10 वर्षों में 187000 'नत्था' जान दे चुके हैं

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रमेश भट्टएक नहीं, दो नहीं, इस देश में करोड़ों नत्था है। क्या हुआ जो पीपली लाइव का नत्था नहीं मरा। इस देश में 1997-2007 यानि 10 सालों में 187000 नत्था अपनी जीवन लीला समाप्त कर चुके हैं। यह तो सरकारी रिकार्ड में दर्ज नत्थाओं के आंकड़े हैं। ऐसे न जाने कितने नत्था होंगे जिनका नाम सरकारी फाइलों में नहीं होगा। दरअसल राजनीति और मीडिया के लिए नत्था जैसा मसाला संजीवनी की तरह होता है। एक पक्ष अपने वोट बढ़ने की आस लेकर आनंदित होता है, दूसरा टीआरपी के खेल में मशगूल।

नत्था की कहानी करोड़ों किसानों की कहानी है। यह उन करोड़ों किसानों की कहानी है जो हर पल अपनी जिंदगी को लेकर संघषर्रत है। यही कारण है कि पीपली लाइव फिल्म इन दिनों हर आमोखास के बीच चर्चा का विषय बन गई है। खासकर इससे जुड़े पात्र इसकी कहानी, बेहतर परिकल्पना ठेठ ग्रामीण परिवेश और इन सबसे उपर दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में राजनीति का खेल वाकई देखने लायक है। इन सबके बीच वह किसान जो अपनी खेती से अजीज आकर विकल्प की तलाश में भटक रहा है। किसानों की दुर्दशा पर फिल्माई गई यह फिल्म इस संवेदनशील मुददे पर सरकारी रूख की पोल खोलती है। किसानों की बढ़ती आत्महत्याओं ने सरकारों की नींद जरूर खुली मगर किसानों की आत्महत्या अब भी हो रही है। फिल्म से पहले यह जान लेना जरूरी है कि हमारी सरकार इस क्षेत्र में बदलाव लाने के लिए कितनी गंभीर हैं। किसानों की आत्महत्या के मामले में कुख्यात राज्यों में महाराष्ट्र, आंध्रप्रदेश, कर्नाटक और केरल आगे रहे।

इन सबके पीछे का कारण किसानों पर कर्ज का बड़ता बोझ था। आज भी हमारे देश में केवल 27 प्रतिशत किसानों की पहुंच बैंकों तक है। इससे साफ है कि किसानों की एक बड़ी आबादी आज भी साहूकारों से कर्ज लेती है। सरकार की 71 हजार करोड़ की कर्ज माफी योजना पर सबसे बड़ी आशंका इसी मुददे को लेकर थी। बहरहाल सरकार ने एक समिति गठित की है जो पता लगाएगी कि देश भर में कितने किसानों ने साहूकारों से कर्ज ले रखा है। बजट 2010-11 में कृषि ऋण बांटने का लक्ष्य 3.25 करोड़ से बढ़ाकर 3.75 करोड़ कर दिया है। साथ ही जो किसान समय से अपने ऋण बैंकों में चुकायेंगे उन्हें 2 प्रतिशत ब्याज दर की छूठ दी जायेगी। यह ऋण 7 प्रतिशत की ब्याज दर में 3 लाख तक लिया जा सकता है। यहां पर यह भी बताना जरूरी है कि खेती में सुधार पर बैठाये गए राष्ट्रीय किसान आयोग ने कृषि ऋण 4 प्रतिशत की दर पर देने की सिफारिश की थी।

पीपली लाइव में कर्ज के बोझ तले दबे नत्था को अपनी जमीन खो जाने की चिंता में वह दरदर भटक रहा होता है। वह जमीन जिससे उसके परिवार की रोजी रोटी चलती है। घर में बूढ़ी मां बीमार है। उसके इलाज में पहले ही बहुत खर्च हो चुका है। उस पर जमीन का चले जाने का मतलब जीवन में हर तरफ अंधेरा आ जाना। फिल्म मे जो काबिलेगौर बात इस मुश्किल घड़ी में मद्यपान करना वह नही भूलता। जाहिर है यह सामाजिक बुराई भी कोढ़ में खाज का काम करती है। किसान देश की राजनीति में अहम स्थान रखते है। एक आम आदमी की नजर में वह अन्नदाता है। नेताओं की नजर में वह वोट काटने की मशीन है।

मगर सच मानिए उसकी खुद की नजर में वह हांड मांस का एक ऐसा इंसान है जो दिन रात खून पसीना एक करके भी परिवार की जरूरतों को पूरा नही कर पाता। मीडिया के लिए नत्था की खबर एक मसाला है जो हाथों हाथ बिकेगा। बस उसे सनसनी की तरह पेश करो और टीआरपी की सीढ़ी चड़ो। किसान वह भी कहकर आत्हत्या करे राजनेताओं के लिए इससे बड़ा कोई मुददा नही। यह मुददा जीत को हार में और हार को जीत में बदल सकता है। यानि जीत और हार के बीच एक महीन रेखा जो नत्था जैसे किसान के जीने या मरने पर निर्भर करती है। इस फिल्म का संदेश यही है कि मीडिया को जिम्मेदार और नेताओं को वफादार बनना होगा। यह देश किसानों का है। खाद्य सुरक्षा का जिम्मा उनके कंधों पर है। लिहाजा उनके कल्याण के बिना देश के कल्याण के बारे में सोचना बेमानी होगी।

लेखक रमेश भट्ट जर्नलिस्ट हैं. इन दिनों लोकसभा टीवी में बतौर एंकर कार्यरत हैं.


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Comments (3)Add Comment
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written by mahima, August 30, 2010
sahi aur bahut hi sachi baat kahi hai aap ne ramesh ji. kisano ke desh main kishan karta hai aatamhatya wah re bharat aur iske bhagyavidhatao. 64 saal ke baad bhi kon hai jo kud ko aajad kah sakta hai. kisaan marta hai politician apna vote bank aur media apne trp aur news speed dekhti hai. kab aajad honge hamare kisaan india se.india to aazad ho gaya. per india se bharat kab aazad hoga.kab khatam hogi sahukarita, chatukarita, vote bank ki rajneeti aur trp ki andhi bhagam bhag.
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written by विनीत कुमार, August 24, 2010
अजयजी,कल्पेश मिस्त्री के साथ जो कुछ भी हुआ,उसके बाद भी कुछ कहने को रह जाता है। ये बात आप पीपली के तुरंत आने के बाद कहते तो कन्सीडर भी किया जाता। आपसे पहले भी एक नामचीन मीडियाकर्मी फेसबुक में यही मुद्दा उठा चुके हैं जिसका कि अब कोई अर्थ नहीं रह गया।
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written by Ajay, August 24, 2010
भट्ट जी, पीपली लाइव जिस विषय पर बनी है वह अतिसंवेदनशील मुद्दा है लेकिन फिल्मकार ने इसे सिर्फ अपने मतलब में भुनाया। मीडिया का स्तर अब भी इतना नहीं गिरा है जितना फिल्म में दिखाया गया है। इस संबंध में आप मेरा लेख नीचे दिए लिंक पर जाकर देख सकते हैं।

http://bharat-bhagya.blogspot.com/2010/08/blog-post.html

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