फेसबुक पर शांति भूषण प्रशांत भूषण के पक्ष में एक लंबी बहस

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Avinash Das : एक समाजवादी सज्‍जन और एक दलितवादी पत्रकार ने पूछा है कि शांतिभूषण की फीस 25 लाख क्‍यों? मैं ये पूछना चाहता हूं कि शांतिभूषण या प्रशांत भूषण ने वंचितों, संघर्षशीलों और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं के पक्ष में जितनी भी लड़ाई सुप्रीम कोर्ट में लड़ी, क्‍या उनसे भी फीस के रूप में 25 लाख रुपये वसूले?

Yogesh Jadon : सवाल बिल्कुल सही है और इसका जवाब भी आना ही चाहिए

Avinash Das : ये वही शांतिभूषण हैं, जिन्‍होंने इंदिरा गांधी की लोकसभा सदस्‍यता के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में लड़ाई जीती थी और इसके बाद ही इमर्जेंसी लगायी गयी थी। कांग्रेस क्‍यों चाहेगी भला कि लोकपाल की ड्राफ्टिंग कमेटी में इन जैसा दागदार आदमी रहे। तो आप समझ लीजिए कि इनके खिलाफ भ्रष्‍टाचार के तमाम मामले कहां से आ रहे हैं?

Dinesh Mansera : amarvani diggi vani sedhe ..sonia darbar se hoti hai..

Rajeev Ranjan Jha : अविनाश जी, जब आप किसी दल, विचारधारा या कुछ व्यक्तियों से खुद को बांध लेते हैं तो आपकी भूमिका उस वकील की बन जाती है जिसे हर हाल में अपने मुवक्किल के पक्ष में दलीलें रखनी होती हैं। और अक्सर मुकदमे में हार-जीत मामले के तथ्यों पर कम, दोनों पक्षों के वकीलों की काबिलियत पर ज्यादा निर्भर करती है। आप जिन लोगों की तरफ इशारा कर रहे हैं, वे अपने पक्ष के बड़े धुरंधर वकील हैं!

Shashi Kant : भाई अविनाश जी, जिस हिंदुस्तान की 80 करोड़ ग़रीब जनता 20 रुपये रोज़ पर गुज़ारा कर रही है वहां एक वकील 100 करोड़पति कैसे बन जाता है? भ्रष्ट सत्ता-व्यवस्था- दलाल- माफियाओं को कानूनी मदद देकर नहीं कमाई गई है यह रकम? हमें भ्रष्टाचार के खिलाफ़ जनलोकपाल बिल के पक्ष में होना चाहिए या किसी ख़ास शख्स के साथ, वो भी जो सौ करोड़पति हो उसके???

Shailendra Jha : BAAT SHANTI BHUSHn ki villain ya hero banane ki nahi hai, baat ye hai ki shanti bhuahan par yadi daag hai koi joki ham sab ki zindagi me hota hai to use wo publick me aakar dhoyen

Anoop Bahujan : plz don't try to be speaker of wrongdoers. if sm1 is wrong, doesn't get clean chit, why r u advocating for him. It's Indian Politics sir ji, it's not black and white only.

Samar Anarya : जो लोग एक दिन की फीस २५ लाख देने की हैसियत में होंगे,वह बहुत ईमानदार लोग होंगे. उन्होंने बहुत लगन और मेहनत से पैसा कमाया होगा.और इतनी ईमानदारी का पैसा कमाने में भला शांति भूषण जी को क्या परेशानी.

Anoop Bahujan : this is corporate socialism!!!

Anand Pandey : वैसे बिना बेईमानी के भी लाखों कमाए जा सकते हैं और फीस के रूप में दिए जा सकते हैं...हम लोग तो लग भाग पूंजीवादी समाज में हैं..

Samar Anarya : और हाँ, बाबा रामदेव और 'श्री श्री रविशंकर जैसे घोषित विश्व हिन्दू समर्थकों को तो छोडिये.. शांति भूषन १९८० से १९८६ तक भाजपा के सदस्य थे, यह तथ्य जाने क्यों लोग भूलना चाहते हैं.. भूलने पर amada हैं

Anoop Bahujan : ‎Samar Anarya m shocked to kno it.....

Anand Pandey : ‎@Samar जी--क्या विश्व हिन्दू परिषद् का समर्थक होना बुरी बात है? और क्या कोई बी जे पी में जाने के बाद गन्दा हो जाता है?

Avinash Das : ये वही शांतिभूषण हैं, जिन्‍होंने 2010 के सितंबर महीने में सुप्रीम कोर्ट से कहा कि देश के 16 प्रधान न्यायाधीशों में से कम से कम आठ 'निश्चित रूप से भ्रष्ट' थे। सुप्रीम कोर्ट में उन्‍होंने जा हलफनामा दायर किया था, उसमें उन्‍होंने गुजरात हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश एसजे मुखोपाध्याय की एक टिप्पणी का भी उल्लेख किया था, जिसमें उन्होंने कहा था, 'हमारे न्याय तंत्र में किसी को भी खरीदा जा सकता है।' हमारी सर्वोच्‍च अदालत के आलाकमानों पर ऐसी टिप्‍पणी करने वाले और देश की सबसे ताकतवर प्रधानमंत्री की लोकसभा सदस्‍यता समाप्‍त कराने वाले शांतिभूषण को 25 लाख की फीस के मायाजाल में डुबोया जा रहा हो और हमारे कुछ न्‍यायप्रिय साथी नगाड़े बजा रहे हों - तो इस देश के भविष्‍य का अंदाजा लगाना बहुत आसान हो जाता है।

Samar Anarya : ‎Anoop Bahujan Really Anoop Bhai? This is an open secret. Just that with some JNU type revolutionaries have been inviting him so much, celebrating him so much that people just stopped talking about this. You can check the facts! Anas Journalist Agar drafting commitee me shamil kuch log UPA gov. Ko blackmail krna chahte hain to aisa nhi hona chahiye..

Avinash Das : In 1986, he resigned from BJP after the party acted against his advice over an election petition.

Samar Anarya : ‎@anand jee-- मेरे लिए बिलकुल बुरा है. बुरा ही नहीं वरना घृणित है, गलीज है, हत्यारों के साथ खड़ा होना है..यह दोनों हिन्दू धर्मान्धों के गिरोह हैं जो अल्पसंख्यकों को तो छोडिये ही दलित और आदिवासियों का खून भी पीना चाहते हैं..

Avinash Das : i m agree with Samar Anarya

Samar Anarya : यकीन ना हो तो आचार्य गिरिराज किशोर का वह बयान याद कीजिये.. जो उन्होंने झाज्हर में ५ दलितों की हिन्दू भीड़ द्वारा गाय काटने के आरोप में हत्या के बाद कहा था. "गाय का जीवन दलितों के जीवन से ज्यादा महत्वपूर्ण है"

Anand Pandey : समर जी --दुःख हुआ जानकर की हम विरोध में भी स्टीरीओ-टाईप्ड हो गए हैं..

Avinash Das : हालांकि Samar Anarya को ये भी याद रखना चाहिए कि शांतिभूषण कांग्रेस और जनता पार्टी के भी सदस्‍य थे।

Anoop Bahujan : ‎Avinash Das plz don't be a mouthpiece of someone. you should be truthseeker. 1 more thing u always blame upon Dalit & socialist and categorise them, it seems that except Dalit & socialist , everybody are agree with you, isn't it. तय करों किस ओर हो तुम, आदमी हो कि आदमखोर हो तुम!!

Kamalendra Jha : but avi aapas me ladai achhi bat nahi hai... kanhi na kanhi esase un logo ko fayda hoga jo ye chahte hain ki JAN LOKPAL NA BANE.....

Samar Anarya : ‎Avinash Das जानकारी दुरुस्त कर लें अविनाश भाई.. शांतिभूषन कभी कांग्रेस के सदस्य नहीं थे.. वह कांग्रेस (ओ) के सदस्य थे, वह कांग्रेस जो इंदिरा गांधी के खिलाफ वाले धड़े की थी. अब इसमें यह जोड़ें की जनता पार्टी के अन्दर दोहरी सदस्यता की परंपरा थी और उसमे १९८० से ८६ यानी की स्थापना के समय से लेकर कमजोरी के दिनों में भी बीजेपी को चुनने वालों की विचारधारा के बारे में आपको थोडा तो असहज होना चाहिए.

Avinash Das : हम लोकपाल चाहते हैं और चाहते हैं कि सिविल सोसाइटी के कुछ जनोन्‍मुखी कानूनविद उसमें शामिल रहें।

Avinash Das : अब इतना तो पता ही है गुरुदेव Samar Anarya. यह कांग्रेस (ओ) इंदिरा की तानाशाही के विरोध में बनी थी। इसके लीडर थे कामराज और मोरारजी देसाई। और यह पार्टी कांग्रेस आई से ही अलग होने के बाद बनायी गयी थी। संभवत:। गलत हो तो फिर दुरुस्‍त किया जाए गुरुदेव।

Sushant Jha : शांति भूषण ने उग्र हिंदुत्व के मुद्दे पर ही बीजेपी से इस्तीफा भी दिया था...इसे भी समझने की जरुरत है।

Samar Anarya : Avinash Das बिलकुल साहब. अब एकदम दुरुस्त है पर इतना फर्क बहुत कुछ बदल देता है. खैर, जन लोकपाल हमें भी चाहिए, पर ऐसा निरंकुश और अलोकतांत्रिक नहीं. और ऐसा राजनीति-विरोधी भी नहीं. और हाँ , सिविल सोसायटी का तो बिलकुल नहीं..

Sanjay Awasthi : Dalit ke naam par roti sekne wale patrakar aur neta unke shoshd ka kam hi karte hain avinas das

Samar Anarya : ‎@सुशांत झा-- गलत जानकारी है साहब कृपया दुरुस्त कर लें. पार्टी उन्होंने एक चुनाव याचिका को लेकर छोडी थी, उग्र हिन्दूवाद को लेकर नहीं... और हाँ १९८० में पार्टी की स्थापना के समय से ही पार्टी में शामिल होने के कुछ तो मतलब होंगे.

Avinash Das : ‎@ Samar Anarya : कैसा निरंकुश ? और कैसा अलोकतांत्रिक ?? और कैसा राजनीति विरोधी ??? और फिर सिविल सोसाइटी का मतलब आप समझते क्‍या हैं ???? कुछ साफ किया जाए।

Atul K Mehta 'viduur' : Lokpal ki to keval Khal hogi jo Dhal ka kaam bhi karegi....par 'Corrupt Society' ya Elite Society ke Lokpal ka mizaz ekdam RAJ-PUROHIT vala hoga....jo is baar Eklavya ka angootha nahi, apitu uski Gardan hi katva diya karega.....:)

Ravish Kumar : मैं एक संस्थान चलाने वाले को जानता हूं. जो मजबूर होकर संस्थान की मान्यता बचाने के लिए रिश्वत देता रहता है। प्रति दिन के हिसाब से कई हज़ार। लेकिन वो अपने तरीके से भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ता भी है. जिसकी वजह से कई विश्वविद्यालयों के वीसी जेल गए हैं। इस आदमी को हम शूली पर कैसे लटका सकते हैं? कोई सुझाव?

Samar Anarya : ‎Avinash Das निरंकुश ऐसा कि लोकतंत्र के आधार शक्ति विभाजन का नकार है यह सिविल सोसायटी वाला जनलोकपाल.कार्यपालिका, विधायिका, और न्यायपालिका की शक्तियां अलग अलग होनी चाहिए यहाँ एक में समाहित हैं. Checks and balances की बात याद है न?

Ravish Kumar : why can't the corrupt lead an. anticorrupt brigade? u dnt need morals to say dt something is immoral. asish nandy (outlook)

Avinash Das : शांतिभूषण जनता पार्टी में थे, जनसंघ में नहीं। जनता पार्टी की सरकार इमर्जेंसी के बाद बनी थी। एक साल के भीतर अपने ही सरकार टूट गयी। मध्‍यावधि चनाव हुए। कांग्रेस भारी बहुमत से जीती। इंदिरा के खिलाफ गोलबंद हुई राजनीतिक शक्तियां भी बिखरनी शुरू हुई। सन अस्‍सी में बीजेपी बनी। शांति भूषण भी उसमें शामिल हुए। तब बीजेपी के एजेंडे में अयोध्‍या और राममंदिर नहीं था। बजरंग दल और विश्‍व हिंदू परिषद का अस्तित्‍व भी नहीं था। खैर, असहमति के एक बिंदु पर उन्‍होंने पार्टी छोड़ दी। जो लोग इन सूचनाओं को शांतिभूषण के सांप्रदायिक होने और न होने के दावों से जोड़ रहे हैं, उनकी सामाजिक चिंताओं को हमारा सलाम है।

Samar Anarya : अलोकतांत्रिक ऐसा कि पूरा फोकस राजनीतिकों और नौकरशाहों पर है.. उन कार्पोरेशंस पर नहीं जो इस आन्दोलन को फंड कर रहे हैं.. आखिर को स्पेक्ट्रम घोटाले में केवल ए राजा ही दोषी थे अनिल अम्बानी और टाटा थोड़े ही. उनको कोई फायदा कहाँ हुआ. नीरा राडिया टाटा के लिए थोड़े ही काम कर रहीं थी, वह तो सिर्फ राजा के लिए काम कर रही THEEN.

Sushant Jha : समरजी...आपका कहना है कि वे कभी भी बीजेपी में थे तो क्यों थे...जनाव इस हिसाब से तो बड़ा गड़बड़ हो जाएगा अगर ये पूछा जाए कि समर अनार्य कभी समर पांडे थे तो क्यों थे....! कृपया इसे अन्यथा न लें...:)

Samar Anarya : ‎Avinash Das और सिविल सोसायटी का पूरा विचार राजनीति विरोधी है, इसके कुछ पहले प्रवर्तकों में से जोर्ज कोनराद की किताब का नाम ही aNTIPOLITICS है. यह भी जोड़ लें की ग्राम्सी ने सिविल सोसायटी को राज्य सत्ता का भीतरी सुरक्षा कवच बताया है. यह भी की जान पी हैरिस की किताब पढ़ें DEPOLITISIZING DEVELOPMENT. इस आन्दोलन के सालों पहले की किताब है, और तब से कह रही है की सिविल सोसायटी राजनीतिकों पर निशाना साधती है, और कार्पोरेशंस से पैसा लेती है. अब इस आन्दोलन की फंडिंग देखें और तर्क SAMJHEN.

Avinash Das : ये बड़ी विचित्र किस्‍म की बात है कि कॉरपोरेट को भी लोकपाल के दायरे में शामिल होने चाहिए। बहुत मामूली सी बात है कि कॉरपोरेट को फायदे जिन सरकारी नीतियों के तहत पहुंचाये जाते रहे हैं, उन नीतियों पर नजर रखने की जरूरत होनी चाहिए या कि सीधे उस फैक्‍ट्री के मालिक पर, जो घूस लेकर मंत्रालय आता है और डील करता है? कमाल है यार आपलोगों की समझदारी भी !!!

Samar Anarya : ‎@ रविश कुमार जी-- क्या जबरदस्त तर्क है साहब.. फिर तो साम्प्रदायिकता के खिलाफ लड़ाई का नेतृत्वा नरेन्द्र मोदी को सौंप दिया JAAY..

Samar Anarya : ‎@रवीश कुमार-- और हाँ भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई के लिए ए राजा का नेतृत्वा कैसा रहेगा? बाकी उनके साथ बरखा दत्त और नीरा राडिया को भी शामिल कर लें. क्या ख़याल है?

Neeraj Diwan : सही बात है।

Avinash Das : ‎@ Neeraj Diwan : नीरज भाई, कौन सी बात?

Samar Anarya : Avinash Das कमाल हमारी नहीं आपकी समझदारी है साहब. जरा देख लें कि २ज्ञ घोटाले का फायदा किसको हुआ है. और यह भी कि इस देश में टेलेफोन, बिजली, पानी, और तमाम सारी बुनियादी सेवाएँ भी किसके हाथ में हैं. और हाँ, चिकित्सा.. जिसका ७५ प्रतिशत निजी हाथों में हैं, और शिक्षा भी. इनको बाहर रखें, और फिर भ्रष्टाचार दूर करें, कमाल है साहब.

Avinash Das : ‎@ Samar Anarya : अरे गुरु जी, सत्ता पक्ष की पूरी बॉडी राजनीतिक है, जनता ने उन्‍हें चुना है, जो ड्राफ्टिंग कमेटी में शामिल है। क्‍या आप इस गलतफहमी में हैं कि ड्राफ्ट केवल सिविल सोसाइटी के लोग बना रहे हैं?

Neeraj Diwan : ‎@avinash das जो आपने कही।

Samar Anarya : Avinash Das और हाँ, निरंकुशता, अलोक्तान्त्रिकता, और राजनीति विरोध के स्पष्टीकरण पर आप कुछ नहीं बोले, मेरी बात गलत लग रही हो तो भी बता DEN.

Samar Anarya : Avinash Das आप भूल गए हैं शायद, कल तक अन्ना हजारे और उनका गैंग किसी बदलाव पर तैयार नहीं था. वह तो अपना ड्राफ्ट वैसे का वैसा लागू करने पर आमादा थे. वह तो जब परतें खुलनी शुरू हुईं, तब अन्ना जी 'संसद का निर्णय अंतिम होगा वाली भूमिका में आये, नहीं तो ब्लैकमेल है तो है, बार बार करेंगे वाली ताल ठोंक रहे थे.

Suresh Chiplunkar : यदि किसी को प्रगतिशील(?) दिखना है तो उसे नरेन्द्र मोदी का विरोध करना ही पड़ेगा… :) :) अण्णा गैंग ऐसे ही प्रगतिशीलों से भरी पड़ी है…

Samar Anarya : Avinash Das देख लें साहब.. आपको सुरेश चिप्लूकर जी का समर्थन मिल रहा है.. अब भी चेत जाइए साहब

Sushant Jha : यानी अविनाश दास को संघी मान लें...?

Neeraj Diwan : माथे पर मोहर लगाने का वक़्त नहीं है। मैं तो इस पर भी सहमत हूं कि अन्ना और उनके कथित गैंग को किनारे कर दीजिए। लेकिन लोकपाल पर बहस कीजिए। उसके तकनीकी पहलुओं पर सुझाव-आपत्तियां दर्ज कीजिए। और संसद इसे पास करें- इसके लिए मिल-जुलकर दबाव समूह बनाइए।

Samar Anarya : ‎@ सुशांत झा-- अविनाश जी की वाम प्रतिबद्धता कमसेकम मेरे लिए असंदिग्ध है सुशांत जी.. बस मैं यह चाहता हूँ कि वह इस पूरे आन्दोलन को मध्यवर्गीय भावनाओं विस्फोट से पैदा हुई उन्माद वाली नजर से न देख तार्किक विवेचन की नजर से देखें, बस. और हाँ, आपका पहला सवाल, दिमाग से उतर गया था.. समर पाण्डेय का पाण्डेय मेरे परिवार/समाज द्वारा मेरे ऊपर थोपा गया हिस्सा था, या आप यह भी मानते हैं कि एक बच्चा अपना नाम चुन सकता है? 'अनार्य' मैंने चुना, (वैसे पासपोर्ट वगैरह पर अब भी वही पाण्डेय चिपका हुआ है, नाम बदलवाना बहुत बड़ी और कष्टदायक प्रक्रिया है साहब- आखिरी डिग्री का इन्तेजार कर रहा हूँ कि फिर एक साथ कर लूँ) अब आप बच्चे को दिए गए नाम की तुलना पार्टी चुनने जैसे सचेत काम से कर रहे हैं तो आप बेशक बहुत 'बुद्धिमान' HONGE.

Suresh Chiplunkar : अरे समर जी, हम तो वैसे ही "अछूत" हैं, जैसे नरेन्द्र मोदी हैं… अविनाश दास जी का अण्णा गैंग से विरोध (या समर्थन) अलग प्लेटफ़ार्म पर है… हमारा अलग कारण से है…

Suresh Chiplunkar : ‎60 साल हो गये "सो कॉल्ड सेकुलरों" को झेलते… अब एक और नीति निर्धारण समिति में भी ऐसे ही लोग… उफ़्फ़्फ़

Samar Anarya : सुरेश जी- अछूत शब्द को गाली ना दें. सदियों के शोषण और संताप से उपजे गुस्से के विद्रोह में बदलने को इंगित करता है यह शब्द.. आपने जिस राम की तस्वीर अपनी बना के चिपकाई है, उनका शम्बूकवध का प्रसंग तो याद होगा आपको. आप 'चितपावन' लोग क्या समझेंगे उसे.. सो जो हैं वही कहें, अछूत ना BANEN..

Neeraj Diwan : वाम और संघ के बीच फंसे अन्ना हज़ारे कल शाम एक ग़ज़ल गुनगुना रहे थे, "उन्हें ये ज़िद कि मुझे देखकर किसी को ना देख.. मेरा ये शौक है, सबसे कलाम करता चलूं" ! - कुछ ऐसा ही आग्रह हम दोस्तों में भी होता है।

Sushant Jha : ‎@समर- मुझे 'बुद्धिमान' घोषित करने के लिए तहे दिल से शुक्रगुजार हूं।

Suresh Chiplunkar : समर भाई, समझने का ठेका "चितपावन" के अलावा किसी और को भी मिला है क्या? :) :)

Anand Pandey : समर जी--राम का नाम बदनाम न करें! संबुक वध से उनका कोई लेना देना है ..वह तो ब्राह्मणों द्वारा इंटर-पोलेतेड चीज़ है..

Suresh Chiplunkar : नरेन्द्र मोदी यदि 2+2=4 कहे तब भी उसका विरोध करना, यदि इसे "अछूत" नहीं कहते तो क्या कहते हैं?

Samar Anarya : ‎@आनंद जी -- आ हा हा-- वाह भाई ऐसी अद्भुत खोज .उन्ही ब्राह्मणों ने राम कथा भी लिखी है यह तो याद है.. तुलसी बाबा ने.. और असली वाली रामायण (वाल्मीकि जी वाली) में भी यह प्रसंग है.. वह तो जाती से ब्राह्मण नहीं थे. अब इस पर तो @AVINASH DAS की प्रतिक्रिया जाननी ही PADEGEE..

Suresh Chiplunkar : ‎"संघी", "चड्डे", "हिन्दू आतंकवादी", इत्यादि सुनते-सुनते अब हम इस "अछूतियत" के अभ्यस्त हो चले हैं… :) :) :)

Ravish Kumar : मैं नरेंद्र मोदी का विरोध करता हूं।

Suresh Chiplunkar : रवीश जी, बिलकुल कीजिये… यह आपका लोकतांत्रिक अधिकार है

Suresh Chiplunkar : ठीक वैसे ही जैसे "सो कॉल्ड सेकुलरों" का विरोध करना मेरा भी अधिकार है :)

Suresh Chiplunkar : चलो भाईयों, अब घर जाना है… और अर्णब गोस्वामी की "मै ही मैं हूं" सुनना है… नमस्कार कल मिलेंगे :)

Sushant Jha : लेकिन रवीशजी...आपने अन्ना को सपोर्ट किया था...मोदी के विरोध से काम नहीं चलेगा...कुछ ज्यादा करना होगा...!

Ravish Kumar : यहां का वहां न मिलायें तो ठीक रहेगा। बात सिर्फ भ्रष्टाचार के खिलाफ है। ऐसा नहीं है कि बाद में ये लोग सांप्रदायिकता की तरफ हमें धूल मिट्टी की तरह चहेट ले जाएंगे। ड्राफ्ट में समस्या है। कौन कहता है कि नहीं है। मंच से ही कहा जा रहा था कि ज़िद कमेटी के वैधानिक गठन को लेकर है। बातचीत में बहुत सारे प्रस्तावों पर पीछे न हटने को लेकर नहीं। मैंने सुना है मंच से कई लोगों को बोलते।

Ravish Kumar : सुशांत, हम दलीलों का आईपीएल नहीं खेल रहे हैं। मेरी कई दलीलें पिट भी सकती हैं। पिटनी भी चाहिए। मैंने आंदोलनों का कोई अंतिम सत्य हासिल नहीं कर लिया है। हर आंदोलन में अपनी समस्या होती है। नेतृत्व पर सवाल उठते हैं। मुझे मालूम है कि मैं सांप्रदायिक नहीं हूं। न हो सकता हूं।

Ravish Kumar : मुझे इस बहस में दस-शून्य से पराजित समझा जाए।

Ravish Kumar : समर से सहमत हूं। इस बात को लेकर कि ड्राफ्ट के कई पहलुओं से निरंकुशता का आभास होता है। लेकिन जब इस ड्राफ्ट की धुलाई कर रहे हैं तो सरकार की बनाई ड्राफ्ट को भी रिन से नहीं विम से ही सही धो लें तो अच्छा रहेगा।

Sushant Jha : रवीशजी...सही बात है। आपकी टिप्पणी से बहस पटरी पर आ गई है। वह डिरेल हो गई थी। मैंने इसिलिए हास्य में वो लिखा था...:) बाकी आप पर शक कहां है...?

Samar Anarya : ‎@रवीश कुमार-- सरकार के बनाए ड्राफ्ट से कौन सहमत है? पर उसका मतलब यह नहीं है कि कि अन्ना जैसे घोर साम्प्रदायिक, क्षेत्रवादी राज ठाकरे समर्थकों को साम्प्रदायिक बाबाओं के सहारे राजनीति पर ही हमला करने उतार दिया जाय. हाँ आपका पहला तर्क बेतरह निराश करता है, आशीष नंदी के सहारे ही सही यह कहना कि भ्रष्ट लोग भी भ्रष्टाचार के विरुद्ध आन्दोलन का नेतृत्व कर सकते हैं लगभग यही कहने जैसा है कि नरेंद्र मोदी साम्प्रदायिकता के खिलाफ लड़ाई के नेता हो सकते हैं.. बात गलत लगे तो बिलकुल धो डालिए मुझे, पर आप लोग जनमत बनाने वाले लोग हैं, आपसे ऐसी बड़ी गलतियां बहुत कुछ नुक्सान कर सकती हैं..

Avinash Das : Suresh Chiplunkar की टिप्‍पणी है : अरे समर जी, हम तो वैसे ही "अछूत" हैं, जैसे नरेन्द्र मोदी हैं… अविनाश दास जी का अण्णा गैंग से विरोध (या समर्थन) अलग प्लेटफ़ार्म पर है… हमारा अलग कारण से है | इस पर Samar Anarya हमें चेतातें हैं कि देख लें साहब.. आपको सुरेश चिप्लूकर जी का समर्थन मिल रहा है.. अब भी चेत जाइए साहब | अब बाकी लोग निर्णय लें कि चिपलून कर हम जैसों का समर्थन कर रहे हैं या विरोध। उनकी टिप्‍पणी में उनका समर्थन या विरोध साफ है - लेकिन अगर समर को ये समझ में नहीं आ रहा है, तो उनको अपनी समझदारी पर आत्‍मचिंतन करना चाहिए।

Ravish Kumar : अब समर, समस्या किससे है। अन्ना से या भ्रष्टाचारा से। मुझे समस्या भ्रष्टाचार से है। वैचारिक सतर्कता होनी चाहिए. अरविंद केजरीवाल ने टाइम्स आफ इंडिया में लिख कर सफाई दी है कि आंदोलन सेकुलर है और वे लोग भी इसमें यकीन रखते हैं। फिर भी मोदी की तरीफ और रामदेव का जयकारा पचता नहीं है। आप जब सिर्फ इसी लाइन पर चलेंगे तो मैं आपके साथ आने में देरी नहीं करूंगा। पर मुझे नहीं लगता कि( पूरी संभावना है कि गलत हो जाऊं) कि यही आंदोलन का चेहरा है। वैसे भी आंदोलन(अगर था तो) भ्रष्टाचार के खिलाफ था,लोकपाल को लेकर कम। कम को पता था कि लोकपाल क्या है। सबको यही मालूम था कि भ्रष्टाचार के खिलाफ गैर राजनीतिक लोगों ने मोर्चा संभाल लिया है। वर्ना जब बीजेपी ने इस मुद्दे को उठाया था तो कामयाबी नहीं मिली थी। किसी जनसमर्थन को फासिस्ट होने को लेकर सचेत रहना ही होगा। पर चंद बयानों से फिलहाल ख़तरे की कोई गंभीर या साज़िशी बू नहीं आती कि संघ पीछे से चला रहा है। फिर भी यह मसला काफी गंभीर तो है ही। अब यह समझना होगा कि अन्ना ऐसे बयान वैचारिक प्रतिबद्धता के कारण देते हैं या फिर भलमनसाहत के। मेरे पास साबित करने के लिए प्रमाण नहीं हैं।

Samar Anarya : ‎Avinash Das बात दिलचस्प है की आपको चिप्लूकर साहब की 'अछूत' आवाज भी हड़प जाना खतरनाक नहीं दीखता.. मेरा 'चेताना' दीखता है.. क्या करें.. बाकी चिपलूकर साहब के नेता राम माधव मंच पर थे.. विहिप वाले रामदेव थे , रविशंकर थे..यह आप या भूलना चाहते हैं या छिपाना.. क्यूँ अविनाश bhaai?

Sajid Usmani : ‎@ravish ji aap is behas ka IPL 10/0 se jeet gaye hain badhai ho aap ko harana koi majak thode he hai warna aap sab ki khabar le kar friday ko RAVISH KI REPORT ME PESH KAR DENGE.

Ravish Kumar : माधव को लेकर मैंने अरविंद से सवाल किया था. वैसे एक पत्रकार के नाते माधव का काफी इंटरव्यू किया है। खबरी रिश्ते भी रहे हैं। पहले कभी। खैर अरविंद ने बताया कि माधव को भी मंच से उतार दिया गया था। अब मैंने यह देखा तो नहीं था लेकिन जो कहा है वही बता रहा हूं।

Ravish Kumar : ग्राम्सी और मार्क्स के अनुसार जंतर-मंतरिया आंदोलन नहीं था। लंपटिया जमावड़ा था। लेकिन यार दो चार दिनों के लिए लोग सड़क पर उतर ही आए तो इतना क्या लोड लेना। उन्हें राजनैतिक होने की प्रैक्टिस तो करने दीजिए। बहस काफी गंभीर हो जाती है तो मैं हल्का होने लगता हूं। क्या करें।

Anand Pandey : समर जी : ".उन्ही ब्राह्मणों ने राम कथा भी लिखी है यह तो याद है.. तुलसी बाबा ने.. और असली वाली रामायण (वाल्मीकि जी वाली) में भी यह प्रसंग है" जी हाँ उत्तर कांड जिसमे यह वाली कहानी, सीता की अग्नि परीक्षा, इत्त्यादी है, वह बाद में जोड़ा गया है...असल वाले वाल्मीकि रामायण में नहीं था यह ..देखिये यह विकी लिंक : http://en.wikipedia.org/wiki/Ramayana#Uttara_Kanda

Sajid Usmani : ‎@RAVISHSAHI KEH RAHE HAIN AAP MEN SCHOOL SE CHUTTI LEKAR GAYA THA RSS WALE MADHAV KO EX BJP WALI UMA KO MANCH PE NAHI BAITHAYA BAAKI SAB KI ACESS THI

Ravish Kumar : अच्छा दोस्तों अब हे हे हे मेरी तरफ से भी। चलता हूं। मूर्खता पर सिर्फ मूर्खों का अधिकार नहीं है। मेरा भी है।

Anand Pandey : खैर, यह इस चर्चा से परे है सो हम लोग अभी इसपर न बात करें तो ठीक है..बाद में आप कभी भी जब फुर्सत में हों तो हम लोग इस विषय पर भी बात चीत कर सकते हैं.

Sajid Usmani : KHOONI KRANTI KO HI KRANTI KYUN SAMJHA JATA HAI BHALE HI VIRAT JAMAVDA NA HUA HO PAR LOG APNE MAN SE AAYE THE. KUCH BHRASTHACHAAR SE TRAST KUCH JIGYASA VASH

Sajid Usmani : ‎@RAVISH JI AAP JAISA DHEER GHAMBHIR AADMI KIS BEKAAR KI BEHAS ME PAD GAYA MUJHE PATA HAI AAP KE PAAS AUR BHI PRODUCTIVE KAAM HONGE

Neeraj Diwan : यूं भी अर्बन मिडिल क्लास के मुंह आंदोलन का स्वाद लग गया है। कम से कम यह अहसास तो कि कुछ करेंगे तो सरकार भी सुनेगी। सही कहा.. नैट प्रैक्टिस। अभी अनशन फिर आगे और..

Avinash Das : आपके लिए Samar Anarya यह लेख http://mohallalive.com/2011/04/22/pankaj-srivastava-react-on-critics-of-anna-s-movement/ और दूसरे कि चिपलूनकर जैसों के बारे में मेरी राय जगजाहिर है।

Samar Anarya : ‎@रवीश कुमार जी-- राम माधव जी पूरी इज्जत से मंचासीन रहे.. मैं नहीं जानता की झूठ आप बोल रहे हैं या अरविन्द जी.. पर अरविन्द केजरीवाल के टाइम्स ऑफ़ इण्डिया में दिए गए 'सेकुलरिज्म' वाले बयां के जवाब में एक (बेशरमी के साथ अपने ही लेख का हवाला दे रहा हूँ.. क्या करूँ बड़े लोग सब उस तरफ हैं..) उसी से कुछ लिंक दे रहा हूँ.. जांच len..

Samar Anarya : http://in.jagran.yahoo.com/news/national/national/5_2_7567157.html

Samar Anarya : और हिन्दू वाले इस लिंक में तो फोटो भी है.. आपसे लोगों को जिम्मेदारी की उम्मीद रहती है रवीश जी, गलतबयानी की नहीं.. http://www.thehindu.com/todays-paper/tp-national/article1629646.ece?css=print

Vineet Kumar :  स्टेटस को गौर से और टिप्पणी को जहां-तहां से पढ़कर कमेंट कर रहा हूं कि 25 लाख रुपये की जो फीस उन्होंने ली क्या इस पर बात नहीं करेंगे कि किससे ली? क्या किसी भी एक ऐसे शख्स से ली जो लाचार है,घर-दमीन,किडनी बेचकर दी है। अगर नहीं तो जिसके पास अकूत,काला,सफेद,ग्रे दुनियाभर की अलग-अलग किस्म की मनी है तो उनसे लेना कुछ गलत नहीं है औऱ जो बाकी लोग इसमें भी शोषण और ब्ला,ब्ला देख रहे हैं तो मेरी अपनी समझ है कि अमीरों को लुटो और गरीबों पर लुटाओ,तभी कुछ बदलाव संभव है। इस देश में गरीबों को लूटकर,अमीरों पर लुटाया जाता है, जो है, उसी की भरी जाती है। इसलिए मैं सैद्धांतिक तौर पर सक्षम लोगों से 25 क्या करोड़ रुपये लेने के पक्ष में हूं। हां, शर्त ये हैं कि टैक्स और बाकी संवैधानिक प्रावधानों के तहत।

Avinash Das : हद हो यार। हिंदू वाले इस लिंक में अन्‍ना के साथ शांतिभूषण की तस्‍वीर है। राम माधव की भी होती तो उससे क्‍या साबित हो जाता। रवीश ने यही कहा कि अ‍रविंद केजरीवाल से जब उन्‍होंने इस बाबत पूछा तो उन्‍होंने जवाब दिया कि उन्‍हें भी मंच से उतार दिया गया था। इसमें निहित है कि वे मंच पर थे। आप गलतबयानी जैसे जुमले किस बात को लेकर इस्‍तेमाल कर रहे हैं, आप ही बताएंगे। पर इस मिजाज में मत रहिए कि अब तो हर चीज का विरोध कर के ही रहूंगा - चाहे जो हो जाए।

Avinash Das : ‎@ Ravish Kumar : रवीश डियर, आप अपना हे हे हे वापस ले लें... Samar Anarya ने अपना हे हे हे डिलीट कर दिया है।

साहित्य शिल्पी ई-पत्रिका : मुझे इस लेख के आरंभ से भी आपत्ति है। क्या लेखकों और पत्रकारों का वर्गीकरण जाहिर है? "समाजवादी सज्‍जन और एक दलितवादी पत्रकार" वाक्य से बहस का आरंभ कर अविनाश क्या सिद्ध करना चाहते हैं? समाजवादी सज्जन होना गलत है या दलितवादी पत्रकार? या फिर आप हमेशा की तरह अपनी वामपंथी कट्टरता का झंडा बुलंद कर रहे हैं? मेरी कमीज ज्यादा सफेद सिद्ध करने वाली दास्तान...भ्रष्टाचार की वकालत ही है आपका वक्तव्य। पीआईएल आत्मप्रचार का बडा बिजनेस है जिसकी आड में बडी महत्वाकांक्षायें आसानी से सिद्ध होती हैं।

Avinash Das : मेरा एक कमेंट पता नहीं कहां चला गया, जो मैंने ऊपर Samar Anarya को संबोधित किया था। खैर, मैंने लिखा था : हिंदू वाले लिंक में अन्‍ना के साथ राम माधव की नहीं, शांति भूषण की तस्‍वीर है। देखिए समर राम माधव का चेहरा भी नहीं जानते। खैर, वे बार-बार रवीश पर गलतबयानी का आरोप लगा रहे हैं। रवीश का बयान था - माधव को लेकर मैंने अरविंद से सवाल किया था. वैसे एक पत्रकार के नाते माधव का काफी इंटरव्यू किया है। खबरी रिश्ते भी रहे हैं। पहले कभी। खैर अरविंद ने बताया कि माधव को भी मंच से उतार दिया गया था... अब इस बयान में रवीश ने यह नहीं कहा कि माधव मंच पर चढ़े नहीं थे। मंच पर चढ़े थे, बैठे थे - तभी तो उतार दिया गया था। यार कुछ तो लिहाज करो अपना। जरूरी नहीं कि लोकपाल या अन्‍ना या शांतिभूषण के खिलाफ हो, तो मुंह से झाग निकालने की हद तक बहस करो।

Avinash Das : अरे! शुक्रिया फेसबुक!! ऊपर वाला कमेंट भी आ गया!!!

Samar Anarya :  ‎Avinash Das भाषा बदलती है तो बौखलाहट दिखने लगती है. तर्कों में कमजोर पड़ने की बौखलाहट. जैसे आप ने शांतिभूषण को कांग्रेस ओ की जगह कांग्रेस का बता देने के बाद कहा था की इतना तो मैं भी जनता हूँ.. मैंने भी हिन्दू वाली तस्वीर में यह नहीं कहा की यह राम माधव हैं. बात सीधी और साफ़ थी की हिन्दू वाली तस्वीर में तो फोटो भी है, मतलब कोई फोटो है, राम माधव के होने का जिक्र करता तो सीधे कहता की राम माधव की फोटो है. हाँ मामला मुह से झाग निकलने वाला जरूर है.. रवीश जी की बात के जवाब में मेरा सीधा बयान था की "रवीश कुमार जी-- राम माधव जी पूरी इज्जत से मंचासीन रहे.. मैं नहीं जानता की झूठ आप बोल रहे हैं या अरविन्द जी.. पर अरविन्द केजरीवाल के टाइम्स ऑफ़ इण्डिया में दिए गए 'सेकुलरिज्म' वाले बयां के जवाब में एक (बेशरमी के साथ अपने ही लेख का हवाला दे रहा हूँ.. क्या करूँ बड़े लोग सब उस तरफ हैं..) उसी से कुछ लिंक दे रहा हूँ.. जांच len.."

Samar Anarya : ‎Avinash Das अब जरा देख लें के मेरा वाक्य था की पता नहीं झूठ आप बोल रहे हैं या अरविन्द केजरीवाल..और बाद की एक टिप्पणी में फिर बात सीधी थी "आपसे लोगों को जिम्मेदारी की उम्मीद रहती है रवीश जी, गलतबयानी की नहीं.. "

Neeraj Diwan : राममाधव बाइज़्ज़त मंच पर आसीन थे। ये है तस्वीरें और संघ का समर्थन पत्र भी http://alturl.com/4zzgh

Avinash Das : अरे भाई, रवीश का आखिरी वाक्‍य एक बार फिर पढिए - अब मैंने यह देखा तो नहीं था लेकिन जो कहा है वही बता रहा हूं। अब इसके बाद भी आप कहते हैं कि रवीश गलतबयानी कर रहे हैं, तो आपकी मानसिक बुनावट की बलिहारी।

Avinash Das : आप सब लोगों के लिए पंकज भाई का आलेख अग्रसारित। कृपया जरूर पढ़ें : http://mohallalive.com/2011/04/22/pankaj-srivastava-react-on-critics-of-anna-s-movement/

Samar Anarya : अब झूठ और गलतबयानी का अंतर तो समझते होंगे.. हाँ हे हे हे गलती से टाइप हो गया था.. किसी और दोस्त के एक सादा सी बात का सादा सा जवाब.. पहले ध्यान भी नहीं गया.. ध्यान जाते ही हटा लिया.. हाँ यह और की आप जैसों से मुंह से झाग निकलने वाली भाषा के उम्मीद नहीं रहती, तो थोडा झटका खाया हुआ हूँ.. यह भी की मेरी हर बात पर दौड़ा लेने के अभ्यस्त आप रवीश जी के भ्रष्टाचार के खिलाफ आन्दोलन का नेतृत्व भ्रष्ट भी कर सकते हैं तक देख ही नहीं पाते.. अब इस पर यह कहूँगा की 'बढ़िया है'

Samar Anarya : ‎@Avinash Das अब लीजिये.. अब तो नीरज जी ने राम माधव जी के तस्वीरें भी खोज डालीं.. मंच पर..और हाँ अविनाश भाई.. जिन भोथरे तर्कों का सहारा आप बार बार ले रहे हैं.. चाहे वह पंकज श्रीवास्तव के हों या शशि झा के..उनका जवाब बारहा दिया गया है.. मेरे लेखों को छोडिये, अपूर्वानंद जी ने भी कुछ लिखा था, और भी तमाम लोगों ने..आप नहीं सुनेंगे.. नहीं सुन रहे हैं...

Samar Anarya : सवाल है की इस आन्दोलन को कार्पोरेशंस क्यूँ फंड कर रहे थे? और क्या यही कारण है की जन लोकपाल बिल कार्पोरेशंस के जांच को तैयार नहीं है? इस आन्दोलन के ६ नेताओं में से २ सीधे सीधे विश्व हिन्दू परिषद् के हैं.. उसकी धर्म सांसदों में जाते रहे हैं.. तीसरे अन्ना हजारे स्वयम ने लगातार शिवसेना का राज ठाकरे का समर्थन किया है.. आन्दोलन के तुरंत बाद मोदी को बेहतर बता कर उन्होंने रहे सहे भ्रम भी खोल दिए.. आप यह देखना नहीं चाहते या आपको दिख ही नहीं रहा?

Samar Anarya : Avinash दस तीसरा सवाल यह है की यह आन्दोलन सिर्फ राजनीति और नौकरशाही को क्यूँ निशाना बना रहा है.. आन्दोलन वाले तो जानते होंगे की यही दो जगहें हैं जहाँ दलित/पिछड़ी शोषित आबादी आ पाई है.. क्या यह सवर्ण/आभिजात्य वर्ग के फिर से हुंकार है या नहीं?

Samar Anarya : और हाँ, को देश बांटने वाला बताते हैं और संतोष हेगड़े का एक निर्णय यूथ फॉर इकुआलीटी का अब तक का सबसे प्रिय निर्णय होता है.. आप देख नहीं पा रहे या देखना नहीं चाहते?

Samar Anarya : ‎Avinash Das चौथा सवाल.. जन लोकपाल बिल लोकतंत्र के मूल धारणा शक्ति विभाजन के खिलाफ क्यों है? यह सारी शक्ति एक लोकपाल के हाथ में क्यों समेत देना चाहता है, यह एक साथ विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका क्यों बनना चाहता है? लोकतंत्र के जरा सी भी समझ वाले को इससे डरना चाहिए.. आप जाने क्यों नहीं dar रहे..

Samar Anarya : पांचवा सवाल-- यह सिविल सोसायटी है क्या? इसमें कोई दलित/पिछड़ा/शोषित वंचित तबका शामिल क्यों नहीं है? छोडिये, इसमें उतर पूर से कोई क्यों नहीं है? कश्मीर से कोई क्यों नहीं है? क्या अकारण ही? या यह इलाके सिविल सोसायटी के 'भारत' में नहीं aate..

Samar Anarya : अब बन सके तो जवाब दीजियेगा या ऐसा कोई लेख दिखाइएगा जिसमे इन सवालों से उलझा गया हो.. भावनात्मक उल्टी वाले (शब्द असंसदीय नहीं है, ख़ास तौर पर मुंह से झाग निकलने वाले आरोप के बाद) लेख, हम भी क्रांतिकारी हैं वाले लेख.. बहुत पढ़ लिए.. सीधे सवाल हैं, साहस हो, विवेक हो तो सीधे जवाब deejiyega...

Avinash Das :  ‎@ Samar Anarya : जैसे जैसे आपके सवाल सामने थे, वैसे वैसे हमने जवाब देने की कोशिश की है... 1) हमने झाग निकलने वाली भाषा का इस्‍तेमाल किया और आप हमारे तर्कों को भोथरा बतानी वाला का इस्‍तेमाल कर रहे हैं। इस पर मैं भी कहूंगा - "बढ़‍िया है!" 2) पंकज श्रीवास्‍तव और शशि झा के लेख के जवाब में आपके बारहा दिये गये तर्कों का अंतिम निष्‍कर्ष यही है कि आंदोलनों का विशेषाधिकार सबके पास नहीं होना चाहिए। कुछ खास, पवित्र किस्‍म के लोगों के पास होने चाहिए। मैंने अपूर्वानंद जी को पढ़ा भी और उनको छापा भी। आपको भी मंच दे ही रहे हैं... 3) जंतर मंतर पर एक दानपेटी थी, वहां कोई भी दान दे सकता था। आप भी दे सकते थे, कॉरपोरेशंस ने भी दिये। इसमें हैरानी की क्‍या बात है? जन लोकपाल बिल के दायरे में कॉरपोरेशंस क्‍यों नहीं हैं - इसका जवाब ऊपर मैंने एक कमेंट में दिया है। फिर यहां चिपका रहा हूं - ये बड़ी विचित्र किस्‍म की बात है कि कॉरपोरेट को भी लोकपाल के दायरे में शामिल होने चाहिए। बहुत मामूली सी बात है कि कॉरपोरेट को फायदे जिन सरकारी नीतियों के तहत पहुंचाये जाते रहे हैं, उन नीतियों पर नजर रखने की जरूरत होनी चाहिए या कि सीधे उस फैक्‍ट्री के मालिक पर, जो घूस लेकर मंत्रालय आता है और डील करता है? कमाल है यार आपलोगों की समझदारी भी !!! 4) इस आंदोलन के छह नेता थे - शांति भूषण, प्रशांत भूषण, अरविंद केजरीवाल, किरण बेदी, स्‍वामी अग्निवेश और स्‍वयं अन्‍ना हजारे। मुझे ये बताया जाए कि इनमें से दो कौन सीधे सीधे विश्‍व हिंदू परिषद से जुड़े हैं? बाकी हमें सब दिखता है और सब कुछ देखते हुए भी हम लोकपाल की लड़ाई जीतना चाहते हैं, क्‍योंकि आरटीआई की तरह जनता के हाथ में एक और धारदार बंदूक होगी। ‎5) लोकपाल राजनीति के ऊपर नहीं बैठेगा, राजनीतिक सत्ता के ऊपर बैठेगा। आप इस बात की लड़ाई छेड़‍िए कि लोकपाल दलित ही होना चाहिए - हम आपकी लड़ाई में साथ होंगे। नौकरशाही पर अभी सीधे सीधे सत्ता की कमान होती है। लोकपाल बिल अभी तक लटका ही इसलिए रहा, क्‍योंकि इस बिल में यह प्रावधान है कि नौकरशाही की लगाम एक के हाथ में नहीं होगी। एक कमेटी होगी, जो उसका ताना-‍बाना तय करेगी। उस कमेटी में विपक्ष भी होगा। तो ट्रांसफर-पोस्टिंग की धांधली तो सबसे पहले बंद होगी। पता नहीं, आप जैसे अभूतपूर्व बुद्धिजीवी नारेबाजी की शैली में तर्क क्‍यों गढ़ने-देने लग जाते हैं। 6) संतोष हेगड़े का ड्राफ्टिंग कमेटी में होना महज एक तकनीकी मामला है और लोकायुक्‍त की हैसियत से उन्‍हें पता है कि शक्तियों का बंटवारा ड्राफ्ट में कैसे होना है। यह अप्रत्‍याशित नहीं है कि कांग्रेस लॉबी और लोकपाल और अनशन के विरोधियों की लॉबी हेगड़े और शांतिभूषण-प्रशांतभूषण के पीछे लगी हुई है। ये तीनों ही कानूनविद हैं, जो सिविल सोसाइटी की ओर से ड्राफ्टिंग कमेटी में हैं। इनके होने से ड्राफ्टिंग में जो पैनापन आएगा, उसको समझा जाना चाहिए। नहीं समझेंगे तो भी आपका क्‍या बिगड़ेगा? आप जैसों को जनता से क्‍या मतलब? 7) जनाब ये आपसे किसने कह दिया कि जन लोकपाल बिल लोकतंत्र की मूल धारणा शक्ति विभाजन के खिलाफ है? फिर आपको पता ही नहीं है दरअसल कि जन लोकपाल क्‍या है? ये शक्ति के विकेंद्रीकरण और केंद्रीयता की तानाशाही के खिलाफ होगा। लोकपाल का पॉलिसी मेकिंग में कहीं कोई योगदान नहीं होगा। लोकपाल का कामकाज लोकतांत्रिक नक्‍शे के भीतर ही समाहित होगा। वह अलग से कोई सैन्‍य बॉडी नहीं होगी। आप तो जैसे सवाल कर रहे हैं, उस हिसाब से तो आरटीआई भी लोकतंत्र के खिलाफ का मामला है। फिर तो जनता की चुनी हुई सरकार से किसी को सवाल करने का हक ही नहीं होगा? कोई सूचना मांगने का भी हक नहीं होगा? खैर, मुझे यह बताइए कि पिछले साठ सालों में कितने नेता भ्रष्‍ट हुए होंगे - किसी आंदोलन ने किसी नेता को राजनीतिक जमीन से बेदखल किया। उसे सजा दिलवा पाया। फिर नये रास्‍ते क्‍या होंगे? आप कहें, क्रांति ही वह रास्‍ता होगा। हमारा आखिरी उत्तर होगा - हमें ऐसे नारों से डरना चाहिए, जो वस्‍तुस्थिति की परवाह किये बगैर रेगिस्‍तान में पानी तलाश रहा हो। 8) क्‍या हास्‍यास्‍पद सवाल है कि सिविल सोसाइटी में दलित, पिछड़ा, शोष‍ित, वंचित तबका शामिल क्‍यों नहीं है? एक काम कीजिए, संताल परगना से किसी गरीब आदिवासी का उठा कर ड्राफ्टिंग कमेटी में शामिल कर दीजिए। हद है भाई। अरविंद केजरीवाल जिस आरटीआई कानून के लिए लड़े, उस कानून का लाभार्थी वही दलित, पिछड़ा, शोषित, वंचित तबका है। शांति भूषण, प्रशांत भूषण जिस तबके की लड़ाई सुप्रीम कोर्ट में लड़ते रहे, वह दलित, पिछड़ों, शोषितों, वंचितों का ही तबका था। आप खुद उच्‍चकुलीन ब्राह्मण हैं और आप दलितों, पिछड़ों, वंचितों के हक में बोल रहे हैं, तो क्‍या आपको यह कह दिया जाए कि आप चुप रहिए, किसी दलित, पिछड़े, वंचित को बहस करने के लिए लाइए। हद है यार। 9) आंखें खोलिए। मैंने लेख पेश करने के बजाय सिलसिलेवार जवाब देने की कोशिश की है। पर मुझे पता है, आप आंखों का पट जरा सा खोलेंगे और आधा भी नहीं पढ़ेंगे कि जवाब देने में जुट जाएंगे - क्‍योंकि अंतत: आपको किसी को यह नहीं बताना पड़ेगा कि समर को चुप कोई नहीं करा सकता। खैर, आपके अगले किसी भी सवाल का जवाब देकर वक्‍त बर्बाद करने से बेहतर होगा कि आपको बिंदास लिखने-बोलने दिया जाए।

Nadim S. Akhter : बहस बहुत गर्मागरम है..अगर आप लोग इजाजत दें तो बस इतना कहना चाहूंगा कि साधन और साध्य में से ज्यादा महत्वपूर्ण कौन है...फैसला आपके हाथ में है।

Avinash Das : सिविल सोसाइटी = http://en.wikipedia.org/wiki/Civil_society

Avinash Das : मुझे कुछ नहीं कहना है... मेरे तर्क भोथरे हैं कि क्‍या हैं, इसका फैसला मैं समर अनार्य के ही हाथों में दे देता हूं और मान लेता हूं कि मैं हतबुद्धि इस देश का नागरिक होने के लायक नहीं हूं। आमीन।

Samar Anarya : Avinash Das इस बार बढ़िया है की परतें थोड़ी खुली हैं.. फिर से देख लीजिये की आप के तर्क कितने भोथरे हैं.. (बात फिर वही की झाग वाली भाषा भी आप ही ले के आये थे तो फिर से... बढ़िया है)

१- पंकज और शशि झा साहब के लिखे लेखों के किसी भी जवाब में कम...सेकम मैंने आन्दोलनों का विशेषाधिकार किसी ख़ास 'पवित्र' तबके के हाथ में होने के बात नहीं के थी. यह आप के जवाब पढने के सीमा हो सकती है, इसे कृपया मेरे तर्कों पर आरोपित ना करें.

२- मेरा सीधा सवाल कुछ ख़ास आभिजात्य लोगों के 'राष्ट्र' के अव्वाज बनने के दावे पर था. ३००० लोग राष्ट्र के आवाज नहीं होते, ख़ास तौर पर तब जब तीन लाख लोग इसी शहर में एक महीने पहले इसी मीडिया द्वारा उनकी रैली के वजह से हुए ट्रैफिक जाम को लेकर खलनायक बनाये गए हों. कहने के जरूरत नहीं की वह मजदूर लोग थे और यह बड़ी कारों वाले अंग्रेजीदां..

३-इससे बड़ी हास्यास्पद बात हो ही नहीं सकती की " जंतर मंतर पर एक दानपेटी थी, वहां कोई भी दान दे सकता था।"

आप० सच में यह समझ रहे हैं अविनाश जी? संस्थागत फंडिंग और दानपेटियों का फरक समझाने के कोशिश कीजिये.. या फिर अरविन्द केजरीवाल से ही पूछ लीजिये की पैसा उन्हें चेक से मिला था या दानपेटियों में..

4-आपका अगला तर्क खैर और दिलचस्प है. आप कह रहे हैं की " बड़ी विचित्र किस्‍म की बात है कि कॉरपोरेट को भी लोकपाल के दायरे में शामिल होने चाहिए। बहुत मामूली सी बात है कि कॉरपोरेट को फायदे जिन सरकारी नीतियों के तहत पहुंचाये जाते रहे हैं, उन नीतियों पर नजर रखने की जरूरत होनी चाहिए या कि सीधे उस फैक्‍ट्री के मालिक पर, जो घूस लेकर मंत्रालय आता है और डील करता है? कमाल है यार आपलोगों की समझदारी भी !!!"

आप कहना क्या चाहते हैं अविनाश जी.. की नीरा राडिया से लेकर बरखा दत्त तक मंत्री बनाने के लिए जो लोबीइंग करती हैं वह अपने आप होती है? आप यह कहना चाहते हैं की भ्रष्टाचार को सांस्थानिक बनाने में कार्पोरेशंस की कोई भूमिका नहीं है? या आप यह नहीं जानते की स्वास्थ्य सेवाओं का ७२ प्रतिशत इस देश में इन्ही निजी क्षेत्र वालों के हाथ में हैं जिनको सरकारी जमीनें इस नाम पर मिली हैं की वह २५ प्रतिशत गरीब लोगों का निशुल्क इलाज करेंगे.. वह नहीं कर रहे.. यह भ्रष्टाचार कैसे रोकेंगे आप? बड़े बड़े निजी स्कूलों में भी यही बात है. या आप यह नहीं जानते की बिजली निजी क्षेत्र से वितरित हो रही है, यहीं इसी दिल्ली में..

अन्ना हजारे तक दबाव में कार्पोरेशंस को लोकपाल के दायरे में लाने को तैयार हैं, आप क्यों नहीं..

५- बाबा रामदेव को क्यों भूल गए आप? और उन श्री श्री रविशंकर को जिनको अन्ना हजारे ने पहला धन्यवाद दिया? यह सिर्फ चूक तो नहीं हो सकती अविनाश जी. आरटीआई और लोकपाल का फरक भी. आरटीआई सरकार को जवाबदेह बनाने का औजार है और लोकपाल एक संस्था को 'सुपर सरकार' बनाने का.. ऊपर से यह बन्दूक जनता के नहीं नोबेल और मैग्सेसे विजेताओं के हाथ में होगी..

Avinash Das : आप ऊपर के कमेंट मिटा रहे हैं, फिर लिख रहे हैं - माजरा कुछ समझ में नहीं आ रहा है। खैर, आपके आखिरी जवाब से ऐसा लग रहा है कि आपको वाकई पता नहीं है लोकपाल का पूरा ढांचा क्‍या होगा। आप यही बता दीजिए कि लोकपाल के हाथ में क्‍या क्‍या शक्तियां होंगी और उसका गठन कैसे किया जाएगा। बता ही दीजिए - फिर हम सब समझ लेंगे कि आपको पता है लोकपाल की पूरी संरचना और अपनी लोकपाल के बारे में अपनी गलत धारणा से उबर भी जाएंगे। बता ही दीजिए जरा।

Avinash Das : जनसत्ता में योगेंद्र यादव का परसों एक लेख छपा है। कल इसे मोहल्‍ला लाइव पर कॉपी-पेस्‍ट करूंगा। उसमें कुछ वाक्‍य इस तरह है : जमीन पर संघर्ष कर रहे कार्यकर्ताओं को अक्‍सर बुद्धिजीवियों की सैद्धांतिक आलोचनाओं से चिढ़ होती है। कई बार ऐसी आलोचनाएं जमीनी हकीकत की नासमझी से पैदा होती हैं। कुछ हद तक यह बात अन्‍ना हजारे के आंदोलन की आलोचना पर भी लागू होती है। इस आंदोलन को संघ परिवार की उपज मानने वाले लोग जनांदोलनों की दुनिया की बारीकियों से नावाकिफ हैं।

Samar Anarya : ‎5) यह फिर से गलत समझदारी है आपकी.. लोकपाल राजनीतिक सत्ता के ऊपर नहीं राजनीति के ऊपर बैठेगा.. इसका मतलब है वह किसी को जवाबदेह नहीं होगा.. संसद को भी नहीं.. हाँ यह आप की अद्भुत दृष्टि ही है जो नोबेल विजेताओं और मैग्सेसे विजेताओं की समिति को जिम्मेदार समिति मान लेती है. यह भी बता दें की यह समिति किसके प्रति जवाबदेह होगी..(यही सवाल अपूर्वानंद जी ने भी उठाये थे, हिन्दू की विद्या सुब्रमनियम ने भी.. और भी तमाम लोगों ने.. तो यह भी बता दें

6) जी हाँ, आप सही कह रहे हैं की कानूनविदों के समिति में होने से पैनापन आएगा.. जैसे शांति भूषन द्वारा दलबदल के खिलाफ ड्राफ्ट किये गए कानून से आया था.. पता नहीं आप जानते भी हैं या नही की वह क़ानून जिसके बाद व्यक्तिगत दलबदल झुण्ड के दलबदल में बदल गया उन्ही का बनाया था.. बाकी.. आप खुशी से जनता के साथ रहिये, हम बाहर ही सही..

7) जन लोकपाल बिल लोकतंत्र की मूल धारणा शक्ति विभाजन के खिलाफ है यह मुझसे इस बिल के अध्ययन ने कहा है जनाब. पूरे ड्राफ्ट को कई बार पढने के बाद.. लोकपाल जांच भी करेगा, सजा भी देगा, क़ानून भी बनाएगा..यह आपको शक्ति विभाजन लगता है? तब तो फिर बलिहारी है..

जनता की चुनी हुई सरकार से जनता को सवाल करने का हक़ है, विपक्ष सालों साल यही करता है. और ६० सालों का सवाल.. वी पी सिंह और बोफोर्स तो आप जानते ही होंगे.. कोंग्रेस तब की चोट से अब तक नहीं उभर पायी है.. पर आप तो सिविल सोसायटी वाले हैं, अनपढ़ गरीब जनता रजा को फकर कैसे बना देती है, उसे देश की तकदीर कैसे बना देती है क्यूँ कर याद रखेंगे.

8) काश आप जानते होते की आरटीआई कानून के लिए अरविन्द केजरीवाल नहीं लादे.. ब्यावर का गरीब मजदूर लड़ा.. एम्केएसएस के नेतृत्व में. ५० दिनों तक तहसील घेर के रखने के वह घेरा डालो डेरा डालो वाली राद्नीति राजस्थान में आर टी आई कानून बनवाने में कामयाब हुई. आप नहीं जानते शायद की यही वह क़ानून है जो बाद में राष्ट्रीय स्तर पर इस क़ानून की लड़ाई का जनक और मॉडल है.. कैसे जानेंगे, उस लड़ाई में गरीब मजदूर था तो कैमरे नहीं थी सिर्फ प्रिंट मीडिया था.. (वैसे हम वहीं थे.. पूरी लड़ाई में नहीं पर चंद रोज जरूर)

अब आप शायद समझ पायें की हमारा पैसा हमारा हिसाब का नारा अरविन्द केजरीवाल के श्रीमुख से नहीं राजस्थान के गरीब किसान मजदूरों के संघर्ष में गधा गया नारा है..बाकी यह की आपकी संथाल परगना के आदिवासियों के लिए की गयी यह टिप्पणी कुछ और भी इशारे कर रही है.. खैर उसके बारे में फिर सही..

और हाँ, "उच्‍चकुलीन ब्राह्मण' तो छोडिये मैं हिन्दू ही नहीं हूँ.. नास्तिक हूँ. और अगर आप जन्म की वजह से बता रहे हैं तो दर्ज कर लें की 'पाण्डेय' उच्च कुलीन नहीं होते, वह '१३' के ब्राहमण हैं.. उत्तर भारत में उच्च कुलीन सिर्फ तीन हैं.. शुक्ल मिश्र और त्रिपाठी.. तो यह तथ्य भी सही कर लें..

९- हमारी तो ऑंखें खुलीं हुई हैं साहब.. आप ही आँखें बंद कर आरोप लगाये जा रहे हैं. इस बहस में आपको, या किसी को चुप कराने के इरादे से नहीं आया था, वैसे भी उसका बेहतर तरीका बहस नहीं 'झाग उगलने' जैसा आरोप होगा.. वह करना होता तो तर्क ना करता.. खैर अच्छा हुआ की आपने बात साफ़ कर दी..

बिलकुल आप अपना बहुमूल्य समय बर्बाद ना करें.. कहें तो मैं अब तक बर्बाद हुए वक्त के लिए माफी वाफी भी मांग लूँ.

Samar Anarya : uupar ke kament mita nahee raha tha avinash jee, ye facebook ke naye awtaar me enter daba dene se adhooree baat bhee paste ho jaate hai aur ab tak shift enter kee thek se aadat nahee padee hai.. bas..

Avinash Das : अभी लोकपाल की ड्राफ्टिंग चल रही है। अभी उसी ड्राफ्ट में ये तय होगा कि लोकपाल को कैसे चुना जाएगा और वह अंतत: किससे प्रति जिम्‍मेदार होगा। आप और अपूर्वानंद जैसे अतर्यामियो को क्‍या कहा जाए... जिनको दरअसल पता नहीं है कि लोकपाल बिल का मतलब क्‍या होगा।

Avinash Das : दिक्‍कत ये है कि आप जवाब पढ़ते ही नहीं हैं, अपनी ही भांजते चलते हैं। दलबदल वाले कानून के संदर्भ में मैंने एक जवाब आपको दिया हुआ है - व्‍यक्ति को खरीदना आसान होता है, समूह को खरीदना आसान नहीं होता – दलबदल कानून के संदर्भ में शांतिभूषण की मंशा पर संदेह करने वालों को ये समझना चाहिए। लेकिन अगर संदेह करने वाले का नाम समर है, तो फिर बात अलग है। कई जिंदगियां खत्‍म हो जाएंगी, उनके तर्क (कुतर्क कहने की कोई गलती नहीं करूंगा) खत्‍म नहीं होंगे।

Avinash Das : आपने आरटीआई आंदोलन और केजरीवाल के संदर्भ में बहुत अच्‍छी बात कही। यही बात मैं पिछले कई दिनों से आपको समझाने की कोशिश कर रहा हूं। कोई भी आंदोलन एक व्‍यक्ति का आंदोलन नहीं होता। जैसे यह आंदोलन अन्‍ना का आंदोलन नहीं था - जिसकी वजह से आप चिढ़े हुए हैं। आपका सारा विश्‍लेषण आपकी चिढ़ का परिणाम न ही है, न कि भारतीय राष्‍ट्र राज्‍य के प्रति आपकी चिंता का।

Avinash Das : उच्‍चकुलीन ब्राह्मण वाली बात - देखिए मेरा जातीय ज्ञान कितना कमजोर है और आप अपना देख लीजिए? आप भी अंतत: किसी को तो उच्‍चकुलीन मान ही रहे हैं... कमाल है प्रभु...

Samar Anarya : अविनाश जी आप गंभीर बहसों में कम उतारते हैं यह तो पता ही नहीं था.. अब बता दूँ की ड्राफ्ट जनलोकपाल बिल पूरा का पूरा तैयार है.. और ना सिर्फ तैयार है बल्कि इसे अन्ना और उनके आभिजात्य समर्थक देश के सीने पे चढ़ के स्वीकार करवाने पर आमादा ही थे.. अन्ना की दहाड़ आपको याद होगी.. यह ब्लैकमेल है तो करेंगे के अंदाज वाली.. और बात है की फिर मिमियाने में बदल गयी.. संसद का जो भी फैसला हो मंजूर होगा.. वाले अंदाज में

Samar Anarya : खैर मुद्दे पे आयें.. इण्डिया अगेंस्ट करप्शन वाले पेज पर ड्राफ्ट जन्लोक्पाल बिल पूरा का पूरा मौजूद है.. मैंने वहीं से पढ़ा था.. अप भी पढ़ लें.. फिर शायद आप भी मेरे/हमारी और अपूर्वानन्द जी जैसों की चिंताएं समझ पायें.. http://www.indiaagainstcorruption.org/ दाहिने हाथ पर हरी बत्ती में लिखा है.. डाउनलोड ड्राफ्ट जन लोकपाल बिल.. कर लें.. पढ़ लें..

Avinash Das : हद हैं यार आप भी... जब सब तैयार है, तो फिर ड्राफ्टिंग कमेटी नये ड्राफ्ट के लिए समय क्‍यों बर्बाद कर रही है? सरकारी लोकपाल ओर जन लोकपाल का अलग अलग मसौदा है और दोनों पक्ष अपना अपना मसौदा लागू कराना चाहता है - सवाल ये है कि आपको पता है कि दोनों के मसौदे में कहां कहां फर्क है। अलग पता चल जाएगा तो आपकी लोकतांत्रिक चिंताओं से जुड़े सवाल कहां चले जाएंगे, आपको भी पता नहीं चलेगा।

Samar Anarya : फिर उसके बाद ज्ञान के इन गूगाल्वादी/विकिपीडिया वादी समयों में सिविल सोसायटी के अर्थ समझते हुए (पूरी बेशर्मी से फिर अपने ही एक लेख का लिंक भेज रहा हूँ) काउंटर करेंट्स में प्रकाशित मेरे एक लेख पर सिविल सोसायटी के बारे में अब तक हुए बौद्धिक विमर्श का एक हिस्सा देख लें.. शायद कुछ और सन्दर्भ khulen..

Avinash Das : आपकी बेशर्मी को बार-बार प्रदर्शित करने की खुद ही आपको जरूरत नहीं। मुझे सिर्फ ये बता दीजिए, जो कि मैं बार बार पूछ रहा हूं कि जनलोकपाल बिल में ऐसी कौन सी बात है, जो आपकी लोकतांत्रिक चिंता को ज्‍यादा सघन बना रही है?

Samar Anarya : Avinash Das वही प्रदर्शित कर रहा हूँ बार बार.. आप बिलकुल ठीक बात कर रहे हैं.. पर एक बार खुद से भी पढ़ लें.. शायद और बातें खुलें.. शायद आपको समझ आये की आप गलत पाले में खड़े हैं.. हम तमाम लोग आपको खोना नहीं चाहते अविनाश जी.. कम से कम इस आभिजात्य 'सिविल सोसायटी' के पाले में तो बिलकुल नहीं.. तो खुद ही पढ़ लें.. मैं तो अपनी चिंताएं लगातार लिख ही रहा हूँ.. पूरी बेशर्मी के साथ.. और शर्मिंदा भी नहीं हूँ..

Avinash Das : आपको आपकी बेशर्मी से उबरने के लिए ही आज योगेंद्र यादव का लेख छापूंगा, पढ़ कर कुछ समझने की कोशिश कीजिएगा।

Avinash Das : योगेंद्र यादव के लेख की कुछ पंक्तियां है : इस अनशन की सफलता केवल अन्‍ना हजारे और उनके चंद समर्थकों की जीत नहीं है। इस आंदोलन में महानगरीय, अंग्रेजीदां और संपन्‍न वर्ग का बोलबाला नहीं था। यह उन छोटे-बड़े जनसंगठनों और साधारण नागरिकों की विजय है, जिन्‍होंने अपनी पहल पर दिल्ली या अपने शहर-कस्‍बे में इस अभियान में शिरकत कर सदाचार की आवाज बुलंद की। यह उन लाखों हिंदुस्‍तानियों की विजय है, जिन्‍होंने मन ही मन अन्‍ना हजारे को सफलता की दुआ दी थी।

Samar Anarya : जी बिलकुल.. योगेन्द्र जी ने लिखा ही होगा.. कल पढ़ लूँगा.. गंभीरता से जब पूरा छपेगा.. तब तक आप ड्राफ्ट जनलोकपाल बिल का यह हिस्सा देख लें..

6.5 A selection committee consisting of the following shall be set up:

1. The Chairpersons of both Houses of Parliament

2. Two senior most judges of Supreme Court

3. Two senior most Chief Justices of High Courts.

4. All Nobel Laureates of Indian Origin

5. Chairperson of National Human Rights Commission

6. Last two Magsaysay Award winners of Indian origin

7. Comptroller and Auditor General of India

8. Chief Election Commissioner

9. Bharat Ratna Award winners

10. After the first set of selection process, the outgoing members and Chairperson of Lokpal.

Samar Anarya : अब यह बताएं की इनमे से कितने लोग हैं जो किसी भी तरह जनता को जवाबदेह हैं? केवल दो-- संसद के दोनों सदनों के सभापति.. बाकी? और मैग्सेसे कौन देता है यह भी जानते होंगे आप.. सदीप पाण्डेय ने पुरस्कार लेते हुए भी धनराशी क्यों लौटाई थी यह बहस भी पढ़ ही लें तो बेहतर..पर फिर वही.. आपको पढना पडेगा.. काम जरा मुश्किल है..

Avinash Das : इसमें आपको दिक्‍कत मैगसेसे वीनर से है, तो ये कहिए इन्‍हें हटा दीजिए।

Avinash Das : वैसे मसौदे दोनों तरफ से हैं और अंतिम तौर पर किस किस्‍म का ढांचा होगा लोकपाल का - इस पर दबाव बनाना चाहिए।

Avinash Das : मुझे तो कोई दिक्‍कत जन लोकपाल के मौजूदा ढांचे से नहीं है।

Samar Anarya : मैग्सेसे पुरस्कार कौन देता है जानते ही होंगे.. नहीं तो आप तो बड़े आदमी हैं.. संदीप जी से ही पूछ लें की उन्होंने धनराशी क्यों लौटाई.. और बिलकुल साहब.. योगेन्द्र जी सत्य के अंतिम निर्णायक हैं, अपूर्वानन्द नाहीए हैं.. छापिये उन्हें भी.. हम भी अपनी बेशर्मी से उबरने का पूरा प्रयास करेंगे.. आपकी खुशी भी इसी में दिखती है..

Avinash Das : हमारी खुशी की परवाह करने का शुक्रिया।

Samar Anarya : बस यह यद् दिला दें की जिस जन लोकपाल बिल को आप समझ रहे थे की अभी ड्राफ्ट होगा, उसका अभी वाला ड्राफ्ट वोर्किंग ड्राफ्ट बनाने के लिए अन्ना मरे जा रहे थे.. भला हो की तम्मं बातें खुल गयीं.. शांति भूषन वाली ख़ास तौर पर तो अब संसद की सर्वोच्चता के सामने मिमियाते फिर रहे हैं..

Avinash Das : यह मिमियाना लोकतंत्र के हित में है। जब वे मिमिया नहीं रहे थे, तो आप कह रहे थे ये तानाशाही लादेंगे। जब मिमिया रहे हैं, तो कह रहे हैं देखिए मिमिया रहे हैं। शोले में जय के हाथों के सिक्‍के वाला हेड-टेल बढिया है आपके पास।

Samar Anarya : जी इस मिमियाने को लोकतंत्र की, राजनीति के विजय के ही बतौर देख रहा हूँ मैं. दिक्कत तो मुझे तब होती जब मिमियाते नहीं..

Avinash Das : इसलिए लोकतंत्र पर और अंतत: संसद पर भरोसा रखिए - जो आपकी पार्टी रखती नहीं है।

Avinash Das : http://mohallalive.com/2011/04/23/yogendra-yadav-s-view-on-anna-hazare-s-movement/

Samar Anarya : Avinash Das इन्तेजार कर रहा था इस कमेन्ट का.. हमारी पार्टी को इस संसद पर भरोसा नहीं है, संसदवादी लोकतंत्र पर है. अन्ना और उनके समर्थकों को ना इस पर है ना संसदवादी लोकतंत्र पर. वह तो यह मानते हैं की दारू की बोतल पर बिकता है वोटर.. क्यों, वह पूछते भी नहीं. तो आप उनमे भरोसा rakhiye shrimaan..

Avinash Das : क्‍या यह फिर बताना पड़ेगा कि मैं अन्‍ना समर्थक नहीं हूं, मौजूदा आंदोलन का समर्थक हूं...

Samar Anarya : मौजूदा आन्दोलन अन्ना और उनके वर्णाश्रम समर्थक विचारों से संचालित है क्या यह फिर बताना पड़ेगा? यह भी की आप और मैं (मने हम दोनों) जो शराब पीते हैं अन्ना के गाँव में होते तो खम्भे से बाँध के मारे जाते यह? या यह की अन्ना के साथ बाबा रामदेव और श्री श्री के सपनों का भारत क्या है?

Avinash Das : चलिए आप अपना राग अलापिए, मैं अपना अलापता हूं। इस मसले पर हमारे सुर अलग हैं, अलग रहेंगे।

Samar Anarya : यह ठीक है.. यहाँ मैं सहमत हूँ.. बस ये की अपना अपना सुर अलापने के ठीक पहले आपके दिए लिंक से योगेन्द्र जी का लेख पढ़ रहा था.. एक पैराग्राफ बहुत दिलचस्प लगा.. आपको भेज रहा हूँ.. दिल करे तो अपना सुर अलापने के पहले इसे पढ़ लीजिएगा.. ना करे तो आपकी मर्जी..

Samar Anarya : ‎"जन लोकपाल विधेयक की खामियों पर भी गंभीर आत्म-विश्लेषण की जरूरत है। इसमें कोई शक नहीं कि सरकारी लोकपाल विधेयक लचर है और उससे इस व्‍यवस्‍था में सुधार की उम्मीद नहीं की जा सकती। ऐसे में एक सर्वव्‍यापी और सर्वशक्तिमान लोकपाल का विचार मन को गुदगुदाता है। लेकिन अंतत: लोकतंत्र में सर्वव्‍यापी और सर्वशक्तिमान संस्‍थाओं के लिए कोई जगह नहीं है। राजनीति में सुधार के तमाम प्रस्‍ताव अक्‍सर इस बीमारी का शिकार रहे हैं। कड़े कानून के लालच में एक समस्‍या खत्म होती है, तो नयी समस्‍या पैदा हो जाती है। उम्मीद करनी चाहिए कि विधेयक की समीक्षा करने वाली समिति में जनांदोलनों के पंच इस मायने में ज्‍यादा समझदारी दिखाएंगे।" योगेन्द्र यादव (समर/अपूर्वानन्द आदि आदि नहीं)

Avinash Das : ये उन्‍होंने ठीक कहा है और हम भी यह लगातार कहते आ रहे हैं कि जनलोकपाल समस्‍या का अंतिम समाधान नहीं है - लेकिन यह जनता के हाथ में एक और हथियार जरूर होगा।

Samar Anarya : यह हथियार तो होगा पर जनता के हाथ में नहीं होगा..मेरी/हमारी सारी दिक्कत ही यही है..

Avinash Das : वह जनता के हाथ में ही होगा। जैसे आरटीआई का एक हथियार जनता के हाथ में होता है। वह सिर्फ सूचना मांगने वाला हथियार है। यहां भी एक हथियार सीधे अपील करने वाला हथियार होगा।

Samar Anarya : जाने किन गलतफहमियों में जी रहें है आप भी Avinash Das जी.. इतना लंबा लम्बा लड़ाई ठानने के पहले एक बार शांति भूषन और कमपनी के द्वारा लिखा ड्राफ्ट जन लोकपाल बिल पढ़ काहे नहीं लेते आप.. (अब दावा कर रहा हूँ की आपने नहीं पढ़ा है.. आप मेरी नजर में ईमानदार व्यक्ति हैं सच बता दीजिये पढ़ा है की नहीं?) पढ़ लीजिये एक बार और फिर बोल दीजिये की यह जनता के हाथ का हथियार होगा.. (अपनी अब तक की सारी समझदारी दाँव पर लगा के बोल रहा हूँ.. सिर्फ इसलिए की आपकी जनपक्षधरता पर यकीन, बहुत गहरा यकीन है अविनाश जी.. ) आपकी बात बिना बहस मान लूँगा.. पराजय स्वीकार के ..

Samar Anarya : हाँ अब ध्यान रखियेगा की मसला ईमानदारी का है, और अगर आप ने झूठ बोला तो इस मुद्दे पर एक सक्रीय कार्यकर्ता हारेगा.. तो बस इतना की आपने ड्राफ्ट लोकपाल बिल पढ़ा है की नहीं? और पढ़ा है तो भी आप समर्थन कर रहे हैं क्या? हाँ बोलिए.. मैं हार मान आप के साथ खड़ा हो जाऊँगा...

Avinash Das : यही सवाल मैंने किया था, तो आपने लंबे समय के बाद एक लिंक उठा कर मारा था। फिर उसकी तफसील पूछी, तो एक अंश कॉपी-पेस्‍ट किया। अब वही तीर हम पर चला रहे हैं... कमाल हैं आप भी।

Samar Anarya : अविनाश जी इतना लम्बा जवाब नहीं.. पब्लिक डोमेन में मैंने आपसे एक वादा किया है.. आप सिर्फ यह कह दें की आप जन लोकपाल बिल पढने के बाद (पूरी तरह से) इसके साथ खड़े हैं.. मई हार मान के आप के साथ .. खड़ा हो जाउंगा..

Avinash Das : ‎1. इस कानून के अंतर्गत, केंद्र में लोकपाल और राज्यों में लोकायुक्त का गठन होगा। 2. यह संस्था निर्वाचन आयोग और सुप्रीम कोर्ट की तरह सरकार से स्वतंत्र होगी। कोई भी नेता या सरकारी अधिकारी जांच की प्रक्रिया को प्रभावित नहीं कर पाएगा। 3. भ्रष्टाचारियों के खिलाफ कई सालों तक मुकदमे लम्बित नहीं रहेंगे। किसी भी मुकदमे की जांच एक साल के भीतर पूरी होगी। ट्रायल अगले एक साल में पूरा होगा और भ्रष्ट नेता, अधिकारी या न्यायाधीश को दो साल के भीतर जेल भेजा जाएगा। 4. अपराध सिद्ध होने पर भ्रष्टाचारियों द्वारा सरकार को हुए घाटे को वसूल किया जाएगा। 5. यह आम नागरिक की कैसे मदद करेगा यदि किसी नागरिक का काम तय समय सीमा में नहीं होता, तो लोकपाल जिम्मेदार अधिकारी पर जुर्माना लगाएगा और वह जुर्माना शिकायतकर्ता को मुआवजे के रूप में मिलेगा। 6. अगर आपका राशन कार्ड, मतदाता पहचान पत्र, पासपोर्ट आदि तय समय सीमा के भीतर नहीं बनता है या पुलिस आपकी शिकायत दर्ज नहीं करती तो आप इसकी शिकायत लोकपाल से कर सकते हैं और उसे यह काम एक महीने के भीतर कराना होगा। आप किसी भी प्रकार के भ्रष्टाचार की शिकायत लोकपाल से कर सकते हैं जैसे सरकारी राशन की कालाबाजारी, सड़क बनाने में गुणवत्ता की अनदेखी, पंचायत निधि का दुरुपयोग। लोकपाल को इसकी जांच एक साल के भीतर पूरी करनी होगी। सुनवाई अगले एक साल में पूरी होगी और दोषी को दो साल के भीतर जेल भेजा जाएगा। 7. क्या सरकार भ्रष्ट और कमजोर लोगों को लोकपाल का सदस्य नहीं बनाना चाहेगी? ये मुमकिन नहीं है क्योंकि लोकपाल के सदस्यों का चयन न्यायाधीशों, नागरिकों और संवैधानिक संस्थानों द्वारा किया जाएगा न कि नेताओं द्वारा। इनकी नियुक्ति पारदर्शी तरीके से और जनता की भागीदारी से होगी। 8. अगर लोकपाल में काम करने वाले अधिकारी भ्रष्ट पाए गए तो? लोकपाल/लोकायुक्तों का कामकाज पूरी तरह पारदर्शी होगा। लोकपाल के किसी भी कर्मचारी के खिलाफ शिकायत आने पर उसकी जांच अधिकतम दो महीने में पूरी कर उसे बर्खास्त कर दिया जाएगा। 9. मौजूदा भ्रष्टाचार निरोधक संस्थानों का क्या होगा? सीवीसी, विजिलेंस विभाग, सीबीआई की भ्रष्टाचार निरोधक विभाग (अंटी कारप्शन डिपार्टमेंट) का लोकपाल में विलय कर दिया जाएगा। लोकपाल को किसी न्यायाधीश, नेता या अधिकारी के खिलाफ जांच करने व मुकदमा चलाने के लिए पूर्ण शक्ति और व्यवस्था भी होगी।

Samar Anarya : और हाँ.. यह दर्ज करें.. की आपसे मिलने के २ साल पहले से लम्बे लम्बे लेख कानूनी मुद्दों पर लिखता आ रहा हूँ.. बिना पढ़े नहीं.. (एक और काम करें.. नरेगा का ड्राफ्ट बिल उठायें.. उसका अंतिम पृष्ठ देखें.. मेरा नाम भी मिल ही जयीगा आपको) यह बताते हुए की संघर्षों में साझीदारी रही HAI..

Avinash Das : आप तो बेशर्मी के साथ लिंक बढ़ाने में माहिर हैं - बढ़ा दीजिए।

Samar Anarya : नहीं साहब.. कुछ लिंक अविनाश दास ढूंढें इसका भी कायल हूँ... ढूंढिए..

Avinash Das : ‎:)

Avinash Das : आपका परिचय आपने हमें बार बार दिया है Samar Anarya साहब। क्‍यों बार बार देने की जहमत उठाते हैं।

Samar Anarya : नहीं Avinash Das जी.. ढूंढिए.. आपको समझ आएगा की कुछ लोग संघर्षों की परंपरा से ताप के निकले हैं.. पत्रकारिता की गलियों से नहीं... और इस्सीलिये उनके तर्कों में एक ख़ास तरह का 'अभिमान' HOTA है JO PATRKAARON KO समझ नहीं आएगा..

Samar Anarya : बहस से मत भागिए Avinash Das साहब.. परिचय पर भी मत लाइए इसे.. आप दोस्त हैं रहेंगे.. आप वाम हैं रहेंगे.. पर आपने जन लोकपाल बिल और इसके बेहूदे समर्थकों का तर्क भावनात्मक उन्माद में खरीदा है यह भी सच रहेगा.. आपने अब तक मेरे सवाल का जवाब नहीं दिया है..

Avinash Das : ‎:-)

Avinash Das : मैं वाम की जगह आम रहूं, यही मेरे लिए बड़ी बात होगी।

Samar Anarya : यकीन मानिए Avinash Das भाई की यह मुस्कराहट मेरे चेहरे पर भी वैसे ही जिन्दा है, चस्पा है, जैसे आप के चेहरे पर..पर सवाल अब भी खड़ा है.. क्या आपने ड्राफ्ट जन लोकपाल बिल पढ़ा था? या बस यूँ ही वक्त के उन्माद के साथ अपने समर्थन का सुर मिलाये जा रहे the?

Avinash Das : आप हर सवाल का जवाब हां या ना में सुनने के आदी तो नहीं। आप तो तर्क और विश्‍लेषण के आदमी हैं।

Samar Anarya : बिलकुल सर.. पर कुछ सवालों के जवाब हाँ और ना में होते हैं.. फिर से दोहरा हूँ.. क्या आपने जन लोकपाल बिल का ड्राफ्ट पढ़ा है?

Ravish Kumar : yes

Ravish Kumar : kuchh baaton se apatti hai...lekin vo sawroop to rahegaa nahee final draft me...

Alok Kumar : पूरी बहस मिस हो गई.. अब सारे कमेंट्स पढ़ने के बाद ही..

Alok Kumar : नेता, अधिकारी, व्यापारी अपने हितों के लिए किसी भी स्तर तक जा सकते हैं उसी तरह बुद्धिजीवी भी अपनी बौधिक जीत के लिए किसी भी स्तर तक तर्क प्रस्तुत कर सक ते हैं.इतने दिनों तक लोकतंत्र में हो रहे अधिकारों के हनन की व्याख्या करके कमाई खाते रहे और अब जब लोग लोकतंत्र में अधिकार मांगने लगे तो उसे लोकतंत्र पे हमला बता कर खायेंगे... by rajeev ranjan

Suresh Chiplunkar : अविनाश जी के इस कथन से सहमत कि, "…चलिए आप अपना राग अलापिए, मैं अपना अलापता हूं। इस मसले पर हमारे सुर अलग हैं, अलग रहेंगे…" मेरा खयाल है कि इस पर सभी की सहमति होगी, चाहे वह दाँया हो या बाँया, या "बीच" का… :) :)

Suresh Chiplunkar : ‎"सिविल"(?) सोसायटी को सुझाव भेजने का सुझाव आया था… मैंने पहला और अन्तिम सुझाव दिया था कि, कथित रुप से "सिविल" सोसायटी से सेकुलरों को भगा दो, सारी समस्याएं हल हो जाएंगी…" :) ज़ाहिर है कि ऐसे "अनसिविल" सुझाव माने नहीं जाते हैं… :) इसीलिये अविनाश जी के उस कथन से सहमत हूं कि "आप अपना राग अलापिये, मैं अपना अलापता हूँ…" :)

Vijnanananda Saraswati : aapka prashna bahut achchha hai... parantu saath hi - kya kapil sibbal narsimha rao ke case ladne ke liye paise liye ya uske badle men ticket.. yaphir ram jethmalani aur jaitly sahab kya karte hain.. is par bhi kuchh tathya ujagar ho... kahin baat yahan na aan pade ki chunki inhone bhrashtachar virodhi abhiyan chala is leye inki chaddhi kharidne pe sales tax di gayi thi ki nahin us par vivaad chhide aur kapil sibbal tatha anya sabhi lakhon karoron ke jaydad par baith jayen karan wo to waise hi hain ji - kya karen?

Satyendra Pratap Singh : ‎"Ravish Kumar मुझे इस बहस में दस-शून्य से पराजित समझा जाए।" मेहनत से सारे कमेन्ट पढ़े. अंतिम में रवीश जी की इस टिप्पडी से सहमत हुआ. ये क्रांतिकारी बहस पिछले ६० साल से चल रही है और अब लगता है कि अनंत काल तक चलती रहेगी. कुछ उम्मीद नहीं.. कांग्रेस-भाजपा ही भेड़ हाकने में सबसे सक्षम है...

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समझ में नहीं आता कि ये पूजीपति एंजेल्स क्यों कूद पड़ा था साम्यवाद में! मर जाने दिया होता मार्क्स को घिसट-घिसट कर. न मार्क्सवाद आता, न भारत बहस होती. कोई यहाँ का विचारक निकलता तो यहाँ के समाज को समझकर काम करता और हम जैसे गरीब-गुरबों का भी भला हो जाता!!

Himanshu Pandya : पूरी बहस में बड़ा आनंद आया ...सबसे ज्यादा आनंद तो चिपलूनकर जी की 'पीड़ा' में आया ! इच्छा हो रही है बहस में कूदूँ लेकिन अनैतिक लग रहा है ... ये मत पूछिए क्यों !

Satyendra Pratap Singh : एक तरफ ८० करोड़ लोगों का प्रतिनिधित्व कर रहे लोग हैं और वे भले ही अलग दीखते है, लेकिन सैद्धान्तिक रूप से एक हैं (और २ राज्यों को छोड़कर सत्तापक्ष और विपक्ष में बैठे हैं). दूसरी तरफ २० करोड़ लोग से भी कम हैं और उसमे लोकतान्त्रिक और अलोकतांत्रिक मिलाकर ४० पार्टियां हैं जो आपस में लड़ने (और एक दूसरे को खत्म करने) में पिछले ६० साल से वक्त जाया कर रहे हैं!!! २० करोड़ का भी आंकड़ा तब है जब २ राज्यों में बहसबाजो के मुताबिक "कथित" साम्यवादी है. वो भी आकड़ा इस चुनाव के बाद हाशिए पर आ जायेगा...

Aflatoon Afloo : मैं ’सर्वोदय ’ (रस्किन की अन्टू दिस लास्ट का गांधी द्वारा किया गया गुजराती तर्जुमा) के सिद्धान्तों को इस प्रकार समझता हूँ: १.सबकी भलाई में हमारी भलाई निहित है। २.वकील और नाई दोनोंके के कामकी कीमत एकसी होनी चाहिए, क्योंकि आजीविकाका अधिकार सबको एक समान है। ३.सादा मेहनत-मजदूरीका,किसानका जीवन ही सच्चा जीवन है।-गांधीजी (सत्य के प्रयोग अथवा आत्मकथा (हिन्दी), पृष्ट २७१)

Aflatoon Afloo : ‎"आदर्श स्थिति में डॉक्टर , वकील और ऐसे ही दूसरे लोग केवल समाजके लिए काम करेंगे , न कि अपने लिए । "- गांधीजी ( ’ हरिजन’,२९-६-’३५ )

Aflatoon Afloo : ‎"वकील भी आखिर मनुष्य हैं ; और मनुष्यजातिमें कुछ तो अच्छाई है ही । वकीलोंकी भलमनसीके जो बहुत से किस्से देखनेमें आते हैं , वे तभी हुए जब वे अपनेको वकील समझना भूल गये । मुझे तो आपको सिर्फ यही दिखाना है कि उनका धंधा उन्हें अनीति सिखानेवाला है । वे बुरे लालचमें फँसते हैं , जिसमें से उबरनेवाले बिरले ही होते हैम । " (हिन्द स्वराज्य,नवीवन,पृ. ३७ )

Suresh Chiplunkar : हिमांशु जी, सोचना बन्द कीजिये और कूद पड़िये… :) :)

Ashok Kumar Pandey : यह बेकार का आरोप है...किसी से भी पूछा जा सकता है कि उसकी फीस (या तनख्वाह) इतनी क्यूं?

Aflatoon Afloo : ‎@ अशोक, कौन-सा आरोप ?

Samar Anarya : ‎Himanshu Pandya कूद पदिये हिमांशु भाई.. जरूरत भी hai..

Suresh Chiplunkar : क्या हुआ हिमांशु जी, बहस में कूदे नहीं अब तक? मेरी पीड़ा बढ़ती जा रही है… आपको मेरी पीड़ा देखने में आनन्द आया था ना? :) :) इधर जल्दी आईये, बहुत "उच्च स्तर" की बहस हो रही है… कल कोई अनार्य साहब मुझे मेरी "जात" (चितपावन) बताकर गये हैं… :) :) ऐसी "सेकुलर" बहस पढ़ने में भी आनन्द आ जाता है… :)

Samar Anarya : ‎@रवीश कुमार जी-- लगता है की आपका कथन अविनाश भाई से किये मेरे सवाल से सम्बंधित है की आपने जन लोकपाल बिल का ड्राफ्ट पढ़ा है. आप कह रहे हैं की कुछ बातों से आपत्ति है लेकिन वह स्वरुप तो नहीं रहेगा.. बस यह बता दीजिये की मध्यवर्ग के इस ब्लैक्मेलिया आन्दोलन की सबसे बड़ी मांग जन लोकपाल बिल को शब्दशः लागू करने की थी या नहीं? वह तो भला हो शांति भूषन का कच्चा चिटठा खुलने का नहीं तो वह तो दवा करते घूम रहे थे की यह ब्लैकमेल है तो है...

Samar Anarya : ‎@रवीश जी-- इसमें यह भी जोड़ें की अन्ना हजारे का शंखनाद जन लोकपाल बिल को ही वोर्किंग ड्राफ्ट बनाने से कम पर रुक ही नहीं रहा था..यहाँ तक की यह लोग अरुणा राय जैसों की और विमर्श की मांग भी नहीं सुन रहे थे. क्या अकारण ही?

Suresh Chiplunkar : हिमांशु जी… आपके लिये एक खबर है (खुश है या बुरी पता नहीं), पुणे में ABVP कार्यकर्ताओं ने MTV Rodies के तीन एंकरों के मुँह पर कालिख पोतकर उन्हें पुणे से बाहर कर दिया है… :) :) (उफ़्फ़, इतनी देर से जागते हैं ये हिन्दूवादी लोग?) हा हा हा हा हा हा हा हा…

Samar Anarya : ‎@सुरेश चिपलूनकर-- यह भी बता देते हिमांशु भाई की आप अछूत बनने चले थे.. सारी पीड़ा सारे संताप भूल कर..और हाँ, इतने हा हा हा हा हा हा राम से नहीं, रावन के चरित्र चित्रण से जुड़े होते हैं ब्राह्मण श्रेष्ठ.. कुछ तो शर्म keejiye

Himanshu Pandya : मैं भूल गया हूं यह आंदोलन किसलिए था , कोई याद दिलाएगा ? सुरेश जी, अन्यथा न लें. मैंने पीड़ा को उद्धरण चिन्हों में लिखा था. वह कोई पीड़ा थोड़े ही थी. वह तो आपका आक्रोश था, सात्विक आक्रोश.

Suresh Chiplunkar : भले ही मेरे कुछ कमेण्ट्स डिलीट हो गये हों, लेकिन इस बहस की TRP बढ़ाने में मैं अपना सहयोग देता रहूंगा… टिप्पणी करके… :) :)

Himanshu Pandya : आप तो जान हैं इस बहस की सुरेश जी .

Suresh Chiplunkar : ‎@ हिमांशु जी - :) :)

Suresh Chiplunkar : लीजिये अब "अनार्य" जी ने बाल की खाल भी निकाल ली… :)

Samar Anarya : Himanshu Pandya एकदम सहमत हूँ.. सुरेश भाई इस बहस की जान हैं और इनके लोग देश की.. और मुंह पर कालिख पोतने से लेकर (अपना ही) मुंह काला करने तक में सिद्धहस्त भी..

Suresh Chiplunkar : शायद भाई ने खुशी की अट्टहासपूर्ण हँसी कभी सुनी नहीं होगी… :)

Suresh Chiplunkar : मोदी समेत तमाम हिन्दूवादियों को जितना ज्यादा "अछूत" बनाएंगे, उतने अन्दर से मजबूत होते जाएंगे… :) ):

Samar Anarya : खुशी में आँखें भीगते सूना था.. गदगद होकर लेट जाना भी.. पर अट्टहास.. खुशी का यह संघी रूप है क्या?

Himanshu Pandya : शान्ति भूषण के हटाने की मांग को कॉंग्रेस का षड्यंत्र बताने वाले दोस्त यह क्यों नहीं देखते कि इस आरोप के लगाने के पहले से कई दोस्त कहते आ रहे हैं कि कम से कम कम जन के प्रतिनिधियों में सभी जन का प्रतिनिधित्व हो . क्या मेधा या अरुणा नहीं हो सकती थीं ? क्या यह कोई लाभ का पद है ? या इसके अप्रत्यक्ष लाभ सब को दिख रहे हैं ? क्या बाहर रहकर यह भरोसा नहीं था कि हमारे दूसरे साथी हमारे हितों का सही प्रतिनिधित्त्व करेंगे ?

Samar Anarya : सुरेश बाबू आपका दर्द यही है.. नरेंद्र मोदी.. अब इसका क्या करें की अन्ना हजारे तक को लाकर आप उनके लिए समर्थन नहीं खरीद सके..आह दुःख.. हाय दुःख..

Himanshu Pandya : सुरेश जी की इस बात पर ध्यान दें अप लोग कि सिविल सोसाइटी में से सेकुलरों को निकाल दिया जाए . खतरा यही है , आज यह सिविल सोसाइटी मनमाफिक है , कल नहीं होगी तब ?

Ashok Kumar Pandey : ‎Aflatoon Afloo मै उस मूल आरोप की बात कर रहा हूँ जिससे यह बहस शुरू हुई थी. अन्ना के मुद्दे पर अपनी स्पष्ट असहमति के बावजूद किसी की फीस कितनी है यह कोई मुद्दा नही. हाँ जिस तरह अन्ना और उनके साथी 'सिविलाइज्ड' लोगों को हीरो बनाया गया और सारी बहस व्यक्तिगत तथा आर्थिक भ्रष्टाचार पर केंद्रित हुई ... यह अवश्यम्भावी था. अभी सावंत कमेटी की रपट भी आयेगी चर्चा में जहां अन्ना के बर्थडे पार्टी का हिसाबी-किताब होगा.

Himanshu Pandya : मैं अन्ना के आदर्श गाँव से बड़ा डरता हूं .

Avinash Das : अवधारणात्‍मक मुद्दे पर व्‍यक्तिगत छीछालेदर का उपक्रम दिलचस्‍प है। चलिए हम गांधी जी के साथ हो लेते हैं - साधन और साध्‍य दोनों पवित्र होने चाहिए। और लोकपाल की लटकबांसी से खुद को अलग करते हैं।

Samar Anarya : ‎Ashok Kumar Pandey आयेगी नहीं अशोक भाई, चर्चा में है.. यह भी की अन्ना ने गाँव में अपना जन्मदिन मनाने में दो लाख रुपये खर्चा किये.. वह भी अपने नहीं अनुदान वाले..पी बी सावंत कमीशन ने उन्हें दोषी भी ठहराया.. पर वह तो अन्ना थे.. माफी मांग कर सजा से बच निकले..

Ashok Kumar Pandey : ‎Himanshu Pandya डरिये भाई...इस राम राज से ज़रूर डरिये...

Himanshu Pandya : ‎Samar Anarya अरे भाई , आपने कैम्पस में सुना नहीं क्या - वो अर्थी पर गीत टाइप कुछ . अर्थी पर गीत !

Samar Anarya : Himanshu Pandya सुना है सर.. बार बार सुना है.

Avinash Das : ओह अन्‍ना, आप जन्‍मदिन मनाने में मायावती से पिछड़ गये ! लानत है आप पर !!

Himanshu Pandya : ‎Avinash Das यह व्यक्तिगत नहीं है ?

Samar Anarya : Avinash Das यह दिलचस्प बात कही आपने.. भ्रष्टाचार के 'अवधारणागत' मुद्दे पर ए राजा, शरद पवार, जैसों की खाट खड़ीकरना भी गलत हुआ इस तर्क से तो? या व्यक्ति व्यक्ति में अंतर करते हैं आप?

Himanshu Pandya : ‎Avinash Das यह आंदोलन किसलिए था ? मेरी बात को मजाक में न लें .

Ashok Kumar Pandey : ‎Samar Anarya Justice P.B.Sawant report submitted to the Maharashtra government in 2005 where it investigates charges of corruption leveled against the social activist and a number of his trusts. He reportedly has over a dozen trusts with Justice Sawant investigating just a coup of them.

The 2005 report submitted to the Maharashtra Government by Justice PB Sawant suggests serious corruption charges against anti-graft activist Anna Hazare. The last chapter in the report deals only with Anna Hazare from pages 256 to 372 and comes to some interesting conclusions.

The commission set up in 2003 “to probe into the allegations of corrupt practices and maladministration into matters” of several state ministers and social activist Anna Hazare clearly indicts the Magsaysay awardee. The report submitted on February 23, 2005, concludes: “The expenditure of Rs 2.20 lacs from the funds of the Hind Swaraj Trust for the birthday celebrations of Shri Hajare was clearly illegal and amounted to a corrupt practice”.

Sant Yadavbaba Shikshan Prasarak Mandal, a trust with which Hazare is associated since its inception in 1980, “committed illegalities” in its audits, according to Justice Sawant.

The report says, “There is no doubt that the trust, and therefore, the trustees of the trust committed illegalities”.

According to Justice Sawant report, Ganpatrao Avati,a close associate of Hazare, had asked for an “amount of Rs 25,000 to process” an application. It thus infers “even those activists who were nearer to Shri Hajare were indulging in corruption and demanding money from the supplicants who came for relief from Shri Hajare”.

According to this report, when Anna Hazare was asked about this, he said that when he had asked Avati about this allegation, but “Shri Avati had denied it.”

The report suggests several other charges of illegality, corruption and maladministration:

Hind Swaraj Trust:

p.269 - illegalities and maladministration in land transactions

p.271 - illegal utilisation of the trust's funds

Sant Yadavbaba Shikshan Prasarak Mandal:

p.281 - "committed illegalities" - its audited accounts for 1982 to

1994 were filed in 1995 and for 1995 to 2002 in 2003. These are

"punshable" illegalities.

p.285 - legal requirement flouted from 1985 at least till 2005 of

submission of the annual budget to the Charity Commissioner

p.297 - did not list all its properties as legally required to the Charity

Commissioner

pp. 298-99 - did not have its accounts in scheduled banks as required

by the law, it advanced a loan that was illegal, it spent money on

objects outside its charter

p.304 - maladministration

p.305 - illegalities in regard to a fixed deposit

Bhrashtachar Virodhi Jan Andolan Trust:

p.316 - registered contrary to law

pp.319-21 - at least since 1998 onwards to 2005 the trust was not

functioning legally

p.323 - from 10/11/2001 the accounts were not maintained as per the

rules of the trust

p.323 - donations collected in the name of the trust were not

properly receipted nor were accounted for in it

p.326 - audited accounts were not submitted to the Charity

Commissioner for 1998-2002

p.327 - illegal cash transctions were made

pp.329-30 - Hazare made key appointments illegally, and these

appointees "lost" money collected by them

pp.359-61 - "activists" close to Hazare took bribes from supplicants

to Hazare, and Hazare did not act against these "activists"

Krishna Pani Puravatha Yojana Sahakari Sanstha:

p.363 - Hazare a member when not eligible to be one.

Conclusions:

p.365 - the Commission summarized Hazare's illegality/corruption/

maladministration.

Interestingly Digvijaya Singh in an interview referred to the Sawant report and said,"It (the committee's findings on Hazare) has come as a rude shock to me," Singh was referring to the report the retired Supreme Court justice had submitted to the Maharashtra government in 2005.

The inquiry had been conducted following allegations of corruption against Hazare by then state minister for food and civil supplies Suresh Jain. Justice Sawant found that Rs 2.2 lakh had been withdrawn from the trust funds for Hazare's birthday celebrations.

This was clearly illegal, Sawant noted in his report. The report criticised the trust for setting apart nearly 11 acres of land in favour of the Zilla Parishad without the permission of the charity commissioner and termed the move as a case of maladministration.

Yet another irregularity pertained to the misappropriation of the sum of Rs 46,374, which was originally meant for promoting secular education.

The money was used instead on the renovation of a temple. The most stringent indictment, though, was reserved for Hazare's Bhrashtachar Virodhi Janandolan Trust.

The report pointed out that the trust's accounts were not being maintained according to rules.

The question now doing the rounds is whether the Congress counter-offensive has come too late. Anna Hazare has gathered together a huge following of people who are sick of corruption and are willing to be led by anyone who looks half-way credible. The fact that Hazare has been able to strike that cord, after having been continuously on television screens for over 5 days, makes the job of the government and the congress of discrediting him that much more difficult

Suresh Chiplunkar : सारी समस्या के जड़मूल को कोई समझने के लिये ही तैयार नहीं है… पता नहीं किस प्रकार के आभासी स्वर्ग में रह रहे हैं और हर जगह से "हिन्दू", "हिन्दूवादी", "हिन्दू हित की बात करने वालों" को बाहर करके, प्रत्येक समिति में कब्जा करना चाहते हैं… मानने को ही तैयार नहीं हैं कि अब "हिन्दूवादी" वर्ग भी एक "बड़ा वर्ग" है और उसकी बात, उसके प्रतिनिधि को उचित स्थान देना ही पड़ेगा…। कब तक एक बड़े वर्ग को बाहर रखेंगे? :) :)

Samar Anarya : ‎Avinash Das एक अनशन क्यों नहीं करते आप उसी जंतर मंतर पर? मुद्दा रखिये की अन्ना और उनके गैंग की आलोचना को कानूनन जुर्म घोषित कर दिया जाय और सजा फांसी या हाथ काटने में से कोई एक (दोनों अन्ना की प्रिय सजाएं है)..इसे व्यक्तिगत सवाल मत कहियेगा.. आप तो दूसरों से नाम लेकर बहुत सवाल पूछते हैं..यह हक़ दूसरों को भी hoga..

Himanshu Pandya : सुरेश जी , लगे रहिये

Satyendra Pratap Singh : ‎60 साल से खाट खड़ी करने की कोशिस हो रही है, वो होती ही नहीं. जिसने वास्तव में खाट खड़ी की है, उसके बारे में चर्चा करने में डर लगता है कि कहीं पुलिस न उठा ले जाए.इससे बेहतर है कि जो कुछ कर रहा है, उसकी ही खाट खड़ी की जाए, जिससे व्यवस्था चलती रहे!

Suresh Chiplunkar : Thanks हिमांशु जी - लंच के लिये जाने तक तो लगा ही रहूंगा… :) :)

Satyendra Pratap Singh : लीजिए आलोचना करने के लिए एक आदमी और देता हूँ, प्रशांत भूषण ही क्यों?

ये भी बेवकूफ था कि कुछ करने के लिए निकल पड़ा था...

http://sites.google.com/site/sakethrajan/

Avinash Das : गजब ! गजब !! गजब !!! अनशन की बढिया कही आपने, Samar Anarya. अरे जैसे आप अपनी जगह से बातें कह रहे हैं - मैं अपनी जगह से बातें कर रहा हूं। अन्‍ना का विरोध करके आप भी जुर्म नहीं कर रहे हैं, अन्‍ना के आंदोलन का समर्थन करके मैं भी जुर्म नहीं कर रहा हूं। इतने विचलित क्‍यों हो गये हैं?

Himanshu Pandya : तो आप यह मानते हैं कि यह अन्ना का आंदोलन है ?

Samar Anarya : Satyendra Pratap Singh..व्यक्तिगत कुतर्क देने के पहले लोगों के बारे कुछ जान भी लेने की कोशिश कर लेते तो अच्छा ही रहता..जैसे की हम जैसे कुछ लोग तमाम जगहों के साथ साथ अम्बिकापुर/सरगुजा के नक्सल इलाके में पुलिस द्वारा गिरफ्तार भी किये गए हैं.. विशुद्ध हिन्दी में 'नक्सली' होने के आरोप में ज्यां द्रेज़ जैसे लोगों के साथ 'ठोंके' भी गए हैं.. या यह की बिनायक सेन की गिरफ्तारी के बाद रायपुर में रहकर संघर्ष का हिस्सा भी बने हैं.. हाँ आरोप लगाना शगल हो तो और बात है satyendr baaboo..

Avinash Das : ऐसा कहना चाहिए - अन्‍ना से तमाम तरह की व्‍यक्तिगत असहमतियों के बावजूद। इतने बेईमान तो अभी नहीं हुए हैं। लोग सड़क पर आये अन्‍ना की वजह से।

Avinash Das : आपलोग आलोचना जरूर करें, पर इस आंदोलन को समझने के लिए मुझे योगेंद्र यादव का लेख सही लगा। पढ़‍िएगा जरूर : http://mohallalive.com/2011/04/23/yogendra-yadav-s-view-on-anna-hazare-s-movement/

Ashok Kumar Pandey : यह 'आंदोलन' इस रूप में विशिष्ट था कि यह नीचे से ऊपर नही ऊपर से नीचे गया...यह साबित हो गया कि जब तक जंतर-मंतर से लाइव टेलीकास्ट न हो कोई 'आंदोलन' राष्ट्रीय नही हो सकता.

Himanshu Pandya : पर आप ने तो पहले कहा है कि लोग भ्रष्टाचार से त्रस्त थे इसलिए आये , अब आप मुद्दे पर व्यक्ति को महत्त्व नहीं दे रहे ?

Samar Anarya : यह और बढ़िया रही Avinash Das जी.. कितने दिन से तो आप अन्ना से असहमतों को ललकार रहे हैं की अनशन कर के दिखाओ, यहाँ वहां.. मिर्च्पुर से लेकर तमाम मसलों पर.. सुर आपका एक ही है..जो अन्ना से असहमत है वह गलत है.. फिर सजा भी मांग ही लीजिये.. हम जैसे लोग जो भ्रष्टाचार विरोधी संघर्ष के 'कांटे' हैं निपट भी जायेंगे, आपका सुन्दर राष्ट्र (भारत माता की तस्वीर वाला, श्री श्री, रामदेव, राम माधव और नरेन्द्र मोदी के सपनों वाला बन भी jaayegaa..

Avinash Das : हां सही है, क्‍योंकि भ्रष्‍टाचार एक कॉमन एजेंडा बन कर उभरा। अनशन का बहाना लोगों को मिला। इस बहाने को क्‍यों पार्श्‍व में धकेलना चाहते हैं। अच्‍छा-बुरा जो भी है, इसको अंडरलाइन तो करना ही चाहिए।

Himanshu Pandya : यानी , आपकी तर्क श्रृंखला को मानें तो , आंदोलन का चरित्र उसके नेतृत्व कर्ताओं की नीति/ दिशा/ विचारधारा से तय होता है ?

Ashok Kumar Pandey : नही यार हिमांशु अब तो सब लाइव टेलीकास्ट और कवरेज से तय होता है...एक 'महान आंदोलन' जिसकी धमक एक हफ्ते बाद बस अखबारों में रह जाती है!

Avinash Das : जैसे आप कह रहे हैं Samar Anarya कि लोकपाल के लिए संघर्ष का साथ देने वाले गलत हैं, वैसे ही अगर कोई कह रहा है कि लोकपाल के लिए संघर्ष का विरोध करने वाले गलत हैं - तो इसमें सजा वगैरा जैसी बात कहां से आ गयी।

Avinash Das : खैर, बहुत काम पड़ा है - आपलोग बहस जारी रखिए।

Suresh Chiplunkar : जन-लोकपाल की नियुक्ति समिति के “10 माननीयों” में से यदि 6 लोग सोनिया के “खासुलखास” हों, तो जन-लोकपाल का क्या मतलब रह जाएगा?

Avinash Das : बहुत अजीब है कि अंतत: आप लोगों के सुर सुरेश चिपलूनकर से मिल रहे हैं - देखिए Samar Anarya...

Samar Anarya : इसके पहले इस देश में अनशन के बहाने लोगों को कहाँ मिले? इसी दिल्ली में फरवरी के महीने में तीन लाख मजदूरों की रैली की रिपोर्टिंग थी की जनता ट्रैफिक जाम से परेशान हुई. तब लाइव टेलीकास्ट नहीं था, कवरेज नहीं था. तब जनता को अनशन का बहना भी नहीं मिला था.. बावजूद इसके की बीटीआर भवन में बैठक कर कर मीडिया को बुलाया गया था.. मीडिया नहीं गया.. उसका क्या?

Himanshu Pandya : मीडिया के बनाए नायकों और उनके पीछे आ रहे जनसैलाब को बहुत ध्यान से देखना चाइये . यह दुधारी तलवार है .

Suresh Chiplunkar : नेतृत्व और मीडिया कवरेज अचानक एक गाँधी टोपीधारी व्यक्ति के पास चला गया है, उसे घेरे हुए जो “टोली” काम कर रही है, वह धुर “हिन्दुत्व विरोधी” एवं “नरेन्द्र मोदी से घृणा करने वालों” से भरी हुई है… इनके पास न तो कोई संगठन है और न ही राजनैतिक बदलाव ला सकने की क्षमता… कांग्रेस तथा सोनिया को और क्या चाहिये?? इससे मुफ़ीद स्थिति और क्या होगी कि सारा फ़ोकस कांग्रेस-सोनिया-भ्रष्टाचार से हटकर जन-लोकपाल पर केन्द्रित हो गया?

Samar Anarya : बहुत अजीब है Avinash Das जी की लोकपाल पर, अनशन पर, और संघर्ष पर आप चिप्लूकर जी के साथ खड़े हैं हम नहीं.. बहुत अजीब है की अप्प्का नेता अन्ना हजारे राज ठाकरे के साथ खड़ा है, हम नहीं.. बहुत अजीब है की आपका मसीहा सफल आन्दोलन के ठीक बाद नरेंद्र मोदी और नीतीश कुमार की तारीफ़ करता है, हम नहीं.. तारीफों से मिलने वाली 'वैधता' तो समझते होंगे naa..

Himanshu Pandya : ‎Avinash Das नहीं अविनाश जी उलटा है . सुरेश जी के तर्क तो उसी खतरे की ओर इशारा कर रहे हैं जिसकी बात मैं कर रहा हूं . उनका वक्त आने दीजिए , वे अपनी सिविल सोसौती बना लेंगे.

Avinash Das : यही तो मैं भी कह रहा हूं।

Ashok Kumar Pandey : है न मजेदार कि फिर भी बी जे पी इसका आधिकारिक समर्थन कर रही है :)

Suresh Chiplunkar : लंच के लिए निकलने से पहले आखिरी बात… फ़िर शायद शाम को ही भेंट हो पाए क्योंकि इधर दोपहर को पावर कट होता है…

Suresh Chiplunkar : प्रचार की मुख्यधारा में “सेकुलरों”(?) का बोलबाला हो गया है, एक से बढ़कर एक “हिन्दुत्व विरोधी” और “नरेन्द्र मोदी गरियाओ अभियान” के अगुआ लोग छाए हुए हैं, यही लोग जन-लोकपाल भी बनवाएंगे और नीतियों को भी प्रभावित करेंगे। बाकी सभी को “अनसिविलाइज़्ड” साबित करके चुनिंदा लोग ही स्वयंभू “सिविल” बन बैठे हैं… यह नहीं चलेगा…। जब उस “गैंग” के लोगों को नरेन्द्र मोदी की तारीफ़ तक से परेशानी है, तो हमें भी “उस NGOवादी गैंग” पर विश्वास क्यों करना चाहिए?

Avinash Das : मैं पहले भी कह चुका हूं कि अन्‍ना हजारे हमारा नेता नहीं है - फिर भी आप बार बार ऐसा कहने पर आमादा हैं - तो कहिए - मैं क्‍या कर सकता हूं - चुप होने के सिवा।

Avinash Das : इस आंदोलन का आधिकारिक समर्थन तो सीपीआई एमएल लिबरेशन और सीपीआई माओवादी भी कर रहे हैं।

Himanshu Pandya : आंदोलन का चरित्र उसके नेतृत्व कर्ताओं की नीति/ दिशा/ विचारधारा से तय होता है ? फिर से वही सवाल Avinash Das

Puja Shukla : नकरात्मक सोच का व्यवसाय से कोई वास्ता नहीं ये हर वर्ग व्यव से समाज में सुलभ है पर पाठको व् श्रोताओ के पास अधिकार है की वो इनकी बातो को अनसुना कर दे.

Himanshu Pandya : ‎"बाकी सभी को “अनसिविलाइज़्ड” साबित करके चुनिंदा लोग ही स्वयंभू “सिविल” बन बैठे हैं… यह नहीं चलेगा…। " सुरेश जी .

Samar Anarya : आपही के मारे रामबाण से कुछ पंक्तियाँ.. मतलब योगेन्द्र जी के लेख से--"जन लोकपाल विधेयक की खामियों पर भी गंभीर आत्म-विश्लेषण की जरूरत है। इसमें कोई शक नहीं कि सरकारी लोकपाल विधेयक लचर है और उससे इस व्‍यवस्‍था में सुधार की उम्मीद नहीं की जा सकती। ऐसे में एक सर्वव्‍यापी और सर्वशक्तिमान लोकपाल का विचार मन को गुदगुदाता है। लेकिन अंतत: लोकतंत्र में सर्वव्‍यापी और सर्वशक्तिमान संस्‍थाओं के लिए कोई जगह नहीं है। राजनीति में सुधार के तमाम प्रस्‍ताव अक्‍सर इस बीमारी का शिकार रहे हैं। कड़े कानून के लालच में एक समस्‍या खत्म होती है, तो नयी समस्‍या पैदा हो जाती है। उम्मीद करनी चाहिए कि विधेयक की समीक्षा करने वाली समिति में जनांदोलनों के पंच इस मायने में ज्‍यादा समझदारी दिखाएंगे।"

Avinash Das : मैं योगेंद्र जी की इस बात से सहमत हूं।

Samar Anarya : यह भी-- "लेकिन इस आधार पर यह मान बैठना भूल होगी कि नेता, पार्टियां और जनप्रतिनिधि फिजूल हैं। देर-सबेर इस आंदोलन को एक राजनीतिक दृष्टि बनानी होगी। इस देश को वैकल्पिक राजनीति चाहिए, राजनीति के विकल्प नहीं।"

Avinash Das : इससे भी सहमत हूं।

Samar Anarya : और सबसे आगे-- राजनीति-द्वेष वाले आरोप में दम है। इस आंदोलन ने शुरू से ही अपने आपको गैर-राजनीतिक बताया। इसके चलते शहरी मध्‍यवर्गीय समाज का राजनीति-विरोधी तबका इससे जुड़ गया। अन्‍ना हजारे ने अपने बयानों में कुछ सतर्कता भले बरती हो, लेकिन अति उत्साही समर्थकों ने अक्‍सर राजनीति-विरोधी असंयमित भाषा का प्रयोग किया। ऐसा माहौल बनाया, मानो सब नेता और जनप्रतिनिधि चोर हैं और देश का उद्धार उन्‍हें दरकिनार करके ही किया जा सकता है। यह एक खतरनाक सोच है।

Samar Anarya : आप सहमत लगते नहीं.. किसी मजबूरी में मान रहे से लग रहे हैं.

Himanshu Pandya : यह आंदोलन किलिये था अविनाश जी ? तीसरी बार .

Samar Anarya : वरना तो हमारी कुल जमा आलोचना ही यही है,पहले दिन से..की यह आन्दोलन राजनीति के ही खिलाफ है..

Ashok Kumar Pandey : जनता’ के भ्रम में कुछ कम्यूनिस्ट पार्टियां , ग्रुप और बुद्धिजीवी भी सब जानते-बूझते कुछ तो अपने जनान्दोलन न खड़ा कर पाने के अपराध और कुण्ठा बोध से और कुछ ’लोग क्या कहेंगे’ के भय से इस आंदोलन में शामिल ही नहीं हुए बल्कि बाकायदा उन्होंने इसके ‘विजय दिवस’ भी मनाये, लेकिन उनका न तो मीडिया ने न ही ‘जनता’ ने कोई नोटिस लिया…अण्णा और उनके सिपहसालारों से तो इसकी उम्मीद थी भी नहीं। ख़ैर अण्णा का अनशन सफल हुआ और किसी तहरीर चौक की चिंता भी फिलहाल सरकार के मन से निकल गयी। यह एक ऐसा विजय दिवस था जिसमें किसी की हार नहीं हुई।

Samar Anarya : राजनीतिक संघर्षों के खिलाफ है.. यह मध्यवर्गीय रणबांकुरों की, आभिजात्य वर्ग की, अभिजन की संघर्ष की जगहें और जमीने दोनों हडपने की साजिश है..

Himanshu Pandya : रानीति विरोध मूलतः सर्सत्तावाद / तानाशाही/हिटलरशाही / सैनिक शासन/फासीवाद की ओर ले जाता है.

Avinash Das : क्‍या बात है अंतर्यामी अनार्य... खैर... एक बार फिर कहूं कि यह आंदोलन लोकपाल के लिए था, जिससे लोगों को लगता है कि भ्रष्‍टाचार के व्‍हेल का मुंह बेलगाम तरीके से नहीं खुल पाएगा और इससे मैं भी सहमत हूं।

Avinash Das : अनशन-आंदोलन भी राजनीति का हिस्‍सा होता है।

Himanshu Pandya : जन सहभागिता तो बाबरी मस्जिद ध्वंस में भी खूब थी . आखिर हम किसी आंदोलन का चाल-चरित्र-चेहरा कैसे तय करते हैं?

Himanshu Pandya : उसको दिशा देने वालो से , नहीं ?

Samar Anarya : यह निष्कर्ष अन्तर्यामी अनार्य के नहीं आपके रामबाण मार्का योगेन्द्र यादव के लेख से निकला है.. फिर से उन्ही के शब्दों में पढ़िए..जनीति-द्वेष वाले आरोप में दम है। इस आंदोलन ने शुरू से ही अपने आपको गैर-राजनीतिक बताया। इसके चलते शहरी मध्‍यवर्गीय समाज का राजनीति-विरोधी तबका इससे जुड़ गया। अन्‍ना हजारे ने अपने बयानों में कुछ सतर्कता भले बरती हो, लेकिन अति ...उत्साही समर्थकों ने अक्‍सर राजनीति-विरोधी असंयमित भाषा का प्रयोग किया। ऐसा माहौल बनाया, मानो सब नेता और जनप्रतिनिधि चोर हैं और देश का उद्धार उन्‍हें दरकिनार करके ही किया जा सकता है। यह एक खतरनाक सोच है।

Samar Anarya : ना समझ आया हो तो सिर्फ एक पंक्ति--इस देश को वैकल्पिक राजनीति चाहिए, राजनीति के विकल्प नहीं।(योगेन्द्र यादव, अन्तर्यामी अनार्य नहीं)

Samar Anarya : एक और--लेकिन अंतत: लोकतंत्र में सर्वव्‍यापी और सर्वशक्तिमान संस्‍थाओं के लिए कोई जगह नहीं है। राजनीति में सुधार के तमाम प्रस्‍ताव अक्‍सर इस बीमारी का शिकार रहे हैं।((योगेन्द्र यादव, अन्तर्यामी अनार्य नहीं)

Samar Anarya : पता नहीं आप लड़ पड़ने के पहले लेख पढने की मोहलत निकाल पाए थे या नहीं... पर अब तो पढ़ len..

Ashok Kumar Pandey : कुछ लोग जैसे सैनिक शासन को सारी समस्याओं का हल बताते हुए सारे नेताओं को गोली मारने की बात करते हैं...यह भी उसी तरह की सोच पर आधारित था . इसकी जड़ें अन्ना के 'माडल' गाँव में है जिसके सरपंच के शब्दों में वहाँ अन्ना का कहा ही अंतिम आदेश है.

Himanshu Pandya : अगर योगेन्द्र जी के इस समर द्वारा उद्धृत अंतिम वाक्य को ही ध्यान में रखें --"लेकिन अंतत: लोकतंत्र में सर्वव्‍यापी और सर्वशक्तिमान संस्‍थाओं के लिए कोई जगह नहीं है। राजनीति में सुधार के तमाम प्रस्‍ताव अक्‍सर इस बीमारी का शिकार रहे हैं।" तो फिर आपका पिछला जवाब काफी दिक्कत पैदा करता है "यह आंदोलन लोकपाल के लिए था,"

फिर दोहरा दूं एक सशक्त लोकपाल की मांग तो बरसों पुरानी है , फिर आज अचानक नवउदारवादी अर्थव्यवस्था जो हमारी व्यवस्थापिका को अभी तक अप्रासंगिक नहीं बना पायी है , एक ऐसा 'जन लोकपाल बिल' लाती है जिसमें सारे अधिकार एक स्वयम्भू सिविल सोसाइटी के पास हों . तब उसके निहितार्थों को समझना भी जरूरी है और प्रश्न्चिन्हित करना भी.

Satyendra Pratap Singh : ‎@Samar Anarya चलिए गोरखपुर में आंदोलन करें. अपने घर का खूंटा पहले उखाड़ दें तो बेहतर होगा. पड़ोस में पंडित जी जीत गए है, उनका भी. उसके बाद शांति भूषण! मुर्गे का खून बहाकर क्रांति!!

Samar Anarya : ‎Satyendra Pratap Singh कुछ खूंटे आप भी क्यों नहीं उखाड़ते सत्येन्द्र बाबू..सारे खूंटे उखाड़ने की जिम्मेदारी हमारे कमजोर कन्धों पर ही क्यों? या इस खूंटे से आपको कुछ जाती लगाव है, की इसको उखाडता देख बहुत दर्द हो रहा है?

Ashok Kumar Pandey : ‎Samar Anarya मान जाओ यार समर..किस-किस को अपन अपने बायोडाटा दिखाते फिरेंगे...वे बायोडाटा जिनसे नौकरी नही मिलाती. किस-किस को बताएँगे कि हमने अपने शहरों में बस कलम घसीटी नही की...जाने दो

Samar Anarya : ‎Ashok Kumar Pandey बात सही है दादा.. मान गया.. तुरंत..

Himanshu Pandya : मैं चला नौकरी पर . लौटकर फिर अलग से लिखूंगा इस पर , योगेन्द्र जी का लेख और अविनाश भाई या हमारे आशुतोष भाई की चिंताएं साझा ही हैं कि इस जन सैलाब को सही दिशा में मोड लें किसी तरह ... योगेन्द्र जी का लेख इसलिए अच्छी बहस की दरकार रखता है , उसमें भी काफी असहमतियों के रास्ते हैं .

Satyendra Pratap Singh : बहुत दर्द हो रहा है समीर. आपके बारे में चर्चा हो रही थी. मैंने कहा कि तेज लड़का है, वामपंथी रुझान का आई ए एस वगैरह बन जायेगा. कुछ लोगों का हित करेगा. उसी समय मेरे एक सहकर्मी ने कहा कि सर ज्यादा संभव है कि ओवरएज हो गया होगा. आपके तर्कों से स्पस्ट हो गया. मेरे सहकर्मी का कहना सही लग रहा है, आप वामपंथी प्रोफ़ेसर बनेंगे. मुर्गों का खून बहाकर ही क्रांति होगी....

Samar Anarya : ‎Satyendra Pratap Singh दर्द होना भी चाहिए. ख़ास तौर पर तब जब आप की समझ में जनता के हित का रास्ता आईएएस बनने की गलियों से भी गुजरता हो.. हाँ, ओवरएज तो बहुत पहले हो गया था.. बिना कभी फॉर्म bhare..

Satyendra Pratap Singh : असल में ज्यादातर लोग "जनता" के हित में लगे हैं, खुद जनता नहीं बने, नहीं तो आपकी बात बहुत पहले समझ में आ जाती. ज्यादातर लोग प्रोफ़ेसर हैं जनता नहीं. आप जो तर्क दे रहे हैं, हर युवक देता है. ६० साल से देता आ रहा है. जब उम्र ४० के पार हो जाती है तब वैचारिक बदलाव आ जाता है. कुछ रणनीति में बदलाव करना ही होगा, जिससे संख्या बढे.. और ज्यादातर लोग जनता बन जाएँ. मै भी इन्तजार में हूँ कि ये व्यवस्था ही लोगों की रोजी रोटी छीन लेगी, तब सब जनता बन जायेंगे... हो सकता है कि तब बदलाव हो...

Satyendra Pratap Singh : समीर= टाइपिंग की गलती से चला गया है. आपके नाम से मैं परिचित हूँ. भ्रम न हो, इसके लिए ये खेद भेज रहा हूँ.

Neeraj Kumar : THATS RIGHT

Samar Anarya : ‎Satyendra Pratap Singh इसके लिए निश्चिंत रहें.. इतनी छोटी बातों पर ना मैं दुखी होता हूँ ना नाराज..हाँ यह भी की कुछ लोग नौकरियाँ नहीं तलाशते.. जीने के लिए कभी कभी कुछ कुछ कर लेते हैं.. करना पड़ता है..उसके लिए शर्मिंदा भी नहीं होते.. मैंने अब तक कभी नेट का फॉर्म भी नहीं भरा वैसे.. तो अभी प्रोफ़ेसर बनाने की भी कोई उम्मीद नहीं है.. जनता ही rahunga

Neeraj Kumar : WAISE YE BHI SAHI HAI LEKIN KUCHH TO KARNA ADTA HAI

Satyendra Pratap Singh : चलिए.. आपसे सीधी बात हो रही है, अच्छा है. खुशी हुई कि आप जनता रहेंगे. आपके विचारों से सहमत होते हुए तमाम भ्रम होते है. जितनी बात आप कहते है, उतनी मैंने भी पढ़ी है. इसलिए कि वो बहुत पुरानी है और कई साल से या कहें कि कई दशक से कही जा रही है. ज्यादातर लोगों को जनता बनाने की जरूरत है, लेकिन अभी मै ही इस वर्ग से बाहर होते-होते बचा! आपने एक लेख लिखा था. सच है कि ७० प्रतिशत से ज्यादा आबादी मध्य वर्ग नहीं है. लेकिन इसमें खामी ये है कि ये आबादी खुद को मध्यवर्ग ही मानती है और आप मध्यवर्ग की खिलाफत करते हैं तो ये बड़ी आबादी आपसे कट जाती है. अगर हम अम्बानी (अभी पिछली तिमाही में ५३०० करोड़ रूपये का शुद्ध मुनाफा हुआ है) का विरोध आपके तरीके से करते हैं तो मोहल्ले का किराने वाला और सब्जी वाला विरोध में खड़ा हो जाता है ....

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ज्यादातर वकील भी प्रशांत भूषण की ये गति देखकर अरुण जेटली और कपिल सिब्बल को ही आदर्श बनाने में ही भलाई समझेंगे, कोई एंजेल्स निकलकर सामने नहीं आएगा...

कहीं न कही इस पुरानी अवधारणा में खामी है ही, जिसके चलते ज्यादातर लोग हमारे खिलाफ हैं या कहें के हमसे नहीं जुड रहे है. हम उसी को धो रहे है....

Satyendra Pratap Singh : एक बात और. मुझे खुशी होती है, अग्निवेश जैसे भारत भारती, रघुपति राघव राजाराम का नारा लगाने वाले लोगों को किसी तरह छत्तीसगढ़ ले जाया जाता है और वे इस व्यवस्था के खिलाफ चीख उठते हैं कि हां, मैं माओवादी हूँ! इस सफलता की जरूरत मुझे लगती है, न कि उनका अतीत याद दिलाकर इन जैसे लोगों को खुद से दूर कर लेने की.

Samar Anarya : ‎Avinash Das इस आन्दोलन का मूल चरित्र समझना हो तो यह भी बता दें की http://antireservation.com/ खोलने पर कौन सी साईट खुलती है. आप तो इन्टरनेट के ब्रह्मज्ञानी हैं, एक बार कर के देख लें.. और फिर बताएं की क्या आप इस आन्दोलन के साथ हैं? अब भी?

Samar Anarya : या फिर आप भी रिसर्वेशन के सवाल पर शिवेंद्र सिंह चौहान के साथ हैं.. मुझे याद है अपने स्टेटस मैसेज में आपने उनके बड़े गुण गाये थे.. हाँ जो भी करें यह साईट जरूर खोल लें..

Suresh Yadav : BHUSHAN pita putro k khilaf jitne gambhir aarop lage he vo yadi kisi neta k khilaf hote to

Suresh Yadav : hum log hi unhe pado se hatane ki mang karte

Suresh Yadav : avinash sir ki ye baat sahi ho sakti he ki bhushan pariva logo ki seva karta aa raha he parantu netikata k mapdand alag alag nahi ho sakte he

Suresh Yadav : kahne ka tatpary yah ki hum LOKPAL jesa kanoon bana rahe he aur sbhya samaj ke pratinidhi hi daagi ,yah svikar nahi kiya ja sakata

Samar Anarya : ‎Satyendra Pratap Singh संघर्ष के लिए जनता के साथ की जरूरत होती है, उसके नेतृत्व के दावे करने वाले 'नागरिक समाज' उर्फ़ सिविल सोसायटी की नहीं. और जब दावे इतने बड़े हों तो पड़ताल जरूरी बंटी है. आप मासूम बने रह सकते हैं..par सवाल तो यह है की आन्दोलन के नेतृत्व में श्री श्री जैसे आरक्षण विरोधी हों और पीछे (साइबर जगत में) http://antireservation.com/ खोलने पर इंडिया अगेंस्ट करप्शन खुले तो आपको समझ जाना चाहिए की यह आन्दोलन आगे और पीछे दोनों में से किसका है? या आप यह बताना चाहते हैं की आरक्षण विरोधी ही भारत की जनता के बहुसंख्यक हैं..

Atul K Mehta 'viduur' : सभी ने सुनी होगी वो पुरानी कहानी धोबी के गधे की....जिसमे धोबी अपने गधे को शेर की खाल पहनकर दूसरों के खेत में चरने के लिए छोड़ देता था..... लोगों को विस्मय तो होता था, शेर को घास चरते हुए देखकर, पर फिर भी डर के मारे कोई कुछ कर नहीं पाता था..... एक दिन गधा चने के खेत में घुस गया और उसे चना खाकर बहुत मज़ा आया.....आनंदातिरेक होकर उसने जोर जोर से रेंकना शुरू कर दिया .....हेंचू हेंचू....और गाँव के लोगों को सारा माज़रा समझ में आ गया ....और फिर वो धुनाई हुई गधे की, कि बेचारे ने दम ही तोड़ दिया......कुछ ऐसी ही हालत अब हमारे प्रिय अन्ना हजारे की भी है....जिन्होंने अति-उत्साह में आकर नरेन्द्र मोदी की बड़ाई करके अपना सारा भेद खुद ही मीडिया वालों को बता दिया.....लेकिन मीडिया में अभी भी ऐसे लोगों की कमी नहीं है, जो अन्ना को ना केवल टाइगर मानकर चल रहे हैं, अपितु उसे इस डरपोक देश का नया और सर्वशक्तिमान भगवान बना देने पर आमादा हैं......भगवान ही बचाएगा इस देश को अन्ना और अन्ना अंधभक्तों से एक बार फिर से....

But the moot Question is - Who is Dhobi ?????

Atul K Mehta 'viduur' : But the moot Question is - Who is Dhobi ?????

Satyendra Pratap Singh : ‎@Samar Anarya तथ्य कहते है कि जनता आपके साथ नहीं, कांग्रेस और भाजपा के साथ है!!! क्यों नहीं है, इस पर विचार करना आपके जिम्मे! ये किताबों में नहीं मिलने वाला, और न ही इन्टरनेट के किसी लिंक पर मिलेगा. मैं बहुत खोज चुका हूँ. जहाँ तक आरक्षण, भाषा, क्षेत्रवाद की बात है, इसी सरकार की देन है, मैं तो १०० प्रतिशत रोजगार की बात करता हूँ.

Samar Anarya : ‎Satyendra Pratap Singh बिलकुल गलत जानकारी है आपको.. दुरुस्त कर लें तो शायद ठीक हो... पिछले चुनाव के आंकड़े देख लें, कोंग्रेस को कितने वोट आये थे भाजपा को कितने.. यह भी जोड़ लें की दोनों मिल कर भी ५० प्रतिशत भी होते हैं या नहीं..अब इसमें यह देखने की कुल मतदान कितना हुआ था? फिर देश की 'नागरिक' आबादी में इनका समर्थन समझें.. (फिर भी ना आये तो आबादी का हिसाब भी देख लें, मतलब यह की १२ करोड़ से ज्यादा मतदाताओं की आबादी वाले उत्तर प्रदेह में बसपा को ३० प्रतिशत मिले तो उसके कुल समर्थकों की संख्या कितनी हुई?

Samar Anarya : Satyendra Pratap Singh हाँ अब इस आधार पर लोकतंत्र को खारिज करने मत दौड़ पड़ियेगा.. प्रतिनिधिमूलक लोकतंत्र की अपनी सीमायें हैं, सार्वभौमिक मताधिकार वाले लोकतंत्र में first past the post का तर्क बहुत बार जनसमर्थन को बिलकुल ठीक ठीक व्यक्त नहीं करता..पर इससे बेहतर कोई सिस्टम अभी नजर में आता भी नहीं.. और हाँ इस बात से कोई इनकार नहीं है की जनता जितनी भी हो कांग्रेस और भाजपा के साथ, अन्ना और उनके गुर्गों से बहुत बहुत ज्यादा है.. यह भी की यह जनता गुजरात के बाद भाजपा और उसके एनडीए को सबक भी सिखा सकती है, बोफोर्स के बाद कोंग्रेस को भी.. अन्ना यह बात समझते हैं, इसीलिये इस जनता को दारू और १०० रुपये पर बिकने वाला बताते हैं..आप अन्ना की इस जनता के लिए इस घृणा को क्यों नहीं समझना चाहते उसके लिए बेशक आपके पास तर्क होंगे. पर उन्हें हमारे गले उतारने की कोशिश तो ना kariye...

Avinash Pawar : भारत के बहुत सारे बुद्धिमान प्राणियों के लिए भ्रष्टाचार एक साधारण समस्या है. उनके लिए तो भयंकर समस्याए और ही कुछ है. जैसे अन्ना, अन्ना का चरित्र, अन्ना का अनशन, अनशन का खर्चा, उसकी संविधानिकता (किसके बाप ने पढ़ी है वो मोटी किताब?), उनके साथी, साथियों का चरित्र, सथियों का लिंग, उनका वर्ग, उनका ठिकाना, उनका धर्म, उनकी मोमबत्ती, उनके पुरस्कार, पुरस्कार देने वाले, पुरस्कार देने वालोंका चरित्र, मीडिया, मीडिया के हेतु.. लोकपाल की किसको जल्दी है? तब तक हसन अली अपना "लोकपाल".

Satyendra Pratap Singh : ‎@Samar Anarya लगे रहिये..प्रतिनिधिमूलक लोकतंत्र, सार्वभौमिक मताधिकार,first past the post में. और गिनते रहिये कि किसको कितने प्रतिशत मत मिले. हाँ, पिछले ६० साल के रिकार्ड यही बताते है कि "कथित " वामपंथियों ने ही २ राज्य में जनता को अपने पक्ष में करने में सफलता पाई है. उसमे भी केरल में स्थिति ठीक लग रही है, बंगाल में नहीं... मेरा मसला वहीँ का वहीँ है कि मुझे ख़ारिज करने के बजाय अपने साथ जोड़ लीजिए, मैं आम मतदाता हूँ कोई वाद कब्ज नहीं है.. फिर भी आप मुझे लगातार ख़ारिज किए जा रहे हैं कि मैं जनता नहीं हूँ. हाँ इतना जरूर है कि मैं मुर्गा बनने को तैयार नहीं!

Satyendra Pratap Singh : दूसरी बात. आपके लिए अन्ना महत्वपूर्ण हो सकते हैं, जिसके चलते आप उनके ऊपर इतने शब्द बर्बाद कर रहे है. मुझे पहले दिन से अन्ना कोई उम्मीद नहीं. http://satyendrapratap.blogspot.com/2011/04/blog-post.html

Sataydeep Bhojak : rajasthani me char laina hath jor thane karoo adab mhe thari dhak

Sataydeep Bhojak : dyu too mhari dab be khawe siglo mal thare tai khali raab

फेसबुक पर हिंदीवालों की कुछ लंबी बहसों में से एक इस बहस में हिस्सा लेने के लिए क्लिक करें- शांति व प्रशांत भूषण


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