भड़ास4मीडिया और मीडिया के छुपेरुस्तम

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हम सभी चाहते हैं कि हमारी समस्याएं कोई आकर हल कर दे और हम खुशहाल हो जाएं. हम सभी चाहते हैं कि पड़ोसी के घर में भगत सिंह पैदा हो जाएं और समाज, देश व मोहल्ले के हित के लिए फांसी पर लटक कर शहीद का दर्जा पा जाएं पर अपने घर के किसी आदमी पर कोई आंच न आए, अपने घर का कोई बंदा क्रांतिकारी बनकर दुख न उठाए. मीडिया में भी यही हाल है. हजारों लोग परेशान हैं. उत्पीड़न झेल रहे हैं. मानसिक यंत्रणा उठा रहे हैं. कोई बास से परेशान है. कोई माहौल से नाखुश है. कोई सेलरी कम होने से दुखी है. कोई सहकर्मियों के उत्पीड़न से त्रस्त है. कोई काम न मिलने का रोना रो रहा है. कोई काम कर-कर के मरा जा रहा है. वे अपनी समस्याओं का हल चाहते हैं. वे जिनसे परेशान हैं, उनकी करतूत का पर्दाफाश करना चाहते हैं. पर वे नहीं चाहते कि उनका नाम व पहचान उजागर हो.

इसलिए वे फर्जी मेल आईडी बनाकर ढेर सारी बातें, अपने दिल की पूरी भड़ास लिखकर भड़ास4मीडिया के पास भेज देते हैं. अब दिक्कत ये है कि भड़ास4मीडिया के पास इनका नाम, नंबर व पहचान तो है नहीं जो इनकी खबर कनफर्म की जाए. दूसरे, जिस पर आरोप लगाए गए हैं, उनसे अगर हम पूछते भी हैं कि आप पर ये आरोप लगाए गए हैं तो वह बंदा पलट कर पूछेगा कि ये आरोप किसने लगाए हैं, आपके पास क्या प्रमाण है, कोई तो आधार हो? जाहिर है, ऐसे में कोई जवाब नहीं दिया जा सकता. ऐसे में कोई खबर पब्लिश नहीं की जा सकती. कुछ मेलों में तो कही गई बातें इतनी छोटी व घटिया होती हैं कि उन्हें पब्लिश करने में भी शर्म महसूस होती है. नीचे ऐसी दो मेलों का प्रकाशन किया जा रहा है जिसमें भेजने वाले का कोई फोन नंबर, पहचान, पता आदि नहीं दिया गया है पर इन लोगों की करबद्ध विनती है कि इनकी समस्याओं का प्रकाशन करा दिया जाए ताकि इन्हें सताने वाले इनके बासेज की वाट लग सके.

ऐसे छुपेरुस्तों से हम लोग यानि भड़ास4मीडिया वाले बेहद परेशान हैं. भई, आपकी दिक्कत भी हल हो जाए, आप पर कोई आंच भी न आए, आपकी बात भी प्रकाशित हो जाए और आपके बारे में किसी को पता भी न लग सके, आपकी बंदूक चल जाए पर कंधा किसी और का मिल जाए..... क्या यह उचित है? भड़ास ब्लाग या भड़ास4मीडिया डाट काम कभी छुपेरुस्तमों का मंच नहीं रहा है. आपको कुछ कहना है तो खुलकर सामने आइए, हम आपको मंच दे रहे हैं. पर यह नहीं होगा कि आपके अनर्गल प्रलाप, बिना आधार के आरोपों को आपके बिना नाम व पहचान के साथ प्रकाशन कर दें. हम यह बात खासकर उन लोगों से कहना चाहते हैं जिनका भड़ास4मीडिया से सिर्फ इतना लेना-देना भर होता है कि उनके बास के खिलाफ किसी तरह कुछ छप जाए ताकि बास की परेशानी बढ़े और उनकी परेशानी कम हो जाए. अगर उनकी बात न छापो तो वे भड़ास4मीडिया वालों को कायर कहेंगे, अगर छाप दो तो फिर कुछ महीनों बाद अपने बास के खिलाफ नया मसाला लेकर प्रकट हो जाएंगे. ऐसे छुपेरुस्तमों से जिनकी निगाह अपने बास से बिलकुल आगे नहीं बढ़ पाती, हाथ जोड़कर हम अनुरोध करते हैं कि प्लीज, हम 'कायरों' को बख्श दो.

अगर आप में थोड़ी बहुत भी हिम्मत है तो नाम-पहचान के साथ सामने आइए. यह भी हिम्मत नहीं है तो मुफ्त का एक फर्जी नाम से ब्लाग बना लीजिए और उसमें फर्जी नाम से अपने बास के खिलाफ रोजाना एक पोस्ट ठेल दिया करिए. ठेलने के बाद उसके लिंक को सभी मेल आईडीज पर फारवर्ड कर दिया करिए. बस, आपकी बात पहुंच जाएगी लोगों तक. लेकिन आप चाहेंगे कि आपके चिरकुट किस्म के स्वार्थों का मंच बन जाए भड़ास4मीडिया तो वो नहीं होने वाला है.

भड़ास4मीडिया से जुड़े हजारों लोग, जो खबरें बताते हैं, भेजते हैं, पढ़ते हैं पर हम उनकी पहचान कभी उजागर नहीं करते, का स्वार्थ खुद के लिए नहीं होता बल्कि वे पत्रकारिता, देश, समाज व सरोकार से संचालित होते हैं और चाहते हैं कि ऐसी चीजें सामने आएं जो पत्रकारिता के लिए जरूरी है. जो सूचनात्मक खबरें हैं, उनका स्वागत है. हम इंतजार करते हैं कि सूचनात्मक खबरें साथी लोग भेजें. ऐसे सकारात्मक दृष्टिकोण वाले साथियों का हम सम्मान करते हैं. बड़े विजन के साथ भड़ास4मीडिया से जो भी जुड़ेगा, उसका स्वागत है पर कोई क्षुद्र स्वार्थों की पूर्ति के लिए भड़ास4मीडिया के मंच का इस्तेमाल करना चाहेगा तो हम उन्हें हतोत्साहित करेंगे. उनके मेलों को नहीं प्रकाशित करेंगे चाहे वे जितने दफे उसी मेल को फारवर्ड करते रहें या फोन कर कर के नाम-पहचान छुपाते हुए छापने का अनुरोध करते रहें.

आइए, वो दो मेल पढ़ते हैं, जिसे भेजने वाले नहीं चाहते कि उनका नाम-पहचान उजागर हो पर चाहते हैं कि यह छप जरूर जाए. आपसे हम जानना चाहते हैं कि क्या इन मेलों को इनके ओरिजनल स्वरूप में प्रकाशित किया जा सकता है.

इन दोनों मेलों में से वो सभी चीजें हटा दी गई हैं जिससे जिनके खिलाफ यह लिखा गया है, उन लोगों का पहचान किसी भी तरह उजागर होता हो, क्योंकि मेरा मानना है कि ये दोनों मेल क्षुद्र स्वार्थों से प्रेरित हैं और इनका मकसद दूसरों का चरित्र हनन करना है. इन दोनों मेलों को संपादित नहीं किया गया है. जैसा आया है, वैसा ही परोसा जा रहा है.

-यशवंत

एडिटर, भड़ास4मीडिया


yashwant Sir, मीडिया ४ भड़ास कॉम पर मीडिया से जुडी खबरे देख कर लगा कि मीडिया छेत्र में हो रहे बदलाव और पत्रकारों के उत्पीडन की जानकारी मुखर रूप से जनता के बीच पहुच रही है. ..... से प्रकाशित ..... के ..... कार्यालय में तैनात ब्यूरो चीफ द्वारा भी कायालय के स्ट्रिंगरो के साथ राजनीति और आपस में संपादक के नाम पर उत्पीडन किया जा रहा है.

ब्यूरो चीफ खुद एक सरकारी कालोनी में रह रहा है और बिना कनेक्सन के ही बिजली का उपभोग किया जा रहा है जबकि ब्यूरो चीफ स्ट्रिंगरो को ईमानदारी का पाठ पढ़ा कर स्ट्रिंगरो से अधिकारियो पर दबाव बनाने व् अधिकारियो से निहित स्वार्थो को पूरा कराये जाने के लिए अनावश्यक रूप से परेसान किया जाता है. कई स्ट्रिंगरो ने तो उत्पीडन के चलते कम ही छोड़ दिया है. ब्यूरो चीफ खुद को ..... के ...... का करीबी बता कर जिले में एक लोकल चेंनेल के साथ भी कम कर रहा है.


नमस्ते सर, मैं ...... का एक मामूली सा employ था कल तक लेकिन शाम को ..... के ....  ने मुझसे कहा की ..... को अब आपकी जरूरत नही है इसलिए अब आपकी यह से सारी सेवाए समाप्त की जाती है, मुझे निकालने की तो कोई वजह है नही. इन लोगों ने ..... के सभी छोटे employ को निकालना शुरू कर दिया था सबसे पहले तो ..... ने ..... को बाहर का रास्ता दिखाया और उनके बाद आपने Chintuo को लाना शुरू किया जिनमे ...... और ..... नाम मेन है. यही दोनों बास का ऑफिस से लेकर घर तक में इनकी Underwear तक का पूरा पूरा ध्यान रखते है, इन्ही दोनों की साजिश का शिकार एक और लड़का हुआ था उसको भी इन लोगो ने हटा ही दिया. अब बारी थी ...... की.

इसको भी निकालने की सोच रहे थे ये  लेकिन जैसे ही ..... को इसकी भनक भर लगी उसने ..... को खुद ही goodbye कर दिया था! मै यह अपने निकालने की वजह भी बता रहा हूँ दरअसल .... वाले दिन तकरीबन ..... बजे एक आदमी झोला लेकर ...... के ऑफिस आता है और मुझसे कहता है की पूरे 50 है और देकर चला जाता है मैंने उस झोले में झाककर देखा तो उसमे गड्डिया थी यानि 50 लाख रूप, अब   ...... को शक हो गया की मैंने ही इस बात को बाहर के लोगो में मैंने ही फैलाई है, मुझसे क्या लेना देना मै क्यों किसी से कहूँगा.

इन लोगो की तो करतूत ...... के सभी लोग जानते है, इनको ...... के दल्ला नाम से जाना जाता मै तो इनको दल्ला कहता नही हूँ, सभी लोग इनको दल्ला और भू माफिया के नाम से जानते है मेरी जॉब लेकर इन लोगों को क्या मिला ये लोग जानते है, अब ये पूरी तरह से sure हो चुके है इनकी करतूत बाहर अब नही जाएगी.........

यशवंतजी हम आपको ये भी बताना चाहते है की मैंने इनकी शिकायत ...... में कई लोगो से की लेकिन इन लोगो के कानो में जू तक न रेंगी, मुझे तो लगता है की जैसे कानून की आँखों में कानून की काली पट्टी बंधी होती है वैसे ...... के इन लोगो की आँखों में भी कानून की काली पट्टी की तरह ही कोई पट्टी बंधी है इसलिए ये सब खामोश है, मैंने इनकी शिकायत ......से भी की लेकिन उन्होंने भी कोई ध्यान नही दिया

अब आप से ही उम्मीद है की आप इस खबर को publish करे ताकि इनका असली चेहरा सबके सामने आजाये, एक बात और मैंने कोई बात गलत नही लिखी आप पता करना चाहेंगे तो इससे ज्यादा बाते आपको पता चलेंगी, ये लोग इस समय करोड़ो के मकान तलाश कर रहे है अगर आपके पास इनकी काली कमी को जाच करने का कोई तरीका हो तो plz मुझको जरूर बतादे!!!!! आपसे आखिरी विनती Plz plz plz इस खबर को जरूर publish करे अगर विटनेस बनने की जरूरत आई तो मै खुल कर सामने आऊंगा लेकिन आप पे कोई आंच नही आने देंगे...............


ऐसे ही कई मेलों के रोजाना दर्शन होते हैं जिसमें किसी न किसी पत्रकार को बेसिर-पैर की कहानियों, बिना प्रमाण कही गई बातों के जरिए निशाना बनाया गया होता है. कुछ मेलों में तो यहां तक लिखा होता है कि फलां आदमी दूसरे मीडिया हाउस के फलां शख्स से मिलने पहुंचा है और इससे सनसनी फैली हुई है, इसे जरूर छापिए क्योंकि यह आपके लिए बड़ी खबर है.... सलाह दीजिए, क्या इस तरह के बिना नाम-पहचान वाले छुपेरुस्तम लोगों के मेलों को प्रकाशित कर देना चाहिए?


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