'मया के बरखा' 21 को रिलीज होगी

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छत्तीसगढ़ के रुचिवान सिने दर्शकों के लिये के लिये 21 मई 2010 का दिन खास महत्व का होगा। इस दिन अपने लोगों की अपनी बोली में भव्य फीचर फिल्म 'मया के बरखा' रिलीज होगी। 'मया के बरखा' छत्तीसगढ़ की गुरतुर बोली की पहली फिल्म नहीं है लेकिन पहली नहीं होने के बाद भी यह फिल्म कई मायनों में अलग ही महत्व रखती है। इस फिल्म में मुंबई के नामचीन कलाकारों का दखल है तो हबीब तनवीर की टीम के सहज और माटी से जुड़े किरदारों का सहज अभिनय भी। अपनी माटी और अपने लोगों की इस फिल्म का नाम 'मया के बरखा' है।

यह पूरी तरह फ्यूजन नहीं है किन्तु देशज की सुगंध दूर दूर तक छत्तीसगढ़ की माटी को महकाएगी। दुर्गा मीडिया साफ्टवेयर के बैनर तले बनी इस फिल्म का निर्देशन आशीष श्रीवास्तव ने किया है। इस फिल्म में प्राकृतिक रूप से धनवान छत्तीसगढ़ की परम्पराएं, संस्कृति, नदियों, कल कारखानों और उन सभी दृश्यों को जीवंत करने की कोशिश की है जिसके बूते छत्तीसगढ़ पूरी दुनिया में अलग से पहचाना जाता है। छत्तीसगढ़ की माटी में अनेक प्रेम कहानियां दर्ज हैं और यह दर्ज है कि प्रेम के बैरी भी। कुछ इसी कथानक को लेकर फिल्म की पटकथा बुनी गई है। आशीष युवा निर्देशक हैं और वे नये जमाने के छत्तीसगढ़ की पसंद नापसंद को खूब समझते हैं। उनकी इस समझ का परिचय फिल्म के हर हिस्से में दर्शकों को देखने को मिलेगा। जिंदगी के सच और प्रेम के महत्व को रेखांकित करती इस फिल्म के गीतों की धूम छत्तीसगढ़ के आंचल में बसे गांव गांव में गूंज रही है। फिल्म का संगीत कर्णप्रिय है। संगीतकार मॉरीस लाजरस उभरते हुए संगीतकार हैं।

छत्तीसगढ़ की माटी में रचे बसे संस्कारों और संस्कृति के अनुरूप गीतों को संगीतबद्व किया है। वे हबीब तनवीर जैसे महान रंगकर्मी के सानिध्य में रहे इसलिये भी उनके संगीत में ठेठ देशज का अनुभव होता है। छत्तीसगढ़ी में इस फिल्म की पटकथा का रूपांतरण लेखक एवं पत्रकार मनोज कुमार ने किया है। छत्तीसगढ़ की माटी में जन्मे मनोज कुमार का रिश्ता छत्तीसगढ़ के साथ वैसा ही है जैसा कि एक मां और बेटे का। भाषा, बोली, संस्कार और परम्पराओं के साथ बदलते दौर के युवाओं के मन की बात को उन्हीं की भावनाओ के अनुरूप् लिखा गया है।

छत्तीसगढ़ के ही प्रतिभाशाली गीतकार गुरूमीत कांबो ने गीतों को पिरोया है और इन गीतों को नुपूर गडकरी, महुआ चटर्जी, अखिलेश तिवारी, महादेव हिरवानी एवं अमित चक्रवर्ती ने अपनी सुमधुर आवाज दी है। मया के बरखा छत्तीसगढ़ की उस परम्परा की फिल्म है जब कभी कहि देबे संदेश बनी थी। पांच-छह दशक से भी ज्यादा पुरानी इस फिल्म में भी मुंबई और स्थानीय कलाकारों की भूमिका थी। कहना न होगा कि जिस तरह से मया के बरखा को युवा दर्शकों के साथ समूचे छत्तीसगढ़ की जनता का प्यार और रिसपांस मिल रहा है, उससे यह फिल्म एक नया रिकार्ड बनायेगी।


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