एचटी से मुकदमा लड़ने में आपका साथ चाहिए

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Yashwant Singhकारपोरेट मीडिया, न्यू मीडिया, होईकोर्ट, न्याय, अपील

मूर्ख दिवस की देर रात जो बातें दिमाग को परेशान किए थीं, 2 अप्रैल की सुबह सोकर उठा तो वही चुहल कर रहीं थीं- बंधु, निकल ले हाईकोर्ट की तरफ, मुकदमा लड़ने। पत्नी आईं और बोलीं- आज तो आपको कोर्ट जाना है। मैं भी मुस्कराया, बोला- पूड़ी तरकारी बांध दो, मुकदमा देर तक खिंचा तो दोपहर में कोर्ट में ही पेट पूजा कर लूंगा, उसी तरह, जैसे, हम लोगों के खानदान वाले करते थे। इतना सुनते ही वे चहंक उठीं।

बताने लगीं अपने दादा का किस्सा। किस तरह वे सुबह घर से पैदल ही जिला मुख्यालय निकल जाते थे, खाने की पोटली बांधकर, मुकदमा लड़ते। देर रात वापस आते थे, रास्ते भर पंचायत करते हुए। जब तक जिये वो मुकदमा ही लड़ते रहे। शौक और शान से मुकदमा लड़ते थे। उन्हें यह फिकिर नहीं थी कि मुकदमा लड़ने से वक्त और पैसे की कितनी बर्बादी होती है, क्योंकि एक तो क्षत्रियों वाली शान, दूजे कोर्ट का जानकार होने का भ्रम। फिर वो सीरियस होकर बोलीं, सचमुच बांध दूं पूड़ी सब्जी? मैंने मना किया, रहने दो यार, उधर ही कहीं खा लेंगे।

हिंदुस्तान, दिल्ली के पूर्व वरिष्ठ पत्रकार राजीव रंजन नाग ने मुझे शुरू में आश्वस्त किया था, यशवंत जी, टेंशन नहीं लेने का। आपको कहीं नहीं जाना होगा। सब ठीक हो जाएगा। पर नाग साहब गोली दे गए। वे 2 अप्रैल को कोर्ट नहीं आए। उन्होंने जिस अपने वकील दोस्त को यह मुकदमा सौंपा, उनसे फोन पर कहलवा दिया कि यशवंत जी, आपको आना होगा। मैं भौचक। सोचा, दिल्ली वाले ऐसे ही होते हैं क्या! फिर हमेशा की तरह मुश्किल-मजबूरी को एक अच्छा मौका मानते हुए दिल्ली हाईकोर्ट के दर्शन का इरादा कर लिया। जिन चार लोगों पर मुकदमा किया गया है उसमें सबसे गरीब आदमी अनिल तिवारी हैं। लगभग दो दशक पहले एचटी ग्रुप के दिल्ली आफिस में चपरासी पद पर भर्ती हुए और बाद में कई सीढ़ियां उपर चढ़ते हुए आज कथित मंदी की भेंट चढ़े हुए हैं। शैलबाला के पक्ष में गवाही और बयान देने के चलते मुकदमा उन पर भी है। अनिल को फोनकर भड़ास4मीडिया आफिस बुलवा लिया था।

मैंने कार की ड्राइविंग सीट संभाली और चार जन आगे पीछे सवार हो लिए, मैं, अनिल, दीपक और अशोक। चलने से पहले सबको उर्जा से भरा... गुरु, जिंदगी है तो संघर्ष है। संघर्ष है तो मुकदमा है। मुकदमा है तो फैसला है। फैसला है तो हार है या फिर जीत है। हार है तो हिम्मत है। हिम्मत है तो उम्मीद है। उम्मीद है तो रास्ते हैं। रास्ते हैं तो मंजिल है। मंजिल है तो देर सबेर मिलेगी ही, मुझे नहीं तो तुझे। मिलेगी तो सही भइये।

दिल्ली हाईकोर्ट के अंदर-बाहर सुरक्षा की जबर्दस्त व्यवस्थासुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट आगे पीछे ही हैं। न्यूज चैनलों की गाड़ियां लाइन लगाए खड़ी मिलीं, जाने कब किसी बड़े मामले में कोई न्यायिक मोड़ आ जाए और बाइट लेनी पड़ जाए। हाईकोर्ट में अंदर जाने के लिए वकील से मिली स्लिप के आधार पर बने पास को लेकर सुरक्षा के कई चक्रों से गुजरते हुए कोर्ट में दाखिल हुए। हम लोगों का मुकदमा कोर्ट नंबर 24 में था। मुकदमें का क्रम था ग्यारहवां, जिसे न्यायिक भाषा में आइटम नंबर 11 बोलते हैं। हर कोर्ट के बाहर और मेन हाल में इलेक्ट्रानिक सिस्टम के जरिए किस कोर्ट में किस आइटम नंबर की सुनवाई जारी है, प्रदर्शित किया जा रहा था। कोर्ट नंबर 24 में आइटम नंबर एक और दो ने काफी वक्त लिया। अपनी उत्सुकता रोक नहीं पा रहा था मैं। कोर्ट नंबर 24 का दरवाजा उठकाया और संभलते डरते अंदर घुसा। बहस जारी थी। दोनों पक्षों के वकील अपनी दलील रख रहे थे और जज साहब उनकी दलीलों को कागजातों के आधार पर नापतौल कर सवाल व शंकाएं पूछते जा रहे थे। कई वकील पीछे बैठे हुए अपने आइटम नंबर की सुनवाई का इंतजार कर रहे थे। मेरे जैसे लोग दरवाजा खोलकर आ-जा रहे थे। कोर्ट के अंदर काफी देर तक कार्यवाही देखने के बाद हम लोग बाहर निकले। मैंने महसूस किया कि जिस तरह फिल्मों में दिखाया जाता है, कोर्ट उस तरह का नहीं होता। यहां बहसें ज्यादा वास्तवकि और टू द प्वाइंट होती हैं। ज्यादा महत्व कागजात और प्रमाणों को दिया जाता है। बहस में वकीलों के अलावा जज भी इनवाल्व होते हैं और सभी बिंदुओं को क्रासचेक करते हैं। यह सब देख मेरी न्यायपालिका के प्रति आस्था और बढ़ गई। हालांकि कहने वाले ये भी कहते हैं कि हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट जैसा उचित न्याय निचली अदालतों में नहीं मिलता क्योंकि वहां  सब कुछ ट्रांसपैरेंट और लाजिकल नहीं होता पर मेरा सीधा वास्ता कभी लोअर कोर्ट से नहीं पड़ा इसलिए मैं कुछ नहीं कह सकता। हां, हाईकोर्ट की प्रक्रिया देखकर अंदर से जरूर संतोष हुआ। बाहर निकलकर कुछ देर अपने वकील के साथ बैठा। उनसे खाना खाने की अनुमति लेकर हाईकोर्ट परिसर में बनी जनता कैंटीन की तरफ बढ़ चला। अनिल का नौरात्र का नौ दिनों का व्रत था, इसलिए उन्होंने कुछ नहीं खाया लेकिन मैंने छोला-चावल खाने के बाद बनारसी पान दबाया और फिर कोर्ट के अंदर घुस गया। आखिर हम लोगों की भी बारी आई। हम लोगों के मामले में क्या हुआ, यह पहले ही बताया जा चुका है।

कोर्ट परिसर के बाहर यशवंत, वकील निलॉय और अनिल तिवारीमेरे लिए हाईकोर्ट का दर्शन करना और अनुभव हासिल करना बेजोड़ रहा। बहुत दिन बाद कुछ बिलकुल नया देखने, सीखने और जानने को मिला। मैं कह सकता हूं कि कोर्ट-कचहरी को लेकर हम जैसे पढ़े-लिखे लोगों के अंदर खामखा का भ्रम और डर बना रहता है। ये तो बड़ी प्यारी चीज होती है। अगर कोर्ट-कचहरी का चक्कर नहीं लगाए तो जिंदगी क्या जी पाए। जिस तरह हर आदमी को एक बार जहाज पर चढ़ना चाहिए, एक बार संसद की कार्यवाही देखनी चाहिए उसी तरह एक बार कोर्ट-कचहरी का भी चक्कर लगाना चाहिए। न्याय पाने के लिए किसी का भी कोर्ट में जाना एक बेहद लोकतांत्रिक अधिकार है और हमें उस अधिकार का सम्मान करना चाहिए। और हमें भी, अगर कहीं लगता है कि हमारे साथ अनुचित हो रहा है तो कोर्ट जाना चाहिए, बिना किसी डर भय के। बात एचटी मीडिया और प्रमोद जोशी द्वारा भड़ास4मीडिया पर किए गए मुकदमें की। यह मुकदमा न सिर्फ भड़ास4मीडिया टीम के लिए पहला मौका है बल्कि ऐसा पहली बार हो रहा है जब कोई परंपरागत और बड़ा मीडिया हाउस किसी न्यू मीडिया माध्यम पर मुकदमा कर रहा है बल्कि उसे उसके बारे में कुछ भी प्रकाशित करने से रोकने के लिए गुहार लगा रहा है। इससे पहले यही बड़ा मीडिया हाउस एक अन्य वेब पत्रकार सुशील कुमार सिंह पर लखनऊ में मुकदमा कर चुका है।

इस प्रकरण से न्यू मीडिया की ताकत का पता चलता है जिसे नोटिस करने के लिए बड़े से बड़ा मीडिया घराना भी मजबूर है। भड़ास4मीडिया आने वाले दिनों में चले या बंद हो जाए, यह मुख्य नहीं है। मुख्य है इस मुकदमेबाजी से जो रास्ता खुलेगा वह देश में न्यू मीडिया के भविष्य को तय करेगा। इसलिए मैं इस मुकदमें को सिर्फ भड़ास4मीडिया पर हुआ मुकदमा नहीं मानता। मैं इसे देश के सभी संवेदनशील, सचेतन व लोकतांत्रिक लोगों, वेब संचालकों, ब्लागरों, आम मीडियाकर्मियों का मुकदमा मानता हूं जिसका प्रतिनिधित्व करने का संयोग मिला है भड़ास4मीडिया को। इस जंग को भड़ास4मीडिया कभी भी अकेले नहीं लड़ सकता। हम लोग केवल निमित्त मात्र हैं जो आपकी तरफ से कोर्ट जाते रहेंगे और अपना पक्ष मजबूती से रखने की कोशिश करते रहेंगे लेकिन हार या जीत होगी तो वो आपकी भी होगी।

बात यहां पैसों की भी नहीं है। एचटी मीडिया और प्रमोद जोशी ने जो मुकदमा किया है उसमें भले ही 21 लाख रुपये का मानहानि का दावा करने के लिए 21 हजार रुपये का स्टैंप कोर्ट फीस के रूप में लगाया गया हो, लेकिन उन लोगों ने नोटिस में अंत में कहा है कि वे प्रतीक के तौर पर एक रुपये का जुर्माना चाहते हैं क्योंकि यह मुकदमा उनके सिद्धांत और उनकी छवि का है। यही बात हम लोग भी कह रहे हैं कि यह मुकदमा पैसों का नहीं है बल्कि परंपरागत मीडिया बनाम न्यू मीडिया के एप्रोच का है। इस जंग में हम न्यू मीडिया के प्रतिनिधि लोग अपने साथ केवल साहस और विजन रखते हैं। हमारे पास न तो पैसा है और न ही कहीं से मिला कोई फंड। हमें इसके लिए आप पर निर्भर रहना है। और इसलिए भी निर्भर रहना है क्योंकि हमें साबित करना है कि हम एकजुट हैं और इस बड़े संघर्ष में किसी एक के कंधे पर कोई बड़ा भार न आए बल्कि सब लोग मिल-जुलकर इस भार को बांट लें। इस मुकदमें को लेकर भड़ास4मीडिया को कई चीजें तय करनी हैं। दोस्त-मित्र की भी शिनाख्त करनी है। जो लोग अच्छे दिनों में अच्छी-अच्छी बातें करते रहते हैं, उनकी भी परीक्षा है कि वे मुश्किल के इस क्षण में हम लोगों का किस तरह का साथ देते हैं। कोर्ट के बाहर न्यूज चैनल वाले हर वक्त रहते हैं मौजूद आप लोगों से अपील है कि इस मुकदमें को लड़ने के लिए प्रतीकात्मक तौर पर हम लोगों की आर्थिक मदद करें,  न्यूनतम दस रुपये से लेकर अधिकतम 101 रुपये तक की। इससे ज्यादा नहीं चाहिए। यह राशि भड़ास4मीडिया के नाम से बने एकाउंट में डाल सकते हैं। बैंक एकाउंट डिटेल इस प्रकार है- Bhadas4Media, A/c No. 31790200000050, Bank of Baroda, Vasundhara Enclave, Delhi. मदद देने वाले अपने बारे में जानकारी मेल This e-mail address is being protected from spambots. You need JavaScript enabled to view it पर भी दें ताकि हम उनका नाम अपनी जानकारी के लिए एक जगह सुरक्षित रख सकें। अगर आप आर्थिक मदद न देना चाहें, सिर्फ नैतिक मदद देना चाहें तो भी हमें मेल करें ताकि आपके मेल को अपने पक्ष की मजबूती के लिए इस्तेमाल कर सकें।

हमें यह राशि मांगने, मदद मांगने में कोई शर्म नहीं है क्योंकि हम इसका इस्तेमाल एक बड़ी लड़ाई के लिए करने जा रहे हैं। मैं निजी तौर पर मानता हूं कि जिस दिन मुकदमा लड़ने में मुझे अपनी जेब से एक पैसा भी खर्च करना पड़ा, मैं मुकदमा लड़ने और न लड़ने के बारे में सोचूंगा क्योंकि यह जंग मेरी निजी जंग नहीं है इसलिए इसमें सामूहिक भागीदारी अपेक्षित है।

दोस्तों, मित्रों और शुभचिंतकों की मदद से आज तक कभी किसी के आगे भड़ास4मीडिया की टीम झुकी नहीं, इसलिए मैं मानकर चल रहा हूं कि आगे भी किसी के आगे झुकने की नौबत नहीं आएगी। भड़ास4मीडिया पहली बार अपने पाठकों से प्रतीकात्मक मदद की अपील कर रहा है क्योंकि अभी तक हमने इस पोर्टल का संचालन अपने दम पर किया, आनलाइन और आफलाइन विज्ञापनों से हुई आय के जरिए किया। पर अब हमें जिस संघर्ष के रास्ते पर चलने को मजबूर किया गया है, उस पर चलने के लिए, जूझने के लिए और सफल होने के लिए आप लोगों की मदद लेनी पड़ेगी। हम अखबारों के दफ्तरों में जाकर पत्रकार साथियों से मदद मांगेंगे, हम सड़क पर जनता के बीच जाकर मदद मांगेंगे, हम कालेजों-कैंपसों में नुक्कड़ नाटक कर सहयोग की अपील करेंगे, क्योंकि हमें कल को यह नहीं लगना चाहिए कि हमने संघर्ष के जरिए जीतने के वास्ते प्रयास करने में कोई कोर-कसर बाकी रखा।

बाकी, दुनिया है, अपने तरीके से चलती है और चलती रहेगी।

अंत में एक चीज और, जो छूट गई। जिस किसी पत्रकार साथी ने किसी मीडिया हाउस के खिलाफ कोई मुकदमा लड़ा हो और जीता हो, वे अपने अनुभव, कोर्ट केस के डिटेल, अपनी तस्वीर हमारे पास भेजें। भड़ास4मीडिया पर एक नई सीरीज शुरू करने की योजना है जिसमें मीडिया मामलों में कोर्ट केस जीतने वाले पत्रकारों के मुकदमों के डिटेल प्रकाशित किए जाएंगे ताकि बाकी पत्रकार साथी सबक ले सकें और कोर्ट के मामलों को बारीकी से समझ सकें। यह नायाब सुझाव एक ऐसे वरिष्ठ पत्रकार ने दिया है जो इन दिनों एक बड़े ग्रुप पर केस करने के बाद लगभग जीतने की स्थिति में पहुंच चुके हैं। उऩका कहना है कि लोग कोर्ट से डरते हैं वरना अगर पत्रकार अपने अधिकारों को लेकर कोर्ट में जाने लगे तो उसके जीतने की स्थितियां हमेशा ज्यादा होती हैं।

आपके सुझावों का इंतजार रहेगा।

यशवंत सिंह

एडिटर, भड़ास4मीडियया

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