यूएनआई को किसी बड़े निजी समूह के हवाले करने की तैयारी!

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पीटीआई की तरह यूएनआई को आर्थिक पैकेज क्यों नहीं? : यशवंत जी, मैं तथ्‍यों की बात करते हुए कुछ मुद्दों पर आपका और उन लोगों का ध्‍यान आकर्षित करना चाहूंगा जिनकी यूएनआई के बेहतर भविष्‍य में रुचि है और जो इस देश में दो न्‍यूज एजेंसी होने की अवधारणा के समर्थक हैं। निष्‍पक्ष पत्रकारिता के लिए बेहद जरूरी भी है। यूएनआई में चालाक और शातिर लोग शतरंज की‍ बिसात पर दूसरों को गोटियों की तरह इस्‍तेमाल कर रहे हैं। यूएनआई जब आर्थिक संकट के दौर में उलझी तभी एक वर्ग सक्रिय हुआ और उसने इस संस्‍थान को किसी बड़े समूह के हाथ में सौंपने की तैयारी करते हुए दांव फेंकना शुरू किया।

यूएनआई को लेकर आज आरोप प्रत्‍यारोप लगाने वाले इसके बेहतर भविष्‍य के लिए कोई सार्थक योजना लेकर सामने आते हुए क्‍यों नजर नहीं आते हैं। बदली हुई परिस्थितियों में इस एजेंसी में भी बहुत से बदलाव जरूरी हैं। केंद्र सरकार ने पीटीआई को जिस तरह कुछ वर्ष पहले आर्थिक पैकेज दिया था वह यूएनआई को क्‍यों नहीं दिया जा रहा है। दरअसल भीतर भीतर तैयारी है कि इस एजेंसी को फिर किसी बडे समूह के हवाले कर दिया जाए और यह समूह जी ग्रुप हो सकता है जिसने पहले भी ऐसा करने का प्रयास किया। इस सवाल का जवाब कौन देगा कि वह कौन लोग हैं जिन्‍हें यूएनआई को तीन वर्ष पहले उसी समूह को सौंपने की तैयारी करने वाले एक पूर्व सर्वोच्‍च पदा‍धिकारी के यहां से आज भी मिठाई और सौगातें भेजी जाती हैं।

यह समय आरोप प्रत्‍यारोप  लगाने और गंदी राजनीति करने का नहीं है। गरिमामय पत्रकारिता के इस शानदार मंच ने अपने श्रेष्‍ठ समय में  अपने सभी कर्मचारियों को यथोचित सम्‍मान और मानदेय उपलब्‍ध कराया है । आज एक मां की तरह यूएनआई उसका प्रतिदान मांग रही  है। लेकिन इसके बदले षडयंत्र और कर्मचारियों को मूल मुद्दे से हटाने की कोशिश की जा रही है। समय रहते इस साजिश से सावधान होना और इसे विफल करना बहुत जरूरी है । ऐसा न होने पर न सिर्फ यूएनआई एक बार फिर बिकने की कगार पर खडी होगी बल्कि इसके साथ ही देश में पत्रकारिता का एक सार्थक और विश्‍वसनीय मंच भी ढह जाएगा। अगर ऐसा हुआ तो यह भारतीय पत्रकारिता जगत का एक ऐसा नुकसान होगा जिसकी भरपाई किसी भी रूप में संभव नहीं होगी। उम्‍मीद करता हूं कि मुद्दे से जुडी यह बातें आपको भी प्रभावित करेंगी और आप पूरी निष्‍पक्षता के साथ इन्‍हें स्‍थान देंगे।

आपका

यूएनआई का एक कर्मचारी


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Comments (6)Add Comment
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written by ex Uni, February 11, 2010
Bhandari ki tareef karne wale sirf bhopal main hi hain aur wo sabhi bhandari ke chamche hain. Sab jante hain ki bhandari ne naukri ke dairan kitna maal do number se banaya hai. iska taja example bhopal main jameen mamle main bhandari ka naam uchalna hai. Delhi main bhi Bhandari ne apni bhopali fauj khari ki hai. ye sab UNI ke staff kam aur bhandari ke naukar jyada lagte hain. Bhandari jaise aadmi ko jitna jaldi ho UNI se bhaga dena chahiye.
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written by भोपाल से वार्ता कर्मचारी , February 10, 2010
इस ब्लॉग में वार्ता के GM और भोपाल में पूर्व bureau chief AK Bhandari के बारे में काफी पढ़ा. लेकिन क्या ये लोग जानते है की उन्होंने कितने लोगो क़ी, कब कब मदद की है. वार्ता के कई कर्मचारी आज संसथान में है तो उन्ही की बदौलत. दफ्तर में शराब पीने की वजह से कई बार कर्मचारियों क़ी नौकरी लेने का निर्णय लिया गया था, लेकिन उन्होंने मैनेजमेंट से बात कर, इसे रुकवाया. कम से कम भोपाल के बारे में तो उदाहरण main जानता हूँ. उन्होंने हमेशा कर्मचारियों के परिवार के हितो का ख्याल रखा है. वार्ता के बारे में government को भी, स्पेशल package के बारे में सोचेना चाहिए, ताकि, हजारो कर्मचारियों क़ी जिंदगिया बच सके.
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written by an employee of UNI, Delhi, February 10, 2010
साफ़ है की वार्ता और UNI कर्मचारियों के एक गुट की गन्दी राजनीती का शिकार हो रहे है. आखिर इन कर्मचारियों का उद्देश्य क्या है. जाहिर है की वे उन तत्वों के हाथ में खेल रहे है, जो इसे किसी दूसरे समूह को बेचने की koshish में है. और लोगो के पास इस बात के पुख्ता सबूत है की कुछ कर्मचारी नेता चाहते है कि यह पुराना संस्थान, जिसने कई नामी गिरामी पत्रकार पैदा किये, जल्दी ही बिक जाये. और यदि यह मान लिया जाये (जो संभव नहीं है) कि, संसथान पर koi media baron काबिज होता है, तो सबसे पहले गाज गिरेगी कर्मचारियों पर. अधिकांश कर्मचारियों कि नौकरी जाएँगी. सोचना जरुरी है कि आखिर कर्मचारियों के लिए क्या बेहतर है. जो नेता, मैनेजमेंट का विरोध कर रहे है, क्या ve बेहतर सोच के साथ काम कर सकते है. यदि कोई नाराज़गी है तो टेबल पर बैठ कर इसे सुलझाया जा सकता है. इसका हल रोज रोज नारेबाजी से नहीं निकल सकता. वार्ता का ऑफिस किसी न्यूज़ agency का दफ्तर कम, नेतागिरी का अड्डा ज्यादा लगता है.
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written by Pihu Singh, February 09, 2010
Its not who is coming n who is selling uni.. its all about product...
if u r not saleable n if ur prouct fails in impressing the readers then man u r lost... people can undermine such giant syndication if its foundation is not strong.. n they can be only through good special stories..
Anyone can tell me why gradually one by one all the leading english newspapers abandoned uni .. n even why mediocre papers like free press stopped the subscription... they dnt have much to do with its internal conflict but quality....
If u cannt work properly, failed in getting good impacts then obviously ur revenue will fall... n the shp will sink... one shall stop the blame blame game...
UNI is a subject to be studied in IIMs .n it will be in days to come .. i bet ..
UNI : a great fiasco... a media tragedy....... another UNI ...?? what to say.. employee or victim .. Wellwisher will be apt word
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written by krishna murari, February 09, 2010
asal me sarkari tantra ke saath hamesha yahi dikkat rha hai aarthik udarikaran jabse lagu hua hai tabse hi sarkari tantra ko dhire dhire khokhla kiya jata hai uske baad use kisi bazaru giddh ke samne paros diya jata hai. isme kai logo ki bhagidari hoti hai neta se lekar peon tak. samanya si baat hai kya aise proffesssional ko nhi laaya jay jo ise puri tarah renovate kare. uni jaisa sansthan chahe to bazar se hi kai crore kama sakta hai aur apne usool par rahte hue kama sakta hai. lekin nhi kai kutte jo tak me hai botiyan nochne ke liye.
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written by Aman, February 09, 2010
बात बिलकुल ठीक है। यूएनआई को लेकर सिर्फ राजनीति ही हो रही है। जिन ए के भंडारी की आज आलोचना की जा रही है एक साल पहले उन्‍हें ही इस संस्‍थान की कमान सौंपने के लिए मन्‍नते की जा रही थी। पिछले कुछ वर्षों में यूएनआई एक ऐसे पेड की तरह रही है जिसकी जडों में लगातार मठ्ठा डाला गया है और ऐसा करने वाले कोई गैर नहीं अपने ही थे।
ईमानदारी से यह सवाल यूएनआई का हर एक कर्मचारी अपने से पूछे कि आज ऐसा कौन सा व्‍यक्ति है जिसके आते ही यूएनआई की किसी एक्‍सप्रेस की तरह दौडने लगेगी। भंडारी जी के कार्यकाल में कोशिशें बहुत हुईं। फिजूलखर्ची रोकी गई। न्‍यूज आपरेशन और खबरें बढायीं गईं। बाहर से पैसे लाने के प्रयास भी हुए लेकिन इन सबको यूएनआई के भीतर ही कुछ उन लोगों से मदद नहीं मिली जिनसे इसकी अपेक्षा थी और अगर वह भी इन प्रयासों से जुडते तो शायद तस्‍वीर बेहतर होती।

यूएनआई का एक संपादकीय सहयोगी।


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