अमिताभ बच्चन की सफलता और विनम्रता की मार्केटिंग

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दयानंदअमिताभ बच्चन अब तो जब-तब लखनऊ आते रहते हैं। पर पहले ऐसा नहीं था। बहरहाल वह जब 1996 में एक बार लखनऊ आए थे तब मैं ने उन से एक लंबा इंटरव्यू लिया था। हिंदी फ़िल्मों में ऊट-पटांग ट्रीटमेंट पर जब बात की तो वह अपनी तरफ से कुछ कहने के बजाय हरिवंश राय बच्चन की शरण में चले गए।

बोले, 'बाबू जी कहते हैं कि हिंदी फ़िल्में पोयटिक जस्टिस करती हैं।' और भी बहुतेरी बातें अमिताभ ने बताईं। जिन सब का व्योरा दे पाना यहां मुमकिन नहीं है। हां पूरी बातचीत में उन की अतिशय विनम्रता ने मुझे बहुत चकित किया। क्यों कि बहुतेरे फ़िल्मी अभिनेताओं-अभिनेत्रियों,राजनितिज्ञों या और अन्य तमाम लोगों से मिलने बतियाने का मुझे मौका मिलता रहा है। दिलीप कुमार तक से दो बार मिला हूं। वह कलफ़ लगी उर्दू ही बोलते हैं या फिर अंगरेजी। और उन के मिलने-बतियाने में भी वह कलफ़ उतरती नहीं है। बल्कि और चढ़ जाती है। ज़्यादातर लोगों का मिजाज बहुत दिखावे वाला होता है। उपेक्षित भाव से मिलते हैं। कई बार अपमानित करने का भाव भी मिल जाता है। लेकिन भीतर से। बाहर से तो वह हंसते हुए ही मिलते हैं। पर पता तो चल ही जाता है। पर तब मैं ने पाया कि अमिताभ बच्चन इस से बिलकुल उलट हैं।

उन की अतिशय विनम्रता से जब मैं अफना गया तो उन से पूछ ही लिया इंटरव्यू खत्म होने के बाद कि,'यह जो आप की अतिशय विनम्रता है, वह ओढ़ी हुई है, अभिनय है या सचमुच ही आप इतने विनम्र हैं?' यह सवाल सुन कर कोई भी भड़क सकता है। पर यह देखिए अमिताभ बच्चन बिलकुल नहीं भड़के। उलटे और विनम्र हो गए। हाथ जोड़ कर बोले, 'अब आप जो समझ लें।' यह कह कर मुसकुरा पडे़। बहुत बाद में जब कौन बनेगा करोड़पति आया तब भी सब के साथ उन की विनम्रता की वही भंगिमा, विनय की उसी भाषा से हम बार-बार परिचित होते रहे। तो क्या अमिताभ बच्चन तमाम अंतरविरोधों के बावजू्द इस लिए सफल हैं कि वह विनय की भाषा जानते हैं और कि अतिशय विनम्र हैं?

मित्रो, आप की क्या राय है? तब और जब उन के प्रबल प्रतिद्वंद्वी शत्रुघ्न सिन्‍हा को भी उन की नकल करते हुए भोजपुरी में उतरना पड़ता है। शत्रुघ्न सिन्‍हा भी पहले लखनऊ बहुत आते थे। तब वह भी यहां से चुनाव लड़ने का मन बना रहे थे। बावजूद इस के बतियाते वह तिरछा हो कर ही थे। पर अब तो वह भी विनम्रता का चोला ओढ़ चले हैं। हालां कि रस्सी भले जल गई हो पर अकड़ अभी गई नहीं है उन की। सारी विनम्रता उन की एक 'खामोश' में डूब जाती है। फिर भी बाज़ार में सफलता की कुंजी अब विनम्रता की तराजू पर चढ़ कर ही मिल रही है। सो विनम्रता का चोला मुफ़ीद पड़ने लगा है। यकीन न हो तो एक ही परिवार के राहुल गांधी और वरूण गांधी से मिल लीजिए। बात समझ में आ जाएगी। जब कि काम और लक्ष्य दोनों का एक ही है।

खैर बात यहां अमिताभ बच्चन और उन की विनम्रता की हो रही थी। तो उन के फ़िल्मी रुतबे को छीनने के सब से बडे़ दावेदार शाहरूख भी उन का कद छीनते-छीनते उन्हीं के जिए को दुहराने लगते हैं। सवाल यह भी है कि क्या यह सिर्फ़ उन की विनम्रता ही है या मार्केटिंग मैनेजमेंट भी है? कि वह अपने को बेचने के लिए कहिए या जमाए रखने के लिए कुछ भी बेच लेते हैं। हाजमोला से ले कर तेल, ट्रैक्टर, सीमेंट वगैरह सब। इतना कि लोग कहते हैं कि वह पैसे के लिए कुछ भी कर सकते हैं। यहां तक कि पैंट भी उतार सकते हैं। सफलता और द्रौपदी जीतने के लिए। तो फिर अकड़ क्या चीज़ है।

यह इस लिए भी कहा कि यह वही अमिताभ बच्चन हैं जो एक समय जब शुरुआती शिखर पर थे तब प्रेस का ही क्या अपनी इस विनम्रता का भी बायकाट किए हुए थे। पर जब वह शिखर से सरके तो लौटे विनम्रता की प्रतिमूर्ति बन कर ही। और वह अब अपने ही गढे़ शिखर पर फिर विराजमान हैं। जहां लोग फटक भी नहीं पा रहे। नहीं होने को तो राजेश खन्ना भी हम लोगों के बीच अभी भी हैं, जिन से स्टारडम छीन कर ही अमिताभ बच्चन सुपर स्टार बने। तब जब कि राजेश खन्ना की फ़िल्मोग्राफी में अमिताभ से ज़्यादा फ़िल्में हैं, ज़्यादा सफल फ़िल्में हैं, ज़्यादा अच्छे गाने हैं। तब के समय वह अमिताभ से भी ज़्यादा लोकप्रिय थे। फिर भी राजेश खन्ना आज की तारीख में बिसर गए हैं।

तो यह क्या है? क्या वह विनम्रता और मार्केटिंग मैनेजमेंट में गच्चा खा गए? जो भी है आज की तारीख में अमिताभ से लोहा लेने वाला कोई और दीखता नहीं फ़िल्म इंड्स्ट्री में। न विनम्रता में, न मार्केटिंग मैनेजमेंट में। पर इस विनम्रता में मिलावट कितनी है इस की निर्मम पडताल भी ज़रूरी है। बेहद ज़रूरी। हम सभी जानते हैं और देखते भी हैं कि अमिताभ बच्चन अपने पिता हरिवंश राय बच्चन की कविताओं का पाठ बडे़ मन और जतन से करते हैं। खास कर मधुशाला का सस्वर पाठ कर तो वह लहालोट हो जाते हैं। अपने अशोक वाजपेयी भी अमिताभ के इस बच्चन कविता पाठ के भंवर में जैसे डूबे ही नहीं लहालोट भी हो गए।

अज्ञेय, शमशेर, नागार्जुन और केदारनाथ अग्रवाल की जन्मशती पर उन्हों ने योजना बनाई कि इन कवियों की कविताओं का पाठ क्यों न अमिताभ बच्चन से ही करवा लिया जाए। उन्हों ने अमिताभ बच्चन को चिट्ठी लिखी इस बारे में। और सीधा प्रस्ताव रखा कि वह इन कवियों की कविताओं का पाठ करना कुबूल करें। और कि अगर वह चाहें तो कविताओं का चयन उन की सुविधा से वह खुद कर देंगे। बस वह काव्यपाठ करना मंजूर कर लें। जगह और प्रायोजक भी वह अपनी सुविधा से तय कर लें। सुविधा के लिए अशोक वाजपेयी ने हरिवंश राय बच्चन से अपने संबंधों का हवाला भी दिया। साथ ही उन के ससुर और पत्रकार रहे तरुण कुमार भादुडी से भी अपने याराना होने का वास्ता भी दिया। पर अमिताभ बच्चन ने सांस नहीं ली तो नहीं ली।

अशोक वाजपेयी ने कुछ दिन इंतज़ार के बाद फिर एक चिट्ठी भेजी अमिताभ को। पर वह फिर भी निरुत्तर रहे। जवाब या हां की कौन कहे पत्र की पावती तक नहीं मिली अशोक वाजपेयी को। पर उन की नादानी यहीं खत्म नहीं हुई। उन्हों ने जनसत्ता में अपने कालम कभी कभार विस्तार से इस बारे में लिखा भी। फिर भी अमिताभ बच्चन नहीं पसीजे। न उन की विनम्रता जागी। इस लिए कि कवितापाठ में उन के पिता की कविता की बात नहीं थी, उन की मार्केटिंग नहीं थी, उन को पैसा नहीं मिल रहा था।

अशोक वाजपेयी आईएएस अफ़सर रहे हैं, विद्वान आलोचक और संवेदनशील कवि हैं,  बावजूद इस सब के वह भी अमिताभ बच्चन के विनम्रता के टूल में फंस गए। विनम्रता के मार्केटिंग टूल में। तो हम आप क्या चीज़ हैं? पता नहीं क्यों मुझे कई बार लगता है कि अमिताभ उतने ही विनम्र है जितने कि वह किसान हैं। बाराबंकी में उन की बहू ऐश्वर्या के नाम पर बनने वाला स्कूल उन के किसान बनने की पहली विसात थी। किसान नहीं बन पाए तो स्कूल की बछिया दान में दे दी। स्कूल नहीं बना तो उन की बला से। वह तो फिर से लखनऊ में किसान बन गए। और विनम्रता की बेल ऐसी फैली कि यह देखिए वह अपने खेत में ट्रैक्टर चला कर फ़ोटो भी खिंचवा कर अखबारों में छपवा बैठे। अब जो संतुष्टि उन्हें अपने पिता की कविताओं का पाठ कर के या अपने खेत में ट्रैक्टर चला कर मिलेगी, उन की विनम्रता को जो खाद मिलेगी वह अज्ञेय, शमशेर, नागार्जुन या केदार की कविताओं के पाठ से तो मिलने से रही।

यह भी एक अबूझ रेखा है कि वह अपनी रेखा को भी उसी विनम्रता से भुलाए बैठे हैं। किसी से उस बारे में बात तक नहीं करते। पर जब इंडिया क्रिकेट में विश्वकप जीतती है तो अद्भुत विनम्रता से वह चैनल वालों को सूचित कर के आधी रात को मुंबई की सड़कों पर जश्न मनाने निकल पड़ते हैं। बेटे, बहू को साथ ले कर। पूरी विनम्रता से सब का अभिवादन स्वीकार करते। आइए हम भी, आप भी उन की इस विनम्रता को प्रणाम करें। तब और जब अभी वह आरक्षण की आग अभी बस जलाने ही वाले हैं बरास्ता प्रकाश झा।

लेखक दयानंद पांडेय वरिष्‍ठ पत्रकार तथा उपन्‍यासकार हैं. दयानंद से संपर्क 09415130127, 09335233424 और This e-mail address is being protected from spambots. You need JavaScript enabled to view it के जरिए किया जा सकता है.


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