आमिर खान की गटर छाप मानसिकता

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डेल्ही बेली का शाब्दिक अर्थ होता है-दस्त लग जाना, डायरिया हो जाना, बदहज़मी हो जाना या हाजमा खराब हो जाना,यह बीमारी होती है गंदा पानी पीने से, दूषित भोजन करने से अथवा जरूरत से ज्यादा खाने से। लगता है ज्यादा सफलता और दर्शकों का प्यार मिलने से निर्माता आमिर खान का भी हाजमा खराब हो गया है, तभी उसने 'डेल्ही बेली'  फिल्म के माध्यम से भारत के सिनमाघरों में गंदगी फैलाने का दुस्साहस किया है।

दरअसल 'डेल्ही बेली' शब्द की उत्पत्ति भारत में अंग्रेजी शासन काल में हुई थी। अंग्रेजों ने देखा कि दिल्ली वालों की दस्त ज्यादा लगते हैं इसलिए इन्होंने इसका नाम डेल्ही बेली रख दिया। धीरे-धीरे यह मेडिकल टर्म बन गया और दुनिया में अब कहीं भी किसी को दस्त लग जाए तो कहा जाता है उसे डेल्ही बेली हो गया। डिक्शनरी के अनुसार इस शब्द का प्रयोग सबसे पहले 1943 में किया गया था। इस शब्द का प्रयोग ज्यादातर पर्यटक करते हैं, जब किसी पर्यटक को दस्त लग जाते हैं, तो कहा जाता है कि उसे डेल्ही बेली हो गया।

'डेल्ही-बेली'  को रिलीज हुए कई सप्ताह हो गए हैं। अब इसकी समीक्षा का कोई मतलब नहीं है। अब इस पर बहस हो रही है कि इस फिल्म का हिन्दी फिल्मों के भविष्य पर क्या प्रभाव पड़ेगा। फिल्म समीक्षक अब्राहीम हिंदीवाला का कहना है कि फिल्म देखते हुए मुझे लगा कि अब जल्द ही हिन्दी फिल्मों को डेल्ही-बेली होने वाला है। अधकचरे दिमाग और भेड़ चाल की आदी फिल्म इंडस्ट्री का 'शिट'  विभिन्न रूपों और दुर्गंध में आने वाला है। आप लिखकर रख लें आमिर खान ने ऐसी शुरुआत कर दी है, जो हिंदी फिल्मों को उसके मूल स्वरूप से निकालकर विनाश की तरफ ले जाएगा।

एक अन्य फिल्म विशेषज्ञ पराग छापेकर की फेसबुक पर टिप्पणी के अनुसार आमिर खान सिनेमा की कई सारी चीजों के प्रणेता रहे हैं। अब वह डेल्ही बेली से घटिया फूहड़ और अश्लील लेकिन सफल फिल्मों के फाउंडर बन गए हैं। अपने स्टार स्टेटस का इतना वाहियात इस्तेमाल करके आमिर ने गंदे और अश्लील सिनेमा का रास्ता पूरी तरह खोल दिया है। एक सफल व्यापारी आमिर खान को समाज में सफलता पूर्वक दुर्गंध फैलाने पर ढेर सारी बधाई।

हर समाज में दो तरह के लोग होते हैं सभ्य और असभ्य। समाज में सभ्यता की अपनी मर्यादाएं हैं, जो इन्हें तोड़ते हैं उन्हें समाज असभ्य कहता है। यह बड़े दुख की बात है कि जैसे-जैसे संचार माध्यमों का विकास है रहा है वैसे-वैसे असभ्यता दर्शाने वाली चीजें सामने आ रही हैं। मोबाइल और इंटरनेट की क्रांति ने आज के युवाओं में ऐसा वर्ग पैदा कर दिया है, जो गाली-गलौच भरी भाषा को सामान्य ढंग से ले रहे हैं और अपनी मां-बहनों को भी गालियों से नवाज रहे हैं। इसी वर्ग ने आमिर की डेल्ही बेली को सफल बनाया है और आमिर ने धूर्त व्यापारी की तरह गालियों से भरी फिल्म से करोड़ों रुपए कमा लिए हैं।

अगर हम आमिर खान के फिल्मी कैरियर पर एक नजर डालें तो 'कयामत से कयामत तक'  से लेकर पीपली लाइव तक उनकी हर फिल्म में परफेक्शन नजर आता है। अच्छा संदेश जाता है। उनकी प्रथम निर्मित फिल्म 'लगान'  आस्कर एवार्ड में टॉप पांच फिल्मों में शामिल होकर सर्वश्रेष्ठ विदेशी फिल्म की केटेगरी में शामिल हो चुकी हैं। 'तारे जमीन पर' को सारे देश ने मुक्तकंठ से सराहा है। उनकी अभिनीत बीसियों फिल्में ऐसी हैं, जो बाक्स आफिस पर जबरदस्त सफल रही हैं। रंगीला, दिल, गुलाम, गजनी, फना, थ्री इडियट, सरफरोश, राजा हिन्दुस्तानी, रंग दे बसंती, मंगल पांडे में आमिर ने विभिन्न किरदारों को जीवंत किया है। लेकिन अपनी शानदार इमेज और बेहतरीन अभिनय की उपलब्धियों को आमिर खान की एक गंदी फिल्म ने जीरो कर दिया है।

फिल्म इंडस्ट्री में आमिर की कथित बोल्डनेस को अच्छा नहीं समझा जा रहा है। मशहूर अभिनेता ओमपुरी ने एक बातचीत में अपनी प्रतिक्रिया में कहा कि ''हालांकि मैंने फिल्म देखी नहीं है, लेकिन इसके प्रोमोज देखने के बाद मैं फिल्म देखना भी नहीं चाहता। फिल्म के डायलॉग वाकई अजीब हैं और यह सेक्स की घिनौनी मानसिकता दिखाती है। एक सीन में 'मैंने इसकी...है और इसने मेरा...है'  जैसा बेहूदा संवाद यूज किया गया हैं। मुझे समझ में नहीं आता कि सेंसर ने इसे पास कैसे कर दिया है।''  इसे इंग्लिश में बनाया गया और बाद में इसे हिंदी में डब करके रिलीज किया गया है। सेंसर बोर्ड अंग्रेजी में बनी फिल्मों को सर्टिफिकेट जारी करने में कुछ ज्यादा ही उदारता बरतता है और फिल्म के अंदाज देखकर तो यही लगता है कि अंग्रेजी वर्जन को डब करते समय फिल्म के बोल्ड डायलॉग्स में कोई चेंज नहीं किया गया।

ओम का कहना हैं, 'अगर कोई प्रॉडक्शन कंपनी अपनी फिल्म में नैतिकता और सामाजिक मूल्यों को छोड़कर अश्लीलता की सीमाओं को लांघती हैं, तो भी उसे स्वीकारने के लिए दर्शकों की एक क्लास मौजूद है।' ओम को हैरानी इस बात की ज्यादा है कि अगर आमिर जैसे स्टार्स और टॉप एक्टर्स वैल्यूज को साइड में रखकर फिल्में बनाएंगे, तो आने वाले समय में एंटरटेनमेंट के नाम पर क्या पॉर्न फिल्में बनाई जाएंगी। अपनी बात पर जोर देते हुए ओम ने कहा कि अब वह इसी उम्मीद में हैं कि शायद आमिर जल्दी ही अपने बैनर तले कोई पॉर्न फिल्म बनाने की अनांउसमेंट करेंगे। वह कहते हैं, 'अगर आमिर ऐसी फिल्मों के समर्थक हैं, तो फिर उन्हें पॉर्न फिल्म बनानी चाहिए। यूथ पॉर्न फिल्में खूब देखते हैं।'

आमिर खान के चाचा नासिर हुसैन सारी उमर मनोरंजक साफ-सुथरी फिल्में बनाते रहे हैं। 'तुम-सा नहीं देखा'  से लेकर 'जो जीता वहीं सिंकदर'  तक उनकी फिल्में परिवार के साथ देखने वाली मनोरंजक फिल्में रही हैं। नासिर हुसैन को इस बात पर गर्व था कि वह महान स्वतंत्रता सेनानी और देश के प्रथम शिक्षा मंत्री मौलाना अबुल कलाम आजाद के खानदान के वंशजों में से हैं। इसी परंपरा में आमिर खान को भी उनके परिवार का वंशज माना जाता है। यह कितनी विडम्बना की बात है कि एक तरफ विद्वान और भारतीय मुसलमानों के सबसे बड़े लीडर मौलाना आजाद द्वारा की गई कुरआन शरीफ की व्याख्याओं को बड़े सम्मान और अदब के साथ पढ़ा जाता है वहीं दूसरी तरफ उनके वंशज (आमिर खान) एक बेहूदा फिल्म बनाकर अपनी कैसी पहचान बना रहे हैं? क्या आमिर खान चाहते हैं कि उन्हें भविष्य में गंदी, अश्लील और बेहूदा फिल्म बनाने वाले निर्माता के रूप में याद किया जाए?

लेखक लतीफ किरमानी राष्‍ट्रीय विश्‍वास के एक्‍जीक्‍यूटिव एडिटर हैं. इनसे सम्‍पर्क This e-mail address is being protected from spambots. You need JavaScript enabled to view it या 09810985063 के जरिए किया जा सकता है.


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