''बड़ा घटिया निकला मनोज बाजपेयी और अजय ब्रह्मात्मज''

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किन्हीं सज्जन ने खुद को अनाम रखते हुए This e-mail address is being protected from spambots. You need JavaScript enabled to view it मेल आईडी से पिछले दिनों यमुनानगर में हुए फिल्म महोत्सव के बारे में काफी कुछ लिख भेजा है. इस मेल के जरिए उन सज्जन ने अपनी भड़ास कई लोगों के खिलाफ निकाली है. एक्टर मनोज बाजपेयी, फिल्म समीक्षक अजय ब्रह्मात्मज और ब्लाग संचालक अविनाश दास पर कई आरोप लगाए हैं. लंबे शिकायती पत्र के केवल उन अंशों को प्रकाशित किया जा रहा है जिसमें आरोप हैं.

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''अजय ब्रह्मात्मज मुंबई से दिल्ली आए, दैनिक जागरण द्वारा आयोजित जागरण फिल्म फेस्टिवल में शामिल होने के लिए। उन्होंने सारी सुविधा और किराया-भाड़ा जागरण से लिया। इस बीच अजीत राय उन्हें यमुनानगर के लिए आमंत्रित करते रहे और अजयजी देखते हैं-आते हैं, करते रहे जैसा कि कोई बड़ा आदमी करता है। अजयजी फिर यमुनानगर गए और सिर्फ अपनी उपस्थिति के कारण मुंबई से आने-जाने के किराये की मांग कर दी जो कि कुल अठारह हजार रुपये थे। वैसे मुंबई से दिल्ली और दिल्ली से मुंबई का का किसी भी फ्लाईट में इतना किराया नहीं होता है। अजयजी जिस डीएवी गर्ल्स कॉलेज की प्रिंसिपल के काम की सराहना कर रहे हैं और दूसरी तरफ अजीत राय की कोशिशों को आपसी फायदे और जान-पहचान का हिस्सा बता रहे हैं, उनसे लोगों को पूछना चाहिए कि आपने एक ही जगह आने-जाने के लिए जागरण और यमुनानगर फिल्मोत्सव से पैसे कैसे ले लिए? क्या ऐसा करना आपके लिए नैतिक रूप से सही था? इस फिल्मोत्सव में आपसे भी बहुत बड़े-बड़े नाम आते हैं लेकिन वे फिल्मोत्सव और कॉलेज की क्षमता के अनुसार पैसे की मांग और सुविधाएं लेते हैं लेकिन आपने तो इतना अधिक लिया -जिसके लायक आप हैं भी नहीं। क्या आप जैसे लोगों की इस घिनौनी कुचेष्टा के बाद भी यह फिल्मोत्सव अन्तर्राश्ट्रीय बन पाएगा,जिसके लिए अजीत राय सहित कॉलेज के लोग प्रयासरत हैं? यमुनानगर में इतनी बड़ी रकम एक आदमी के लिए दिए जाने से दिक्कतें हुई और अजयजी को कॉलेज की इज्जत और अठारह हजार के बीच चुनना था और उन्होंने अठारह हजार चुना।''

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''यमुनानगर फिल्मोत्सव के प्रबंधन ने अविनाश दास से कहा कि उन्हें मनोज वाजपेयी की कोई दरकार नहीं है। लेकिन अविनाशजी को अपना अस्तित्व खतरे में नजर आया और बार-बार अजीत राय पर इस बात के लिए दबाव बनाया कि ऐसा न करें, वाजपेयी का कार्यक्रम हर-हाल में होना चाहिए। अविनाशजी और अजयजी से पूछा जाना चाहिए कि क्या इस तरह जबरदस्ती मनोज वापजपेयी को घुसाकर भी फिल्मोत्सव को अन्तर्राष्ट्रीय होने में मदद मिली? मनोज वाजपेयी को वैसे भी दिल्ली अपने पारिवारिक काम से आना था और रुकना था। अविनाशजी ने मनोज वाजपेयी का खर्चा बचाने और अपनी पीआर मजबूत करने के लिए इस कार्यक्रम को फेस्टीबल में फिट करा दिया। जो मनोज वाजपेयी अदाकारी के आधार पर ही हम सबका हीरो है, इस पूरे मामले में इतना घटिया निकला कि उसने अपनी और अपनी पत्नी की बिजनेस क्लास की टिकट ली और करीब 80 हजार रुपये अविनाशजी के साथ मनोज वाजपेयी के लिए इस पूरे कार्यक्रम में प्रबंधकों के फुंक गए। यमुनानगर फिल्मोत्सव आपसे सहयोग और मदद से चलनेवाला कार्यक्रम है। मजबूरी में आयोजकों को वहां के एक सह्दय से मदद लेनी पड़ गयी। सवाल है कि इस काम के लिए मजबूर किसने किया? वही अविनाशजी और हमारे मनोज वाजपेयी हीरो ही न जो कि भ्रष्टाचार मुक्त सुंदर समाज बनाने का ढोंग करते रहे हैं। इस पूरे प्रकरण में आखिर फिल्मोत्सव और डीएवी कॉलेज, यमुनानगर का क्या फायदा हुआ? उनकी तो एक रिपोर्ट तक अविनाश ने प्रकाशित नहीं की और आज अजय ब्रह्मात्मज ने लिखा भी तो पूरी अपनी खुंदक निकाल दी। क्या उनमें इस बात का साहस है कि वे लोगों के सामने स्वीकार करें कि एक ही जगह से आने-जाने के लिए उन्होंने दो अलग-अलग आयोजकों से पैसे लिए? अगर ऐसा वे स्वीकार लेते हैं या फिर उनकी पोस्ट लगाते वक्त अविनाशजी लिख देते कि यह अजयजी के निजी विचार हैं, तब भी शायद कुछ ईमानदारी बची रह जाती। वैसे भी 15 दिन बाद की इस पोस्ट में शक की सुइयां अपने आप ही उठती रहती है। दैनिक जागरण के नाम पर अजयजी ने जो निजी लाभ लेने की कोशिश की है, वह कितनी ओछी घटना है, इसकी जितनी भी निंदा की जाए कम है।''

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Comments (7)Add Comment
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written by ALOK KUMAR, October 28, 2011
AJAY BRAMHATJ defamed the profession of PROs by his misdeed. In Toronto Jagran Film Festival was being organized where AB was present. The budding actress of Bollywood was the main star attraction. The organizing committee of the Jagran Film Festival distributed few gift coupons to the journalists saying in case of not the proper use of coupons it must be returned back to the organizing committee. But as the Film Festival came to end AB used the coupons for buying expensive chocolates, biscuits and many more eatable things.
Apart from this AJAY BRAMHATJ played the tricks again. He got 25-30 thousand rupees in Kanpur Film Festival for shopping. He purchased costliest shoes and garments from this rupees Somebody had made a complain regarding this and he had to returned back the whole amount. Due to such shameful acts of AB all the PROs of Bollywodd hate and dislike him and also try to maintain distance from him .
AJAY BRAMHATJ has acquired a lot of properties in Kandiwali, Goregaon, Dahisar, Goa, Patna and Motihara. Apart from these he Use luxurious Car like Scrpio, Bolero, NE . ALOK MUMBAI
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written by R K rao, October 28, 2011
If a person try to defame and degrade the profession of journalism while working as a PRO posing himself a journalist what he should be called? A tout, a journalist or a PRO? You can better judge? I would like to narrate the real story of the person. The story goes here.
AJAY BRAMHATJ is not a journalist by his profession .He is an independent Public Relation Officer (PRO) of Bollywod .He is a most infamous name in the PRO fraternity of Bollywood movie world. He is known as a crook, tout and most opportunist person who never fails to take the advantage of any situation in his favour.
I would like to recount an incident which took place four years ago when most versatile actor Kamal Hasan took a team of journalist for the suiting of his movie “Abhay” in Chennai. AJAY BRAMHATJ anyhow managed to sneak into the team of journalist where he had a heart attack. He was admitted in a hospital where he incurred Rs four lakhs as medical fees on his treatment. The generous actor Kamal Hasan took no hesitation to bear his medical fees. He paid the huge amount like four lakhs rupees for his treatment. On the same time the crook and shameless AJAY BRAMHATJ using his influence got transferred four lakhs rupees in the name of his wife Vibha Rani from Indian Oil Company (IOC). Later the matter came to light and AJAY BRAMHATJ was exposed. R.K RAO
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written by bobby, October 20, 2011
ये क्या मामला है जी। समझ में नहीं आया। पूरी रपट तो छापते। मोहल्ला वाले अविनाश भाई को तो अजित भाई ने साध रखा है। सुना है खुलेआम उनको अपने सगे भाई से भी ज्यादा सगा बता रहे हैं। अगर कोई उनका सगा भाई होगा तो वो सुन कर दहशत से मर जाएगा। कैसी व्यवस्था है जहां सताने वाले सगे हो जाते हैं। और जो आपके काम में सहयोज करते हैं, अजय जी जैसे लोग, उनके पीछे लोग पड़ जाते हैं। क्या गलत किया है अजय जी ने या अविनाश ने। पता नहीं अविनाश अजित राय. को अपना सगा मानते हैं या नहीं..लेकिन इस मसले पर उनकी चुप्पी उनके गुनाहो को खुलासा माना जाए...या अजित राय ने उनको फिर से मैनेज कर लिया। आखिर इवेंट मैनेजरो से पंगा लेने की हिम्म्त कौन जुटाए..अच्छा है, नूरा कुश्ती चलती रहे। अपना क्या...तेल नहीं तेल की धार देखेंगे.
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written by dinesh, October 18, 2011
यशवंत भाई, पूरी रिपोर्ट पढ गया। ये तो अजित राय ने छदम नाम से लिखी है, साफ लगता है। जो सोच कर इसने अजय और अविनाश को बुलाया था, वो मंशा पूरी नहीं हुई तो क्या करे। अपनी भंड़ास निकाल रहा है। अविनाश और अजय ने मनचाही रपट ना लिखी तो बंदा नाराज हो गया है। तिलमिलिया गया है भाई। देखना, ये फिर इन दोनो के पैरो पर पड़ेगा। इसकी फेस्टिवल की दूकान चल निकली है। जाने कब तक कैंपस के लोगो को ठगता रहेगा। अखबारो की दुनिया से बहिष्कृत होने के बाद कैंपस में दूकान लगा ली। जै हो कैंपस मूर्ख शिरोमणी की...। वैसे भाई मेरा तो मन कर रहा है कि अजित राय जी की सावर्जनिक जगह पर अभिनंदन करुं...नाम बदल कर हमला करने वाला कूढमगज...यशवंत भाई, आप सावधान..अब आपको साधेगा..फिर आपके साथ भी वही करेगा जो इनके साथ कर रहा है।
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written by shivkesh rai, October 17, 2011
अरे भाई..अजय जी ने जो मुद्दे उठाए हैं, कृपया उन पर नजर डालें..बजाए इसके कि उन्हें आप गालियां निकाले। ये अजित राय नामक प्राणी है क्यो चीज। अजय जी से पूछो कि कैसे उनकी चमचागिरी करके उन्हें वहां बुलाया होगा। अविनाश के पैरो पड़ा होगा। आखिर वहीं अविनाश हैं ना जिन्होंने अजित राय को तबाह कर दिया है। अब कहां है बेचारा..ना तीन में ना तेरह में। क्या करे। कैंपस फिल्म फेसिट्वल कराता फिर रहा है। लाइन लगा देगा। वह धुनी है..पाप भी करेगा तो पुण्य की तरह। अविनाश को तो उसने पटा लिया था। अजय जी के तो पैरो पड़ा था। इन दोनों से पूछिए...अजित राय किसी के साथ वफादार नहीं है। जो लोग इसके काम आए उन्ही की पोल पट्टी खोल रहा है। कितना दम है..इसकी जांच कौन करे। क्यों भड़ांस को इस्तेमाल कर रहे हो दोस्तो..निजी झगड़ो को अपने से निपटाओ..पब्लिक फोरम को क्यो इस्तेमाल कर रहे हो। अजित राय की सच्चाई पूछना हो तो प्रिंसिपल महोदया से पूछिए...जो इनके नाम को रोती फिर रही हैं और अजित राय इल्जाम लगा रहे हैं कि उनकी महत्वाकांक्षा राजनीति में जाने की है..वे उन्हें पोपुलर होने के लिए इस्तेमाल कर रही हैं।
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written by कमल शर्मा, October 17, 2011
यशवंत जी, पहली बार आपसे शिकायत कर रहा हूं। यह पत्र पूरा छापिए। अंश छापने का कोई मतलब नहीं रहा। भडास ने हरेक की बात को पूरा छापा है तो यह पत्र चाहे कितना लंबा हो, अधूरा क्‍यों। इस पूरे मामले की जांच भी होनी चाहिए।
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written by विकास, October 17, 2011
यशवंत जी, आपने पत्र के अंश छापे पढकर अच्छा लगा। ज्यादातर बातें बिल्कुल सही है। अजय जी बहुत सीनियर फिल्म पत्रकार हैं, उनका धंधा, दलाली (माफ कीजिएगा प्रायोजित समीक्षाओं को ये नाम दे रहा हूं) सब दूसरे फिल्म समीक्षकों जैसी ही चलती है। लेकिन बातें बड़ी-बड़ी करते हैं, आदर्श का उपदेश...उनके हिसाब से हमारे जैसे पाठक चूतिए हैं। वो निर्माताओं की ओर से प्रायोजित पार्टियों में जाते हैं, विदेशों में होने वाले प्रीमियर में हिस्सा लेते हैं...किसके बूते उन्हीं निर्माता निर्देशकों के बूते जिन्हें अपनी फिल्म के लिए इनसे लिखवाना है। अब खाते उनकी हैं तो गाना भी पड़ेगा न। लब्बोलुबाब ये है कि अजय जी जो करें वो करें...उनका काम है...लेकिन कम से कम बुद्धजीवी बनने की कोशिश न करें, आदर्शवाद का चोला ओढ़कर लोगों को धोखा न दें। जैसे हैं वैसे ही रहें। पत्र अच्छा है...पूरा छापेंगें तो साधुवाद...अरे यही तो भड़ास की असली पूंजी है।

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