यूएनआई का सच और भंडारी का झूठ

E-mail Print PDF

कर्मचारी नेता सीपी झा पर फर्जी मुकदमा : ब्यूरो चीफ शोभना जैन के खिलाफ रिपोर्ट : रायटर वाले सर्विस काटने की धमकी दे रहे : 900 कर्मियों को पांच माह से वेतन नहीं : संपादक, भड़ास4मीडिया, महोदय, मैं संवाद समिति यूएनआई (यूनाइटेड न्यूज आफ इण्डिया) का एक कर्मचारी हूं। अपना नाम, नंबर और पता आपको इस भरोसे पर भेज रहा हूं कि आप इसका खुलासा नहीं करेंगे और इस मकसद से भेज रहा हूं कि आप मेरे पत्र को फर्जी नहीं मानेंगे। ये हम लोगों की पीड़ा है। सौ फीसदी सच लिखने की कोशिश की है। अगर आप पब्लिश कर देंगे तो हम लोगों की बात दुनिया के सामने आ जाएगा। मैं बताना चाहूंका कि यूएनआई अब भगवान भरोसे है। रिटायर होने के बाद सवा साल पहले तीन तिकड़म से जनरल मैनेजर की कुर्सी पर काबिज हुये अरूण कुमार भण्डारी ने करीब 50 साल पुरानी इस संस्था को बन्दी के कगार पर पहुंचा दिया है। कम्पनी के करीब 900 कर्मचारियों का पांच महीने का वेतन बकाया हो चुका है। किसी के बच्चे की फीस नहीं जमा हो रही है तो किसी का मकान मालिक उसे किराये नहीं देने की वजह से घर से निकाल चुका है और कोई बनिये और दूध वाले के उलहानों से आजिज होकर खुदकुशी करने के बारे में सोच रहा है।

इस त्रासदी का एक दर्दनाक पहलू यह भी है कि भण्डारी और उसकी जेबी यूनियन के नजदीक रहने वाले दिल्ली में तैनात पन्द्रह प्रतिशत कर्मचारियों को एडवांस के नाम पर जनवरी तक का वेतन दिया जा चुका है जबकि बाकी कर्मचारी भुखमरी के कगार पर हैं। यूएनआई के इतिहास में पहली बार यह भी हुआ कि पिछले साल अगस्त में कर्मचारी यूनियन के चुनाव के दौरान भण्डारी और उसके चमचों ने एक गुट का खुलकर समर्थन और प्रचार किया था। कर्मठ कर्मचारियों की कोई सुनवाई नहीं हो रही है और मुम्बई में तैनात कर्मचारी नेता सीपी झा के खिलाफ चल रहे फर्जी मुकदमे को बार-बार अनुरोध के बावजूद वापस नहीं लिया जा रहा है।

यूएनआई इस समय 20 से 25 करोड़ रुपये के घाटे में है। अक्टूबर 2008 में भण्डारी के जनरल मैनेजर बनने से पहले कर्मचारियों का एक महीने का वेतन बकाया था मगर आज वेतन, एलटीए, आकिस्मक अवकाश का भुगतान मिलाकर हर कर्मचारी का लगभग दो लाख रुपया बकाया हो चुका है। कोढ़ में एके भंडारी : लायक नहीं खलनायक हूं मैं!खाज यह है कि कर्मचारियों ने अपनी गाढ़ी कमाई से पेट काटकर थ्रिफ्ट सोसाइटी में जो पैसा जमा किया था, धोखाधड़ी से उसका करीब दो करोड़ रुपया भी दबा लिया गया है। भण्डारी ने सोसाइटी को कभी दस लाख देने का तो कभी पांच लाख रुपया हर महीने देने का झूठा आश्वासन दिया मगर सोसाइटी का पैसा नहीं मिलने की वजह से हर साल अगस्त और दिसम्बर में वितरित की जाने वाली ब्याज एवं लाभांश की राशि सदस्यों को धनाभाव की वजह से नहीं मिली। कर्मचारियों के भविष्य निधि का पैसा जिस माह जमा होता है, हाय-तौबा मच जाती है और वेतन भुगतान पिछड़ जाता है। संवाद समिति रायटर का करोड़ों बकाया है और भुगतान नहीं होने की वजह से वह बार-बार सर्विस काटने की धमकी दे रहा है। यही हाल यूएनआई की सेवा ग्राहकों तक पहुंचाने वाली गुड़गांव स्थित एक कम्पनी का भी है। भुगतान न किये जाने की वजह से इस कम्पनी ने ग्राहकों और यूएनआई की तरफ से आने वाली शिकायतों पर ध्यान देना बन्द कर दिया है।

जीएम बनकर भण्डारी ने संस्था को चलाने के लिये प्रदीप कश्यप, अरूण केसरी, शोभना जैन, आलमगिर, संजय भटनागर, अभिजीत चन्द्रा, शरद द्विवेदी, सतीश साहू, संजय भूसे और अविनाश झा को आगे बढ़ाया जबकि नीरज बाजपेयी, सीपी झा, सुरेन्द्र कुमार अरोडा, नरेश सिंह, दीपक बिष्ट, कुलदीप सिंह अरोड़ा, सदाशिव पिल्लै, अशोक साहू, उपेन्द्र कुमार, अशोक गुप्ता और केएन मिश्रा सरीखे लोगों को लगातार प्रताड़ित किया है। झूठ, फरेब और दमन के सहारे कम्पनी चलाने का ख्वाब देखने वाले भण्डारी ने कभी छत्तीसगढ़ सरकार से दो करोड़ रुपये, कभी मध्य प्रदेश सरकार से पांच करोड़ रुपये, कभी तत्कालीन सूचना प्रसारण मन्त्री आनन्द शर्मा से अपनी नजदीकी का हवाला देकर केन्द्र से 20 करोड़ रुपये लाने का झांसा दिया तो कभी जर्मन टीवी और कभी यशवन्त देशमुख से समझौता करके कम्पनी में करोड़ों रुपये लाने के सब्जबाग दिखाये।

कंपनी की मौजूदा बदहाली से परेशान कर्मचारियों द्वारा दिल्ली स्थित यूएनआई मुख्यालय में 'भण्डारी हटाओ' अभियान चलाया जा रहा है और एक फरवरी को यूनियन की जनरल बाडी की बैठक में सर्वसम्मति से कर्मचारी 'भण्डारी इस्तीफा दो' प्रस्ताव पारित करके निदेशक मण्डल को भेज चुके हैं। इसके बावजूद कम्पनी को किसी निजी घराने को बेचकर करोड़ों रुपये कमीशन हथियाने का ख्वाब लेकर भोपाल से दिल्ली आये एके भण्डारी पूरी बेशर्मी से अपने पद पर जमे हैं। जीएम की कुर्सी पर बने रहने की ख्वाहिश में भण्डारी कर्मचारियों में इतनी फूट डाल चुका है कि कई लोगों की अनदेखी करके ब्यूरो प्रमुख बनाई गई शोभना जैन के खिलाफ पिछले हफ्ते यूनीवार्ता के तीन कर्मचारी पुलिस में रिपोर्ट दर्ज करा आये। इस शिकायत पर कम्पनी में पुलिस पहुंची और खूब थुक्का फजीहत हुई।

प्लीज, भड़ास4मीडिया टीम से अनुरोध है कि वह यूएनआई को बचाने के लिए चलाए जा रहे अभियान में शामिल होकर एक मिसाल कायम करे.

आपका

एक कर्मचारी

यूएनआई


AddThis