न्यूज मैन कम, न्यूज मैनेजर ज्यादा हो गए

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विष्णु त्रिपाठीबचपन के एक प्रसंग से बात शुरू करते हैं। मोहल्ले में एक सिद्धी गुरू हुआ करते थे। हमने तो उन्हें बुजुर्ग के तौर पर ही देखा था लेकिन जवानी में वो शौकिया तौर पर पहलवानी भी करते थे, सो उनका निकनेम हो गया सिद्धी गुरू। जबका ये प्रसंग है, तब उनकी उम्र 60 के ऊपर तो हो ही गई होगी। हमें तो बहुत एक्टिव दिखते थे। एक रात जब हम पिता जी के साथ कमल किशोर वैद्य जी के दवाखाने में बैठे थे तो सिद्धी गुरू का पदार्पण हुआ। कुछ बेचैने से थे, वैद्य जी से बोले पता नहीं क्या बात है, कुछ दिनों से पोर-पोर दुखता है। जोड़ों में पीर उठती है। पहले सोचा पुरवाई का असर है लेकिन अब तो पछुवा का जोर चल रहा है लेकिन पीर है कि घटने के बजाय और जोर मार रही है। वैद्य जी बड़ी-बड़ी सघन मूंछों के बीच मुस्कुराए, बोले दादा, पीर इसलिए जोर मार रही है कि आपने जोर करना बंद कर दिया है।

सिद्धी गुरू की मुखमुद्रा कुछ ऐसी बनी कि बात समझे नहीं। वैद्य जी ने बात और स्पष्ट की, आपने जोर करना जो छोड़ दिया है। हमें लगता है कि दंड बैठक अब आप करते नहीं, मुगदर भांजना तो दूर की बात रही। गुरू की मुख मुद्रा अब कुछ-कुछ समझने वाली थी। वैद्य जी जारी रहे, जवानी में आपने इतनी कसरत की, अखाड़े में जोर किया, दंड बैठक मारा, मुगदर भांजा तो शरीर जिस मेहनत की खुराक का अभ्यस्त था, वही आपने त्याग दिया, नतीजा शरीर अंदर से आवाज दे रहा है। वैद्य जी, जारी रहे, बोले हम आपके लिए बढ़िया च्यवन प्राश का प्रबंध कर देते हैं लेकिन आप उसके पहले अपना अभ्यास शुरू कर दीजिए। गुरू बोले…और दर्द की दवाई? वैद्य जी का जवाब था दवाई आपके ही पास है, मैंने बता तो दी है।

लिखने पढ़ने वालों के साथ भी कुछ ऐसा ही हो जाता है। एक बार अभ्यास कमजोर हुआ, बंद हुआ तो मन-चित्त अंदर से आवाज देना शुरू कर देता है। हम जैसे लोग जो अब मूलतः न्यूज मैन कम बल्कि न्यूज सुपरवाइजर या मैनेजर ज्यादा हो गए हैं, कंटेंट कंस्ट्रक्शन कंपनी के हेड मेट (मिस्त्री वाला मेट)। तभी लगता है कि कुछ-कुछ सिद्धी गुरू जैसी दिक्कत हो गई है। कभी कभी लगता है कि हम जैसे लोग खबरों की दुनिया में वाचिक परंपरा के अनुगामी होकर रह गए हैं (सौजन्य से नामवर सिंह)। कभी कभी ये भी लगता है कि लिख तो बहुत रहे हैं, लेकिन वह शब्द रचना नहीं है, बल्कि खबरों की चीर-फाड़, पूछताछ, खबरों का सौजन्यीकरण, समन्वय और तमाम खबरीय प्रशासनिक प्रकरणों को लेकर लंबे-चौड़े चिट्ठों का लेखन, मेल बाजी। हालांकि खबरों का लेखन भी अस्थायी भाव का लेखन है, जल्दबाजी में लिखा गया साहित्य। बकौल सीनियर विष्णु त्रिपाठी (कानपुर वाले, वैसे हम भी कनपुरिया ही हैं) तीसरे दर्जे का साहित्य। फिर भी आत्मसंतोष होता था। खबर में ही कोई एंगिल देकर, कलर-फ्लेवर देकर, पर्सपेक्टिव देकर स्वांतः सुखाय हो जाता था। सत्ता के गलियारे सरीखे गासिप कालम लिख कर खबरी मन को थोड़ा बहुत तुष्ट कर लेते थे, लेकिन अब तो वो भी नहीं रहा।

जब जागरण जंक्शन की योजना सतह पर आई तो ये तय हुआ कि सबसे पहले माहौल बनाने के लिए जागरण के लोग लिखना शुरू करें। स्वाभाविक रूप से हमें जिम्मेदारी मिली कि जागरण के सम्मानित सहयोगियों से इस आशय का औपचारिक आग्रह करें। आग्रह किया भी गया और उसके परिणाम भी निकले, कई लोगों ने लिख कर भेजा भी, लेकिन आग्रह की अपेक्षानुरूप संख्या कम थी। सुकीर्ति जी ने एकाध बार आग्रह दोहराया भी, लोगों को एक बार फिर याद दिला दीजिये ना। याद तो नहीं दिलाया लेकिन सामने पड़ गए संतोष तिवारी जी से पूछ बैठा-आपने फोटो भेजी, कुछ लिखा? उन्होंने उसी रिदम में पूछ लिया-आपने फोटो भेजी, कुछ लिखा? मैं निरुत्तर, खुद पर बहुत लज्जा आई। वो कहानी याद आ गई। शायद कभी कल्याण में पढ़ी थी। मां अपने बेटे को लेकर एक साधु के पास गई, निवेदन किया-बाबा, ये मिठाई बहुत खाता है, आप कह देंगे, इसे समझायेंगे तो निश्चित तौर पर बुरी आदत तज देगा। बाबा ने कहा-माई, हफ्ते भर बाद आना। हफ्ते भर बाद मां फिर से बेटे को लेकर साधु बाबा के पास पहुंची। बाबा ने बच्चे को पास बिठाया, स्नेह के आंचल में भिगोया और कहा बेटा ज्यादा मिठाई खाना अच्छा नहीं, अति सबकी बुरी होती है। कम खाओगे तो मिठाई और ज्यादा अच्छी लगेगी, जाओ। मां ने शिकायती लहजे में कहा कि अगर यही तीन बोल बोलने थे तो उसी दिन बोल देते। हफ्ते भर का इंतजार क्यों कराया? बाबा बोले-माई, पिछले सात दिन मैं खुद कम मीठा खाने का अभ्यास कर रहा था। माई संतुष्ट हो गई।

रोज सोचते थे कि कहां से शुरू किया जाए? फिर सोचा कि चलो पहले अपनी फोटो ही भेज देते हैं, जागरण जंक्शन के संयोजकों-संचालकों को लगेगा तो कि कुछ हो रहा है। घर पर फोटो की ढुंढ़ाई शुरू की, बच्चा पार्टी से कहा-ऐसी फोटो निकालो जो प्रसन्नवदन हो, चेहरा खिलखिलाता न सही, मुस्कुराता हुआ ही हो। विनी ने कहा- ऐसी फोटो तो मुश्किल है। क्यों? उसका जवाब था ऐसी फोटो तो तब खिंचेगी जब चेहरा भी तो वैसा हो। मेथी की पत्तियां तोड़ रहीं श्रीमती जी को बस विनी के इसी वाक्य के बूते मुझ पर वार करने का एक और मौका मिल गया। बहरहाल एक कामचलाऊ फोटो मिली और उसका प्रेषण भी हो गया लेकिन सवाल यही था शुरू कहां से किया जाए। उपेंद्र स्वामी जी ने घंटी भी बजा दी, बोले फोटो तो आ गई, अब कुछ भी लिख दीजिए सर (सर, शायद उनका तकिया कलाम सरीखा है)। ब्लाग तो लेखन की असीमित दुनिया है, कुछ भी लिखा जा सकता है। मैंने सोचा ये कहना तो बहुत आसान है लेकिन कहीं भी, कभी भी क्या कुछ भी लिखा जा सकता है? मुझे सिद्धी गुरू याद आ रहे थे। वैद्य जी ने तो कह दिया था लेकिन उन्हें नए सिरे से जोर मारने में कितनी दिक्कतें पेश आई होंगी। फिर भी मन जो आवाज दे रहा है, अंदर से जो पोर-पोर दुख रहा है, उससे पार तो पाना ही है। विष्णु भाई, आप पार पा लेंगे।

चारो तरफ लोहड़ी की उमंग है, भगवान भुवन भास्कर उत्तरायण हो रहे हैं। कोई कह रहा था कि खरमास खत्म हो रहा है। मन पक्का हुआ तो कहां से शुरू किया जाए? का जवाब भी मिल गया। चलो वही लिख देते हैं कि फिर से लिखने की प्रक्रिया किस दौर से गुजरी। अब लिखा जाएगा, ओरिजनल लिखा जाएगा। उन्होंने कहा, उन्होंने बताया से आगे। विश्वस्त सूत्रों का कहना है कि से और आगे। कोशिश करेंगे कि वो लिखा जाएगा जो स्थायी भाव का हो। जीवन के तमाम प्रसंग हैं, मन में भरे पड़े हैं, जिंदगी में तमाम ऐसे चरित्रों से साबका हुआ, जिनके बारे में लिखने की चाहत है, ऐसे चरित्र जो आपसे भी दो-चार हुए होंगे। गांव, मोहल्ले की बातें। रस्मो रिवाज की बातें। बाबा की बातें, अजिया की बातें। कनपुरिया-कनौजिया (कन्नौजिया नहीं) खान-पान की बातें। मूड होगा तो खालिस कनौजिया में लिखेंगे। कोई प्रवचन नहीं, उपेदश नहीं, शोध और रिसर्च नहीं। जिन प्रसंगों और लोगों ने कभी गुदगुदाया, आल्हादित किया, प्रेरणा दी, सिखाया, उन्हें शेयर करेंगे। निश्चित तौर पर सौ फीसद स्वांतः सुखाय लिखेंगे, पढ़ने वाले मुदित-प्रमुदित होंगे तो खुद धन्य समझेंगे।

लेखक विष्णु त्रिपाठी वरिष्ठ पत्रकार हैं और दैनिक जागरण, नोएडा में एसोसिएट एडिटर के रूप में कार्यरत हैं. उनका यह आलेख उनके ब्लाग से साभार लिया गया है.


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