मुझे नहीं पता था कि सम्मान मुख्यमंत्री निशंक के हाथों बांटे जाएंगे

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खुशदीप सहगलसोचा तो यही था कि कल के प्रोग्राम पर कुछ नहीं लिखूंगा... लेकिन कुछ बातों को साफ करना मेरे लिए बहुत ज़रूरी हो गया है... पहली बात मैं अपने सम्मान को वहीं कुर्सी पर छोड़ आया और मोहिंदर जी समेत कुछ और ब्लॉगर्स से निवेदन भी कर आया कि इसे आयोजकों के पास वापस पहुंचा दीजिएगा... मुझे नहीं पता था कि सम्मान मुख्यमंत्री निशंक के हाथों बांटे जाएंगे...

मेरे लिए उस वक्त धर्मसंकट ये था कि शिकागो से भाई राम त्यागी और दुबई से दिगंबर नासवा जी ने मुझसे व्यक्तिगत तौर पर अपने सम्मान लेने के लिए कहा था... इसलिए उस वक्त सम्मान लेना अपरिहार्य था... वहां निशंक ही नहीं रामदरश मिश्र, प्रभाकर जी, अशोक चक्रधर, विश्वबंधु गुप्ता जैसी विभूतियां भी स्टेज पर मौजूद थीं... स्टेज पर मेरा न जाना उनका भी अपमान होता...

अब सुनिए आयोजकों ने मुझे किस तरह मिसगाइड किया... प्रोग्राम सीधे-सीधे दो भागों में बांटा गया था- पहला भाग हिंदी साहित्य निकेतन, किताबों का विमोचन, ब्लॉगरों को सम्मान इत्यादि... ये कार्यक्रम शाम चार से साढ़े छह बजे तक चलना था... छह से साढ़े छह बजे अल्पाहार का कार्यक्रम तय किया गया... उसके बाद साढ़े छह से आठ बजे तक देश को जागरूक करने में न्यू मीडिया की भूमिका पर संगोष्ठी होनी थी... फिर नाटिका और उसके बाद भोजन...

मुझसे आयोजक और लखनऊ के जाने माने ब्लॉगर रविंद्र प्रभात जी ने व्यक्तिगत तौर पर आग्रह किया था कि मैं पुण्य प्रसून वाजपेयी जी को कार्यक्रम के दूसरे भाग में मुख्य अतिथि बनने के लिए आग्रह करूं... मैंने उनके कहने पर अपनी तरफ से कोशिश की... ये पुण्य प्रसून जी का बड़प्पन है कि वो सिर्फ मेरे कहने पर तैयार हो गए... लेकिन जब मैंने प्रोग्राम में देखा कि सात बजे तक भी कार्यक्रम का पहला हिस्सा खत्म होने का नाम ही नहीं ले रहा तो मैंने पुण्य जी को एसएमएस कर आग्रह किया कि थोड़ा लेट आइएगा...

लेकिन कार्यक्रम तब तक मुख्यमंत्री की चाटुकारिता और हिंदी साहित्य निकेतन का निजी प्रोग्राम होकर रह गया था... सच मानिए तो मेरी रूचि सिर्फ कार्यक्रम के दूसरे हिस्से में ही थी... देश को जागरूक करने में न्यू मीडिया की भूमिका.... इस विषय पर पुण्य जी के मुख्य अतिथि की हैसियत से सब ब्लॉगरों और युवा मीडियाकर्मियों के विचार भी जानने को मिलते...

लेकिन जब सब गुड़-गोबर होता दिखा तो मैं खुद ही शाहनवाज, ललित भाई को लेकर हिंदी भवन के बाहर भागा... तब तक पुण्य प्रसून जी गेट तक आ चुके थे... और वहीं युवा पत्रकारों, ब्लॉगरों से बात कर रहे थे... उन्हें पता चला कि अंदर निशंक जी विराजमान हैं तो उन्होंने वहीं से वापस लौट जाना बेहतर समझा... जब तीर निशाने से निकल चुका था तो अविनाश जी गेट पर आए, वो भी शायद कोई बुला कर लाया...

लेकिन तब तक प्रसून जी कार में बैठ चुके थे... उन्होंने ऐसे कार्यक्रमों के लिए अविनाश जी को टाइम मैनेजमेंट की नसीहत दी और रवाना हो गए... तब तक मेरी स्थिति बहुत विचित्र हो गई थी... मैंने एक मिनट भी वहां और खड़े होना गवारा नहीं समझा... चाहता तो स्टेज पर जाकर ही मुख्यमंत्री के सामने सम्मान लौटा देता... लेकिन ब्लॉगर समुदाय की गरिमा का ध्यान रखकर ऐसा नहीं किया... और घर वापस आ गया... हां एक बात और, मेरी तबीयत कल सुबह से ही खराब थी... घर लौटते लौटते उलटियां भी शुरू हो गई... मनसा वाचा कर्मणा के राकेश कुमार जी इसके गवाह हैं...

रात तक मन इतना खिन्न हो गया कि क्या हिंदी ब्लॉगिंग भी भ्रष्टाचार की उसी दिशा में आगे नहीं बढ़ चली जिसका कि हम अपनी पोस्ट में जमकर विरोध करते हैं... फिर क्या फायदा है इसमें बने रहने का...

जय हिंद...

खुशदीप सहगल

ब्लागर, देशनामा और स्लाग ओवर

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