भड़ास4मीडिया पर 'शिल्पा-बाबा-किस' किसलिए?

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यशवंत जी, नमस्ते..... पिछले कुछ दिनों से ऐसा हो रहा है कि सुबह-सुबह नींद से जागने के बाद सबसे पहले भड़ास4मीडिया देखता हूँ और फिर आ आगे बढ़ता हूँ. ऐसा इसलिए हो पा रहा है क्योंकि आप लोगों ने अभी तक बड़े ही सटीक और सुन्दर लेख, वरिष्ट पत्रकारों के साथ बातचीत और मीडिया से सम्बंधित हर खबर को बेबाकी से रखा है हमारे सामने.  इसी का नतीजा है कि आज देश के हर कोने मे काम कर रहा पत्रकार इस पोर्टल से अपनापन महसूस करता है. लेकिन आज सुबह जब मैं पोर्टल पर गया और खबरों पर नज़र फेंकी तो एक खबर या लेख (पता नहीं इन दोनों मे से क्या था?) पर मेरी नज़र रुक गयी और मैंने उस खबर को पूरा पढ़ा लेकिन मेरी समझ मे ये नहीं आया कि इस खबर की यहां क्या उपयोगिता है? क्या आपका जो पाठक वर्ग है वो यह जानने के लिए यहां आता है कि एक साधू ने एक फिल्मी अदाकारा के गाल पे पप्पी क्यों ले ली?

माफ करिएगा, इस तरह की खबर के लिए टीवी वाले अपनी  दुकान खोल कर बैठे हैं और अच्छा होगा अगर उन्हें ही यह काम करने दिया जाए. आगर मुझे या किसी और पाठक को इस तरह की खबरों मे दिलचस्पी होगी तो वो टीवी देखेंगे क्योंकि वे लोग बेहतर तरीके से दिखाते हैं, यह हर कोइ जानता है. वीडियो फुटेज मे कई तरह के अलग-अलग इफेक्ट के साथ इस तरह की खबरों को दिखाने का उनको पूरा अनुभव है, तो फिर करने दीजिये उनको अपना काम. आपको क्यों उस मैदान मे कूदना हैं. यहां मेरे कहने का यह मतलब नहीं है कि यह एक खबर नहीं है या इस दिखाने का कोइ मतलब नहीं है गर ऐसा कुछ हुआ है तो इसे टीवी वाले तो छोडेंगे नहीं और छोड़ना भी नहीं चाहिए क्योकि ऐसी घटनाएं रोज नहीं होती हैं. यहां मै यह भी कहने नहीं जा रहा हूँ कि लेख की भाषा सही नहीं है या लेख को सनसनी वाले स्टाइल मे लिखा गया है. जाहिर है कि लेख एक टीवी पत्रकार की कलम से लिखा गया  है तो वो टीवीमय भाषा का ही प्रयोग करंगे लेकिन आप कहां थे?

आपको यह खबर इतनी जरूरी कैसे लगी कि आपने  इस खबर को समूचे पत्रकार बिरादरी तक पहुँचाना जरूरी समझा? मुझे समझ नहीं आ रहा कि आपको ऐसा क्या दिखा इस लेख मे जो उपयोगी था या पढ़ने योग्य था. मुझे लगता है कि भड़ास इस लिए नहीं है और इस पोर्टल पर इस खबर की कोइ अहमियत नहीं है. बेकार है!!!!!!!!

संपादक महोदय के जवाब का इंतज़ार रहेगा.

विकास कुमार

एक युवा पत्रकार

9718548403

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विकास भाई,

सच कहूं तो यह लेख और तस्वीरें देखकर मेरा भी मन मचल उठा:) सोचा कि आज टीआरपी वाला खेल मैं भी खेल ही लेता हूं :):)

दरअसल हुआ ये कि इस घटना के बारे में पहली बार मैंने वीओआई के साथी देवेंद्र के मेल के जरिए ही जाना। टीवी वगैरह कम देख पाता हूं फिर भी रात में जरूर एक घंटा देखता हूं। उस दौरान ये खबर दिखी नहीं थी और सुबह देवेंद्र की मेल देखकर मैं पहले तो चौंका फिर खुश हुआ। चौंका इसलिए कि टीआरपी बटोरू इस घटना के बारे में क्या टीवी वालों को कोई खबर नहीं! खुश इसलिए हुआ कि चलो आज इस टीआरपी बटोरू खबर को मैं एक साथी की टिप्पणी के रूप में पब्लिश कर देता हूं। पर आप देखिए, भड़ास4मीडिया ने इस मुद्दे पर अपनी ओर से कोई खबर या टिप्पणी नहीं पब्लिश की। एक पत्रकार साथी के लिखी टिप्पणी को प्रकाशित किया गया। उन्हीं साथी ने ही ये तस्वीरें मुहैया कराई थीं।

तो, मेरे खयाल से, जिस तरह भड़ास4मीडिया के 'कहिन' कालम में ढेर सारे मुद्दों पर केंद्रित अनेकों लेख, जिनमें से कइयों का मीडिया से कोई सीधा वास्ता भी नहीं होता, प्रकाशित होते रहते हैं, तो एक लेख यह भी सही। रही भाषा की बात तो, कोई भी लेख उस लेखक के भाव व भाषा के अनुरूप ही पब्लिश किए जाने की परंपरा है। अगर हम लेखों को री-राइट करने लगेंगे, या उनकी भाषा बदलने लगेंगे तो यह न सिर्फ लेखक व पत्रकारिता के साथ अन्याय होगा बल्कि हम लोगों पर भी काम का बोझ बढ़ जाएगा।

आशय यह कि किसी पत्रकार साथी के विचार को पब्लिश कर हम लोगों ने कोई गलत काम नहीं किया, ऐसा मैं मानता हूं। अगर आपको दुख हुआ, गलत लगा, तो मैं माफी चाहता हूं। भड़ास4मीडिया के प्रति आपके गंभीर लगाव की हम लोग कद्र करते हैं। मेरा बस इतना ही कहना है कि 'बाबा और शिल्पा' वाला मैटर भड़ास4मीडिया पर एक पत्रकार साथी के विचार के रूप में प्रकाशित हुआ है, न कि खबर के रूप में।

आगे से हम लोग कोशिश करेंगे कि ऐसे मुद्दे न आएं जिनसे आप जैसा युवा साथी दुखी हो।

आपकी जिंदगी में ढेर सारी सुख, समृद्धि और शांति की प्रार्थनाओं  के साथ

यशवंत

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