उन्हें भी नहीं पता पं. जसराज व पं. भीमसेन जोशी का फर्क?

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दिनेश चौधरीम्यूजिक इंडिया मेरी पसंदीदा साइट है, हालांकि इसने मेरा बहुत बड़ा नुकसान भी किया है। पहले मनपसंद संगीत सुनने के लिये कैसेट-सीडी का सहारा लेना पड़ता था और आमतौर पर शास्त्रीय संगीत के कैसेट छोटे कस्बों में बहुत आसानी से नहीं मिलते। इसलिये कैसेट-सीडी की खोज भी एक समय में बड़ा अभियान हुआ करता था और बेहद मेहनत से ढूंढकर लाये गये अलबम को सुनने में जो आनंद आता था, उसकी बात कुछ और ही होती थी।

अपने पास कैसेट्स का जो संग्रह है, उनके साथ ढेर सारी कहानियां भी जुड़ी हुई हैं कि किस कैसेट को किस कस्बे या शहर में किस तरह से हासिल किया गया।  मसलन, श्रीमती अनिता सेन अपने रायपुर की ही गायिका हैं पर उनका कैसेट मुझे अप्रत्याशित रूप से गोवा में मिला था। गुलजार ने "मीरा" पर जो फिल्म बनायी थी उसमें संगीत पंडित रविशंकर ने दिया था और यह कैसेट मुझे शिमला में हासिल हुआ। मैं अपने मित्र पूरन हार्डी के साथ वहां घूम रहा था कि हमें मशहूर अभिनेता सौरभ शुक्ला दिखाई पड़े जो शिमला की ठंड से बचने के लिये स्वेटर की तलाश में थे। हमने सोचा कि जरा-जरा चलते-चलते सौरभ से बात कर ली जाये तो हम दुकान के बाहर ही फुटपाथ पर उनका इंतजार करने लगे और अनायास ही "मीरा" का कैसेट  नजर आ गया। उस्ताद हुसैन बख्श का जिक्र मैंने पूर्व में भी किया है जो मुझे जूतों व अंडों की दुकान में मिले थे।

जिस कस्बे में मेरी शुरूआती तालीम हुई वहां सिंधियों की भरमार हुआ करती थी। व्यवसाय करने में इनका कोई सानी नहीं होता और ये बचपन से ही "धंधे" की तालीम हासिल करने लगते हैं। बचपन में जब हम गुल्ली-डंडा, कंचे या दूसरे खेल खेलते थे मेरा एक सिंधी मित्र शंकर कांच के मर्तबान में मीठी गोलियां बेचा करता था। कभी-कभी वह एल्यूमीनियम के एक तसले में आलू उबालकर ले आता और उसे काटकर व नमक-मिर्च छिड़कर बेचा करता था। पत्तल के दोनों में आलू के टुकड़े काटकर व उसमें माचिस की एक तीली लगाकर ग्राहक को देने की उसकी अदा मुझे अभी तक याद है। पांडे जी के यहां मेरी मुलाकात एक अन्य सिंधी भाई से  हुई जो पाकिस्तान के सिंध प्रांत से आया हुआ था और गांजे की अपनी लत के कारण स्वाभाविक रूप से पांडे जी का नियमित दरबारी था। पांडे जी एक किस्सा उसके सामने ही बहुत रस लेकर सुनाया करते थे। एक सिंधी व्यवसायी ने अपने छोटे-से पुत्र को "धंधे" की तालीम देने की गरज से बेहद उंचाई पर चढ़ा दिया और उससे कहा कि "बेटा, कूद जा।" बच्चे ने आनाकानी की तो उसने कहा कि "कूद जा बेटा, मैं थाम लूंगा।" जब बच्चे ने छलांग लगायी तो वह झट अलग हो गया और रोते हुए बच्चे से कहा कि "बेटा! धंधे में अपने बाप पर भी भरोसा मत करना।"

तो पाकिस्तान के उस सिंधी भाई से जब मेरी मित्रता हुई और उसे ग़ज़लों के सुनने के मेरे शौक के बारे में मालूम हुआ तो उसने कहीं से एक कबाड़ की शक्ल वाली -बगैर कवर या फ्लैप वाली- एक कैसेट जैसी चीज मुझे लाकर दी। इस शुबहे के बावजूद कि कैसेट को चलाने से मेरा कीमती कैसेट प्लेयर खराब हो सकता है, मैंने उस कैसेट को चलाने का जोखिम उठाया और यकीन मानिये की मेंहदी हसन साहब की उस मूड की ग़ज़लें मैंने आज तक नहीं सुनी और न ही वे ग़ज़ले किसी अन्य अलबम में या इंटरनेट पर उपलब्ध हैं। इस कैसेट में मेहदी हसन साहब ने मीर की मशहूर ग़ज़ल " देख तो दिल के जां से उठता है, ये धुआं-सा कहां से उठता है" को जिस अंदाज में गाया है वह बेमिसाल है। मैं कोशिश करूंगा कि इसे डिजीटल फार्मेट में बदलकर आपको सुना सकूं।

ट्रेड यूनियन आंदोलन के सिलसिले दिल्ली जाने पर जंतर-मंतर ही धरने या भूख-हड़ताल की जगह हुआ करती थी। भूख-हड़ताल में तो खैर खाने का सवाल ही नहीं उठता, पर धरना होने पर हम कनाट प्लेस चले जाते और यहीं पर छोले-भटूरे या कुलचे खाये जाते थे। प्लाजा के पास जैन बुक डिपो में सरकारी नियमों वाली किताबें खरीदी जाती थीं- जो आमतौर पर चार्जशीट का जवाब देने में काम आती थीं- और इसके बाद समय निकालकर मैं अपने अभियान में जुट जाता था। पास ही की कैसेट दुकान में कोई बरतानिया का सैलानी था जो पंडित जसराज के एक अद्भुत आलाप को सुन रहा था। साथ में चौरसिया जी की बांसुरी थी और पार्श्व में उस्ताद जाकिर हुसैन का तबला। यह एक अद्भुत जुगलबंदी थी। मैं लपककर वहां पहुंचा और दुकानदार से कैसेट देने को कहा।

उसने कहा कि एक ही है और उसे "सर" को देनी है। "सर" कैसेट को सुन रहे थे और कतिपय असंभव-सी मुद्रा में अपने सर को झटक रहे थे। अपनी बोलचाल वाली अंग्रेजी बहुत खराब होते हुए भी मैंने अपनी समुचित प्रतिभा का उपयोग करते हुए "सर" से कहा कि मैं भी दिल्ली से बाहर से हूं और मेरा शहर यहां से कमोबेश उतना ही दूर है, जितना बरतानिया होता होगा व मेरे यहां दोबारा आ पाने के अवसर बेहद कम हैं, इसलिये मेहरबानी करके इस कैसेट को मेरे लिये छोड़ दें। "सर" इतने सहृदय थे कि कैसेट तो छोड़ ही दिया बहुत मिन्नते करने पर भी उसके पैसे तक नहीं लिये।

बहरहाल, म्यूजिक इंडिया वालों ने मेरा यह आनंद मुझसे छीन लिया है। यह साइट बेहद समृद्ध है और आप कोई भी गीत, ग़ज़ल, भजन, शास्त्रीय बंदिश, ख़याल, ठुमरी, साज-संगीत या लोकगीत, कुछ भी यहां पर सुन सकते हैं। पर हैरानी की बात यह हुई कि पंडित जसराज व पंडित भीमसेन जोशी में फर्क करने की गड़बड़ी पता नहीं कैसे इन लोगों ने भी कर दी है। जब पंडित भीमसेन जोशी का निधन हुआ था तो आर्यन टीवी वालों ने पंडित जसराज की क्लिप चला दी थी। यही काम जागरण वालों ने किया था। म्यूजिक इंडिया वालों से इस तरह की गलती की अपेक्षा नहीं की जा सकती। आवरण में पंडित जसराज की तस्वीर है लेकिन भीतर भीमसेन जोशी गा रहे हैं।

पर इस गलती से पंडित जी को सुनने का आनंद जरा भी कम नहीं होता। सुनिये पंडित भीमसेन जोशी का मशहूर भजन, "जो भजे हरि को सदा, वही परम पद पायेगा....।" साथ में सुनिये वह जुगलबंदी भी जो मुझे "सर" के सौजन्य से हासिल हुई थी।

http://www.musicindiaonline.com/#/album/24-Classical_Hindustani_Vocal/233078-Tunes_And_Melodies/

http://www.musicindiaonline.com/#/album/45-Classical_Jugalbandhi/28850-The_Jugalbandi_Series_Vol_2/

लेखक दिनेश चौधरी पत्रकार, रंगकर्मी और सोशल एक्टिविस्ट हैं. सरकारी नौकरी से रिटायरमेंट के बाद भिलाई में एक बार फिर नाटक से लेकर पत्रकारिता तक की दुनिया में सक्रिय हैं. वे इप्‍टा, डोगरगढ़ के अध्‍यक्ष भी हैं. उनसे संपर्क This e-mail address is being protected from spambots. You need JavaScript enabled to view it के जरिए किया जा सकता है.


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