बाजार के बाजीगर और सिनेमा के नए शिल्‍पकार

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अतुलयह दौर विद्रोही निर्देशकों का है, जो कम बजट में समाज की सच्चाइयों से रू-ब-रू कराने वाली साफ सुथरी छोटी फिल्में बनाकर साबित कर चुके हैं कि सिनेमा मनोरंजन का माध्यम मात्र नहीं बल्कि इससे आगे भी कुछ है। ये वे निर्देशक हैं जिन्हें सिने जगत कभी सनकी कहकर पुकारता था लेकिन आज बॉलीवुड इनकी सनक का कायल है।

इतने दिन भी नहीं बीते कि याद दिलाने पर भी याद न आएं। पच्चीस-तीस बरस पहले का यथार्थ है। हिंदी में मुख्यधारा के सिनेमा की पत्रकारिता करने वालों को तीसरे दर्जे का नागरिक माना जाता था। किसी बडे प्रकाशन गृह से उनके जीते जी कोई किताब छप जाए, यह तो असंभव ही था। क्योंकि तब हिंदी के प्रकाशक भी उच्चस्तरीयता के दंभ में रहते थे। जो इस प्रतिकूल परिदृश्य में जिद की तरह तने थे। उन्हें अपना अस्तित्व बचाए रखने के लिए या तो विदेशी सिनेमा का आधार लेना पड़ता था या दौर के तथाकथित बौद्धिक सिनेमा का।

इसे बाजार का खुलापन कहें या दबाव, हिंदी का व्यावसायिक सिनेमा क्षितिज पर इस कदर हावी हुआ कि व्यावसायिक सिनेमा की पत्रकारिता मीडिया के लिए अनिवार्य बन गई है। इस पत्रकारिता के जानकार भी सहसा ग्लैमर और वैभव की गर्म सुखद धूप के हिस्सेदार बन बैठे और इसी के साथ आरंभ हुआ उनकी सिने पुस्तकों का प्रतिष्ठित हिंदी प्रकाशकों द्वारा नियमित प्रकाशन। पिछले कुछ वर्षों में नए पुराने अनेक फिल्म पत्रकारों का बाजार में आना इसका प्रमाण है।

व्यावसायिक सिनेमा पर नजर रखने वाले और उस पर कलम चलाने वाले प्रहलाद अग्रवाल मध्य प्रदेश के सतना जैसे छोटे शहर में सक्रिय रहकर भी जब तक अपनी उपस्थिति कराते रहते हैं। इसके बावजूद कि वह किसी राष्ट्रीय दैनिक की फिल्म पत्रकारिता से बावस्ता नहीं हैं। हाल ही में हिंदी के प्रसिद्ध राजकमल प्रकाशन से उनकी पुस्तक छपी है 'बाजार के बाजीगर'। अनेक सीमाओं के बावजूद इस पुस्तक का स्वागत इसलिए होना चाहिए क्योंकि यह सिनेमा के नए शिल्पकारों और उनके काम को आत्मीय अंदाज में एक साथ प्रस्तुत करती है। यह बताती है क्यों यह नए लोग अपने पूर्ववती लोगों से भिन्न तथा विरल हैं।

अनुराग कहते हैं- 'वह जिसे प्रथम गुरू कहा जाता है, कोई चालीस साल बाद अपनी किताबी जुबान की चौहद्दी से बाहर निकला है। आज आशुतोष गोवारिकर, संजय लीला भंसाली, मधुर भंडारकर, राजकुमार हीरानी, करण जौहर और आदित्य चोपड़ा उन फिल्मकारों के नाम हैं जो अपनी फिल्म से नई राहें बनाने की कोशिश कर रहे हैं। बड़ी बात यह है कि यह अपने-अपने हुनर के साथ दाखिल हो रहे हैं। अपने-अपने देखने सुनने और कहने के अलग-अलग नजरिये के साथ। काबिले गौर है कि डेढ़ से साठ करोड़ लागत तक की फिल्म बनाने वाले यह लोग गहरी व्यावसायिक समझदारी रखते हैं।

आज वर्तमान परिदृश्य इसलिए संभावनापूर्ण है। करण आदित्य मंडली का वर्चस्व होते हुए भी बहुआयामी प्रतिभाशाली लोगों के लिए सृजन के दरवाजे खुले हुए हैं। आज ऐसा कोई मुकाम नहीं, जहां पर एक बिल्कुल नयी पीढ़ी अपने हस्ताक्षर न कर चुकी हो। किताब में छोटे-छोट नौ अध्याय हैं। मुख्यतः सूरज बडजात्य, करण जौहर, आदित्य, राकेश रोशन, रामगोपाल वर्मा, विधु विनोद चोपडा, मधुर भंडारकर, और प्रकाश झा पर खुद को फोकस करते हैं और इनकी चर्चा के बहाने पूर्ववर्ती इनके समकालीन और इनके बाद वालों की भी टोह लेते हैं। अनेक फिल्मकारों और उनके काम के लिए अनुराग जी द्वारा प्रस्तुत की गयी सूक्तियां दिलचस्प होने के साथ साथ सारगर्भित भी हैं।

मसलन रामगोपाल वर्मा का महत्व इसलिए है कि वह सिनेमा के व्यवसाय में छोटी मछली का प्रभुत्व स्थापित करते हैं। उनका कभी कोई गॉडफादर नहीं रहा, लेकिन आज वे बेशुमार लोगों के गॉडफादर हैं। या ''ब्लैक'' का अंधेरा हिंदी सिनेमा के लिए ''उजाला'' बनकर आया या रंग दे बसंती एक घटना है, जो घटते हुए जितनी विलक्षण है,  घटने के बाद उससे कहीं पुरअसर होती जाती है, अथवा महेश भट्ट बखूबी जानते हैं कि बाजार के मायावी तिलिस्म के बीच अपना पुराना और खोटा सिक्का किस तरह से असली से बढ़कर कीमत पर भुनाया जा सकता है। वह अपनी निजी जिंदगी को किस्सा बनाकर तरह तरह से रंगकर न जाने कितनी बार परोस चुके हैं। लगता नहीं कि ये सिलसिला रूकने वाला है क्योंकि बाजार उनके किस्से कहने के अंदाज का मुरीद है।

सिनेमा के वर्तमान परिदृश्य में सक्रिय निर्देशकों कलाकारों का परिचय पाने के लिहाज से प्रहलाद अग्रवाल की पुस्तक पठनीय और दिलचस्प है,  लेकिन इसकी सबसे बड़ी कमजोरी यह है कि नए सिनेमा के गंभीर विमर्श से किनारा करती नजर आती है। यानी यह मुख्यधारा के सिनेमा में निहित गंभीर तथा दूरगामी संदेशों को पकड़ने की जहमत नहीं उठाती है। न ही इस बात को रेखांकित करती है कि एक ही कालखंड में सक्रिय अनेक नौजवान फिल्मकार किन अर्थों में सफल होने के बावजूद केवल एक फार्मूले पर नहीं टिकी है। कथ्य-प्रस्तुतिकरण-नजरिए की कौन सी भिन्नता उन्हें अलग-अगल सिने व्यक्तित्वों में ढालती नजर आती है..? क्यों कोई ढाई करोड़ में भी अपनी पहचान बना लेता है और क्यों किसी को पचास करोड़ भी कम पड़ते हैं.? क्या अपने होने को सिद्ध करने के लिए केवल प्रतिभा ही काफी है या उस प्रतिभा को करोड़ों रुपये की भी दरकार है...? सबसे अंत में यह प्रश्न कि जिन फिल्मकारों के कारण प्रहलाद जी को हिंदी का वर्तमान सिने परिदृश्य सुनहरा नजर आता है वह तमाम लोग क्या केवल 'बाजार के बाजीगर हैं'  अथवा नयी सोच व ऊर्जा से लबरेज नए सिनेमा के पैरोकार...।

लेखक अतुल कुशवाह पत्रकारिता से जुड़े हुए हैं.


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