हीरोइन को नाचना भी नहीं आता

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पहले माफी मांग लेता हूं क्योंकि प्रियदर्शन की फिल्मों का इतिहास इतना बुरा नहीं है जितनी बुरी फिल्म 'खट्टा मीठा' बनी है। एकदम बकवास। कोई कहानी नहीं। कोई संवाद नहीं।

हंसाने के बेहूदा और बासी फॉर्म्यूले। फिल्म देखे हुये बारह घंटे से ज़्यादा बीत गये हैं लेकिन एक भी सीन ऐसा नहीं है जिसकी तारीफ कर सकूं। हीरो अक्षय कुमार है, बस यही कहानी है फिल्म की, जितना बन पड़ सकता है अक्षय ने कर दिखाया है लेकिन कमजोर कहानी ने सारे किये कराये पर पानी फेर दिया है।

हीरोईन तो ऐसी है कि बस पूछिये मत, नाचना भी नहीं सिखाया प्रियदर्शन ने उसको। कुलभूषण खरबन्दा ने जो गंभीरता दिखाई है उसे तार तार कर दिया है कमजोर कहानी और निर्देशन ने। सारे कलाकार प्रियदर्शन की पुरानी फिल्मों के पिटारे से ज़रूर हैं लेकिन कोई भी छाप नहीं छोड़ पाया।

असरानी का टेलीफोन पर कन्फयूज होने वाला सीन तो इतना बकवास है कि खुद असरानी को शर्म आ जाय़े। राजपाल यादव भी क्या करते। सबने जोर लगाया लेकिन सब दिशाहीन हो गये। भटकाव भी ऐसा कि पूरी फिल्म में रास्ता नहीं मिला। देश प्रेम के नाम पर इतने बासी डायलॉग कि उनमें से बास आ रही थी।

ये मेरी खुद की फ्रस्ट्रेशन हो सकती है कि मैं कुछ ज्यादा ही उम्मीद कर के फिल्म देखने चला गया था। बुरा मत मानियेगा लेकिन प्रियदर्शन की इस फिल्म में केवल बकवास ही बकवास है। कुछ भी देखने लायक नहीं है।

लेखक दिनेश कांडपाल जनसंदेश न्यूज चैनल में प्रोड्यूसर हैं.


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