ब्लागरों की जुटान में निशंक के मंचासीन होने को नहीं पचा पाए कई पत्रकार और ब्लागर

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: गंगा घोटाले को लेकर कुछ लोगों ने आवाज उठाई : पुण्य प्रसून बाजपेयी और खुशदीप सहगल ने किया बहिष्कार : नुक्कड़ समेत कई ब्लाग व ब्लाग एग्रीगेटर चलाने वाले और हिंदी ब्लागिंग को बढ़ावा देने के लिए हमेशा तन मन धन से तत्पर रहने वाले अपने मित्र अविनाश वाचस्पति का जब फोन आया कि 30 अप्रैल को शाम चार बजे दिल्ली के हिंदी भवन (जो गांधी शांति प्रतिष्ठान के बगल में है) में ब्लागरों की एक जुटान है तो मैं खुद को वहां जाने से रोक नहीं पाया.

आमतौर पर भड़ास के कामों से फुर्सत निकाल पाना मेरे लिए कठिन होता है लेकिन हिंदी ब्लागरों से जब मिलने मिलाने की बात होती है तो मैं उत्साहित होकर वहां पहुंचने की कोशिश करता हूं क्योंकि आज भड़ास4मीडिया जिस मुकाम पर है उसके पीछे हिंदी ब्लागिंग की ही देन है. भड़ास ब्लाग से जो शुरुआत की तो उसके पीछे कई हिंदी ब्लागरों का हाथ रहा है जिनसे हिंदी में टाइप करने से लेकर ब्लाग बनाने फिर साइट बनाने तक के नुस्खे सीखे. चार की बजाय तीन बजे ही हिंदी भवन मैं पहुंच गया. पहुंचते ही हिंदी भवन के सभागार स्थल के ठीक बाहर दो किताबों के प्रचार का बैनर टंगते हुए देखा.

इन किताबों पर उत्तराखंड के मुख्यमंत्री रमेश पोखरियाल निशंक का नाम लेखक के रूप में अंकित था. किताबें सफलता सिखाने वाली किताबों जैसी थीं (किताबों के नाम- 1- सफलता के अचूक मंत्र 2- भाग्य पर नहीं, परिश्रम पर विश्वास करें). थोड़ा अचरज हुआ कि एक मुख्यमंत्री सफलता सिखाने वाली किताबें लिख रहा है जिसमें ढेर सारी सच्चरित्र होने की बात कही गई थी और उसी मुख्यमंत्री का नाम कई तरह के घोटालों में आ रहा है. अभी कुछ रोज पहले ही सीएजी की रिपोर्ट से खुलासा हुआ कि उत्तराखंड सरकार ने हरिद्वार महाकुंभ में गंगा घोटाल किया है. इस गंगा घोटाले के चलते गंगा और ज्यादा मैली हुई हैं. गंगा में भारी मात्रा में मल व मैल बहाकर उत्तराखंड सरकार ने न सिर्फ गंगाजी बल्कि भक्तों की पवित्र भावनाओं को भी चोट पहुंचाया है. इस घोटाले पर हो-हंगामा शुरू होने के आसार बन गए हैं. इस घोटाले से पहले भी कई घोटाले उत्तराखंड सरकार और इसके सीएम रमेश पोखरियाल निशंक के नाम दर्ज हैं. पर लगा कि डायमंड प्रकाशन वालों ने, जो कार्यक्रम के स्पान्सरों में से एक हैं, ये प्रचार बैनर इसलिए लगाए होंगे ताकि उनकी नई किताबों की बिक्री बढ़े. यह तनिक भी आभास नहीं था कि रमेश पोखरियाल निशंक भी इस कार्यक्रम में आने वाले हैं.

हिंदयुग्म डाट काम वाले शैलेष भारतवासी मिल गए. हिंदी ब्लागिंग के लिए इस शख्स ने काफी खून और पसीना जलाया-बहाया है. हिंदी ब्लागिंग के एक्टिविस्ट रहे हैं शैलेष. इनकी तारीफ में ज्यादा कुछ कहने की बजाय इतना बता दूं कि आउटलुक हिंदी वाले इस अंक में शैलेष भारतवासी की तस्वीर छपी है और उन पर रिपोर्ट भी है. शैलेष संग बतियाता और घूमता रहा. ब्लागर साथियों से परिचय होता रहा. उधर, रविंद्र प्रभात, अविनाश वाचस्पति समेत कई आयोजक लोग मंच को सजाने-संवारने में जुटे रहे. गिरोश बिल्लोरे मुकुल कार्यक्रम को ब्लागों पर लाइव प्रसारित कराने की एक अदभुत व्यवस्था को संयोजित करने व सफल बनाने में जुटे थे. मंच के बैनर से स्पष्ट हुआ कि बिजनौर की हिंदी की एक संस्था के पचास बरस पूरे होने पर यह कार्यक्रम आयोजित किया गया है और इसमें कई किताबों का विमोचन होना है.

शैलेष और मैं कार्यक्रम शुरू होने में देरी देखकर सभागार से बाहर निकल कर चाय पीने चले गए. वहां जिस चाय वाले से शैलेष ने परिचय कराया, उन्हें देखकर दंग रह गया. वे चायवाले नहीं बल्कि साहित्यकार हैं. उनकी लिखी किताबें फुटपाथ पर चाय की दुकान के बगल में सजी थीं, बिक्री के लिए. ठीक पीछे उनके साहित्यकार होने से संबंधित तस्वीरें व बैनर थे. तस्वीरों में चाय वाले साहित्यकार साथी पीएम, राष्ट्रपति समेत कई बड़े लोगों के साथ दिख रहे थे. बैनर पर इनका नाम लिखा देखा- लक्ष्मण राव. इतने बड़े लोगों से मिल चुका और इतनी अच्छी किताबें लिख चुका कोई शख्स चाय बनाकर जीवन चलाता होगा, ये सोचकर देखकर मैं हैरान था. ईमानदारी का नशा होता ही ऐसा है. मन ही मन मैं सोचने लगा कि मुझे ईमानदार नहीं रहना है क्योंकि ईमानदार व्यक्ति तो बहुत ठोकर खाता है, बेचारा चाय बेचने लगता है.

अपनी भावना, मन की भड़ास मैंने अपने एक साथी से शेयर की तो उनका कहना था कि दरअसल ईमानदार व्यक्ति जो जीवन जीता है, उससे कम से कम उसको मलाल नहीं होता, हम आप जरूर चकित होते हैं क्योंकि हम लोगों को लगता है कि सारी सुविधाएं मिलने के बाद ही ईमानदारी के लिए लड़ाई लड़ी जानी चाहिए या ईमानदार बनने का दिखावा करना चाहिए. आम आदमी तो अपनी ईमानदारी को अपनी शख्सियत मान उसे ही जीता रहता है और उसी में वो सारी खुशियां, सारे दुख-सुख पा लेता है जो हम लोग बहुत कुछ भौतिक सुख सुविधाएं पाकर भी नहीं जी पाते, नहीं महसूस कर पाते.

खैर, ये लंबी बहस है. मैं मन ही मन उस बुजुर्ग साहित्यकार साथी लक्ष्मण राव को प्रणाम कर और चाय खत्म कर लौट गया सभागार की तरफ. तब पता चला कि निशंक आने वाले हैं. उनका हवाई जहाज लेट है. फिर पता चला कि लैंड कर गया है. रायपुर वाले पंकज झा, दिल्ली वाले चंडीदत्त शुक्ला, मयंक सक्सेना समेत कई लोग मिलते रहे. जाकिर अली रजनीश, राजीव तनेजा, खुशदीप सहगल समेत कई ब्लागर साथियों से मुलाकात हुई. कई महिला ब्लागर भी वहां पहुंची थीं. कार्यक्रम शुरू होने में देरी होते देख सभागार से फिर बाहर निकला तो निशंक के स्वागत के लिए कई लोग लाइन में लगे दिखे. और अंततः कई गाड़ियों के साथ निशंक आ गए.

उतरते ही कुछ न्यूज चैनल वालों ने उन्हें घेर लिया. जिस प्रोग्राम में शिरकत करने आए थे, उसके बारे में बताने के बाद आगे बढ़े और सभागार में पहुंचे. उनके आते ही कार्यक्रम में तेजी आ गई. स्वागत आदि की औपचारिकता के बाद बिजनौर की साहित्यिक संस्था के पचास वर्ष पूरे होने पर बातचीत शुरू हुई. हम लोग फिर बाहर निकल आए. यह भी बताया गया कि करीब पचास साठ ब्लागरों का सम्मान होना है, उन्हें पुरस्कृत किया जाना है. थोक के भाव ब्लागरों का सम्मान. अच्छा लगा कि चलो ब्लागरों को रिकागनाइज किया जा रहा है. सभागार से बाहर आने के बाद कई ब्लागरों से बातचीत चाय की दुकान पर शुरू हुई. बातचीत में निशंक का भी जिक्र चला. उनके गंगा घोटाले की बात उठी. फिर यह भी कि निशंक से मीडिया वालों को सवाल करना चाहिए की उत्तराखंड के इस नए घोटाले के बारे में उनको क्या कहना है.

यहां मैं एक बात बताना भूल गया. हिंदी भवन के बगल में एक राजेंद्र प्रसाद भवन भी है. उसमें सुलभ इंटरनेशनल वाले बिंदेश्वरी समेत कई लोग एक किताब के विमोचन समारोह में आए थे. मुझे सुरेश नीरव ने सूचित किया था, सो बीच में मैं शैलेष के साथ हिंदी भवन से उठकर राजेंद्र प्रसाद भवन चला गया. वहां चाय-नाश्ता तुरंत मिलने वाला था, इसलिए चाय-नाश्ता मिलने तक रुके और खा-पीकर फिर इधर निकल आए. मैंने शैलेष से बोला कि हम लोग प्रेमचंद की कफन कहानी के नायकों सरीखे हो गए हैं, प्रोग्राम में शिरकत करने के नाम पर पहुंचे और खा-पीकर निकल लिए, बिना किसी को दुआ सलाम किए. शैलेष हंसे.

मैं ऐसे क्षण इंज्वाय करता हूं. ऐसी ही जिंदगी जीता रहता हूं जिसके हर पल में छोटी मोटी शैतानियां, खुशियां, एक्सप्रेसन आदि हों. लगातार गांभीर्य धारण करे रहना, लगातार खुद को क्रांतिकारी इंपोज करते रहना अपन से नहीं होता और ऐसी हिप्पोक्रेसी के मैं खिलाफ भी रहता हूं. मनुष्य बेहद सरल चीज होता है, वह उलझी हुई दुनिया को देखकर खुद बहुत कांप्लेक्स बनता जाता है और अंततः अंदर कुछ और, बाहर कुछ और वाला दो शख्सियत रखने वाला इंसान बन जाता है. पर, हर गंभीर आदमी हिप्पोक्रेट होता है, ऐसा भी नहीं है. कई लोगों की गंभीरता उनके स्वभाव का हिस्सा होता है. वे बचपन से ही वैसा जीवन जीते हैं और वैसे ही व्यवहार करते हैं.

आखिरी बार लौटकर जब हिंदी भवन सभागार जाने लगा तो हिंदी भवन के गेट पर पुण्य प्रसून बाजपेयी दिखे. कुछ छात्रनुमा युवका, पत्रकार नुमा युवक उनसे बतिया रहे थे और पुण्य जी लेक्चर दिए जा रहे थे, बड़ी खबर वाले अंदाज में. उन्होंने कार्यक्रम के आयोजकों को समय का ध्यान न रखने के लिए कोसा. उन्हें कार्यक्रम के दूसरे सत्र, जो ब्लागिंग पर था, के लिए बुलाया गया था. पर आयोजकों को होश ही नहीं था कि पुण्यजी आ गए हैं. और, जब निशंक की बात चली तो पुण्य प्रसून ने कहा कि करप्शन के चार्जेज इन महोदय पर लगे हैं. निशंक के मंच पर बैठे होने की बात को पुण्य प्रसून पचा नहीं पाए. और यह भी किसी ने कहा कि भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरे निशंक के हाथों ही ब्लागरों को पुरस्कृत-सम्मानित कराया जाना है. थोड़ी देर बाद पुण्य प्रसून बाजपेयी गेट से अपनी कार की तरफ बढ़े.

तभी खुशदीप सहगल, जो संभवतः जी न्यूज में हैं, गुस्साए हुए आए और बोले कि पुरस्कार वगैरह सब वहीं छोड़ दिया है, इन आयोजकों को इतनी भी समझ नहीं है कि किसके हाथ पुरस्कार दिला रहे हैं. सहगल का गुस्सा इस बात पर ज्यादा दिख रहा था कि पुण्य प्रसून बाजपेयी को ब्लागिंग के कार्यक्रम के लिए बुलाया गया लेकिन किसी ने उन्हें मंच पर बुलाने की जरूरत नहीं समझी. एक तरह से पुण्य प्रसून बाजपेयी और खुशदीप सहगल ने अपना विरोध प्रकट करते हुए वहां से निकल लेने की तैयीर शुरू की और आयोजन को बीच में छोड़कर चले गए.

मैं अंदर का नजारा देखने सभागार में पहुंचा. मंचासीन एक सज्जन, जो कभी अधिकारी हुआ करते थे, माइक पकड़कर ब्लागरों को नसीहत दे रहे थे. तारीफ कर रहे थे. निशंक को बार बार संबोधित कर उन्हें देवेगौड़ा से अपनी नजदीकी का किस्सा सुनाते हुए उनके पीएम बनने पर अलग राज्य बनाए जाने के दौरान की घटना का जिक्र कर रहे थे. उनके कहने का आशय ये भी था कि अलग राज्य उनकी सलाह पर देवेगौड़ा ने बनाया, सो, उसी कारण उत्तराखंड बना, और इस कारण उनका निशंक पर हक बनता है, इसके लिए वे बाद में निशंक से मिल लेंगे. वे यह सब बात थोड़ा हंसते हुए भी कह रहे थे, सो कुछ लोगों ने इसे मजाक माना और कुछ ने इसे पूरी गंभीरता से लिया. और हां, इस अधिकारी महोदय ने भ्रष्टाचार पर इतना भाषण झाड़ा कि लोग बोर हो गए. वे स्विस बैंक में जमा धन को भारत लाने के बारे में तरकीब बता रहे थे, वे यूरोपीय यूनियन के बारे में बता रहे थे. पर उन्हें साहस नहीं हुआ कि वे मंच पर बैठे निशंक से उनके राज्य के घोटालों के बारे में पूछ सकें.

प्रभाकर श्रोत्रिय, रामदरश मिश्र आदि आए और बोले. रामदरश मिश्र ने अपनी उम्र का हवाला देते हुए साफ-साफ बता दिया कि उन्हें ब्लाग के बारे में कुछ नहीं पता, लेकिन इतना पता है कि ये बहुत अच्छा है और हर कोई अपने ब्लाग पर लिखकर अपनी बात सब तक पहुंचा सकता है. प्रभाकर श्रोत्रिय ने ब्लाग में सिर्फ सरोकार, विचार, समाज आदि के बारे में लिखे जाने की बात कही. उनके कहने का आशय ये था कि ब्लाग पर कूड़ा करकट नहीं परोसा जाना चाहिए. कई ब्लागरों ने मन ही मन इस पर आपत्ति दर्ज की. सभी हिंदी साहित्य निकेतन संस्था के पचास वर्ष होने और इसके संस्थापक गिरिराज शरण अग्रवाल को जमकर दुवाएं दीं. गिरिराज शरण अग्रवाल की बड़ी बेटी मंच का संचालन कर रहीं थीं. उनकी छोटी बेटी भी पूरे आयोजन को सफल बनाने में पूरे सक्रियता से जुटी हुई थीं. गिरिराज जी की पत्नी मीना भी अच्छी साहित्यकार हैं, ये बात पता चली. हम जैसे साहित्य के अज्ञानियों के लिए पूरे आयोजन ने ये संदेश जरूर दिया कि ये अग्रवाल कुनबा साहित्य की जमकर सेवा कर रहा है. और, इस परिवार के हर एक सदस्य, यहां तक कि छोटे बच्चों को भी बेहद सक्रिय व सहज देखकर अच्छा लगा.

पूरे आयोजन के दौरान मैं उस वक्त वहां नहीं था जब ब्लागरों को पुरस्कार आदि दिए जा रहे थे, सम्मानित किया जा रहा था. लेकिन बाद में जब कार्यक्रम खत्म हुआ तो देखा कि ब्लागर भाई बहन लोग गदगद हैं, सम्मान पाकर, पुरस्कृत होकर. दो बार दर्शकों के बीच से निशंक को लेकर आवाज उठाई गई, भ्रष्टाचार के बारे में. पर ये आवाज बेहद धीमी थीं, सो मंच तक नहीं पहुंच पाई, हां, अगल बगल वाले लोग जरूर आवाज उठाने वालों को देखने लगे.

दोपहर तीन बजे हिंदी भवन पहुंचा तो रात करीब आठ बजे वहां से घर के लिए निकला जब चाय के लिए ब्रेक हो गया. लौटते वक्त ड्राइव करते हुए सोचता रहा, लंबे जाम में फंसने के बाद गाड़ी बंदकर सोचता रहा, इस धरती पर अरबों खरबों लोग हैं, कोई चोर है, कोई उचक्का है, कोई आम आदमी है, कोई बेईमान है, कोई राजा है, कोई रंक है, कोई त्रस्त है, कोई मस्त है. सबके अपने अपने तर्क और सबके अपने अपने कर्म. कोई किसी को चोर चोर कह रहा है तो कोई चोर चुपचाप अपना काम किए जा रहे हैं और चोरी को चोरी न मान, इसे जीवन का हिस्सा मानकर जिए जा रहा है. कोई चोर दूसरे कथित ईमानदारों को लालीपाप पकड़ा कर अपने गोल में कर ले रहा है और उसे अपना प्रवक्ता बना दे रहा है और वह लालीपाप वाला आदमी अब चोर के चोर न होने के पक्ष में तर्क दिए जा रहा है.

ढेरों बिंब प्रतिबिंब आते रहे जाते रहे. यह भी लगा कि इस सिस्टम में बेहद मजबूरी में ही बड़े चोर पकड़े जाते हैं. कलमाड़ी अभी पकड़ा गया. उसके पहले तक वह सीना ताने खुद को ईमानदार बताता घूम रहा था. और फिर कलमाड़ी ही चोर कैसे. कलमाड़ी ने जो कुछ किया उसे क्या उसके उपर वाले आकाओं ने संरक्षण देकर नहीं कराया. तो फिर चोर सिर्फ कलमाड़ी ही क्यों. वो जो चोरी के स्रोत हैं, वे तो सबसे बड़े ईमानदार बने फिरते हैं और चोरी के खात्मे की मुहिम को सपोर्ट करने की बात कहते हैं.

विचारों, खयालों की दुनिया से निकलकर जब घर पहुंचा तो लगा कि दरअसल इस देश में यथास्थितिवाद ने इस कदर घर कर लिया है कि हर कोई सब कुछ जान बूझकर चुपचाप अपने अपने हिस्से की जिंदगी अच्छे से जिए जाने के लिए कसरत कर रहा है. और पसीना सुखाते वक्त दूसरों की चिंता करने का नाटक करते हुए फिर अपने हिस्से की मलाई की तलाश के लिए दाएं-बाएं सक्रिय हो जाता है. पर यह सच संपूर्ण नहीं है.

राजधानियों के बाहर जंगलों गावों कस्बों छोटे शहरों में जो खदबदाहट है, उसे शायद महानगर वाले महसूस नहीं कर पाते लेकिन एक दिन कोई उन्हीं जंगलों और गांवों और कस्बों और छोटे शहरों से निकल कर जब दैत्याकार महानगरों में आता है तो उसे लगता है कि उसने जो कुछ सीखा जिया वो सच नहीं, सच तो ये है झूठ की दुनिया है जहां आगे बढ़ने के लिए हर पल झूठ के शरणागत होने की मजबूरी है और इसे नकार देने पर तनहाई, परेशानियों, मुश्किलों का अंतहीन दौर है.  और ऐसे ही किसी युवक के हाथों में कभी कोई हथियार आ जाता है, कोई विचार आ जाता है और वो सबको थर्रा देता है.

जंगलों से आती कराह की आवाज, गोलियों की आवाज, सिस्टम के सताये लोगों की आहों की आवाज.... ये बेकार न जाएंगी. कई बार हालात बदलने में देरी होती है, वक्त लगता है, पर इसका मतलब यह नहीं कि सच हार गया. देश से गोरों को भगाने में कई दशक लगे. कई तरह के नेता उगे. कई तरह के विचार आए. तब जाकर जनता गोलबंद हुई. आजादी की लड़ाई शुरू और खत्म होने में सौ साल लगने में केवल दस साल ही शेष रह गए थे.

इस मुल्क में जो नई व्यवस्था की गुलामी पिछले साठ साल से चल रही है, उसे खत्म होने और कोई नई व इससे ज्यादा ईमानदार व पारदर्शी व्यवस्था आने में अभी कुछ वर्ष या कई दशक लग सकते हैं. जरूरत सिर्फ इस बात की है कि हम अपने अपने हिस्से के विरोध को प्रकट करते रहें, नए माध्यमों के जरिए अपनी आवाज उठाते रहें, कभी संगठित होकर सड़क पर आते रहें तो कभी समानता के गीत गाते हुए दूसरों को यह गाना सिखाते रहें.

आज का दिन निशंक के नाम रहा. निशंक को अच्छा कहने वाले भी भारी संख्या में हैं, और उसमें से कई वित्तपोषित हैं. निशंक को बुरा कहने वाले भी बहुत लोग हैं, जिनमें से कई निजी स्वार्थ के कारण उनका विरोध करते हैं. लेकिन निशंक के राज में जिस जिस तरह के घोटाले खुलते रहे हैं और खुल रहे हैं, वे कई सवाल उठाते हैं. निशंक का चरित्र एक तरफ सदाचारी, साहित्यकार और तेजस्वी का चित्रित किया जाता है तो दूसरी तरफ वे बेहद भ्रष्ट, अवसरवादी, सांठगांठ में माहिर बताए जाते हैं.

सच क्या है, ये हम आप पर छोड़ते हैं लेकिन यह याद रखिएगा कि निशंक कोई अंतिम व्यक्ति हमारे आपके बीच में नहीं हैं. यहां दिल्ली से लेकर लखनऊ, पटना, रायपुर तक ढेर सारे निशंक अलग अलग नामों से बैठे हुए हैं. इन राज्यों में अफसर बेहद संजीदगी से भ्रष्टाचार की रणनीतियां बनाकर अपने आकाओं को ओबलाइज कर रहे हैं. आज ही कहीं अखबार में पढ़ा था कि कोर्ट ने नौकरशाहों को फटकारा कि ये लोग सब जानबूझकर गलत काम करते और कराते हैं.

कांग्रेस हो यो भाजपा. निशंक हों या मनमोहन. सबके खाने और दिखाने के दांत अलग अलग हैं. लोग कानूनी तरीके से भ्रष्टाचार करने लगे हैं और पकड़े भी नहीं जाते, सवाल उठाने वालों को ही दौड़ा लेते हैं. बेईमानी में पकड़े जाते हैं छोटे मोटे अफसर. ट्रैफिक सिपाही, स्ट्रिंगर. राडिया के दलाल पत्रकार आज भी महान हैं. कई अपने अपने संस्थानों में विराजमान हैं. और उनके संस्थान इन दिनों भ्रष्टाचार के खिलाफ जमकर लिख बोल रहे हैं. यह हिप्पोक्रेसी ही तो है. यह दिखाने और खाने के अलग अलग दांत ही तो हैं.

ऐसे माहौल में, जब झूठ का दर्शन सच के रूप में कराया जा रहा हो और सच बताने वालों को उनकी कीमत लगाकर भ्रष्टाचारियों के पक्ष में खरीद लिया जा रहा हो, वहां तो लगता है कि अब बस राम राम ही कहा जाए और मान लिया जाए कि होइहें वही जो राम रचि राखा.

जय हो.

अगर आप कार्यक्रम में मौजूद रहे हैं, तो जरूर अपनी प्रतिक्रिया दीजिएगा कि मेरी रिपोर्टिंग में कहां कहां गड़बड़ी हुई है और आप क्या सोचते रहे या सोचते हैं पूरे आयोजन व घटनाक्रम पर.

यशवंत

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... आयोजन से जुड़ी कुछ तस्वीरें ...

हिंदी भवन सभागार के ठीक बाहर लगा निशंक की नवप्रकाशित पुस्तकों का बैनर

हिंदी भवन में आयोजन शुरू होने से पहले मंच की तैयारियों का दृश्य

अपनी नई किताब का विमोचन करते उत्तराखंड के मुख्यमंत्री डा. निशंक व अन्य.

संबोधित करते डा. प्रभाकर श्रोत्रिय.

साहित्यकार लक्ष्मण राव और उनकी चाय की दुकान. पीछे उनका बैनर.

साहित्यकार लक्ष्मण राव के बारे में बताते हिंदयुग्म के संपादक शैलेष भारतवासी. लक्ष्मण राव के बगल में उनकी किताबें बिक्री के लिए रखी रहती हैं और पेड़ के सहारे उनकी तस्वीरों का कलेक्शन टिका हुआ.

बड़े बड़े लोगों के साथ खड़े लक्ष्मण राव चाय बेचते हैं, ये भला कोई यकीन कर सकता है.

चाय विक्रेता और साहित्यकार लक्ष्मण राव की किताबें.

हिंदी भवन से निकलकर राजेंद्र प्रसाद भवन पहुंचे तो वहां भी कई लोग मिले. चाय नाश्ता कर वहां से हम लोग निकल आए.

हिंदी भवन के बाहर लक्ष्मण राव की दुकान की चाय पीते शैलेष भारतवासी, पंकज झा, मयंक सक्सेना, चंडीदत्त शुक्ला आदि ब्लागर साथी.


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