अमरउजाला डाट काम के कायाकल्प की तैयारी

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अमर उजाला प्रबंधन देर से जगा है. इन्हें अब समझ में आ चुका है कि अमरउजाला डाट काम को 'एयू' फांट की बजाय हर जगह देखे-पढ़े जाने में सक्षम आधुनिक यूनीकोड में कनवर्ट किया जाए. अभी अगर कोई अमर उजाला डाट काम खोलता है और उसके कंप्यूटर पर अमर उजाला का 'एयू' फांट इंस्टाल नहीं है तो इस वेबसाइट को पढ़ नहीं सकता. उसे अमर उजाला डाट काम से एयू फांट डाउनलोड कर अपने कंप्यूटर में इंस्टाल करना पड़ता है. तकनीक के कम जानकार कई लोग यह काम नहीं कर पाते, सो, वे खबरों के लिए दूसरी वेबसाइटों पर चले जाते हैं. जो जानकार हैं, वे भी फांट डाउनलोड के झंझट से बचते हुए किसी और साइट की ओर सरक लेते हैं.

दूसरे अखबारी घराने अपनी-अपनी वेबसाइटों को ट्रेडीशनल फांटों से जाने कबके मुक्त कर चुके हैं. दूसरे मीडिया हाउस वेब माध्यम के भविष्य व इसकी उपयोगिता को अच्छी तरह समझते हैं. इसीलिए वे वेब व इंटरनेट सेक्शन को सुगठित, पुनर्गठित कर सबसे आगे निकलने की होड़ में कूद चुके हैं. खासकर भास्कर डाट काम इन दिनों जबर्दस्त तरीके से अपडेट किया जा रहा है. भास्कर डाट काम को प्रमोट करने के लिए दैनिक भास्कर अखबार में बड़े-बड़े आकर्षक विज्ञापन भी प्रकाशित किए जा रहे हैं. भास्कर समूह अपने वेब पोर्टल को आज के युवाओं के इंतजार न करने की आदत से जोड़कर मार्केट कर रहा है. 

एनबीटी, हिंदुस्तान, प्रभात खबर, दैनिक जागरण, राजस्थान पत्रिका समेत कई अखबार अपने पोर्टलों पर खूब जोर दे रहे हैं. जागरण ने तो अपने कर्मियों को आनलाइन तौर पर इंगेज रखने और उनके लिखे का व्यावसायिक उपयोग करने के लिए एक ब्लाग पोर्टल बना दिया है, जागरण जंक्शन डाट काम नाम से. इसी समूह के टैबलायड अखबार आई-नेक्स्ट के वेब पोर्टल पर जबर्दस्त तरीके से काम चल रहा है. आई-नेक्स्ट के वेब पोर्टल को युवाओं का सबसे पसंदीदा पोर्टल बनाने की योजना है. इसी तरह हिंदुस्तान अखबार के लोगों के लिए भी प्रबंधन ने एक ब्लाग पोर्टल बनाया है जिस पर इस अखबार से जुड़े कई वरिष्ठ-कनिष्ठ लोग लिखते रहते हैं. पर अमर उजाला प्रबंधन अपने पोर्टल को लेकर कोई खास चिंतित नहीं दिखा, ब्लाग की बात तो दूर है.

पर अब लगता है कि अमर उजाला डाट काम का उद्धार होने वाला है. पूरी साइट को यूनीकोड में कनवर्ट कर अमर उजाला डाट काम का नया अवतार लाने की तैयारी हो गई है. इसका विज्ञापन भी अमर उजाला डाट काम पर दिखने लगा है. हालांकि आज दोपहर अमर उजाला डाट काम का बेटा वर्जन खोलने पर सर्वर इरर दिखा रहा था. पर इसे अब ठीक किया जा चुका है. नया टेंपलेट आकर्षक है. उम्मीद करते हैं कि अमर उजाला प्रबंधन प्रिंट की तरह वेब सेक्शन पर भी आने वाले दिनों में ज्यादा दिमाग खर्च करेगा. अमरउजाला डाट काम के बेटा वर्जन को आप यहां क्लिक कर देख सकते हैं- अमरउजाला


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Comments (1)Add Comment
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written by kumar hindustani, March 06, 2010

आगे बढऩे की ललक होना अच्छा है और कुछ इसी राह पर शायद अमर उजाला चल निकला है। देर से ही सही लेकिन एक अच्छी शुरुआत के लिए अमर उजाला को धन्यवाद व्यक्त करता हूं। किसी बेहतरीन मकसद, लक्ष्य, सोच को सही साबित करने के उद्देश्य से प्रारंभ हुआ यह सफर अब कहां तक चलेगा, यह तो आने वाला वक्त ही बताएगा।
जरूरी यह जानना है कि अमर उजाला अब कॉरपोरेट कल्चर को आत्मसात करने लगा है। तभी तो दो साल पहले शुरु हुए अमर उजाला के कॉरपोरेटाईजेशन के बाद केवल केबिन में कॉरपोरेट मीटिंग्स, सेमीनार, वर्कशॉप आदि होते थे। लेकिन केबिन की बत्ती बुझने और कर्मियों के बाहर निकलने के साथ ही दिमाग की बत्ती भी गुल हो जाती थी। कॉरपोरेट कल्चर केवल काल्पनिक कथानक का काम करता था।
अब लगता है अमर उजाला एक नए उजाले के साथ तैयार हो रहा है। कॉरपोरेट होने के बाद से अब वो इसका असली मतलब समझना शुरु कर रहा है। जिसका ताजा उदाहरण आजकल अमर उजाला कर्मचारियों के मोबाइल फोन को मिलाने पर सभी को पता चल रहा है। बात हो रही है अखबार कर्मियों के मोबाइल की नई कॉरपोरेट कॉलर ट्यून अमर उजाला की।

'अमर उजाला,
जोश सच का।।
रात हो या सहर,
ना रुकेगा सफर।
मीलों हमें चलना है
ये वक्त बदलना है,
ये वक्त बदलना है
ये वक्त बदलना है....
अमर उजाला,
जोश सच का।।Ó

जैसे ही आप अपने किसी भी अमर उजाला कर्मचारी मित्र का मोबाइल फोन घनघनाएंगे, उक्त कॉलर ट्यून बेहद ही जोशीली आवाज में साफ सुनाई देगी। यह कॉलर ट्यून अमर उजाला द्वारा ही रचित है और इसे गायकों ने बुलंद आवाज दे कर अल्फाजों को यथार्थ बनाने पर जोर डाला है। लेकिन अगर एक-एक अल्फाज पर गौर करें तो देखिए क्या पता चलता है।

'अमर उजाला (काफी पहले से ही सबको पता है, लेकिन कोई भी उजाला अमर नहीं हो सकता, उजाले-अंधेरे का एक अनवरत चक्र है।)Ó
'जोश सच का (यह स्लोगन ताकि सच जिंदा रहे स्लोगन की हत्या करने के बाद दिया गया। यानी सच मर गया लेकिन झूठे जोश को सच कहने में क्या जाता है? )Ó
'रात हो या सहर (काली अंधियारी रात हो या फिर उजाला, केवल जोश दिखेगा, होश के बारे में अभी नहीं पता)Ó
'न रुकेगा यह सफर (अब यह कारवां आगे बढ़ निकला है, जो किसी भी कीमत पर रुकने वाला नहीं)Ó
'मीलों हमें चलना है (यानी, कारवां इतना बढऩे के बाद भी वहीं खड़ा हुआ है। अभी भी न जाने की कितनी दूरी बाकी है जिस पर चलना है। या यूं कहें कि अब सफर की असली शुरुआत हुई है।)Ó
'ये वक्त बदलना है (सबको पता है कि समय को कोई नहीं बदल सकता। यह सदियों से चला आ रहा एक सार्वभौमिक सत्य है कि समय खुद ही आगे चलता और बदलता रहता है। लेकिन अब अमर उजाला ने यह जिम्मेदारी उठाई है। देखना है कि अमर उजाला वक्त बदलता है या फिर आने वाला वक्त अमर उजाला को बदलता है)Ó

एक बात साफ कर दूं कि यहां मैं किसी निजी स्वार्थवश अमर उजाला की बढ़ाई या बुराई नहीं कर रहा हूं। वरन, सभी को उस हकीकत से दो-चार करने की कोशिश कर रहा हूं जो अमर उजाला के बारे में शायद सभी को नहीं पता।
कौव्वा चले हंस की चाल, नुमा मुहावरे पर आंख मूंद विश्वास करते हुए अमर उजाला चला आया है। शशि शेखर के वक्त में समूह ने काफी तरक्की की। लेकिन वो तरक्की वास्तविक न होकर केवल एक नकल भर थी। अमर उजाला ने विश्व के नंबर एक हिंदी दैनिक अखबार दैनिक जागरण की नकल करना प्रारंभ किया और तरक्की के सोपान पाता चला गया।
लेकिन हकीकत में नकल करने वाला नकली ही रह जाता है। वो कभी खुद से एक मिसाल नहीं खड़ी कर सकता। वो जो भी करता है उसमें नकल की बू साफ-साफ सुंघाई देती है। पहले कंटेंट की प्रमुखता से नकल करने के कुछ वक्त बाद खुद को पुन: नकली साबित करने के लिए कॉरपोरेटाइजेशन में खुद को ढालने लगा अमर उजाला। लेकिन कॉरपोरेट मीटिंग्स में शामिल होने वाले 90 फीसदी अमर उजाला कर्मियों को शायद ही पता होता कि दरअसल यह कॉरपोरेट क्या बला है? 'अधिकांश इसे कार से उतर कर कारपेट वाले केबिन में होने वाली फालतू मीटिंग भर ही समझते आए हैं।Ó
सालों से अमर उजाला में काम करते आए असल देशी कर्मचारियों को एकदम से कॉरपोरेट का सीरप पिलाने के बाद से अमर उजाला ने फिर नकल की। अबकी बार नकल थी उसी नंबर वन अखबार के टैबलॉयड आई-नेक्स्ट की। सही समझे- कॉम्पैक्ट लांच करने के पीछे अमर उजाला की यही मंशा थी कि कहीं जागरण बड़े-छोटे अखबार की कहानी सुनाकर पूरे बाजार में कब्जा न कर ले। इसलिए फटाफट नकल की, आधी-अधूरी तैयारी से झटपट कॉम्पैक्ट का प्रकाशन शुरु कर दिया।
उधर जागरण सफलता की एक से एक नई इबारतें लिखता रहा। इसी कड़ी में उसने विश्वप्रसिद्ध इंटरनेट सर्च इंजन याहू के साथ गठजोड़ करके अपना ई-संस्करण सर्वश्रेष्ठ कर लिया। लेकिन बेचारा अमर उजाला अभी तक उस तकनीकी को नहीं समा पाया। और आज भी ऑनलाइन विशेषज्ञों की टीम अमर उजाला की वेबसाइट निर्माण में जुटी है। नकल का कितना दुष्परिणाम भुगतना पड़ता है इसका अंदाजा इस बात से ही लगाया जा सका है कि जहां जागरण की एक वेबसाइट है, वहीं नकल के चक्कर में अमर उजाला को तीन वेबसाइट बनानी पड़ गईं। लेकिन सफलता अभी भी नहीं मिल पाई है। रोज सिस्टम हैंग रहता है, वेबसाइट अपडेट नहीं हो पाती जैसी शिकायतें सामने आना आम बात है।
मेरा न केवल अमर उजाला बल्कि उन सभी विकासशील मीडिया घरानों के संपादकों, मालिकों से निवेदन है कि नकल करने वाला हमेशा नकली ही रहता है। इसलिए खुद की अकल पर भरोसा करें। हमेशा अपने कर्मचारियों पर भरोसा जताकर उन्हें कुछ ऐसा नया इजाद करने के लिए कहें जो बाजार में एक मानक बन जाए। कर्मचारियों की प्रतिभा का सही आंकलन कर प्रयोगात्मक रुख भी अपनाएं। सफलता के लिए केवल सही मौके पर सही शुरुआत करने भर की देरी होती है। इसलिए पंरपराओं की दीवारें तोड़कर और दूसरों की नकल छोड़कर खुद से एक ऐसी नई दास्तान बनाएं जो औरों के लिए भी एक मिसाल बन उन्हें कुछ नया करने के लिए प्रेरित करे।

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