नेट का भी अपना समाज है, प्रभाष जी!

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आलोक तोमरसुबह-सुबह हमारे गुरु और हिंदी के या शायद भारत के महान संपादक प्रभाष जोशी का फोन आया। पहले तो उन्होंने यही पूछा कि कहां गायब हो। लेकिन वे जल्दी ही मुद्दे पर आ गए। मुद्दा यह है कि अखबारों की ईमानदारी का क्या आलम है और लोकसभा चुनाव के दौरान खबरों को छापने के लिए अखबारों ने जो निर्लज्ज धंधा किया है, उसके लिए क्या उन्हें माफ कर देना चाहिए? प्रभाषजी हालांकि इंटरनेट पर बहुत नहीं जाते। उन्होंने कई बड़े अखबारों जैसे टाइम्स ऑफ इंडिया, अमर उजाला और दैनिक जागरण आदि के नाम ले कर खुलेआम लिखा और जगह-जगह बोला कि इन लोगों ने अपना ईमान बेचा है।

इन अखबारों ने अपने उस पाठक को मूर्ख बनाया है जो उनके पन्नों पर छपे हर शब्द पर भरोसा करते हैं और पैसा दे कर अखबार खरीदते हैं। प्रभाष जी को बताया गया था कि इंटरनेट पर बहुत धुआंधार बहस उनके बयानों को ले कर छिड़ गई थी और अब तक छिड़ी हुई है। उस बहस में मैं भी शामिल था इसलिए उन्होंने मुझसे बात की। गुस्से में लिखे हुए एक वाक्य के लिए झाड़ भी लगाई। फिर उन्होंने कहा कि नेट भारत में अभी दो प्रतिशत से ज्यादा लोगों के पास नहीं पहुंचा है और नेट का कोई समाज नहीं हैं इसलिए मुख्यधारा यानी अखबारों में यह बहस होनी चाहिए।

प्रभाष जी पूज्य हैं और सारा जीवन पत्रकारिता के ईमानदार और एक हद तक आत्मघाती सरोकारों से जुड़े रहे हैं इसलिए पत्रकारिता के साथ हो रहे द्रोह पर उनकी चिंता और आक्रोश में मैं उनके साथ हूं। लाखों और लोग भी हैं। लेकिन जहां तक भारत में नेट का समाज नहीं होने की बात है, वहां मैं अपने गुरु से विनम्रतापूर्वक असहमत होने की आज्ञा चाहता हूं। भारत में इंटरनेट का समाज आज लगभग उतना ही विकसित है जितना छपे हुए अखबारों और पत्रिकाओं का। प्रभाष जी ने अगर एक शब्द लिखा या बोला तो नेट के तमाम ब्लॉग और वेबसाइट पर हर शब्द के जवाब में हजारों लाखों शब्द लिखे गए। गुनाहगार अखबारों के भाड़ मीरासियों ने प्रभाष जी और उनके सरोकार के साथ जुड़ने वालों को कोसा और आरोप भी लगाया कि प्रभाष जी सठिया गए हैं और अपनी भड़ास निकाल रहे हैं। प्रभाष जी को इन अल्लू पल्लू लोगों के बयानों से कोई फर्क नहीं पड़ता। वे हिंदी पत्रकारिता के महानायक हैं।

मगर जहां तक नेट का समाज नहीं होने की बात है, वहां नेट से रोजी रोटी चलाने के कारण मैं कुछ तथ्य उनके सामने पेश करना चाहता हूं। ब्लॉगर और वर्ल्ड प्रेस नाम की दो मुफ्त ब्लॉगिंग सेवाओं के जरिए भारत में ही करीब नौ लाख ब्लॉग बने हैं और उनमें से तीन लाख हिंदी में हैं। एक ब्लॉग को एक दिन में ज्यादा नहीं, अगर दस लोग भी पढ़ते हैं तो तीन करोड़ का समाज तो ये हो गया। पत्रकारिता से जुड़ी भड़ास4मीडिया वेबसाइट पर रोज लाखों लोग आते हैं। वहां एक भी खबर छपती है तो असम से ले कर कोचीन तक से ई-मेल और फोन आने लगते हैं। हमारी डेटलाइन इंडिया पर अब तक रोज का आंकड़ा 50 हजार पाठकों का हैं। यह किसी भी अखबार के एक संस्करण के पाठकों से ज्यादा है। एक वेब सेवा है एलेक्सा। वहां जा कर किसी भी वेबसाइट का नाम टाइप कीजिए तो आपको पता चल जाएगा कि प्रतिदिन, प्रति सप्ताह और पिछले तीन महीने में कितने लोगों ने किसी वेबसाइट को देखा। नेट के समाज की एक खासियत यह है कि इसमें पूंजी बहुत कम लगती है। जेब में दस हजार रुपए हों तो आप अपनी काम चलाऊ वेबसाइट विकसित कर सकते हैं। गूगल के अलावा कोमली नामक कई विज्ञापन सेवाएं हैं जो ब्लॉग और वेबसाइटों को विज्ञापन देती हैं। करोड़ों रुपए लगा कर शुरु किए गए टीवी चैनल और बहुत तामझाम से चलने वाले बड़े अखबार भी इंटरनेट पर आ गए हैं और अब इंटरनेट का समाज सिर्फ भारत में कम से कम बीस करोड़ लोगों का समाज बन चुका है।

जिस देश में अब आप इंटरनेट पर टिकट बुक करा सकते हैं, इनकम टैक्स भर सकते हैं, अपने बैंक खाते से पैसा निकाल या जमा करा सकते हैं वहां इंटरनेट को अनदेखा नहीं किया जा सकता। यह जरूर है कि इस इंटरनेट समाज की कोई शिनाख्त अभी तक नहीं बनी है। हिंदी की सबसे गंभीर वेबसाइट देशकाल चलाने वाले मुकेश कुमार, सबसे विचारोत्तेजक वेबसाइट रविवार के आलोक पुतुल और सबसे सफल वेबसाइट भड़ास4मीडिया के यशवंत सिंह इस समाज को बनाने की पहल कर रहे हैं और जल्दी ही यह समाज संगठित रूप में सामने आएगा। समाज है मगर उसकी ग्राम सभा या पंचायत नहीं हैं। मेरा प्रभाष जी से विनम्र आग्रह है कि वे इंटरनेट की दुनिया में पधारें और अपना नियमित स्तंभ किसी एक वेबसाइट पर लिखना शुरू कर दें। उन्हें अपने आप पता लग जाएगा कि नेट के पाठक भी बहुत हैं और नेट के समाज में हलचल हो रही है। दरअसल अखबार पढ़ने वालों के समाज से ज्यादा विकसित यह समाज नेट का समाज है और दलाल इसमें भी होंगे मगर उनके बारे में क्या बोलना? समाज दलालों को आखिरकार निरस्त कर देता है।

नेट पर बहुत क्रांतिकारी प्रयोग हो रहे हैं। कविता कोश नाम की वेबसाइट पर भवानी प्रसाद से लेकर दिनकर और फिराक गोरखपुरी से लेकर जावेद अख्तर तक की लगभग सारी रचानाएं मौजूद हैं। हिंदी भारत नाम का एक ग्रुप याहू पर चलता है जिसमें कुछ भी लिखिए, पूरी दुनिया से प्रतिक्रियाएं आती है। नेट का यह समाज अब हिंदी में भी खगोलीय समाज बन चुका हैं और इसकी उपेक्षा एक बहुत बड़े समकालीन सच की उपेक्षा होगी।


आलोक तोमर से This e-mail address is being protected from spambots. You need JavaScript enabled to view it या 09811222998 के जरिए संपर्क कर सकते हैं.

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