जगजीत सिंह बरास्ते अमिताभ

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मैं जिस अमिताभ की बात कर रहा हूं वह बच्चन नहीं, बल्कि अपने शुक्ला जी हैं। कॉलेज में अपन से एक साल सीनियर। मोटे तब भी थे पर थोड़े कम थे। अब लंबाई-चौड़ाई कदरन एक जैसी होगी क्योंकि खाने-पीने के इंतिहाई शौकीन हैं। अपने दुबे जी खुले आम मुर्गे की टांग उड़ाते थे और कोई उनके ब्राह्मण होने का हवाला देता था तो कहते थे कि हां ‘ब्राह्मण तो हूं पर रावण के कुल का’ और जय लंकेश के नारे के साथ पुनः मुर्ग-भोज में जुट जाते थे।

हालांकि शुक्ला जी ने कभी इस तरह से अपनी कुलीनता का कोई ऐलान नहीं किया पर वे मांसाहारी भोजन बहुत चाव के साथ करते हैं और इसमें तरह-तरह के प्रयोग भी करते रहते हैं। खाने का अलावा उनका दूसरा शौक उम्दा संगीत सुनने का है और शास्त्रीय संगीत सुनने के लिये एक तरह से मुझे अमिताभ ने ही प्रेरित किया था। जगजीत की ग़ज़ल भी मैंने पहली बार अमिताभ के सौजन्य से सुनी थी, इसलिए आज जब मैं जगजीत साहब के उन दिनों की ग़ज़लों को और ग़ज़ल सुनने के इस पूरे सफरनामे को याद करना चाहता हूं तो इसमें अमिताभ की यादें जुड़ना लाजमी हैं।

आधुनिक ग़ज़ल गायकी का यह ट्रेंड मेंहदी हसन साहब ने शुरू किया, जिसमें लफ्जों को बार-बार दोहराया जाता है। मेंहदी हसन साहब कहते हैं कि ‘‘जब आप फिल्म देखते हैं तो फिल्म का सीन व सिचुएशन आपके सामने होता है, लेकिन ग़ज़ल का सीन व सिचुएशन क्या है, यह बताने के लिये हम बार-बार लफ्जों को रिपीट करते हैं।‘‘ यानी ग़ज़ल गायकी में यदि ग़ज़ल के असल मूड को अभिव्यक्ति देनी है तो लफ्जों को बार-बार दोहराना जरूरी हो जाता है और यह शैली मेंहदी हसन साहब के बाद आने वाले लगभग सभी ग़ज़ल गायकों ने अपनायी है, जिनमें से जगजीत भी एक हैं। ग़ज़लों में लफ्जों के बार-बार रिपीट होने के भी कुछ दिलचस्प किस्से हैं, जिन्हें चलते-चलते बयान कर देना असंगत न होगा।

तब अमिताभ कोरबा में इलेक्ट्रिसिटी बोर्ड के एक लगभग उजाड़ से इलाके में बिल्कुल नये क्वार्टर रहते थे व उनके साथ अपने कॉलेज के दिनों के एक और मित्र रहते थे जिनका नाम विनोद महेशकर है। विनोद मुन्नी बेगम के जबरदस्त फैन थे व मुन्नी बेगम के अलावा केवल वॉयस ऑफ अमेरिका सुनते थे और भारत के बारे में नयी-नयी जानकारियां पेश करते थे और ऐसा करते हुए बाकायदा गर्व का अनुभव भी करते थे। विनोद की एक और अदा यह थी कि अगर आप उनके घर जायें और बंद दरवाजे की घंटी बजायें तो बिना इस बात का लिहाज किये हुए कि बाहर कोई भी हो सकता है, उनके मुख-कमल से हमेशा एक ही स्वर झरते थे, ‘‘कौन है बे!’’ इतना कहे बिना उन्होंने कभी भी अपने घर का दरवाजा नहीं खोला। बहरहाल, मुन्नी बेगम की ग़ज़ल मैंने पहली बार विनोद के घर पर ही एक टू-इन-वन पर सुनी थी। वे ग़ज़लों को कुछ-कुछ कव्वाली की शैली में गाती हैं पर उनके ग़ज़लों का चयन बहुत जबरदस्त होता है। इनमें से एक-दो की बानगी पेश करता चलूं:

वो मेरे सामने आयें तो इस तरह, रुख पर परदा रहे-मुझको दीदार हो
आंख चिलमन पर डाले मैं बैठा रहूं, हुस्न छन-छन के बाहर निकलता रहे

और

तुमने मूसा को नाहक तकलीफ दी, लुत्फ आता अगर याद करते हमें
जिनकी आंखों में ताबे-नजारा न हो, उनका जलवा दिखाने से क्या फायदा

तथा

अहले दैरो-हरम रह गये
तेरे दीवाने कम रह गये

हमने हर शै संवारी मगर
फिर भी जुल्फों में खम रह गये

हक फूलों पे है गुलचीं का
बागवानी को हम रह गये

तो विनोद की पहली पसंद मुन्नी बेगम थीं। शुरुआत मे मैं फिल्मी गाने ही सुनता था और एक आम हिंदुस्तानी की तरह फिल्म संगीत को ही संगीत समझता था। संयोग से एक बार आकाशवाणी रायपुर से अनूप जलोटा की ‘‘चांद अंगड़ाइयां ले रहा है’’ सुनी तो अनूप जलोटा का दीवाना हो गया व उनकी ग़ज़लें ढूंढ-ढूंढ कर सुनने लगा। इसी दौर में अमिताभ से मित्रता हुई तो स्वाभावतः उनसे पूछा कि अनूप का यह कैसेट है क्या? बदले में अमिताभ ने जगजीत की ग़ज़ल ‘‘उम्र जल्वों में बसर हो ये जरूरी तो नहीं’’ सुनाई। ग़ज़ल बहुत अच्छी लगी पर मुझे लगा कि अमिताभ अनूप जलोटा की तौहीन कर रहे हैं। तो यहां पर अदायगी को लेकर कुछ जरूरी बहस हुई। मसलन मैंने कहा कि अनूप अपनी ग़ज़ल में लफ्जों को रिपीट कर ‘घटा’, ‘गेसू’ व ‘अंगड़ाई’ की अदायगी कुछ इस तरह से करते हैं कि वह सामने नजर आने लगता है। अमिताभ ने कहा कि जगजीत ने यही काम अपनी ग़ज़ल में ‘नींद’ व ‘सजदे़ के लिये किया हैं। जगजीत जब इस ग़ज़ल में कहते हैं कि ‘‘शेख करता तो है मसजिद में खुदा को सजदे, उसके सजदो में असर हो ये जरूरी तो नहीं’’ तो साफतौर पर मसजिद से उठती अजान की आवाज सुनाई पड़ती है।

बहरहाल, इन थोड़े बहुत मतभेदों के बावजूद तब ग़ज़लें सुनना और ग़ज़लों के साथ-साथ क्लासिकल सुनना हम लोगों का पेशा बनता जा रहा था। कॉलेज के दूसरे बरस में मुझे आज तक याद नहीं कि फिजिक्स के घंटे में कौन से प्रोफेसर आते थे क्योंकि उनका घंटा लंच के बाद का होता था और लंच के बाद मैं, अमिताभ व विनोद नियम से कॉलेज से भागकर ग़ज़लें सुनने का प्रोग्राम बनाते थे। मुन्नी बेगम, अनूप जलोटा व जगजीत की अपनी-अपनी प्राथमिकताओं के बाद मेंहदी हसन हम सबकी साझा पसंद थे और इस क्रम में बेगम अख्तर, तलत मेहमूद, मलिका पुखराज, गुलाम अली, नीना व राजेंद्र मेहता, राजकुमार रिजवी, परवेज मेंहदी, अहमद व मोहम्मद हुसैन, चंदन दास और राहत अली व उषा टंडन आदि कई नाम थे। ग़ज़लों के कैसेट जुटाने की होड़-सी लगी रहती थी और किसी के हाथ में कोई नया कैसेट आ जाये तो वह अपने-आपको तुर्रम-खां समझने लगता था।

कॉलेज छूटने के तुरंत बाद अमिताभ व विनोद को कोरबा में नौकरी मिल गयी थी। मैं एक साल का जूनियर था व कुछ दिनों तक नौकरी के लिये भटकता रहा था। ग़ज़ल सुनने के अलावा मेरी एक खासियत यह थी कि मैं अंडा व चिकन करी-कहते हैं कि - बहुत उम्दा बनाया करता था, इसलिए अक्सर कोरबा पहुंच जाता व अमिताभ और विनोद मेरा खुलकर स्वागत किया करते थे। यहीं पर आकर मुझे एक बड़े कांप्लेक्स से छुटकारा भी मिला था। मैं छोटे-से कस्बे से भिलाई आया था जो उन दिनों छत्तीसगढ़ का आधुनिकतम शहर माना जाता था। अमिताभ एक डुपलेक्स में रहते थे और घर में सोफा, फ्रीज-आदि लकदक चीजें हुआ करती थीं। मैं हिंदी के नावेल पढ़ता था और वे अंग्रेजी के। तो मन में कहीं पर हीनता का बोध था और अच्छी मित्रता के बावजूद बना रहा। जब कोरबा पहुंचा तो अमिताभ व विनोद का किचन इतना गंदा था कि उतना गंदा कीचन मैंने अपनी जिंदगी में नहीं देखा था। इससे मुझे अपने कांप्लेक्स से छुटकारा मिल गया और अंडा व चिकन करी के साथ ग़ज़लों को सुनने का सिलसिला एक बार फिर से शुरू हो गया। इसके लिये अमिताभ ने या विनोद ने उन दिनों का फिलिप्स का सबसे महंगा ‘डेक’ मंगाया हुआ था।

वहां अमिताभ के किसम-किसम के मित्र आया करते थे, जिनके भांति-भांति के किस्से हुआ करते थे। एक बदायूं के लल्ला थे। क्रिकेटर मुदस्सर नजर को मुजफ्फर नगर कहते थे और जगजीत सिंह-चित्रा सिंह के नाम का उच्चारण उन्हें बेहद कठिन लगता था, कहते थे, ‘‘जगजीत सिंह-चलचित्र सिंह।’’ तो मैंने पाया कि बदायूं के लल्ला एक बार बड़े ध्यान से मेंहदी हसन साहब को सुनने में लगे हुए हैं। हैरानी हुई कि इन्हें ग़ज़लों का चस्का कब से लग गया? मेंहदी हसन साहब बार-बार लफ्जों को रिपीट कर ग़ज़ल का मूड बना रहे थे। अहमद फराज साहब की मशहूर ग़ज़ल थी-‘‘रंजिश ही सही दिल ही दुखाने के लिये आ’’ और शेर था ‘‘जैसे तुम्हें आते हैं न आने के बहाने, ऐसे ही किसी रोज न जाने के लिये आ।’’ मेहदी हसन साहब ‘‘जैसे’’ को बार-बार रिपीट कर रहे थे और बदायूं के लल्ला कान लगाकर बड़े ध्यान से सुन रहे थे। जब तक मेंहदी हसन साहब अगले शेर तक पहुंचते लल्ला ने जोर से कहा ‘‘बत्तीस।’’ हमने कौतूहल से पूछा, क्या बत्तीस?’ तो लल्ला ने कहा कि मेंहदी हसन ने 32 बार "जैसे" कहा।

एक बंगाल से आये हुए कोई दादा थे, जिन्होंने मुझसे गोपनीय तौर पर पूछा था कि ‘‘ये ग़ज़ल गायक क्या डायरी लेकर नहीं चलते, अगली लाइन भूल जाते हैं और बार-बार पिछली लाइन को रिपीट करते हैं?’’ कल्याण जी आनंद जी के एक भक्त ने पूछा कि ‘‘मेंहदी साहब सीनियर हैं, या हसन साहब?’’

लब्बो-लुआब यह कि ग़ज़लों की पापुलरटी उस दौर में परवान चढ़ रही थी और यह महज एक संयोग था कि ग़ज़ले एक खास अरसे में -अस्सी के दशक में- संयोग से तब तक पापुलर रहीं जब तक अमिताभ व मेरा एक-दूसरे के यहां नियमित आना जाना लगा रहा। मैं अपने कस्बे के जिस मकान में रहा करता था वह पहली मंजिल पर था और लकड़ी से बनी चौखट व झिरियों से हवा खूब तेजी के साथ आया करती थी। इसलिए अमिताभ ने इस घर का नाम ‘हवा महल’ दे रखा था। नौकरी में आने के बाद जब मुझे पहला बोनस मिला तो मैंने जोड़-गांठकर फिलिप्स का ‘पॉवर-हाउस’ खरीदा जो उन दिनों काफी अच्छा सेट माना जाता था और अपने नाम के मुताबिक बेचारा रात-दिन खटता रहता था। अमिताभ जब ‘हवा-महल’ में आते तो बेचारे पावर-हाउस के काम के घंटे कुछ और भी बढ़ जाते थे व अगले दिन पड़ोसी हमें कुछ बदली हुई निगाह से देखते थे। कभी-कभी हम एक पूरा दिन किसी एक कलाकार के नाम समर्पित कर देते थे, मसलन-‘‘ए डे विद कुमार गंधर्व" और तब सारा दिन केवल कुमार साहब को ही सुना जाता था। कभी पंडित जसराज जी को कष्ट देते तो कभी भीमसेन जोशी को, कभी जगजीत साहब को तो कभी राजकुमार रिजवी को।

पीछे किचन में चावल की हंडिया आखिर में चढ़ायी जाती थी क्योंकि लंगर में खाना खाने के लिये आने वालों की तादाद पहले से तय नहीं होती थी। एग करी के लिये उचित व पर्याप्त मात्रा में शोरबा पहले तैयार कर लिया जाता था और चावल के साथ अंडे सबसे आखिर में उबाले जाते थे, जब मोटे तौर खाने वालों की संख्या का अनुमान लग जाया करता था। उन दिनों हमारे एक मित्र सुधाकर हुआ करते थे जो खाने के मामले में आखिर तक छोर संभाले रखते थे और ऐसा माना जाता था कि मोहल्ले के कुत्तों के दुबले होने में सुधाकर का बड़ा हाथ था, क्योंकि वह हंड़िया में चावल का एक दाना भी नहीं छोड़ते थे। यही सुधाकर जब एक बार खाना चढ़ जाने की अंतिम प्रक्रिया की शुरुआत में आये तो अमिताभ को चावल लाने के लिये भेजना पड़ा। मस्तमौला अमिताभ झोला थामे उस दुकान में पहुंचे जहां से अपने यहां नियमित राशन आता था और जहां अपना खाता चलता था। दुकानदार ने अमिताभ से कहा कि ‘‘साहब, एक बढ़िया क्वालिटी का चावल आया है, लंबे-लंबे दाने हैं...।’’ अमिताभ ने पूछा ‘‘क्या बहुत लंबे दाने हैं?’’ दुकानदार ने कहा, ‘‘हां साहब, काफी लंबे दाने हैं।’’ अमिताभ ने कहा, ‘‘ठीक है, 15 मीटर दे दीजिये!’’

तो यह वह दौर था जब ग़ज़लों को ऐसी पापुलरटी मिली हुई थी, जो दोबारा संभव नहीं लगती। शादी -ब्याह में, आकेस्ट्रा में, गणेशोत्सव में, दुर्गा पूजा में ग़ज़ले बजा करती थी। पहली बार यह मिथ टूटा कि फिल्मी मौसिकी ही असल मौसिकी हुआ करती है और इस मिथ को तोड़ने में जगजीत सिंह साहब के साथ कुछ और नाम बावस्ता थे। मसलन पंकज उधास, जो गीतनुमा ग़ज़लें गाने के बाद भी इस विधा के साथ सतत जुड़े रहे। गुलाम अली, जिनकी आवाज लोगों ने ‘निकाह’ फिल्म के बहाने पहली बार सुनी थी और जो रातो-रात हिंदुस्तान की बहुसंख्य जनता के मानस में बस गये थे। ‘‘चुपके-चुपके’ व ‘गुलाम अली’ एक दूसरे का पर्याय बन गये थे। अनूप जलोटा, जिनके बारे में कम लोगों को पता है कि रेकार्डों की बिक्री के लिये सबसे ज्यादा ‘गोल्ड’ व ‘प्लेटिनम डिस्क’ हासिल करने का विश्व रिकार्ड इन्हीं के नाम है, ये बात और है कि भारत सरकार ने इन्हें आज तक पद्मश्री के लायक भी नहीं समझा। पर हिंदुस्तान में गैर -फिल्मी मौसिकी की मशाल जलाये रखने में लीडर का काम निःसंदेह जगजीत साहब ने ही किया।

गैर फिल्मी संगीत को लोकप्रियता दिलाने में एक नाम और है, जिनके जिक्र के बगैर यह फेहरिस्त अधूरी रहेगी। लेकिन यह नाम किसी कलाकार का नहीं है, बल्कि एक धंधेबाज का है, जिसने विशुद्ध व्यवसाय करते हुए भी कुछ काम ऐसे कर डाले जिसने संगीत जगत में उथल-पुथल मचा दी। जी हां, मैं गुलशन कुमार की बात कर रहा हूं। गैर फिल्मी संगीत को लोकप्रिय बनाने में ऊपर मैंने जिन लोगों का जिक्र किया है, गुलशन कुमार का योगदान उनसे कमतर नहीं हैं क्योंकि इन सभी नामों के सामने आने में माध्यम का काम ‘टी-सीरिज’ ने ही किया था। एच.एम.वी. जैसी नामी कंपनी तब गुणवत्ता के आधार पर कैसेट के दाम तय करती थी और जब इसने ‘‘कोबाल्ट’’ नाम की एक सीरिज निकाली को तो ग़ज़लों व शास्त्रीय संगीत के कैसेटों के दाम 65 रुपये से बढ़ाकर 75 रुपये कर दिये, जबकि ‘टी-सीरिज’ लगभग इसी गुणवत्ता के साथ अपने कैसेट्स को 15 रुपयों में बेच रही थी और यही वजह थी कि जगजीत सिंह जैसे गायक, जो पहले एक खास वर्ग में ही सुने जाते थे अब मध्यमवर्गीय परिवारों में भी पहुंचने लगे थे।

जारी

लेखक दिनेश चौधरी पत्रकार, रंगकर्मी और सोशल एक्टिविस्ट हैं. सरकारी नौकरी से रिटायरमेंट के बाद भिलाई में एक बार फिर नाटक से लेकर पत्रकारिता तक की दुनिया में सक्रिय हैं. वे इप्‍टा, डोगरगढ़ के अध्‍यक्ष भी हैं. उनसे संपर्क This e-mail address is being protected from spambots. You need JavaScript enabled to view it के जरिए किया जा सकता है.


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Comments (5)Add Comment
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written by HARISH, April 24, 2013
very good job
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written by Rakesh Bhilai, September 30, 2011
asif khan bhai aap achcha aur gambhir sahitya padhana chchod den. Champak, Chandamama, Chacha Choudhari aur sabu jaise comix padhen. Chchote Bachchon ke liye we achchi pustaken hain. Sorry.
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written by asif khan, September 28, 2011
सर जी पूरा नहीं पढ़ पाया। बहुत बोझिल हो गया। अगली बार कम शब्दों के जरिये छोटा लेख लिखने की कृपा करे। पाठकों पर मेहरबानी होगी। धन्यवाद
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written by धीरेन्द्र पाण्डेय , September 28, 2011
बहुत खूब पुरानी यादे तजा कर दी बिलकुल यही दीवानगी हम लोग किया करते थे और शायद आज भी करते है पर अब दोस्तों कि महफ़िल नहीं नसीब है
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written by mohd. zakir hussain , September 28, 2011
chha...gaye dinesh bhai.... khaas kar aapki is puri "ghazal" ka yeh sher कल्याण जी आनंद जी के एक भक्त ने पूछा कि ‘‘मेंहदी साहब सीनियर हैं, या हसन साहब?’’ maine kuch dosto se bhi share kiya. aapka likha padh kar shayad ham jaise logo ko bhi likhne ki kuch tameez aa jaye.

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