'सिंघम' देखकर पुलिस अफसर कुछ सीखें तो बात बने

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: दुनिया जिन महान बेईमान कारपोरेट घरानों, उनके महाबलशाली लुच्चे प्रतिनिधि नेताओं के जरिए संचालित होती है उनका असली दर्शन तो हर बेईमानी व भ्रष्टाचार के जरिए मुनाफा और माल कमाना है. ये लोग लोकतंत्र, सिस्टम व व्यवस्था को जनविरोधी बना देते हैं. ऐसे सड़े हालात में कुछ एक जनपक्षधर लोग कितना झेलते हैं, इसका तीखा प्रदर्शन फिल्म सिंघम में है :

मेरी जरूरतें कम है, तभी मेरे सीन में दम है

बहुत दिनों से फिल्म नहीं देखी. और हर हफ्ते कोई न कोई चर्चित फिल्म आती रही, जाती रही पर संयोग नहीं बन पाया कि कोई भी फिल्म देख सकूं. गाली वाली फिल्म आई आमिर खान की तो सेक्स वाली मर्डर2 आई इमरान की. बच्चा लोगों की चिल्लर पार्टी भी आई और ऋतिक रोशन की लव स्टोरी भी आई. इनके पहले भी बहुत फिल्में आईं. लेकिन बहुत दिनों बाद किसी फिल्म को देखने का संयोग आज बन बैठा.

फिल्म मैं अक्सर घर से भागकर देखता हूं. आज भी घर से भाग निकला. कहां जाऊं कहां जाऊं सोचते हुए नोएडा के स्पाइस माल पहुंच गया. टिकट खिड़की पर पहुंचा और सिंघम का टिकट कटा लिया. अकेले था. सो, तुरंत शुरू हुए शो का टिकट लेकर भागते हुए उसमें जाकर बैठ गया. फिल्म शुरू हो चुकी थी. एक इंस्पेक्टर अपने थाने में बैठकर खुद के सिर पर रिवाल्वर लगाकर गोली मार रहा है और खत्म हो गया. यह देखकर मलाल हुआ कि अरे यार, लगता है फिल्म के इंपार्टेंट सीन मुझसे छूट गए. अब जब लौटकर फिल्म के बारे में लिख रहा हूं तो लग रहा है कि एक ठीकठाक फिल्म देखी.

अपन लोग पार्टी आंदोलन भगत सिंह समाज सरोकार बदलाव जनता जैसे शब्दों को सोते पहनते गाते बोलते पत्रकारिता में आए इसलिए फिल्में वही अच्छी लगती हैं जिसमें कोई सोच, सरोकार और समझ हो. सिंघम में ढेर सारे फिल्मी अतिरंजना के बावजूद फिल्म अंत तक बांधे रखती है. कहानी वही पुरानी है. सिस्टम भ्रष्ट है, सिस्टम चलाने वाले लोग भ्रष्ट हैं, इसलिए कुछ जो ईमानदार आदर्शवादी टाइप देहाती लोग इस सिस्टम में पहुंचते हैं तो उन्हें किन किन मुश्किलों का सामना करना पड़ता है, इसका बयान है फिल्म में.

अजय देवगन (फिल्म में नाम है बाजीराव सिंघम) एक ईमानदार इंस्पेक्टर हैं. दूर देहात के थाने में हैं और ईमानदारी से मामलों को निपटाते हैं, समाज के हिस्से हैं और एक प्रगतिशील सोच रखते हैं. इसी कारण गांव देहात के लोग उनके मुरीद हैं और उनकी मुश्किल में जान देने के लिए भी तैयार रहते हैं. बाद में अजय देवगन का साबका एक महान गुंडे से पड़ता है. वह गुंडा अजय को सबक सिखाने के लिए उनका तबादला शहर में करा देता है, शहर में यानि अपने गुंडई वाले इलाके में. वो महान गुंडा नेताओं, अफसरों, मंत्रियों तक को पालता है और खुद अपहरण, उगाही, बेईमानी आदि का धंधा करता है. जो उसका इगो हर्ट करता है वह उसे निपटा देता है.

अजय देवगन से उसका साबका पड़ता है तो वह अजय देवगन को ऐसी स्थिति में लाकर खड़ा कर देता है कि जैसे उसके पहले एक इंस्पेक्टर ने उससे पंगा लिया तो उसको भ्रष्टाचार में जबरन फंसा दिया गया और उसे थाने में अपनी सर्विस रिवाल्वर से गोली मारकर मरना पड़ा. एक तरह से उसकी हत्या कर दी गई.  उसी तरह की स्थितियां अजय देवगन के सामने भी आ चुकी हैं. पर अजय देवगन अपनी तरकीबों, समझ बूझ और टीम को साथ लेकर चलने वाली भावना के कारण गुंडे को निपटा देता है. हां, इसके लिए फिल्म में बहुत ज्यादा अतिरंजना दिखाई गई है. कि अजय देवगन के भाषण देने पर पुलिस विभाग के बड़े बड़े अफसरों का, खुद डीजीपी का दिल डोल जाता है और वह भी इंस्पेक्टर अजय देवगन की ईमानदारी की मुहिम में शामिल हो जाते हैं.

अजय देवगन का हर बार की तरह इसमें भी कमाल का अभिनय है. जो शख्स खलनायक बना है, प्रकाश राज, उसने तो अदभुत अभिनय किया है. रीयल गुंडे माफिया की तरह अभिनय किया है. उसके बड़े गुंडे वाला अभिनय देखकर सिहरन दौड़ जाती है. कितनी शांति से वह सबको मारता काटता पकड़ता और निपटाता है, और कितने मजे से सिस्टम को अपना गुलाम बनाए हुए हैं, कितने आराम से वह टिकट लेकर चुनाव जीत जाता है... यह सब देखते हुए लगता है कि अपन लोग के लोकतंत्र की यही सच्ची हकीकत है. फिल्म खत्म होने पर निर्देशक रोहित शेट्टी ने फिल्म के शूट किए जाने के रा सीन भी दिखाए हैं.

इस एक्शन फिल्म सिंघम में अजय देवगन पर मारधाड़ के जोरदार सीन फिल्माए गए हैं. यंग एंग्री मैन वाला दौर याद आता है इसे देखकर. माल में अब वो लोग नहीं होते जो हीरो के एक्शन में आने पर सीटियां बजाएं पर इस फिल्म को देखते हुए सीटियों की आवाज से कई बार दो-चार हुआ. तालियां भी दर्शकों ने बजाईं. कमेंट भी लोगों ने खूब किए. भ्रष्ट सिस्टम, भ्रष्ट राजनीति ने किस तरह से पुलिस विभाग को बिना पेंदी का लोटा बना दिया है, बिना औकात का कर दिया है, इसका सटीक चित्रण है. अभिनेत्री काजल अग्रवाल टाइमपास के लिए हैं. बीच में कुछ एक रोमांटिक गाने फिलर की तरह हैं. पर अभिनेत्री काजल अग्रवाल सीमित भूमिका के बावजूद अपनी स्टाइल और अभिनय से दर्शकों के दिल को छूती हैं.

फिल्म देखकर निकलते वक्त वही पुराना सवाल दिमाग में तैरता है कि आखिर ईमानदारी दाल में नमक की तरह क्यों है. जब पूरी दाल बेईमानी की है तो उसमें ईमानदारी के नमक से क्या होने वाला. दुनिया जिन महान बेईमान कारपोरेट घरानों, उनके महाबलशाली लुच्चे प्रतिनिधि नेताओं के जरिए संचालित होती है उनका असली दर्शन तो हर बेईमानी व भ्रष्टाचार के जरिए मुनाफा और माल कमाना है. किसी भी तरह माल बटोरते रहने, पावर में बने रहने और सिस्टम को अपना घरेलू नौकर बना लेने की जिद हर देश के लोकतंत्र, सिस्टम और व्यवस्था को जनविरोधी बना दे रहा है. ऐसे जनविरोधी सिस्टम में कुछ एक जनता की बात करने वाले लोग, ड्यूटी व फर्ज की बात करने वाले लोग पहुंचते हैं तो उन्हें कितना कुछ झेलना पड़ जाता है, उसका तीखा वर्णन इस फिल्म में है.

तीन घंटे तक सिंघम देखने वाला दर्शक जब सिनेमाहाल से बाहर निकलता है तो यही मानकर निकलता है कि इस फिल्म का हीरो फिल्मी स्टोरी होने के कारण जीत जाता है, जिंदा बच जाता है वरना असल जिंदगी में तो ऐसे हीरो या तो निपटा दिए जाते हैं, या साइडलाइन कर दिए जाते हैं या फिर उन्हें भ्रष्टाचार का ककहरा सीखकर भ्रष्टाचार के मेनस्ट्रीम में शामिल हो जाना पड़ता है. फिल्म के कुछ एक डायलाग जोरदार हैं. इंस्पेक्टर गुडे से कहता है- मेरी जरूरतें कम है, तभी मेरे सीने में दम है. डीजीपी साहब जब पूरी पुलिस  फोर्स के साथ गुंडे को निपटाने उसके घर पहुंचते हैं तो गुंडा उनसे कहता है कि डीजीपी साहब आपके सामने ये सब क्या हो रहा है. तब डीजीपी जवाब देते हैं कि यहां डीजीपी साहब कहां हैं, डीजीपी साहब तो दिन भर वीआईपी ड्यूटी के कारण हाईबीपी की दवा लिखवाकर और खाकर सो रहे हैं, वो अब सुबह ही जगेंगे.

मतलब यह कि पुलिस अगर चाह ले तो वह कुछ भी कर सकती है. वह सही को गलत व गलत को सही बना सकती है. इस फिल्म के जरिए पुलिस की लाचारी और पुलिस की अकूत ताकत, दोनों का एहसास कराया गया है. अगर कोई पुलिस वाला इस फिल्म को देखेगा तो फिल्म खत्म होने के बाद काफी देर तक खुद के बारे में और अपने विभाग की व्यवस्था के बारे में सोचता रहेगा. उसे अपनी खाकी के बारे में सोचने पर मजबूर होना पड़ेगा, उसे इस खाकी के पहनने का मकसद समझ में आएगा. हो सकता है कि मैं गलत होऊं क्योंकि अक्सर लोगों की उनके हालात के अनुसार कंडीशनिंग हो जाती है जिसके बाद उन पर तर्कों, संवेदनाओं और समझाइश का कोई असर नहीं पड़ता.

यह फिल्म मुझे इसलिए भी अच्छी लगी क्योंकि पिछले कुछ महीनों में पुलिस केंद्रित जो फिल्में आईं, जिसके लीड रोल में सलमान खान थे, दबंग, चुलबुल पांडेय टाइप, उसमें इंस्पेक्टर को मसखरा बना दिया गया, उसमें इंस्पेक्टर को जन्मना हरामी, बदमाश, छिछोरा, लफंगा दिखाया गया. शायद इसी कारण आजकल के इंस्पेक्टरों को चुलबुल पांडेय का अभिनय ज्यादा रीयलिस्टिक लगा और पसंद आया है. सो, इसी वजह से कई नए नवेले दरोगा थानेदार खुद को चुलबुल पांडेय कहलाने और वैसा दिखने-करने में गर्व महसूस करने लगे. पर सिंघम में पुलिस इंस्पेक्टर को एक आदर्शवान, संवेदनशील और ईमानदार के रूप में चित्रित किया गया है जिसके उपर समाज और जनता की रक्षा का गंभीर दायित्व है. यही सच भी है.

सिंघम देखते हुए मनोज वाजपेयी का अभिनय याद आ जाता है. प्रकाश झा की फिल्में नजर आने लगती हैं. यंग्र एंग्री मैन वाले जमाने के अमिताभ बच्चन याद आते हैं. मतलब, सिंघम देखने के बाद आप बाहर निकलेंगे तो बहुत देर तक इसका नायक बाजीराव सिंघम आपके दल-दिमाग पर छाया रहेगा. हालांकि नायकत्व की यह छवि वर्तमान सड़ी व्यवस्था का खयाल आते ही खत्म होने लगती है कि और अंततः लगता है कि यह सब फिल्मी है पार्टनर.... अपन का देश समाज ऐसे ही चूतियापे वाली व्यवस्था में चलता रहेगा... कभी कभार कुछ एक नायक टाइप बहके हुए लोग आएंगे और व्यवस्था के मकड़जाल में फंसाकर शहीद किए जाते रहेंगे, उनकी शहादत पर थोड़ा बहुत हो हल्ला मचेगा, पर इस आकस्मिक ब्रेक के बाद, छोटी सी श्रद्धांजलि व शांति के बाद फिर सड़ी-गली व्यवस्था यूं ही धड़ल्ले से चलती रहेगी.

फिल्म के कुछ अन्य तथ्य

  • रोहित शेट्टी और अजय देवगन की जोड़ी पिछली पांच फिल्मों की कामयाबी का स्वाद चख चुकी है. इनका आत्मविश्वास फिल्म सिंघम में भी नजर आता है. अब तक यह जोड़ी दर्शकों के सामने कॉमेडी फिल्में लेकर आयी है, लेकिन इस बार उन्होंने शेर की तरह दहाड़ते हुए दिखाने की कोशिश की है कि वे गंभीर फिल्में भी अच्छे से बना लेते हैं.

  • पिछली कई फिल्में गोवा को केंद्रित करके बनाई गईं और वहां होनेवाले काले धंधों का पर्दाफाश कर रही हैं. सिंघम भी इसका विस्तार करती है. एक्शन सीन के दर्शकों को बेहद पसंद आयेगी यह फिल्म. एक बार फिर से फिल्मों में एक्शन को पसंद किया जायेगा और इसके दृश्यों को यादगार दृश्य माना जायेगा.

  • फिल्म को यू/ए सर्टिफिकेट दिया गया है. बच्चों और परिवार के साथ फिल्म देख सकते हैं. फिल्म में कोई वलगर सीन नहीं है. सिर्फ मारधाड़ ज्यादा है. फिल्म कुल 2 घंटे 25 मिनट की है.

  • जिन लोगों को ऐसे हीरो पसंद हैं जो चुटकियों में बीस गुंडों को धूल चटा दे, लड़कियों को छेड़ने वाले को सबक सिखाए, बड़ों की इज्जत करे, रोमांस करने में शरमाए... वह जरूर इस फिल्म को देखें.

  • ‘सिंघम’ तमिल में इसी नाम से बनी सुपरहिट फिल्म का हिंदी रिमेक है. शुरुआत के चंद मिनटों बाद ही पता चल जाता है कि इस फिल्म का अंत कैसा होगा, लेकिन बीच का जो सफर है वो फिल्म को मनोरंजन के ऊंचे स्तर पर ले जाता है. तालियों और सीटियों के बीच गुंडों की पिटाई देखना अच्छा लगता है.

  • युनूस सजवाल की लिखी स्क्रिप्ट में वे सारे मसाले मौजूद हैं जो आम दर्शकों को लुभाते हैं. हर मसाला सही मात्रा में है, जिससे फिल्म देखने में आनंद आता है. बाजीराव सिंघम में बुराई ढूंढे नहीं मिलती तो जयकांत में अच्छाई. इन दोनों की टकराहट को स्क्रीन पर शानदार तरीके से पेश किया गया है. फिल्म इतनी तेज गति से चलती है कि दर्शकों को सोचने का अवसर नहीं मिलता है.

  • ‘जिसमें है दम वो है फक्त बाजीराव सिंघम’ तथा ‘कुत्तों का कितना ही बड़ा झुंड हो, उनके लिए एक शेर काफी है’, जैसे संवाद बीच-बीच में आकर फिल्म का टेम्पो बनाए रखते हैं. कई संवाद मराठी में भी हैं ताकि लोकल फ्लेवर बना रहे, लेकिन ये संवाद किसी भी तरह से फिल्म समझने में बाधा उत्पन्न नहीं करते हैं.

यशवंत

एडिटर

भड़ास4मीडिया

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