हरियाणवी फिल्‍मों की भावी चुनौतियां और बाजार

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: भोजपुरी सिनेमा की तरह भटकाव नहीं चाहते फिल्‍मकार : हरियाणा अंतरराष्ट्रीय फिल्म फेस्टिवल में हर बार एक सवाल जरूर उठता है...कि जब भोजपुरी जैसी क्षेत्रीय भाषा की फिल्मों का करोड़ों का बाजार हो सकता है तो हरियाणवी भाषा की फिल्मों का बाजार क्यों नहीं बनाया जा सकता है।

यह सवाल इसलिए भी वाजिब है कि भारत में भोजपुरी भाषा-भाषियों की संख्या करीब चार करोड़ है, जबकि हरियाणवी या उसकी तर्ज वाली हिंदी बोलने वालों की संख्या इसकी तुलना में कुछ ही कम यानी तीन करोड़ है। जाहिर है कि हरियाणवी सिनेमा का एक बड़ा बाजार बनाया जा सकता है। तीसरे हरियाणा फिल्म फेस्टिवल के दौरान २०१० में हरियाणवी की पहली फिल्म चंद्रावल की नायिका ऊषा शर्मा से लगायत हरियाणा की माटी के फिल्मी लाल यशपाल शर्मा और सतीश कौशिक तक यह सवाल उठाते रहे हैं और इसी तर्ज पर सरकार से मांग करते रहे हैं। यह सवाल चौथे हरियाणा फिल्म फेस्टिवल में भी उठा। एक प्रेस कांफ्रेंस में यह सवाल हरियाणवी माटी के अभिनय सपूत राजेंद्र गुप्ता से भी पत्रकारों ने पूछा। सवाल वाजिब है या नहीं...इसकी चर्चा फिर कभी...लेकिन सबसे बड़ी बात चौथे हरियाणा फिल्म फेस्टिवल के फिल्म एप्रीशिएशन कोर्स के निदेशक और हिंदी लेखक संजय सहाय ने इस सवाल का जवाब देते हुए कही। उन्होंने माफी मांगते हुए कहा कि उन्हें भोजपुरी सिनेमा जैसा बाजार नहीं बनाना है और अगर ऐसा ही बाजार हरियाणवी सिनेमा भी बनाना चाहता है तो इससे बेहतर है कि वह बाजार न ही बने।

संजय सहाय के ये शब्द भोजपुरी सिनेमा के बाजार की तर्ज पर हरियाणवी सिनेमा के बाजार के विस्तार और उसकी मौजूदा हालत पर विचार का प्रस्थानविंदु हो सकते हैं। भोजपुरी की पहली फिल्म 1962 में गंगा मइया तोहे पियरी चढ़इबो आई थी। पचास साल पहले भोजपुरी सिनेमा ने कदम रखा, वह सोद्देश्य, मूल्यपरक और एक हद तक सांस्कृतिक शुरुआत बिंदु था। अस्सी के दशक तक भोजपुरी सिनेमा का यह रूझान बना रहा। लेकिन जैसे ही उदारीकरण के बाद भोजपुरी सिनेमा ने अपनी चुप्पी तोड़ी तो उसमें अपने शुरुआती दौर जैसी दृष्टि नजर नहीं रही। इस दौर में अश्लीलता का बोलबाला बढ़ा। आज हालत यह है कि कुछ आंकड़ों के मुताबिक हर साल भोजपुरी में पचास तो कुछ आकलनकारों के मुताबिक सत्तर-अस्सी फिल्में बन रही हैं। लेकिन उनमें से शायद ही कोई सोद्देश्यपरक हो। संजय सहाय कहते हैं कि इन फिल्मों में न तो भोजपुरी संस्कृति है और न ही भोजपुरी की आत्मा, दरअसल ये सी ग्रेड की मुंबइया फिल्में हैं, जिनकी भाषा सिर्फ भोजपुरी है।

हरियाणवी में कहा जा रहा है कि बीस साल बाद कोई फिल्म इस साल फरवरी में आई। मुठभेड़ ए प्लान्ड एनकाउंटर की रिलीज हो चुकी है। इस फिल्म की कहानी सोद्देश्यपरक बताई जाती रही है। जिसके प्रीमियर पर मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा और कांग्रेस के वरिष्ठ नेता शमशेर सिंह सुरजेवाला तक मौजूद थे। भोजपुरी सिनेमा का दूसरा दौर शुरू हुआ तो उसमें सरोकारी पक्ष गायब होता गया, इन अर्थों में हरियाणवी फिल्मी दुनिया की दूसरी शुरुआत बेहतर कही जा सकती है। लेकिन हरियाणवी के जैसे वीडियो और गीत बसों-ट्रकों और जाटू या हरियाणवी बोली वाले क्षेत्रों में धड़ल्ले से बिक रहे हैं और उन्हें देखा-सुना जा रहा है। वह एक उसी खतरे की ओर इंगित करता है, जिसने भोजपुरी सिनेमा को अपने घेरे में ले लिया है। जिसकी वजह से खिन्न संजय सहाय सवाल उठाने को मजबूर हुए हैं।

यानी हरियाणा अंतरराष्ट्रीय फिल्म फेस्टिवल ने हरियाणा में फिल्मों के लिए माहौल बनाने में मदद दी है तो हरियाणवी सिनेमा और उसके बाजार को बनाने की चर्चा भी जोर पकड़ने लगी है। लेकिन खतरा यही है कि वह भोजपुरी सिनेमा की तरह ना बन जाए और फिर बाद में उससे बाहर निकलने के लिए छटपटाने लगे। इसलिए संजय सहाय के सवालों से हरियाणवी फिल्म और संस्कृति की दुनिया से जुड़े लोगों को जूझना होगा। हरियाणवी सिनेमा को शुरू में ही यह तय करना होगा कि वह किस दिशा में आगे जाएगा। तकनीकी और संचार क्रांति के इस दौर में सिनेमा को आगे बढ़ाना कहीं ज्यादा आसान है। बाजार जितना बुरा नहीं है, उससे कहीं ज्यादा बुरा बाजारवाद की रौ में बह जाना है। बेहतर यह होगा कि बाजारवाद की रौ में बहे बिना हरियाणवी सिनेमा को भी बाजार का उपयोग करना होगा। तभी वह सरोकारी रास्ते पर आगे बढ़ सकेगा।

लेखक उमेश चतुर्वेदी वरिष्ठ पत्रकार और स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं. कई अखबारों और चैनलों में काम करने के बाद इस समय न्‍यूज एक्‍सप्रेस से जुड़े हुए हैं. उनका यह लेख हरियाणा अंतरराष्‍ट्रीय फिल्‍म फेस्टिवल की पत्रिका में प्रकाशित हो चुका है. इसे वहीं से साभार लेकर प्रकाशित किया गया है.


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