‘जारकर्म की अपनी द्विज परम्परा पर फिल्म बनाएं प्रकाश झा’

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पहले हम फिल्म से बाहर दिए वक्तव्यों पर बात करते हैं। एक बात और, हम अमिताभ को आरक्षण फिल्म के किरदार प्रभाकर आनंद के रूप में नहीं बल्कि अमिताभ बच्चन के रूप में जानते हुए बात कर रहे हैं। क्योंकि, सारी दुनिया में जब भी उन के अभिनय या वक्तव्यों की बात की जाती है तो लोग इसे अमिताभ के कहे के रूप में सुनते-बतियाते हैं। फिल्म से बाहर भी जब ‘आरक्षण फिल्म’ की चर्चा हो रही है तो लोग यही कह रहे हैं, अमिताभ ने ये कहा- अमिताभ ने वो कहा।

इस कड़ी में अमिताभ को इंटेलेक्चुएल दिखाने की कोशिशें भी शुरू हो गई हैं। अभी हाल ही में प्रसिद्ध शायर शहरयार को अमिताभ के हाथों ज्ञानपीठ सम्मान दिलवाया गया। खबरों में, शहरयार की बात कम अमिताभ के कथन ज्यादा छाए रहे। बताइए, सम्मान शहरयार को, खबर का केन्द्र अमिताभ। इस तरह, एक तरह अमिताभ को बौद्धिक दिखाया जा रहा है, दूसरी तरफ उन्हें महानायक दर्शाया जाता है। कल को इन्हीं कथित महानायक से प्रक्षिप्त परम्परा के तहत आरक्षण विरोधी वक्तव्य दिलवाने शुरू कर दिए जाएंगे। इसी तरह के कुत्सित प्रयास ‘लगान’ फिल्म में कथित दलित पात्र को ले कर भी किए गए थे। बताइए, जहां फिल्मों का दलित जीवन से किसी भी तरह का सम्बंध नहीं, वहां बौद्धिकता का नाटक कर के फिल्मकार दलित जीवन से खेलना चाहते हैं।

अमिताभ बच्चन ने फिल्म ‘आरक्षण’ के संदर्भ में एक वक्तव्य में कहा है कि ‘फिल्म इंडस्ट्री में किसी तरह का आरक्षण नहीं है। यहां ज्यादा स्वस्थ प्रतिस्पर्धा है।’ इस वक्तव्य के बहाने अमिताभ ने फिल्म से बाहर ‘आरक्षण’ पर अपने वक्तव्य से भारतीय संविधान द्वारा निर्धारित और मान्य आरक्षण व्यवस्था पर कटाक्ष किया है। इतना ही नहीं अमिताभ ने इस पर बहस को आमंत्रित किया है। अब अमिताभ को कौन समझाए कि बहस-विमर्श उन का क्षेत्र नहीं है? यह तपते अंगारों का क्षेत्र है, जिस पर नंगे पांव चलना पड़ता है। लेकिन क्या करें, वह जिस कायस्थ परम्परा से आते हैं वह है ही बड-बोलों की। इस परम्परा के महानायक प्रेमचंद को कौन नहीं जानता, जो महान दार्शनिक डा. धर्मवीर के चिन्तन में दम तोड़ चुके हैं।

अमिताभ को पता होना चाहिए कि फिल्में मात्र मनोरंजन का साधन हैं। और हिन्दी फिल्में तो भडैंती का अवतार हैं। इन फिल्मों के नायक को अपनी सीमा का ध्यान रखते हुए केवल फिल्म के बारे में बात करनी चाहिए। लेकिन क्या करें, वे एक ब्राह्मण प्रकाश झा के चक्कर में ऊल-जुलूल बोल गए हैं। क्या अमिताभ को उन दलितों के मर्म का पता भी है, जिन्हें भारतीय संविधान ने आरक्षण दिया है? क्या अमिताभ बाबा साहेब डा. भीमराव अम्बेडकर और गांधी जी के बीच हुए पूना पैक्ट के बारे में कुछ जानते हैं? और क्या उन्हें संविधान सभा के सदस्यों की बौद्धिकता के बारे में कुछ पता भी है? अगर नहीं, तो उनकी चुप रहने में ही भलाई है। अन्यथा, अंगारों से भरा क्षेत्र खुला है। वे बार-बार अपने पिता हरिवंश राय बच्चन की ‘मधुशाला’ की पंक्तियों से वाह-वाही लूटते हैं। क्या अमिताभ को बताना पड़ेगा कि ‘मधुशाला’ किस की नकल है? स्वयं अमिताभ ने नकल के धन्धे को चुना है। इसलिए, बेहतर होगा कि वे अपने धन्धे तक सीमित रहें। जब दलित-विमर्श ने कायस्थ प्रेमचंद को कहीं का नहीं छोड़ा और द्विज जार परम्परा को उस की नाभि से पकड़ लिया, ऐसे में हवाई बातें करने वालों की फिल्मी परम्परा को हवा में उड़ाने में कितनी देर लगेगी?

क्या अमिताभ को मालूम है कि प्रख्यात फिल्म गीतकार शैलेन्द्र, जिन्होंने एक से बढ़ कर एक गीत लिखे हैं, वे चमार थे? अब अमिताभ कहेंगे, भई, मैं यही तो कहना चाह रहा हूँ कि फिल्मों में जाति नहीं देखी जाती, यहाँ कोई आरक्षण नहीं। तो अमिताभ जी को बताया जा रहा है कि दलित-विमर्श चाहता है कि यह बताया जाए और सब को पता हो कि शैलेन्द्र चमार थे और सुखविन्दर सिंह, मिक्का, हंसराज ‘हंस’ भी दलित ही हैं। ऐसे ही, हमारे जिन दलितों की फिल्म इंडस्ट्री में किसी तरह की भी कोई भूमिका है वह उन की पहचान के साथ आनी चाहिए। तब देखते हैं कि फिल्म इंडस्ट्री कितनी लोकतांत्रिक या मानवीय है? सारी दुनिया जानती है कि अमिताभ बच्चन कायस्थ हैं और फिल्मों में वे अपना सरनेम श्रीवास्तव रखना पसन्द करते हैं। यह है अमिताभ का जातीय पहचान ना दिखाने का तरीका? अमिताभ को सलाह है कि वे एक बार किसी फिल्म में अपना नाम भंगी या चमार रख लें और उस पीड़ा को महसूस करें, जो इन जातियों के साथ बरती जाती है। आप के पैरों के नीचे से जमीन निकल जाएगी। हो सके तो चमार या भंगी शीर्षक से किसी फिल्म में काम भी कर लें। इस में यह भी ध्यान रखें कि फिल्म की कहानी श्यौराज सिंह ‘बेचैन’ या सूरजपाल चैहान की लिखी हो, किसी पंडत की लिखी कहानी नहीं चलेगी। हाँ, प्रेमचन्द की लिखी कहानी का तो कोई सवाल ही नहीं है।

इधर अमिताभ फिल्म इंडस्ट्री में आरक्षण से इनकार कर रहे हैं, उधर मोहल्ला लाइव में ‘बॉलीवुड के इन परिवारवादी गुंड़ों को एक धक्का और दो’ (11 दिसम्बर 2010) शीर्षक के तहत आए लेख में निर्देशक अनुराग कश्यप ने लिखा है – ‘‘बॉलीवुड में आपका स्वागत है। यहां मेहनत, जुनून, क्षमता और प्रतिभा पर ये सच भारी पड़ता है कि आप किसके बेटे हैं।’’ अब अमिताभ क्या कहेंगे? फिर, यह भी सुना गया है कि अमिताभ के इंडस्ट्री में आने से पहले, उन के पिता हरिवंश राय बच्चन का नाम वहां उन से पहले पहुंच गया था। अब अमिताभ ही बताएं कि अभिषेक बच्चन कैसे फिल्म इंडस्ट्री में टिकाए हुए हैं? अमिताभ की मेहनत से कौन इनकार करता है, लेकिन अभिषेक? एक फ्लाप हीरो किस तरह से आरक्षित किया गया है? अमिताभ को इस आरक्षण के खिलाफ अपनी ताकत लगानी चाहिए, न कि संवैधानिक आरक्षण के खिलाफ। संविधान प्रदत्त आरक्षण से नौकरियों में आने वाले दलित, प्रतियोगी परीक्षाओं में चुन कर आते हैं। अगर किसी का पिता आईएएस या क्लर्क है तो उस के बेटे या बेटी को नौकरी में आने के लिए अपने पिता से ज्यादा मेहनत करनी पड़ती है। ऐसे नहीं कि फिल्म इंडस्ट्री की तरह किसी फ्लाप हीरो का बाप उसे लगातार प्रमोट करता रहे। राजनीति और नौकरियों में आरक्षण को जानने के लिए अमिताभ और अन्य ऐसे आरक्षण विरोधियों को समाज-व्यवस्था को जानना होगा।

इसलिए बेहतर होगा कि अमिताभ ऐसे विषयों पर सोच समझ कर बोलें। लगे हाथ अमिताभ को यह भी बताया जा रहा है कि वे जिन दर्शकों की वजह से सुपर-स्टार बने हैं, उन में अधिकांश मजदूर, रिक्शेवाले, कुली, सफाई करने वाले, जूते पालिश करने वाले आदि दलित ही हैं, उन्होंने कभी नहीं सोचा कि वे कायस्थ अमिताभ बच्चन श्रीवास्तव की फिल्में देख रहे हैं। जिस ‘नव मिडिल क्लास मानसिकता’ की बातें अमिताभ कर रहे हैं, वह तो अमिताभ की फिल्मों से नाक-भौं सिकोड़ता है। तो अमिताभ जी, दलितों के दुख-दर्द पर्दे पर अभिनीत करने के बाद आप जरा इन की वास्तविक जिन्दगी में भी प्रवेश कर के देखिए, फिर आप इस तरह की स्टेटमेंट नहीं दे पाएंगे।

आरक्षण फिल्म के संदर्भ में ही दिए गए एक इंटरव्यू में अमिताभ ने पिता की तरफ से खुद को कायस्थ ब्राह्मण बताया है और माँ की तरफ से सिख। (देखें, अमिताभ बच्चन से ज्योथि वेंकेटश का इंटरव्यू, http://www.cineview.com) अमिताभ के ‘आरक्षण-विरोध’ की सारी हकीकत इस स्टेटमेंट से खुल जाती है। पाठक अमिताभ का विरोधाभासी चेहरा देख सकते हैं। अमिताभ को खुद को ब्राह्मण या कायस्थ ब्राह्मण कुछ भी मानने पर क्या कहें? लेकिन अगर सही में अमिताभ अपनी पहचान को ले कर चिंतित हैं तो उन्हें डा. धर्मवीर लिखित ‘प्रेमचंद की नीली आँखें’ पढ़ लेनी चाहिए, पहचान सामने आ जाएगी। उन की सारी समस्याओं का समाधान हो जाएगा। फिर अमिताभ ने अपनी माँ को जिस धर्म का बताया है, उन्हें पता होना चाहिए कि वह सिख धर्म हमारे दलित (आजीवक) सदगुरुओं रैदास-कबीर से सीख-समझ कर सामने आया है। अब यह अमिताभ के ऊपर है कि वह द्विज जार परम्परा को मानते हैं या आजीवकों की सदाचार की परम्परा को।

अब थोड़ी बात फिल्म के दृश्यों को ले कर कर ली जाए। कास्टिंग में आरक्षण अंकित मुहर से पात्र परिचय कराया गया है। इस के बैक-ग्राउंड में मातमी संगीत बजाया गया है। यह उच्च जातियों को भड़काने का कुत्सित प्रयास है। माहौल ऐसा बनाया गया है जैसे मंडल कमीशन के समय बनाया गया था। सिनेमा-हालों में एक तरह से आरक्षण-विरोधी माहौल बना दिया जाता
है। पहले ही दृश्य में, दलित हीरो इंटरव्यू देने के लिए आता है। वहां उस से बार-बार बाप का नाम और सरनेम पूछा जा रहा है। हीरो, सरनेम और बाप का नाम बताने की बजाय भड़क रहा है। क्यों? प्रकाश झा क्या बताना चाहते हैं? हीरो गुस्से और आवेग में आ कर पैर पटकता हुआ चला जाता है कि इंटरव्यू लेने वाले उस की जात पूछना चाहते हैं। झा क्या कहना चाह रहे हैं? सर्वप्रथम तो, नायक को अपने बाप का नाम बताना चाहिए था और फिर अपनी जात। हमारे महान सदगुरु तो पहले ही कह गए हैं - जात जुलाहा नाम कबीरा।। और - कह रैदास खलास चमारा।।

बताइए, फिल्म के दलित नायक से जात छुपवाई जा रही है। यहाँ बताया जा रहा है कि जात छुपाना ही हीनता का कारण है। दलित को हर जगह ऊँचे स्वरों में बताना चाहिए कि वह चमार है या भंगी फिर देखिए, कैसे जात पूछने वाले छू-मंतर हो जाते हैं। हीरो से बाप का नाम न कहलवा कर प्रकाश झा ने अपनी द्विज जार परम्परा का असली चेहरा सामने ला दिया है, जिस में बच्चे का बाप कोई होता है और पालता कोई है। दलित आजीवक परम्परा में सब का वैध पिता होता है, नहीं होता तो द्विज परम्परा के शरण कुमार लिम्बाले, कर्ण या व्यास का बाप। यूं यह फिल्म लिम्बाले की कहानी लगती है। फिल्म के एक दृश्य में चोटी वाला ब्राह्मण ‘मौका’ मिलने की बात कहता है। बताइए, ढाई हजार सालों से सारे मौके हड़पे बैठा ब्राह्मण मौका मिलने की बात कह रहा है। अभी तो मुश्किल से दलित को मौका मिलने लगा है, तो इन सुदामाओं को पसीना आ गया है।

अच्छा होता फिल्म के इस पात्र से झा मैला उठवाने या मरे जानवर की खाल उतरवाने का काम करवाते तो थोड़ी ईमानदारी फिल्म में आती। झा ने सुदामा को तो पसीना-पसीना दिखा दिया, लेकिन वे एकलव्य को कैसे भूल गए? फिर फिल्म का मेहनत का मैसेज किसे मंजूर नहीं? दलित ही तो हमेशा से ही मेहनती रहे हैं। असल में, यह मैसेज ब्राह्मण को देना चाहिए था, जो बगैर कुछ किए ‘कर्मकांड’ से अथाह धन पाता है। सही में, हजारों वर्षों से कौव्वे ही तो मोती चुग रहे थे। फिल्म में सब से बड़ा मिथक दिखाया है, अमिताभ बच्चन द्वारा गौशाला में स्कूल खोलना और वहाँ गरीब बच्चों को मुफ्त पढ़ाना। यहां मुफ्त कोचिंग का भ्रम तो है ही साथ ही कहने की कोशिश की गई है कि ‘आरक्षण’ की कोई जरूरत नहीं। कितना बड़ा प्रक्षिप्त गढ़ने की कोशिश की गई है? आजादी के बाद, व्यवस्थित सरकारी प्रयासों के बाद ही देश में आरक्षण नाममात्र ही लागू हो पाया है, वहीं प्रकाश झा मुफ्त कोचिंग का भ्रम दे कर इसे आरक्षण का विकल्प बनाना चाहते हैं? कबीर यूं ही नहीं कह गए – पांडे, कौन कुमत तौहे लागी।

प्रकाश झा तो मुफ्त शिक्षा की बात कर रहे हैं, लेकिन वास्तविक जीवन में क्या चल रहा है। इस के लिए शिक्षक दिवस के दिन 5 सितम्बर 2011 को, ‘जनसत्ता’ के दिल्ली संस्करण में छपी खबर झा को पढ़ लेना चाहिए। कानपुर के गणेश शंकर विद्यार्थी मेडिकल कालेज के द्वितीय वर्ष के तीन दलित छात्रों को आत्महत्या के लिए मजबूर कर दिया गया। सहयोगी छात्रों और उनके परिजनों ने कहा है कि चूंकि वे दलित थे इसलिए उन्हें दो टीचरों द्वारा जबरदस्ती फेल कर दिया गया। इन छात्रों ने अपने सुसाइड नोट में इन दोनों टीचरों के खिलाफ जाति सूचक शब्दों का प्रयोग करने और जबरदस्ती फेल करने की बात लिखी है। अगर अमिताभ बच्चन और प्रकाश झा में थोड़ी सी ईमानदारी है तो वे कानपुर के इस कालेज के बाहर धरने पर बैठें और इन द्रोणाचार्यों को सख्त से सख्त सजा दिलवाने में मदद करें। फिल्म में छुपे रूप में आरक्षण का विरोध है। फिल्म में एक डायलाग है-‘परिवर्तन की कीमत चुकानी पड़ती है।’ बताइए, द्विजों को क्या कीमत चुकानी पड़ रही है? आरक्षण तो दलितों का अधिकार है। अभी तो न्यूनतम आरक्षण लागू है। जिस दिन संपत्ति के तमाम साधनों पर दलितों को उन का पूरा हक मिलेगा, उस दिन सही में आरक्षण माना जाएगा। तब देखते हैं द्विज कितना पाएंगे?

ऐसे ही, फिल्म में अमिताभ का एक डायलाग है- ‘विश्वास पर मदद की थी, मुझे मेरा घर चाहिए।’ परिदृश्य में माहौल आरक्षण विरोधी है। अमिताभ का घर उन के दोस्त के बेटों ने साजिशन कब्जा कर लिया है। ऐसे में अमिताभ का यह डायलाग खतरनाक इशारा करता है। साजिश अमिताभ के दोस्त के बेटों की, कटाक्ष आरक्षण पर। बताइए, उस का आरक्षण से क्या लेना देना? वैसे झा और अमिताभ को बताया जा रहा है कि यह देश मूल निवासियों यानी दलितों का है। दलितों ने आप पर विश्वास ही तो किया था, जो कि आप उन का देश ही हड़प गए। अब हालात यह हैं कि दलितों को द्विजों पर रत्ती भर भी विश्वास नहीं। किरदार अमिताभ की बेटी पूर्बी कहती है – ‘आप के लिए सिद्धांत ही सब कुछ है।’ पता नहीं यहाँ किन सिद्धातों की बात हो रही है? कबीर ने स्पष्ट रूप से आप के इन सिद्धांतों की कथनी-करनी का अंतर पहचाना है और बाबा साहेब डा. भीमराव अम्बेडकर ने इन्हें ‘रिडल’ कहा है। फिर, जैसे फिल्म में एक पात्र (अमिताभ) अच्छा हो सकता है, वैसे ही वास्तविक जीवन में कोई व्यक्ति अच्छा या बुरा हो सकता है। उस का ‘आरक्षण’ से क्या सम्बन्ध? आरक्षण दलितों के समग्र विकास में न्यूनतम उपाय है। अगर आरक्षण के रास्ते में यह अच्छा व्यक्ति रोड़े अटकाता है, तो इस से बुरा व्यक्ति हो ही नहीं सकता।

फिल्म में एक मुद्दा प्रेम को ले कर भी उठाया गया है। अमिताभ को अपनी बेटी के दलित नायक से प्रेम करने पर कोई ऐतराज नहीं। लेकिन यहाँ बताया जा रहा है कि ऐतराज ‘दलित विमर्श’ को है। क्योंकि, जिस दलित बालक-बालिका को उस के माँ-बाप अपनी कमर तोड़ मेहनत से पालते-पोसते हैं, वह प्रेम के चलते ‘द्विजों की जार-परम्परा’ के चक्कर में पड़ जाते हैं। यह आम जीवन में देखा गया है कि द्विज परम्परा की लड़की, दलित लड़के से ब्याह रचा कर उसे उसके घरवालों से अलग करवा देती है। और, अगर दलित लड़की किसी द्विज से प्रेम के नाम पर विवाह कर बैठती है तो वह वहां पूरी जिन्दगी घुट-घुट कर मर जाती है। प्रख्यात चिन्तक डा. धर्मवीर ने अपनी किताब ‘चमार की बेटी रूपा’ में इस के बारे में विस्तार से बताया है। फिल्म के संदर्भ में ही बात करें, तो फिल्म की नायिका पूर्बी को सब कुछ पता होते हुए भी ‘आरक्षण’ पर ऐतराज होता है। वह नायक की भावनाओं को ही नहीं समझ पाती। हम अभी उस द्विज जार परम्परा की तो बात ही नहीं कर रहे जिस में दलित घर में आ कर द्विज स्त्री जहर घोल देती है।

दलित की भूमिका एक मुस्लिम कलाकार सैफ अली खान द्वारा निभाई गई है। यह सच है कि कोई द्विज कहीं भी ‘दलित और आरक्षण’ के समर्थन में बोल ही नहीं सकता। चाहे उसे एक्टिंग ही क्यों ना करनी हो। यह भी सच है कि फिल्म में बेहतर अभिनय की वाह-वाही मनोज वाजपेयी ने आरक्षण विरोधी शिक्षक की भूमिका अदा कर के लूटी है। यह स्वाभाविक ही है, क्योंकि वाजपेयी के भीतर का ब्राह्मण और फिल्म का ब्राह्मण एकाकार जो हो गए हैं। इस से दर्शक ब्राह्मण की असली झलक पाने में सफल रहे हैं। वैसे अच्छा होता कि वाजपेयी दलित नायक की भूमिका में आते और ‘मनुस्मृति और उस के पैराकारों’ के विरुद्ध डायलाग बोलते। तब उन के भीतर के कलाकार की सही परीक्षा होती।

हम पुनः फिल्म के बाहर कही जा रही बातों पर बात करें। प्रकाश झा कहते हैं -‘देखिए, आरक्षण सिर्फ 1990 में नहीं आया। यह सच है कि 1990 में मंडल कमीशन ने आरक्षण का प्रतिशत बढ़ा दिया। पर आरक्षण तो हमारे देश में आजादी के समय से चला आ रहा है। उस वक्त साढ़े बाइस प्रतिशत था पर हमारे देश की जो जातिगत व्यवस्था है, दिमागी विभाजन है, उसको लेकर यह बहुत बड़ा मुद्दा है। यह मुद्दा कभी खत्म नहीं हुआ। हम अपनी फिल्म ‘आरक्षण’ के माध्यम से इसे पुनः जीवित करने का कोई प्रयास नहीं कर रहे हैं। हकीकत यह है कि हमारे देश की जातिगत व्यवस्थाओं के चलते जिनका जीवन मौकों से जुड़ा हुआ है, उनके लिए आरक्षण हमेशा जीवंत मुद्दा रहा है और रहेगा।’ (देखिए, हिन्दुस्तान, रविवार 31 जुलाई 2011, पृष्ठ 7, दिल्ली संस्करण, शांति स्वरूप त्रिपाठी से बातचीत।)

अब प्रकाश झा को कौन समझाए कि देश की हिन्दू कही जा रही 80 से 85 प्रतिशत जनता के लिए महज 49 प्रतिशत आरक्षण है, जबकि शेष 15 प्रतिशत हिन्दू 51 प्रतिशत नौकरियों के ऊपर फन फैलाए बैठे हैं। एक अन्य बात यह भी कही जा रही है कि आरक्षण की वजह से प्रतियोगिता बढ़ी और इसी के चलते कोचिंग सेंटर खुले। अगर यह बात सच है तो अच्छा ही है जो कि आरक्षण ने प्रतियोगिता को बढ़ावा दिया। अन्यथा तो, बगैर किसी प्रतियोगिता के ब्राह्मण नौकरियों पर कुंडली मारे बैठा रहा और सामंत कृष्ण के यहां भिखारी सुदामा बन कर जाता रहा। यूं आरक्षण ने इस देश के बौद्धिक समझे जा रहे ब्राह्मण की पोल खोल दी है।

तो, प्रकाश झा को सलाह है कि वे अपनी टोली को लेकर उन विषयों पर नाच-गा लें जो उन की जार परम्परा और फिल्म के अनुकूल हैं। अगर वे खुद को इंटेलेक्चुएल ही सिद्ध करना चाहते हैं तो मैदान में उतर कर सीधे बात करें। फिर वे थोड़ा पढ़-लिख भी लें। कैमरा सम्हालने से कोई बौद्धिक नहीं हो जाता। अभी भी इन्हें मनोरंजन करने वालों की श्रेणी में ही रखा जाता है।
यह मैं इसलिए बता रहा हूँ कि फिल्मों में किसी भी विधा में लिखने वालों को मेन-स्ट्रीम यानी मुख्यधारा का साहित्यकार नहीं माना जाता। यह यहाँ तक है कि कैफी आजमी, गुलजार, या सलीम-जावेद को कोई सीरियसली नहीं लेता। इसीलिए प्रेमचंद जैसे लेखक फिल्मी दुनिया छोड कर भाग निकले थे। प्रेमचंद को पता था कि यहां रह कर उन का सारा किया धरा – (दलित-विरोधी लेखन) मिट्टी में मिल जाएगा।

असल में, भारतीय इतिहास में पहली बार ब्राह्मण को काम करना पड़ रहा है। इसीलिए उस के पैरों के नीचे से जमीन खिसक गई है। अब की बार सुदामा पकड़ा गया है। लोकतांत्रिक व्यवस्था में समान हिस्सेदारी के चलते दलितों को अपने न्यूनतम अधिकार मिलने लगे हैं तो इन झाओं, तिवारियों, चौबों, पांडों, शर्माओं के माथे पर शिकन आ गई है। प्रकाश झा कोई अलग नहीं हैं। ‘आरक्षण’ के बारे में अभी तो केवल इतना बताया जा रहा है कि ‘आरक्षण ईमानदारी का सर्टिफिकेट है’। जारकर्म और भ्रष्टाचार में आकंठ डूबे द्विजों को सलाह है कि वे अपने को सुधारने के बारे में सोचें, समझें और फिल्में बनाएं। प्रकाश झा अगर जारकर्म के विरोध की फिल्म बनाएंगे तो यह लेखक उन के पक्ष में लिखने में पल भर की भी देरी नहीं करेगा।

यूं, आरक्षण फिल्म आरक्षण के विरोध में लिखी और बनाई गई है। फिल्म का एक-एक डॉयलाग आरक्षण के विरोध में है। आरक्षण समर्थन के नाम पर चालू, सतही और उत्तेजक डायलाग हैं। किसी को यह भ्रम नहीं रहना चाहिए कि यह फिल्म आरक्षण का समर्थन करती है। कुल मिला कर फिल्म ब्राह्मणी प्रभुता के खेल का नंगा नाच है, जिस के अंत में एक साध्वी मुख्यमंत्री को गुंडागर्दी रुकवाने का निर्देश देती दिखाई गई हैं? यही द्विज जार परम्परा की खासियत है और इस जार परम्परा की खोल-बांध महान चिन्तक डा. धर्मवीर पहले ही कर चुके हैं। और हाँ, ईश्वर उन दलितों को थोड़ी सी बुद्धि दे, जिन्हें इस फिल्म में दलित विरोध दिखाई नहीं दिया।

लेखक कैलाश दहिया युवा कवि, आलोचक और कला समीक्षक हैं.


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