रिपोर्टिंग के रिश्ते

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रवीश कुमारसात साल की रिपोर्टिंग से न जाने कितने रिश्ते अरज लाया हूं। ये रिश्ते मुझे अक्सर बुलाते रहते हैं। जिससे भी मिला सबने कहा दुबारा आना। ऐसा कभी नहीं हुआ कि दुबारा उस जगह या शख्स के पास लौटा जा सके। तात्कालिक भावुकता ने दोबारा आने का वादा करवा दिया। मिलने वालों से स्नेह-सत्कार,भोजन और उनका प्रभाव इतना घोर रहा कि बिना दुबारा मिलने का वादा किये आया भी नहीं जाता था। सबको बोल आया कि जल्दी आऊंगा। अब आंसुओं से भर जाता हूं। एक रिपोर्टर सिर्फ दर्शकों का नहीं होता,वो उनका भी होता है जिनसे वो मिलता है, जिनकी सोहबत में वो जानकारियां जमा करता है और जिनके सहारे वो दुनिया में बांट देता है। रिपोर्टिंग में मिले इन सभी रिश्तों में झूठा साबित होता जा रहा हूं। क्या करूं उनका इंतज़ार खतम नहीं होता और मेरा वादा पूरा नहीं होता।

झांसी की मिसेज कैंटम आज तक इंतज़ार कर रही हैं। अक्सर फोन आ जाता है। हाउ आर यू माई डियर सन। गॉड ब्लेस यू। व्हेन आर यू कमिंग टू झांसी। न जाने वो किस जनम की मेरी मां है। अठारह सौ सत्तावन के डेढ़ सौ साल होने के वर्ष झांसी गया था। अस्सी साल की एक वृद्धा। एंग्लो-इंडियन। साधारण सा घर। मिसेज कैंटम आईं और पहले पूछा टेल मी सन, कभी एंग्लो इंडियान खाना खाया है? जवाब- नहीं। लेकिन जब आपने बेटा कह दिया तो पूछती क्यों हैं? खिला दीजिए न। स्पेशल रिपोर्ट की शूटिंग शुरू होने से पहले मेरे इस जवाब पर कैमरा मैन घबरा गया। मिसेज कैंटम ने कहा एंग्लो-इंडियन शैली में मटन बनाया है। तुम खाता है। क्या नाम बताया तुमने अपना? जी रवीश कुमार। यू नो, यू आर लाइक माइ सन। आई एम सो हैप्पी टू सी यू। छोटी सी मेज़ पर ऐसा रिश्ता बना कि क्या कहें। लगा कि ये किसी क्रांतिकारी की मां होगी। इस जनम में अपने क्रांतिकारी बेटे के हाथों मारे गए अंग्रेंजों की मौत का प्रायश्चित कर रही होगी। या फिर भारत की उदारता की निशानी को बचा कर रख रही होंगी। तभी उन्होंने डरते हुए कहा कि दरअसल, मैं जो काम करती हूं उससे कई लोगों को प्राब्लम होता है, सन। इतनी बार बेटा कहा कि मैं भी मिसेज कैंटम को मॉम कहने लगा। एक घंटे में ऐसा रिश्ता।

मिसेज कैंटम झांसी के कैन्टोनमेंट के क्रबिस्तान की देखरेख करने लगी थी। उस दौर में मारे गए और अकाल मृत्यु को प्राप्त हुए अंग्रेज अफसरों की कब्रों को फिर से सजा दिया था। कहा कि इतनी हालत खराब थी कि पूछो मत। यहां कोई आता नहीं था। लेकिन देखों मैंने कितना सुन्दर बना दिया। राष्ट्रवाद के झंझटों में फंसे बिना एक हिन्दुस्तानी महिला उनकी देखरेख कर रही है,जिसके दम पर हमारा राष्ट्रवादी आंदोलन गर्विला होता है। मैंने पूछा भी कि मॉम,ये एक प्राब्लम है। लेकिन भारत एक परिपक्व देश भी है। किसी को प्राब्लम नहीं होगा। भावुक तो हम दुश्मनों के लिए भी होते हैं। उस रिपोर्ट के बाद से आज तक मिसेज कैंटम अचानक फोन कर देती हैं। आवाज़ का ज़ोर बताता है कि एक मां अपने अधिकार से बेटे को बुला रही है। दुबारा कब आओगे। प्लीज कम न। अपनी वाइफ और बेटी को भी लाना। आई विल कूक फॉर यू। नाइस मटन। यू लाइक न। फोन रखने के बाद थोड़ा रो लेता हूं। फिर उस दफ्तर की नियति में खुद को झोंक देता हूं जिसने इन रिश्तों को पाने में मदद तो की लेकिन जोड़ कर रखने में साथ नहीं दिया। जानबूझ कर नहीं लेकिन रिपोर्टर तो घटनाओं का साक्षी होता है। ख़बर बदलते ही उसकी दुनिया बदल जाती है। एक साथ वो कई शहरों और कई संबंधों में रहता है।

इसी तरह से बीकानेर के शौकत भाई आज तक फोन करते हैं। छह साल हो गए बीकानेर गए। धर्मेंद्र चुनाव लड़ रहे थे। ट्रेन में जगह नहीं थी तो शौकत भाई ने कहा कि अरे रवीश भाई, चिन्ता मत करो, मेरी सीट पर बिकानेर चलो। तब से एक रिश्ता बन गया। पहले उनका फोन आता है, फिर उनकी पत्नी बात करती है और फिर उनकी बेटी। शौकत भाई बहुत शान से कहते हैं कि एक बार तो आ जाओ। तुम्हारा ही घर है। बीकानेर में कोई यकीन नहीं करता कि रवीश भाई अपने दोस्त हैं। मैं सबको बोलता हूं न। मेरी पत्नी तो हमेशा याद करती हैं आपको। हां इस साल देखिये, आ जाऊंगा। दिल कहता है कि मत बोल झूठ। फिर बोलने लगता हूं, शौकत भाई, मेरा इंतजार क्यों करते हैं? शौकत भाई का जवाब लाजवाब कर देता है। रवीश भाई, ये आपका घर है। घरवाले तो इंतज़ार करेंगे न।

जमालुद्दीन को आप सब नहीं जानते। लेकिन हो सके तो इनसे मिल आइये। एक मामूली दर्जी। आंखें कमज़ोर पड़ रही हैं। लेकिन ग्यारह किलो की कॉपी पर ताज महल की शक्ल में उसका इतिहास लिख रहे हैं। ग़ज़ब का काम है। आगरा में रहते हैं। जमालुद्दीन कहते हैं कि उन्हें अकबराबाद और ताज को देखते ही कुछ हो जाता है। इसलिए वो ताज के करीब नहीं जाते। जब वो ये बात कह रहे होते हैं तो उनके चेहरे पर ताज को बनाने वाले मज़दूरों की रूहें उतर आती हैं। लाल हो जाता है। हाथ लरज़ने लगते हैं। बहुत ज़िद की, जमाल भाई, चलो न, ताज के सामने। दो बार गया। मना कर दिया। जमालुद्दीन ने कहा कि नहीं, मैं ताज के सामने नहीं जा सकता। कहने लगे कि सामने शाहजहां को देखकर कांप जाता हूं। शाहजहां के किस्से और उस संगमरमर की इमारत का इतना शानदार कथाकार मुझे आज तक नहीं मिला। जमालुद्दीन आज तक फोन करते हैं। कुछ मदद कर आया था तो थोड़ी और आस होगी। लेकिन इसके लिए वो कभी फोन नहीं करते। उनकी चिंता यही है कि ताज पर जो इतिहास लिखा है वो दुनिया के सामने नुमाया हो जाए। जमालुद्दीन ने कितनी बार कहा, बेटा कब आओगे। उनका यह सवाल अपराधी बना देता है। लगता है कि किसी बूढ़े बाप को अकेला छोड़ आया हूं। दो साल पहले जब उनके घर से निकला तो जमालुद्दीन ने मुझे एक नक्श दिया। एक कागज़ का टुकड़ा। किसी भी ओर और छोर से देखिये तो अल्लाह लिखा मिलेगा। जमाल ने कहा कि बुरी नज़र न लगे। आज तक मेरी पर्स में वो नक्श है।

पंजाब के रियाड़का गया था। गुरुदासपुर में। सच बोलने का स्कूल पर स्पेशल रिपोर्ट करने। पूरे परिवार से ऐसी दोस्ती हुई कि हर तीज त्योहार पर वहां से फोन आता है। कब आ रहे हो? आने का वादा मेरा ही था। दो दिन तक उस स्कूल में रहा। परिवार में ऐसे घुल मिल गया कि वादा कर आया कि अबकी परिवार के साथ आऊंगा। मौका ही नहीं लगा। स्पेशल रिपोर्ट के दौरान अमृतसर के एक स्कूल की प्रिंसिपल से मुलाकात हुई थी। वो अब कनाडा में हैं। उनका फोन आया था। कहां इंटरनेट पर आपकी आवाज़ आ रही थी तो हम सब दौड़ गए कि ये तो अपने रवीश कुमार की रिपोर्ट लगती है। वो बहुत भावुक थीं। कह रही थीं कि बेटे कभी कनाडा आना। हम हिन्दुस्तान आ रहे हैं तो ज़रूर मिलेंगे। मैं हंसने लगा। माता जी, कितना झूठ बोलूं मैं। दुबारा कब मिलना हुआ है। अरे क्या बात करते हो जी। आपको टाइम नहीं तो हम आ जायेंगे। रियाड़का स्कूल के प्रिंसिपल के बेटे गगनदीप आज तक एसएमएस करते हैं। कई बार पलट कर फोन करता हूं तो पूरे घर में खुशी की लहर दौड़ जाती है। अदभुत स्कूल है। इतना मोहित हो गया था कि खुद ही वादा कर दिया कि गर्मियों में पत्नी और बेटी के साथ यहां आकर रहूंगा। आज तक नहीं जा सका।

ऐसा ही इंतज़ार गुजरात में हो रहा है। मेरठ में डॉक्टर साहब कर रहे हैं, मैनपुरी में प्रोफेसर साहब कर रहे हैं, भिवानी में प्रीतम भाई कर रहे हैं, अलीगढ़ के दारोगा जी कर रहे हैं, बारामती में सुशील कर रहे हैं, जयपुर के चंद्रपरिहार साहब कर रहे हैं। आगरा के देवकीनंदन सोन कहते हैं कि आप से मिलने के बाद लगा कि कोई रिश्ता है। जब भी आपकी आवाज़ आती है घर में हंगामा मच जाता है। सब कहने लगते हैं कि अरे ये तो अपने रवीश भाई हैं। क्या बात है। इजाज़त हो तो भावुक हो लूं। इतराना अच्छा नहीं लगता। मेरा स्वभाव भी नहीं है। लेकिन क्या करूं इन रिश्तों का? कब तक दुबारा आने के भरोसे पर ये टिके रहेंगे। मालूम नहीं लेकिन जब इनलोगों का फोन आता है तो बहुत अच्छा लगता है। कम मिलने-जुलने वाला आदमी हूं और बिना मेहनत किये ऐसा खजाना मिल जाए तो सहेज कर रखने का लालच भी होता है। कई लोग ऐसे हैं जिनसे सिर्फ फोन पर रिश्तेदारी है। आवाज़ से उनको जानता हूं। कभी मिला नहीं। डर भी लगता है कि पांच साल से जिससे फोन पर बात कर रहा हूं, वो अचानक मिल जाए तो न पहचान पाने का असर कितना खतरनाक होगा। कहीं ये न सोच बैठे कि दंभी है।

रिपोर्टर दुबारा क्यों नहीं जा पाता और नहीं जा पाता है तो पहली बार में ऐसे रिश्ते क्यों बनाता है? रिश्तों के बिना हर रिपोर्टर अधूरा है। काश इन सब को संभाल पाता। दुबारा जा पाता। इन सबका अपराधी तो हूं लेकिन इन्हीं लोगों से पूरा भी होता हूं। हम रिपोर्टरों को कितना कुछ मिलता है। इनती सारी मायें, इतने संगे संबंधी सब इसी पेशे में मिले हैं। ग़ज़ब का काम है ये पत्रकारिता। दुनिया के सबसे आसान कामों में से एक लेकिन रिश्ते इतने मुश्किल कि भावुक कर तोड़ देते हैं। सारे रिपोर्टर को भावुकता के इन लम्हों से गुज़रना होता होगा। सबको मरना पड़ता होगा।

एनडीटीवी के जाने-माने चेहरे और मशहूर टीवी जर्नलिस्ट रवीश कुमार के कस्बा ब्लाग से साभार


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Comments (17)Add Comment
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written by kuldeepdev, April 30, 2011
bas salam karne ka dil chahta hai...?
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written by Digpal, February 08, 2010
रवीश भाई आप बिल्‍कुल सच कहते हैं, हमारी जिन्‍दगी में रिश्‍तों की बहुत अहमियत है और खासकर हम लोगों का काम ही कुछ ऐसा है कि जहां जाओ वहां कोई न कोई रिश्‍ता बना छोड़ आते हैं। उम्‍मीद हमें और उन्‍हें भी यही होती है कि लौटकर आएंगे, लेकिन अगली बार वहां रिपोर्टिंग के लिए कब जाना होगा पता नहीं। इसलिए हर बार जब भी फोन आता है तो न चाहते हुए भी उनकी खुशी के लिए झूठ बोलना पड़ता है कि इस साल आऊंगा। अब वो साल फिर कब आएगा पता नहीं। लेकिन उन सब दोस्‍तों की याद बहुत आती है और उन्‍हें भी हमारी याद आती है व वे हमसे प्‍यार करते हैं इसलिए बार बार आने का आग्रह करते हैं। तो रवीश भाई आपके उन चाहने वालों और हमारे भी उन दोस्‍तों को सलाम जो आज भी हमारा इंतजार कर रहे हैं। एक दिन जब इस आपाधापी से छुटकारा मिलेगा तो उन सबसे मिलने चले जाईएगा, हम भी कोशिश करेंगे की अपने दोस्‍तों से मिल आया जाएत्र
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written by amitvirat, January 30, 2010
kya karoge bhai yahi to diniya hai
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written by dinesh mansera ndtv nainital, January 29, 2010
ye aapka vyaavhar hai ravish ji,nahi to bahut se aise bhi hai ki..khai piye khiske hum yaar kiske...
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written by Naresh Arora Jalandhar, January 28, 2010
बोहत अच्छा लिखा रवीश जी...आप के स्पेशल रिपोर्ट के तो हम पहले से ही कायल हैं लेकिन इस लेख में आपने एक पत्रकार के अन्दर का दर्द बोहत अछे तरीके से जाहिर किया..सच में कितने लोगों से मिलते हैं और कितने ही रिश्ते बन जाते हैं इस पेशे में भी..लेकिन दोबारा उन्हें नहीं मिल पाते और किसी खबर के सिलसिले में ही मिलना होता है..आम पत्रकार नेता अभिनेता को तो याद रख लेता है लेकिन आपने इन रिश्तों को तवज्जो दी जोकि एहम है...लिखते रहिये रवीश जी ..आप से प्रेरणा मिलती है हम जैसे युवा पत्रकारों को...:)
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written by shivang mathur, January 28, 2010
Ravish bhai ya ravish ji toh nahi keh sakta par ravish sir keh sakta hoon,kyunki aap ko sir kehna ka mann karta hain,aapke vichaar jaankar aur aapke through ye sab rishte jaankar khushi hoti hain ki shayad abb bhi journalist mein dil bacha hain warna main sochne lagatha ki pata nahi kaise ho gaye hain hum ki kuch bhi bata do farak nahi padta.`
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written by paras amrohi, January 28, 2010
ravish bhai,
aap hindustan se mil rahe hain, likh rahe hain hindustan, yeh na dil se mitega aur na kagaz se.darasl ye khud se milne jaisa hai.
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written by JAGDISH FROM MATHURA, January 28, 2010
BAHTREEN,
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written by k.k.sharma, January 28, 2010
Ravish bhai, aap ne apne blog mai ek reparter ke doosre pahloo ke bare mai bataya ha. ek reporter hone ke nate main ye aasani se samajh sakta hoon. aap ke blog reporter ki asli jindgi samne aati hai.
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written by vartika, January 28, 2010
namaskar raveesh ji!
aapke bare me bhut suna tha ki aap bhut acche insaan hai. lekin aaj apka yh lekh pdkr mahsus bhi bhi ho gya . ykeen ho gya . inta bhawuktapurna lekh likhne wala insaan nishchaya he bhut komal dil ka hoga..riporting ke jis anchue , anjaane pahlu ko aapne saamne rakha wo wakai koi reporter he jaan sakta hai. mai aasha karti hun ki aapke wo saare RISHTE jinse aap milna chahte hai wo aapka blog pdh rhe hon!
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written by Manoj Agrawal, January 28, 2010
Bhagwan se prarthana hai ki aap aise hi bhavnao se bhare rahe.
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written by PRAVEEN DUTTA, January 28, 2010
रवीश भाई, आपने अपने बहाने उस सच को सामने रखा है जो अक्सर अनकहा रह जाता है. कोई कुछ भी कहे यूँ ही लिखते रहिये, हम में से ज्यादातर तो ये भी नहीं कर रहे हैं. सादर
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written by ashok priyadarshi, January 28, 2010
Bhai anam,
Raveesh ji ko padhkar aapne jo likha usse sahmat nahin hua ja sakta. patrakarita ke douran hi nahin, vastvik jeevan main bhi kai bar aisa hota hai, jab aap train, bus ya plane main kahin ki yatra kar rahe hote hain ya kisi ajnabi sahar main ghoom fir rahe hote hain tabhi koi ajnabi kab apna ban jata hai aur kab uske pate aur phone ka adan pradan ho jata hai aur kab pragadh rishta ban jata hai pata hi nahin chalta. udaharan ke liye main ek bar bus se dilli se lucknow ja raha tha. train cancel ho gai thi aur jana jaruri tha... raste main hi kasmeeri gate se anand vihar jane wali bus GL- 23 main mere theek bagal wali seet par baithi ek bharda mahila se baton baton main aisa rista bana ki aaj 11 sal bad bhi wah meri didi hai aur main unka chota bhai.... wah muradabad tak gain aur main lucknow tak.... par wah rishta ... kya khaun 11 salon main 2 mulakatain hui hain lekin phone shayad koi din naga jata hai ... ab unke pati ho ya bitiya ya bete sab ka yadi dilli aana hota hai to apni mulakat tay hoti hai adi adi....
main raveesh ji se puri tarah sahamat hun, aise riste bante bhi hain aur salon sal nibhaye bhi jate hain....
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written by anam, January 28, 2010
रवीश भाई, आप जिस घोर पेशेवर, निर्मम और विमुखतावादी व्यवस्था से आते हैं, वहां इन ‘अदनों’ को नहीं, बल्कि लालू, मुलायम, अमर और राहुल नामधारी वीआईपी हस्तियों को याद किया जाता है। आपकी ब्लाॅगोचित शब्दिक लफाजी काबिले-तरीफ हो सकती है, पर जज्बात के पड़ाव पर आप जैसे पत्रकार तब ‘अदनों’ या ‘आम’ लोगों से जुड़ी पुरानी यादों में खोते हैं, जब समाज के सामने खुद को जमीन से जुड़ा व्यक्ति साबित करने का विचार पैदा लेता है। आज अगर राहुल गांधी या सोनिया गांधी झांसी के किसी दलित के घर जाकर भोजन करने के कथित दरियादिली मिषन पर निकल जाएं तो आप जैसे पत्रकार बिना मुंह-कान धोए कैमरा उठाकर पीछे-पीछे दौड़ पड़ेंगे, पर अगर उसी शहर में मिसेज कैंटम किसी मुसीबत में फंस जाएं और आपको याद करें तो हो सकता है आप चैनली व्यस्तता और निस्संगता दिखाकर पल्ला झाड़ लोगे। ब्लाॅग के आभासी पन्ने पर आभासी जज्बात दर्शाना बड़ा आसान है, किसी अदनों की पीड़ा को अपनी पीड़ा समझना आसान नहीं। आप लिखते अच्छा हैं, पर चैनल की स्वार्थी और घोर असंवेदनषील दुनिया की हदों के पार जाकर भावुकता का इजहार कोरा ढांेग है। अक्सर आपको पढ़ता हूं इस विश्वास के साथ लखटकिया नौकरी वाले इस शख्स ने एक बार फिर अनभोगे यथार्थ को भावुवकता की छौंक देकर पन्ने पर दर्ज किया होगा। चैनल का कोई रिपोर्टर अपने स्रोत या सूत्र को किस निर्ममता और बेहयापन के साथ भूलता और उसका इस्तेमाल करता है, यह किसी से छिपा नहीं है। आप चैनल वाले फिल्मी और फंतासी सोच के कायल हैं। ठीक वैसे ही जैसे संजय दत्त पर्दे पर गांधी का अनुयायी बन जाते हंै, पर वास्तविक जिंदगी में वे अमर सिंह के अनुयायी हैं। लिखते रहे मुन्ना भाई!


अनाम
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written by अंकित, January 28, 2010
Simply Amazing...
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written by Sandeep Richhariya, January 28, 2010
वास्‍तव में रवीस भाई आपने एक ऐसी सच्‍चाई का दर्शन कराया है जो हर एक घुमंतू रिर्पोटर के साथ होती है। रिर्पोटों को करते समय की सच्‍चाई से विमुख एक रिर्पोटर अपने तमाम तरह के मानवोचित दर्द समेटे सिर्फ खबर को परोसता ही रहता है और अपनी जटिलताओं में ही परेशान रहता है।
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written by anurag tripathi, January 28, 2010
Really heart touching write-up...every field reporter can identify himself with the article...keep it up brother

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