'रण' देख रोना आया, पैसे बर्बाद न करें

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सलीम अख्तर सिद्दीकीदोस्तों के साथ तीन दिन पहले तय पाया गया था कि सभी काम छोड़कर 'रण' फिल्म का पहला शो देखा जाएगा। ऐसा ही किया भी। 'रण देखकर लौटा हूं। फटाफट आपको फिल्म की कहानी बता देता हूं। विजय हर्षवर्धन मलिक एक न्यूज चैनल 'इंडिया 24' चलाते हैं। आदर्शवादी पत्रकार हैं। चैनल घाटे में चल रहा है। टीआरपी बढ़ाने के लिए मलिक का बेटा जय विपक्ष के एक नेता, जो बाहुबली है, के साथ मिलकर एक साजिश रचते हैं। उस साजिश में देश के प्रधानमंत्री हुड्डा को एक शहर में हुए बम ब्लॉस्ट का साजिशकर्ता करार देती सीडी बनाई जाती है। यानि खबर क्रिएट की जाती है। हर्षवर्धन मलिक को सीडी दिखाई जाती है। मलिक को लगता है कि देशहित में ये खबर अपने चैनल पर चलाना जरुरी है। इंडिया 24 पर खबर चलती है। चुनाव में हुड्डा हार जाते हैं और विपक्ष का नेता जीत जाता है।

इधर पूरब नाम का एक आदर्शवादी पत्रकार भी है, जो विजय हर्षवर्धन मलिक का जबरदस्त प्रशसंक है। उन्हीं के वैनल में नौकरी करता है। उसको लगता है कि खबर में कहीं कोई गड़बड़ है। वह अपनी तरह से इंवेस्टीगेशन करता है और पूरी सच्चाई की एक सीडी बना लेता है। फिल्म में एक और चैनल है, हैडलाइन टुडै नाम का। उसका मालिक कक्कड़ आदर्शवादी पत्रकार को देश हित के नाम इमोशनल ब्लैकमेल करता है। आदर्शवादी पत्रकार उसे सीडी सौंप देता है। लेकिन चैनल का मालिक कक्कड़ विपक्ष के नेता से सीडी का पांच सौ करोड़ में सौदा कर लेता है। सीडी के बिकने पर आदर्शवादी पत्रकार कक्कड़ के पास जाता है तो कक्क्ड़ उसे पैसे की अहमियत बयान करता है। यह भी कहता है कि विपक्ष के नेता और इंडिया 24 का पर्दाफाश करके 10-15 दिन की टीआरपी के अलावा क्या मिलने वाला है। आदर्शवादी पत्रकार उसकी भी सीडी बना लेता है। उसे पता चल जाता है कि विजय हर्षवर्धन मलिक वाकई ईमानदार पत्रकार हैं। वह उनके पास जाता है। सीडी उन्हें सौंप देता है। मलिक से पत्रकारिता छोड़ने की बात कहकर मलिक के पैर छूकर चला जाता है। मलिक अपने चैनल पर सीडी को उस वक्त चलाता है, जब विपक्ष का नेता प्रधानमंत्री की शपथ लेने की तैयारी कर रहा होता है। कैमरे के सामने एक लम्बा सा भाषण मीडिया को पिलाता है। दर्शकों से हमेशा के लिए नमस्कार कर लेता है। आदर्शवादी पत्रकार पूरब, इंडिया 24 का मालिक बना दिया जाता है। यह है 'रण' की कहानी।

फिल्म में गानों की गुंजायश ही नहीं थी। फिल्म के बीच-बीच में हिन्दु-मुस्लिम एकता का तड़का भी लगाया गया है। यदि मीडिया अपनी टीआरपी बढ़ाने के लिए खबरें क्रिएट करता है तो फिल्म निर्माता सिनेमा हॉल तक लाने के लिए बेतुकी कहानियों को पर्दे पर उताकर लोगों का बेवकूफ बनाता है। रामगोपाल वर्मा जिस बात को कहना चाहते हैं, वह बात समय-समय पर मीडिया वाले ही बार-बार कह चुके हैं। स्व0 प्रभाष जोशी तो बाकायदा खबरों को बेचे जाने के खिलाफ एक अभियान चला चुके हैं। फिल्म में ऐसा कुछ नहीं है, जिससे यह लगे कि आज के दौर के मीडिया, खासकर इलैक्ट्रॉनिक मीडिया में कुछ बदलाव आ सकता है। हम लोग तो अभी-अभी पांच सौ रुपए का फटका खाकर आए हैं। फिल्म देखकर रोना आया। बाकी आपकी मर्जी। वैसे पहले शो में कुल बारह लोग थे। आखिर में एक सवाल अमिताभ बच्चन से। कल रात आईबीएन-7 पर बैठे हुए आप खबर क्रिएट नहीं कर रहे थे तो और क्या कर रहे थे ?

लेखक सलीम अख्तर सिद्दीकी मेरठ के वासी हैं, हिंदी ब्लागिंग के सक्रिय साथी हैं. उनसे संपर्क 09837279840 के जरिए किया जा सकता है.


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