जगजीत सिंह बरास्ते अमिताभ (दो)

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दिनेश चौधरीजगजीत सिंह साहब की महानता केवल इतने में नहीं है कि वे अच्छा गाते हैं या अच्छा गाते हुए वे बहुत ज्यादा लोकप्रिय भी हुए। बड़ी बात यह है कि उन्होंने ग़ज़ल गायन को एक संस्थागत रूप प्रदान किया और किसी रिले रेस की तरह वे अन्य गायकों को अपने साथ जोड़ते चले गये। दूसरे स्थापित गायकों की तरह उन पर कभी भी यह आरोप नहीं लगा कि उन्होंने किसी नवोदित ग़ज़ल गायक के रास्ते में कोई बाधा खड़ी की हो।

उल्टे वे स्वयं नये गायकों की तलाश में लगे रहे और तलत अजीज, घनश्याम वासवानी व विनोद सहगल जैसे गायकों को पहचान दिलाने में मदद की। स्वयं जगजीत सिंह राजस्थान के श्रीगंगानगर में आशा सिंह मस्ताना की एक सभा में बतौर लोकल आर्टिस्ट पेश किये गये थे और यहां पर काफी वाहवाही मिलने के बावजूद उन्हें खुद को स्थापित करने में खासा संघर्ष करना पड़ा था। जगजीत के संघर्ष की थोड़ी-बहुत कहानी आप रवीन्द्र कालिया की ‘‘गालिब छुटी शराब’’ में पढ़ सकते हैं। मैंने बहुत सारे लेखकों व नामी-गिरामी लोगों की अत्मकथायें पढ़ी हैं, पर रवीन्द्र कालिया ने जितनी बेबाकी से अपने कमीनेपन व गुस्ताखियों के बारे में लिखा है, वह बेमिसाल है। जगजीत वाला वह प्रसंग तो और भी मजेदार हैं जिसमें दारू की झोंक में वे चित्रा सिंह को ग़ज़ल गाना छोड़कर रवीन्द्र संगीत गाने की सलाह देते हैं।

जगजीत सिंह साहब का जिक्र समकालीन ग़ज़ल गायकी के जिक्र के बगैर पूर नहीं हो सकता। इसका विलोम भी उतना ही सत्य हैं। मैंने पहले भी अर्ज किया है कि मैं इस बहाने उस पूरे दौर को याद करना चाहता हूं, जिस दौर में ग़ज़ल गायकी हिंदुस्तान में परवान चढ़ी और केवल एक सक्रिय श्रोता के रूप में मैं इस पूरे दौर का चश्मदीद गवाह रहा। इस दौर में एकाध सतीश बब्बर जैसे गायक भी आये जो ग़ज़ल गाते हुए बाकायदा भावाभिनय करते थे और वह भी इस हद तक कि टेलीविजन पर उन्हें देखते-सुनते हुए मुझे कई बार ऐसा भी महसूस हुआ कि ग़ज़ल में सोने का जिक्र आने पर कहीं वे सचमुच में सो ही न जायें। उनकी गायी एक ग़ज़ल ‘‘इनायत कम, मोहब्बत कम, वफा कम/ मिला सब कुछ हमें लेकिन, मिला कम’’ थोड़ी पापुलर भी हुई थी। लेकिन बहुत सारे नाम जो इस दौर में उभरकर आये थे वे बेहद संजीदा ग़ज़ल गायक साबित हुए।

नीना व राजेंद्र मेहता की जोड़ी तो खैर साठ के दशक के उत्तरार्द्ध में ही सामने आ गयी थी। युगलगान का यह प्रयोग थोड़ा जोखिम भरा इसलिए माना जा सकता है कि ग़ज़लों में विरह का रंग कुछ ज्यादा ही उभरकर सामने आता है और श्रोता दोगाने के रूप में इसके साथ तादाम्य बिठा पाता है अथवा नही, यह किसी भी गाने वाले के लिये चिंता का विषय हो सकता है। विरह वेदना का एक मजेदार पहलू यह है कि सारा हिंदी काव्य नायिका के विरह वर्णन से अटा हुआ है और संभवतः सखी वगैरह का ढकोसला खुद कवियों का पाला हुआ है। नायिका अपने से कमउम्र चचेरी या ममेरी बहनों को हड़काकर उनकी सेवायें लेती रही होंगी, ताकि चिट्ठी-पत्री भिजवाई जा सके। कोई अपनी सखी पर  भरोसा कैसे कर सकता है?

इस मामले में उर्दू शायरी वालों ने जरा ईमानदारी दिखाई हैं जहां विरह की  पीड़ा से हर जगह नायक ही जूझता हुआ नजर आता है और अपने किसी भी ‘सखा’ पर भरोसा नहीं करता क्योंकि उसके ‘रकीब’ हो जाने का खतरा हर वक्त मंडराता रहता है। इसलिए रात की तनहाई में वह अपनी विरह वेदना सितारों से व्यक्त करता है और कहता है कि ‘‘हमें तो आज की रात पौ फटे तक जागना होगा/ अभी कुछ बेकरारी है, सितारो तुम तो सो जाओ।’’ यानी नायक की विरह वेदना के साथ तनहाई का पहलू अपने आप जुड़ा हुआ है और मुझे लगता है कि कुछ गायिकाओं के नामों को अपवाद के तौर पर छोड़ दिया जाये तो ग़ज़लों में मेल सिंगर का ही प्रभुत्व इसी वजह से कुछ ज्यादा है। बावजूद इसके आगे चलकर चित्रा-जगजीत, मिताली-भूपिंदर, इंद्राणी - राजकुमार रिजवी, सोनाली - रूपकुमार राठौर आदि कई जोड़ियां आईं लेकिन उल्लेखनीय सफलता केवल चित्रा-जगजीत को हासिल हुई। नीना व राजेंद्र मेहता को बहुत अच्छा गाने के बाद भी वैसी शोहरत हासिल नहीं हुई, जिसके वे वास्तविक हकदार थे। वरना आज भी उनकी गायी हुई ग़ज़ल ‘‘ कुछ मुझको दोस्तों में नुमायां तो कर गयीं/वो गर्दिशें पहुंचकर जो मुझ तक ठहर गयीं’’ सुनकर रोंगटे खड़े हो जाते हैं।

राजकुमार रिजवी का जिक्र भी मैं बहुत तकलीफ के साथ करता हूं। गैर फिल्मी संगीत जगत ने उनके साथ वही सलूक किया है जो फिल्म संगीत वालों ने मन्ना दा के साथ किया। ग़ज़ल को ग़ज़ल के असल अंदाज में गाने वाले राजकुमार रिजवी -कैलिबर, गायकी या अदायगी- किसी में भी जगजीत साहब से कमतर नहीं थे, पर पता नहीं क्यों उन्हें श्रोताओं ने हाथों-हाथ नहीं लिया। मुझे तब अपार पीड़ा हुई थी जब किसी ने बताया कि राजकुमार रिजवी साहब किसी रियलिटी शो में बतौर प्रतियोगी शामिल हुए थे। मुझे तो यह भी नहीं पता कि यह सूचना सही है अथवा गलत, लेकिन यदि सही है तो कहा जा सकता है कि ‘‘कुछ तो मजबूरियां रही होंगी...।’’ राजकुमार रिजवी को हिंदुस्तान का मेहदी हसन कहा जाता है और ऐसा कहना गलत भी नहीं है। ‘‘तूने ये फूल जो जुल्फों में सजा रक्खा है’’ से लेकर ‘‘हुस्ने-बेबाक ने ये कहकर उड़ाया आंचल’’ जैसी ग़ज़लें यदि आपने आज तक न सुनीं हों तो मेरा नेक मशविरा है कि बराहे-करम यू-ट्यूब में जायें और उन्हें सुनकर बतायें कि आप मेरी राय से इत्तेफाक रखते हैं अथवा नहीं।

रिजवी साहब गायकी व रिश्ते दोनों ही में मेंहदी हसन के घराने से हैं व मेंहदी हसन साहब के न गा पाने की वजह से जो शून्य पैदा हुआ है, उसे बखूबी भर रहे हैं - ये बात और है कि लोग उनका नोटिस नहीं ले पा रहे हैं। मेंहदी हसन साहब की रिक्तता को भरने का काम कुछ दूसरे रूप में उस्ताद हुसैन बख्श भी कर रहे हैं। मेंहदी हसन साहब -अल्लाह उनको लंबी उम्र बख्शे-खराब स्वास्थ्य की वजह से नहीं गा पा रहे हैं और ‘सदा-ए-ईश्क’ के बाद उनका कोई नया अलबम सामने नहीं आ सका। उनकी माली हालत भी ठीक नहीं बतायी जाती है और यह जगजीत सिंह ही थे जिन्होंने पाकिस्तान जाकर न सिर्फ उनकी खैरियत पूछी बल्कि उन्हें आर्थिक मदद भी दी।

जो पीढ़ी जगजीत साहब के बाद ग़ज़ल के फलक में आयी उनमें बहुत सारे नाम शामिल हैं, पर फिलहाल मैं इनमें से एक का जिक्र करना चाहता हूं। दरअसल अस्सी के दशक में जब ‘निकाह’, ‘प्रेमगीत’, ‘अर्थ’, ‘साथ-साथ’ व ‘उमराव जान’ जैसी फिल्मों की ग़ज़लों ने अपार सफलता हासिल की तो इस बहाव में बहुत से गायक ऐसे भी आए जो सिर्फ धारा की साथ ही तैर सकने का जज्बा रखते दिखाई पड़ते थे। उस दौर में तलत मेहमूद साहब ने एक इंटरव्यू में कहा कि यह जो ग़जल गायकों की भीड़-सी आयी हुई है, उसमें मुझे सिर्फ कलकत्ते का एक लड़का ही संजीदा दिखाई पड़ता है। कलकत्ते का यह ‘लड़का़’ चंदन दास थे, जिनके पहले अलबम ‘‘इंट्रोड्यूसिंग चंदन दास’’ में कमाल की ग़ज़लें थीं - कुछ अमीर कजलबाश की तो कुछ बशीर बद्र की। चंदन दास की आवाज भी ग़ज़ल के नाजुक मिजाज से मेल खाती हुई थी। दूसरी बात यह कि ग़ज़ल के शेर का राज काफिये (तुक) पर जाकर खुलता है। मजा तो तब है जब काफिया सुनने के बाद रदीफ़ (तुकांत) अपने आप श्रोता के मुख से निकल जाये। काफिये पर हल्का-सा झटका देकर रदीफ़ निकलवाने व अपनी ग़ज़ल को एक तरह से इंट्रैक्टिव बनाने की यह कला चंदन दास में बखूबी नजर आयी।

इन्हीं चंदन दास का प्रोग्राम कोरबा में तब हुआ जब मैं संयोग से अमिताभ के यहां डेरा डालकर बैठा हुआ था। मित्रों के साथ योजना बनी कि चंदन दास को लाइव तो सुनना ही है, उनसे जाकर मिलना भी है व उनका एक बढिया-सा इंटरव्यू भी किया जाये।

...जारी...

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लेखक दिनेश चौधरी पत्रकार, रंगकर्मी और सोशल एक्टिविस्ट हैं. सरकारी नौकरी से रिटायरमेंट के बाद भिलाई में एक बार फिर नाटक से लेकर पत्रकारिता तक की दुनिया में सक्रिय हैं. वे इप्‍टा, डोगरगढ़ के अध्‍यक्ष भी हैं. उनसे संपर्क This e-mail address is being protected from spambots. You need JavaScript enabled to view it के जरिए किया जा सकता है.


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Comments (2)Add Comment
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written by sarabjeet, October 05, 2011
very nice jagjit singh ki gajlo ka koi jabab nahi hai or vah ek lajabab gajal gayak hai puri dunia hi is gajal smarat ke thik hone ki duava kar rha hai.......
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written by KUNAL CHAKRAVERTHY, October 01, 2011
बहुत ही उम्दा लेख है सर जी !smilies/smiley.gif

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