संगमन : कथा-साहित्य की जनपक्षधरता पर विमर्श

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गिरिराज किशोर और प्रियंवदहिन्दी साहित्य में गंभीर पहचान बना चुके 'संगमन' का 15वां आयोजन उदयपुर में 2 से 4 अक्टूबर 2009 को हुआ। नगर के समीप गांव बेदला स्थित आस्था प्रशिक्षण केन्द्र में आयोजित इस समारोह के सहयोगी जनार्दन राय नागर राजस्थान विद्यापीठ (डीम्ड विश्वविद्यालय) के जन शिक्षण व विस्तार कार्यक्रम निदेशालय, आस्था व राजस्थान साहित्य अकादमी थे। तीन दिन के इस जमावड़े में बाहर से आये लगभग 40 कथाकारों और साहित्यकारों के अलावा नगर के साहित्यकार, पाठक व युवा छात्र-छात्राओं की सक्रिय भागीदारी रही। नगर के आस-पास के शहरों कस्बों के साहित्यकारों-पाठकों की आवाजाही ने आयोजन को जीवंत बनाया।

कथाकारों में सर्जनात्मक संवाद को सघन बनाने, युवा कथाकारों को मंच उपलब्ध करवाने व जन आन्दोलनों में साहित्यकारों की भागीदारी जैसे मुद्दों पर केन्द्रित इस राष्ट्रीय संगोष्ठी ने साहित्य और सामाजिक सरोकारों में एक नया आयाम जोड़ा। पहले दिन के सत्र का विषय 'नयी सदी का यथार्थ और मेरी प्रिय पुस्तक' था। चर्चा की शुरुआत आलोचक विजय कुमार के वक्तव्य से हुई जो पोलैंड की विश्व विख्यात कवयित्री शिम्बोर्सका पर केन्द्रित था। विजय कुमार ने कहा कि लेखिका ने वर्तमान के यथार्थ को उभारने का जो प्रयास किया है, वह हमको आज के समाज की यथार्थता के बिम्बों प प्रतीकों के मूल में छिपी नग्नता व छद्म को जानने की दृष्टि देने वाला है।

उन्होंने कहा कि शिम्बोर्सका का जीवन यह भी दिखाता है कि एक रचनाकार किस तरह अपने समाज की विद्रूपताओं से जिरह करता हुआ समाज को वैचारिक ताकत देता है। विजय कुमार ने शिम्बोर्सका की कुछ महत्वपूर्ण कविताओं के अंशों को भी उद्धृत किया। चर्चित युवा कथाकार वन्दना राग ने राही मासूम रजा के प्रसिद्ध उपन्यास ´आधा गांव´ के माध्यम से व्यक्ति की सामाजिक मनोदशा को स्वरूप व दिशा देनेवाले कारणों की ओर इशारा किया। उन्होंने कहा कि यह उपन्यास इस तथ्य को उद्घाटित करता है कि ´सत्ता´ किस तरह से सच्चाई से ज्यादा अफवाहों का आतंक फैलाकर अपना हित साधती है। बाहरी शक्तियों का असर हमारे अंदरूनी रिश्तों व समरसता की भावना को तोड़ता है। कवि व उपन्यासकार हरिराम मीणा ने ´आदि धर्म´ पुस्तक के माध्यम से आदिवासी जीवन व संस्कृति में पाये जाने वाले सकारात्मक पहलुओं को आत्मासात करते हुए आज के समाज में धर्म, पर्यावरण, वैचारिक संकीर्णता, अलगाव जैसी समस्याओं से निजात पाने की दृष्टि ग्रहण करने पर बल दिया। मीणा ने विकास के नाम पर आदिवासी समाज व जीवन पर आये संकटों की चर्चा करते हुए कहा कि सरकार की जन विरोधी नीतियों के कारण आदिवासी अिस्मता  संकट में है। उन्होंने इस संकट से लड़ने में लेखकीय भागीदारी की अपेक्षा बताई।

समालोचक एवं गद्यकार दुर्गा प्रसाद अग्रवाल ने स्वयं प्रकाश के उपन्यास ´ईंधन´ की चर्चा की। उन्होंने ईंधन को आज के युवा वर्ग के जीवन मूल्यों में आ गये अन्तर्द्वन्द्व, सामाजिक मनोवृत्ति व व्यक्तिगत आकांक्षाओं के बीच नये अन्तर्विरोधों को समझने में आधारभूत उपन्यास बताया। उन्होंने उपन्यास से उदाहरण देकर स्पष्ट किया कि वैश्वीकरण और बाजारवाद का हमारे जीवन पर कितना गहरा असर पड़ा है। अग्रवाल ने इसे भारतीय परिदृश्य में हो रहे भूमण्डलीकरण पर लिखा गया पहला महतवपूर्ण उपन्यास माना। इतिहास बोध के संपादक, इतिहासकार लाल बहादुर वर्मा ने अपने उदबोधन में सबसे पहले गाँधी के व्यक्ति और कृतित्व की चर्चा की उन्होंने गाँधी की सबसे बड़ी ताकत अपने पर गहरा विश्वास और साहस बताते हुये कहा कि आज की नई मानव विरोधी स्थितियों से लड़ने में ऐसी ही ताकत की जरूरत है। उन्होंने अपनी प्रिय पुस्तक हार्वर्ड फास्ट की ´सिटीजन टोम्पेन´ के कथानक पर कहा कि सृजन व संघर्ष में एक अन्तर्द्वन्द्वात्मक रिश्ता होता है, जिसे समझना बेहद जरूरी है। हर सृजन जीवन के संघर्ष से उत्पन्न होता है तथा जीवन में ही अपनी सार्थकता को स्थापित करता है। उन्होंने यथार्थ के सर्जनात्मक पक्षों को उद्घाटित करने के साहस व उसके साथ चलने को इस सदी की सबसे बड़ी चुनौती बताया। चर्चा में कथाकार लता शर्मा, कैलाश बनवासी, डॉ. सर्वतुन्निसा खान, अनुपमा सिसोदिया ने भाग लिया। इससे पहले कथाकार महेश कटारे ने संगमन के शुभारंभ की घोषणा की। सुप्रसिद्ध कवि हरीश भादानी के निधन का समाचार सत्र के प्रारंभ होने से पहले मिल गया था अत: सभी ने दो मिनट का मौन रख श्रद्धांजलि दी। संगमन के स्थानीय संयोजक पल्लव ने सभी का स्वागत किया। सत्र का संयोजन कथाकार ओमा शर्मा ने किया।

संगमन 2009

दूसरे दिन आयोजित कहानी पाठ सत्र में जयपुर के युवा कथाकार राम कुमार सिंह ने अपनी कहानी ´शराबी उर्फ हम तुझे वली समझते´ व मुम्बई से आये वरुण ग्रोवर ने ´डैन्यूब के पत्थर´ का पाठ किया। अलग-अलग शैलियों में लिखी गई इन कहानियों पर विशद् चर्चा में यह बात मुखर हुई कि वरुण की कहानी प्रागैतिहासिक काल की होते हुए भी समकालीन सवालों टकराती है वहीं रामकुमार की कहानी को भाषायी रचनात्मकता व परिवेश को जीवंत बनाने के लिए उल्लेखनीय माना गया। कथाकार योगेन्द्र आहूजा ने वरुण की कहानी के कथ्य को समकालीन मुद्दों से बचाव की युक्ति कहा तो वरिष्ठ लेखक लाल बहादुर वर्मा ने इसे असाधारण को साधारण बनाने का प्रयास बताया। उन्होंने भाषा के वैज्ञानिक तथ्यों के आधार पर वरुण की कहानी को दुस्साहसी बताया। सुभाषचन्द्र कुशवाहा ने कहा कि ये कहानियां मनुष्यता के संकट को हमारे सामने रखती है। युवा फिल्म समीक्षक मिहिर पंड्या ने वरुण की कहानी पर टिप्पणी में कहा कि इसके नायक व खलनायक एक ही पात्र में नजर आने से कहानी की सुन्दरता बढ़ी है। समालोचक प्रो. नवल किशोर, देवेन्द्र, ओमा शर्मा, सीमा शफक, जितेन्द्र भारती व पल्लव ने भी चर्चा में भागीदारी की। गालिब़ की पंक्ति के शीर्षक में प्रयोग पर हुई बहस पर लक्ष्मण व्यास ने कहा कि यह इस्तेमाल दादा-पोते के सम्बन्ध जैसा है जिस पर आपित्त करना उचित नहीं होगा। इस सत्र का प्रभावी संचालन वरिष्ठ कथाकार शिवमूर्ति ने किया।

इस दिन की शाम उदयपुर भ्रमण हेतु रखी गई थी। सभी प्रतिभागी उदयपुर के समीप ऐतिहासिक स्थल सज्जनगढ़, बड़ी तालाब व फतहसागर गये। यहां की प्राकृतिक सुन्दरता ने लेखकों को मंत्रमुग्ध कर दिया।

तीसरे दिन के अन्तिम सत्र में ´प्रतिरोध, जन आन्दोलन और साहित्य´ विषय पर चर्चा का प्रवर्तन योगेन्द्र आहूजा के वक्तव्य से हुआ। कथाकार देवेन्द्र ने कहा कि कोई विचारधारा एक युग में महत्वपूर्ण होती है किन्तु वह अन्य युग में प्रभावहीन भी हो सकती है इसलिए विचारधारा से ज्यादा जरूरी विजन है। कथाकार शिवमूर्ति ने जन आन्दोलनों से लेखकों का जुड़ाव व अपनी रचनाओं में कला के सन्तुलित उपयोग को जरूरी बताया। आलोचक डॉ. माधव हाडा ने कहा कि लेखक को मध्य वर्ग के बदलते सरोकार एवं प्राथमिकताओं की जानकारी होनी चाहिये। शोधार्थी प्रज्ञा जोशी ने लेखकों के जन आन्दोलनों से जुड़ाव न होने से रचनाओं के प्रभाव में आ रही कमी को रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि दमन के बढ़ते स्वरूपों को देखकर हमें प्रतिरोध के नये तरीकों को खोजना होगा। वरुण ग्रोवर ने जन आन्दोलनों को वर्तमान पीढ़ी के लिए अमूर्त विचार कहा। उनका कहना था कि क्या सच कहना ही प्रतिरोध नहीं है र्षोर्षो  हिमांशु पंड्या ने कहा कि किसी और को जवाब देने से पहले जरूरी है अपने आप को जवाब देना। चर्चा में मधु कांकरिया, सुभाष चन्द्र कुशवाहा, रतन कुमार सांभरिया, मंजू चतुर्वेदी, मनीषा कुलश्रेष्ठ, डॉ. रईस अहमद, जितेन्द्र भारती, हबीब कैफी, विजय कुमार, कैलाश बनवासी और प्रो. नवल किशोर ने भाग लिया। समापन वक्तव्य में वरिष्ठ कथाकार गिरिराज किशोर ने कहा कि  कथाकार वह है जो अमूर्त को आकृति दे। किसी रचना के स्वरूप को अस्वीकार किया जा सकता है किन्तु रचनाकार की ईमानदारी पर अंगुली उठाना अनुचित है। उन्होंने कहा कि प्रतिबद्धता विरोध ही है। बाहरी दृष्टि से मूल्यांकन की प्रवृित्त को अनुचित बताते हुए उन्होंने कहा कि रचनाकार उलझनों को सुलझाने का काम करता है। गिरिराज किशोर ने नामवर सिंह के आलोचना कर्म की द्विधा पर प्रहार कर इसे वैचारिक जकड़ बताया। सत्र का संयोजन महेश कटारे व ओमा शर्मा ने किया। हिमांशु पंड्या ने स्थानीय आयोजकों की ओर से आभार माना।

कथाकार प्रियंवद के संयोजन में हुए इस आयोजन के अन्य आकर्षणों में पंकज दीक्षित द्वारा लगाई गई कथा पोस्टर प्रदर्शनी, लघु पत्रिका प्रदर्शनी व पंडित जनार्दन राय नागर के साहित्य की प्रदर्शनी भी थी। राजस्थान साहित्य अकादमी द्वारा आयोजन स्थल पर पुस्तक बिक्री की व्यवस्था थी। तीन दिन तक चले आयोजन में मूलचन्द्र पाठक, हरिनारायण, नवीन कुमार नैथानी, चरणसिंह पथिक, सुशील कुमार, अश्विनी पालीवाल, क़मर मेवाड़ी, ज्योतिपुंज, माधव नागदा, नन्द चतुर्वेदी, सत्यनारायण व्यास, अमरीक सिंह दीप, कनक जैन, जितेन्द्रसिंह, डी.एस. पालीवाल, गजेन्द्र मीणा, गणेशलाल मीणा सहित बड़ी संख्या में साहित्य प्रेमियों ने भागीदारी की।


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उदयपुर से सुधा चौधरी की रिपोर्ट


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