अविनाश नए विवाद में फंसे, जयपुर में मुकदमा

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श्रीपाल शक्तावत और अविनाश दासब्लाग के जरिए दूसरों का चरित्रहनन करने के एक मामले में पीड़ित पक्ष ने ब्लागर पर मुकदमा कर दिया है। ब्लागर और पीड़ित दोनों ही पत्रकार हैं। ब्लागर का नाम है अविनाश तो पीड़ित हैं राजस्थान के वरिष्ठ पत्रकार श्रीपाल शक्तावत। ये अविनाश वही हैं जो एनडीटीवी और भास्कर समूह से विवादित स्थितियों में कार्यमुक्त किए गए। अनामी-बेनामी कमेंट के पुरजोर समर्थक और फुसफुसाहटों को ब्लाग का मंच प्रदान किए जाने के हिमायती अविनाश ने खुद पर मुकदमा होने की जानकारी मिलने के तुरंत बाद अपने ब्लाग से संबंधित कमेंट हटा दिए हैं।

उनकी इस हरकत को देखते हुए पीड़ित पक्ष अब अविनाश पर सबूत मिटाने का मामला दर्ज कराने की तैयारी में है। भड़ास4मीडिया को मिली जानकारी के अनुसार श्रीपाल शक्तावत के इस्तगासा दायर करने पर जयपुर की एसीजीएम कोर्ट नंबर 23 ने जयपुर पुलिस को रिपोर्ट दर्ज कर जांच के आदेश दे दिए हैं। यह मुकदमा आईटी एक्ट की धारा 66ए, आईपीसी की धारा 120बी और 561 के तहत जयपुर के महेशनगर थाने में दर्ज कर लिया गया है।

श्रीपाल शक्तावत ने भड़ास4मीडिया से बातचीत में मुकदमा दर्ज कराए जाने की पुष्टि की। पूरे मामले के बारे में विस्तार से बात करते हुए श्रीपाल ने बताया कि 'कथादेश' के मीडिया विशेषांक में उनसे संबंधित एक रिपोर्ट को अविनाश दास ने 'कथादेश' से साभार लेकर अपने ब्लाग पर प्रकाशित किया। ब्लाग पर प्रकाशित रिपोर्ट के नीचे नकली नामों से ढेर सारे जो कमेंट लिखे व प्रकाशित किए गए वे बेहद आपत्तिजनक हैं। इन कमेंटों में उन्हें चरित्रहीन, व्यभिचारी, भ्रष्ट, जातिवादी, अपराधी, उगाही करने वाला... न जाने क्या-क्या बताया गया और ऐसे कमेंट कई-कई बार अलग-अलग फर्जी नामों से लिखे व प्रकाशित किए गए। श्रीपाल के शब्दों में- ''मेरे बारे में राजस्थान की मीडिया के लोग जानते हैं कि मैंने आज तक किसी की एक चाय तक नहीं पी। पत्रकारिता के मानदंडों से इतर जाने से हमेशा इनकार किया। पत्रकारों को जब बाजार से पैसे उगाहने के लिए कहा गया था तो मैंने न सिर्फ खुद यह काम करने से मना किया बल्कि अपनी टीम को भी ऐसा न करने के लिए प्रेरित किया। अपने पूरे करियर में समाज के लिए और पीड़ित लोगों के लिए लड़ा व डट कर खड़ा रहा। सत्ता और व्यवस्था के दबाव, प्रलोभन व भय में आए बिना बड़े उद्देश्य के लिए कई बड़े स्टिंग आपरेशन किए। तो जो आदमी सोद्देश्यपूर्ण पत्रकारिता करने की कोशिश कर रहा है, उसे आप अपने ब्लाग पर एक मिनट के भीतर चरित्रहीन, व्यभिचारी, भ्रष्ट, जातिवादी लिखकर उसके अब तक के सभी किए धरे को खत्म कर दें, उसकी बनी-बनाई प्रतिष्ठा का सत्यानाश कर दें तो क्या वह चुप बैठेगा। क्या आप उससे चुप रहने की उम्मीद करते हैं। अगर मैं दूसरों के लिए लड़ सकता हूं तो अपने लिए क्यों नहीं लड़ूंगा।''


ब्लाग पर प्रकाशित वह आलेख, जिस पर आई टिप्पणियों से आहत होकर श्रीपाल ने मुकदमा किया. इस चित्र से पता चल रहा है कि आलेख के कमेंट को फिलहाल 'आफ' कर दिया गया है.


श्रीपाल आगे कहते हैं- ''ब्लाग बनाकर अनाम, बेनाम, एनानिमस, फर्जी नामों से किसी के बारे में कुछ भी कमेंट कर-करा देने की बढ़ती प्रवृत्ति के खिलाफ किसी न किसी को खड़ा होना था। शुरुआत मैंने कर दी है। इस लड़ाई को अगर सुप्रीम कोर्ट तक लड़ना पड़ेगा तो लडूंगा। मुकदमा करने से पहले मैंने दिल्ली, अहमदाबाद और जयपुर के साइबर एक्सपर्ट्स के साथ कई राउंड बैठक की, विचार-विमर्श किया और राय ली। अब जब मैंने मुकदमा किया तो उन्होंने कमेंट हटा दिए। क्यों हटा दिए? अगर आप फर्जी नामों से कमेंट के इतने बड़े समर्थक हैं तो उन कमेंटों को रहने देते। मुकदमा किए जाने के बाद कमेंट हटाना भी अपराध है। आईपीसी के सेक्शन 201 के तहत सबूत मिटाने के मामले में मैं फिर इस्तगासा दायर करूंगा। इस पूरे प्रकरण में अगर पुलिस ढिलाई बरतती है तो कोर्ट जाता रहूंगा लेकिन छोडूंगा नहीं। पहले मैंने पुलिस में ही कंप्लेन की थी लेकिन जयपुर पुलिस ने इस मामले में जब रुचि नहीं ली तो कोर्ट गया। कोर्ट के आदेश पर अब पुलिस सक्रिय हो गई है। पुलिस अगर कभी निष्क्रिय दिखती है तो कोर्ट में जाकर सक्रिय कराऊंगा। 21 साल के मेरे पत्रकारीय करियर में मेरे काम को देखते हुए कई नेशनल और इंटरनेशनल एवार्ड मुझे मिले लेकिन इन लोगों ने तो पल भर में मेरी सारी साख मिट्टी में मिला दी। मुझे पता है कि फर्जी नामों से जिन लोगों ने कमेंट लिखे वे कौन हैं। लेकिन उनके चेहरे खुद सामने लाने की बजाय पुलिस के जरिए सामने लाना चाहता हूं। जयपुर में एक गिरोह है, दिल्ली में बैठे हुए कुछ लोग हैं। इन लोगों ने मुझे डैमेज करने के लिए सारा खेल किया। मैं आइडेंटिफाई करना चाहता हूं कि मेरे से पीड़ित लोग कौन हैं, वे खुलकर सामने आएं। दुष्प्रचार के खिलाफ चुप नहीं रहा जा सकता। आपके पास तथ्य है तो आप लिखिए लेकिन अनर्गल कुछ भी लिखना गलत है।''

इस मसले पर अविनाश का पक्ष जानने के लिए भड़ास4मीडिया की तरफ से पिछले दो दिनों में चार बार फोन किया गया और एसएमएस भी किया गया पर उन्होंने न तो फोन रिसीव किया और न ही एसएमएस का जवाब दिया।

 


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