मुझे दुष्यंत कुमार ने बिगाड़ा

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मुझे बिगाड़ने में दुष्यंत कुमार का अमूल्य योगदान रहा है। दुनिया की ऐसी-तैसी करने का जज्बा मुझे उन्हीं के शेरों ने दिया, ये बात और है कि ता-उम्र नुकसान अपना ही करते रहे। तब कस्बे में ‘साये में धूप’ की एकमात्र प्रति अग्रज मित्र पांडे जी के पास हुआ करती थी जो किताबें मांगने वालों को अच्छी निगाह से नहीं देखते थे।

दुष्यंत के शेर बीच-बीच में उन्हीं के ‘मुख -कमल’ से सुने थे, सो ‘तुम्हीं ने दर्द दिया है, तुम्ही दवा देना’, की तर्ज पर किताब की मांग कर डाली। पहले तो उन्होंने दार्शनिक मुद्रा में शून्य की ओर तकते हुए इस मांग को लगभग अनसुना कर दिया। फिर दोबारा कहा तो उनके चेहरे पर कुछ फकीरों वाले भाव आए, होठों से फुसफुसाहट के साथ कुछ शब्द फूटे जो भाव-अभिव्यक्ति की हद तक तो नहीं पहुंच पाये पर संभवतः उनमें मेरे लुटने-पिटने की बद्दुआयें थी। वे बहुत भारी मन से -जैसे मैंने उनकी सारी जागीर अपने नाम कर डालने की जिद कर दी हो- अंदर गये। बाहर आये तो उनके हाथ में ‘साये में धूप’ के साथ ‘सोवियत पत्रिका’ की एक प्रति थी। इस संयोग को आसानी से समझा जा सकता था। मोटे और चिकने पन्नों वाली सोवियत पत्रिका तब बहुत आसानी से मिल जाती थी और इसका उपयोग पढ़ने के लिये नहीं बल्कि किताबों में जिल्द चढ़ाने के लिये होता था। उन्होंने बहुत करीने से किताब में जिल्द चढ़ाई, उसे अच्छे से रखने की सलाह दी, चेतावनी दी कि किताब किसी और को नहीं देनी है और उसके किसी भी पन्ने को कोने से मोड़ना नहीं है। अंत में जैसे कोई बाप अपनी कन्या की विदाई कर रहा हो, ऐसे शहीदाना अंदाज में उन्होंने किताब को मेरे हाथों में सौंपा और ताकीद की कि सात दिनों के अंदर बिना कहे उसे सही-सलामत वापस कर देना है।

मैं जानता था कि वे छठे दिन से ही तगादा प्रारंभ कर देंगे, इसलिए मैंने ग़ज़लों को पढ़ने की गलती नहीं की। एल.आई.सी. वालों की कोई पुरानी डायरी घर में थी, उसी के पन्नों में मैंने ग़ज़लों को उतारना शुरू कर दिया। कुल मिलाकर 52 ग़ज़लें थीं। एक ग़ज़ल ‘‘जिस बात का खतरा है सोचो कि वो कल होगी / जरखेज जमीनों में बीमार फसल होगी’’ मैंने कमलेश्वर वाली सारिका से उतारी थी, हालांकि बाद में  ‘साये में धूप’ के किसी भी संस्करण में इसके शामिल न किये जाने के कारण मुझे अब संदेह होता है कि कहीं यह किसी और की ग़ज़ल तो नहीं थी? बहरहाल, पांडे जी को मैंने उनकी अमानत पांच दिनों में ही वापस लौटा दी। उन्होंने औपचारिकता में भी नहीं कहा कि ‘अरे, इतनी भी क्या जल्दी थी?’ उल्टे उनके चेहरे पर अपार तसल्ली के भाव थे।

इसके बाद ‘साये में धूप’ को मुझे ज्यादा पढ़ना नहीं पड़ा, क्योंकि तमाम ग़ज़लें, शेरों के उन्हीं क्रम के साथ, मुझे कंठस्थ हो चुकी थीं और इसका खामियाजा अक्सर सामने वालों को भुगतना पड़ता। इसी क्रम में दुष्यंत के कुछ और दीवानों से भेंट हुई, जिनमें से एक रामचंद्र ललवानी थे। वे दुष्यंत की रचनाओं का कॉपीराइट अपने पास रखते थे और किसी भी अन्य शायर की तारीफ को दुष्यंत की अवमानना मानते हुए उससे लड़ने पर आमादा रहते। एक इन्दर तलरेजा थे, जो फ्रेंच कट दाढ़ी रखने, ड्रम बजाने और झक्क सफेद कुर्ता-पाजामा पहनने का शौक रखते थे और लगता था कि अभी-अभी किसी डिटरजेंट के विज्ञापन से निकल कर बाहर आ रहे हैं। उन्होंने  ‘साये में धूप’ को कंठस्थ करने के अलावा श्रीमती राजेश्वरी त्यागी को पत्र लिखकर दुष्यंत कुमार का एक बड़ा-सा फोटो डाक से मंगवाया था और मुझे शुबहा था कि वे रोज सुबह उसके समक्ष अगर आरती जैसी नहीं करते रहे होंगे तो अबरबत्ती जरूर लगाते रहे होंगे।

उन दिनों रायपुर में ‘‘कविता चौराहे पर’’ नामक आंदोलन बड़ा चर्चित हुआ था और इसकी नकल का असफल प्रयास हम कर चुके थे। शुरूआत अपनी ही एक ‘कविता’ से की थी जिसे आज कोई और अपन को सुना दे तो आत्महत्या जैसी संगीन वारदात का अंदेशा हो सकता है। आंदोलन की असफलता का श्रेय अपन ने पूरी ईमानदारी से कविता छांटने वाले अपने एक शिक्षक-कवि को दिया और चयन प्रक्रिया पर पुनर्विचार करते हुए सोचा कि जब कविता चौराहे पर आ सकती है तो ग़ज़ल क्यों नहीं आ सकती? लिहाजा मैंने पांडे जी के दरबार में, जहां भगवान शंकर की स्तुति में कुछ छंदबद्ध रचनायें पढ़ने के बाद गांजे के सामूहिक सेवन का सांस्कृतिक आयोजन किया जाता था और जहां इसी कारण से भले घर के लड़कों के जाने की मनाही थी, दुष्यंत की ग़ज़लों को चौराहे पर लाने का प्रस्ताव रखा।

पता नहीं प्रस्ताव में निहित विचारों की मौलिकता के कारण या गांजे के सेवन से उत्पन्न दुष्प्रभाव के कारण मेरे प्रस्ताव का बेहद गर्मजोशी के साथ स्वागत किया गया और तय पाया गया कि सिनेमा टाकीज के मालिक से मिलकर एक पोस्टर वाला फ्रेम उधार मांगा जाये और उस पर आगे की कार्रवाई शुरू की जाये। सिनेमा टाकीज के मालिक ने हमें कविताओं को सिनेमा हॉल पर ही लगाने की सलाह के साथ एक फ्रेम सौंप दिया। हम बेहद खुश थे और प्रशंसा कर रहे थे कि बेचारा सिनेमा हॉल का मालिक साहित्य प्रेमी न होने के बावजूद कविताओं में कितनी रूचि रखता है। लेकिन पांडे जी के एक अन्य दरबारी ने गुप्त सूचना दी कि फ्रेम को सिनेमा हॉल में लगाने की सलाह काव्यप्रेम के कारण नहीं बल्कि इसलिए दी गयी है कि उसे फ्रेम के वापस करने की हमारी नीयत पर भरोसा नहीं है।

‘‘सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं है / मेरी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिये’’ वाली ग़ज़ल के साथ हमने दुष्यंत कुमार को सिनेमा हॉल में टांग दिया। कितनों ने इसे पढ़ा, अपन को नहीं पता। लेकिन सिनेमा हॉल में भीड़ जुटती तो अपन सोचते कि फिल्म सुपर फ्ललॉप और बकवास है, लोग तो दरअसल अपने पोस्टर के कारण इकट्ठा हो रहे हैं। इसी खुशफहमी में तय किया गया कि पर्याप्त माहौल बन चुका और अब अपना कस्बा इतना परिपक्व हो चुका है कि उसके सामने दुष्यंत कुमार की ग़ज़लों की एक पोस्टर प्रदर्शनी  पेश की जा सकती हैं। लिहाजा किशोर-उम्र में अपनी पढ़ाई का पर्याप्त नुकसान करते हुए मैंने उनकी कोई 40 ग़ज़लों के पोस्टर तैयार किये। कुछ में थोड़ी-बहुत चित्रकारी जैसी थी, कुछ में कोलाज थे और कुछ की लिखावट ‘देशबंधु’ से उधार ली गयी थी, जिसमें पहले जयंत देशमुख और बाद में अरूण काठोटे के बनाये हुए पोस्टर छपते थे। स्थानीय धर्मशाला के संचालक मंडल में से एक को अपन ने ‘‘दुष्यंत कुमार फैन क्लब’’ का मेंबर बनाया हुआ था, जिसने हॉल की समस्या हल कर दी और तयशुदा तारीख में अपन अपनी पोस्टरों की दुकान सजाकर बैठ गये।

शाम बीतते -बीतते भी कोई ग्राहक नहीं आया। आखिर में पांडे जी अपने दरबारियों के साथ पहुंचे। एक चेहरा उनके दरबार से नहीं था, जो कोई यदु थे और स्थानीय कवि थे तथा आबकारी विभाग में होने के कारण अच्छे कवि माने जाते थे। उन्हें मुख्य अतिथि का दर्जा दिया गया। पांडे जी अपना चेहरा देखकर समझ गये थे कि प्रदर्शनी को कोई रिस्पांस नहीं मिला है। लिहाजा उन्होंने क्षतिपूर्ति के लिये पोस्टरों के बनावट की तारीफ की। किसी ने किसी कोलाज को अच्छा बताया तो किसी ने लिखावट की तारीफ की।

मुख्य अतिथि ने अपने संक्षिप्त किंतु सारगर्भित वक्तव्य में आयोजन की प्रासंगिकता पर प्रकाश डाला और उन्होने इस आंदोलन को और आगे ले जाने की मूल्यवान सलाह दी। सिर्फ ‘दुष्यंत भक्त रामचंद्र’ चुपचाप बैठे थे। उन्होंने प्रोटोकाल के विरूद्ध मुख्य अतिथि के बाद कुछ कहने की अनुमति मांगी और कहा कि यह आयोजन दुष्यंत कुमार का है, लेकिन यहां दुष्यंत कुमार की कोई चर्चा नहीं हो रही है। हम यहां सिर्फ एक व्यक्ति की चर्चा के लिये बैठे हुए हैं। इस तरह के आयोजन निरर्थक हैं और अगर दुष्यंत कुमार के लिये कुछ करना है तो फील्ड में जाकर मजलूमों, वंचितों की लड़ाई को आगे बढ़ाना चाहिये।

पांडे जी इशारे के लिये उनके हाथ को दबाते रहे पर वे अपनी रौ में बोलते रहे। अंततः जब नौबत लगभग मेरे रोने की आ गयी तब कहीं रामचंद्र ने अपना वक्तव्य समाप्त किया। इस घटना का बालक मन पर इतना गहरा प्रभाव पड़ा कि आयोजन के कई दिनों बाद तक भी दीवार से पोस्टरों को उतारने की सुध नहीं रही और जब धर्मशाला संचालक मंडल के सदस्य व फैन क्लब के मेंबर ने कई दिनों तक टोका-टाकी की तो कहा कि ‘‘रामचंद्र जी से कहना कि जाके उन पोस्टरों को नदी में सिरा आयें।’’

इसके बाद चूंकि कहानी में एक मोड़ है, इसलिए आप चाहें तो यहां पर एक विराम या इंटरवेल जैसा ले सकते हैं।

आगे दुष्यंत कुमार के प्रति दीवानगी कम तो नहीं हुई पर इसका स्वरूप बदल गया। अभी तक ग़ज़लों को पढ़ने की लत थी पर अब इन्हें सुनने की भी लत लग चुकी थी। इसलिए यह मौलिक ख्याल जेहन में आना स्वाभाविक ही था कि कितना अच्छा हो कि कोई कलाकार दुष्यंत की ग़ज़लों का एक अल्बम निकाले। अल्बम को ढूंढने की कोशिश मैंने बामशक्कत की। किसी एक मित्र ने बताया कि कोई एक फिल्म बनी है, जिसका नाम ‘‘शायद’’ है और शायद इसमें दुष्यंत कुमार की कोई ग़ज़ल है। पर इसे किसी भी माध्यम से सुन पाने मे मैं नाकाम रहा। बहुमुखी प्रतिभा के धनी पांडे जी एक लोकल आर्केस्ट्रा ग्रुप चलाते थे,  मैंने उनसे एक अल्बम निकालने का आग्रह किया पर वे बाबा भोलेनाथ की भक्ति में लीन रहने में ज्यादा सुविधा महसूस करते थे।

जब भिलाई में डेरा डाला तो वहां नामी कलाकारों का आना-जाना होता रहता था। इस सिलसिले की शुरूआत निर्मला देवी से हुई, जिनके बारे में मित्र अमिताभ ने बताया था कि इनका गोंविंदा नाम का एक बेटा है जो फिल्मों में आने के लिये स्ट्रगल कर रहा है। निर्मला देवी और लक्ष्मी शंकर की ठुमरियों का एक कैसेट मुझे अमिताभ से ही सुनने को मिला था। इंटरव्यू चूंकि अमिताभ ने आर्गेनाइज किया था और निर्मला देवी मूलतः ठुमरी-भजन आदि गाती थीं, इसलिए मैंने दुष्यंत के बारे में अपनी जुबान बंद रखी। अमिताभ ने काफी मेहनत से इंटरव्यू तैयार किया पर ‘देशबंधु’ वालों ने इसे नहीं छापा और एक लेखक की भ्रूण-हत्या कर दी। अमिताभ के लेखन की शुरुआत और समाप्ति एक साथ हुई।

फिर मलिका पुखराज भिलाई आयीं। एक मित्र के साथ उनसे हुई दिलचस्प मुलाकात का वाकया मैंने पिछली बार बयान किया था। उनसे मिलने के लिये हम एल.आई.सी. वाली डायरी लेकर गये थे। हम एक-एक कर शेर पढ़ते जा रहे थे। पहले मलिका साहिबा उन्हें सुनकर पास या रिजेक्ट करतीं। जिन शेरों को उनकी मंजूरी मिलती ताहिरा उन्हें अपनी डायरी में नोट करती जातीं। यह सिलसिला थोड़ा लंबा खिंच गया। मलिका साहिबा को कुछ और भी काम रहे होंगे। वे थोड़ी ऊब भी महसूस कर रही थीं। लिहाजा उन्होंने बहुत बारीक लजों में हमें अपनी दुकान समेटने का इशारा किया। हम जोश और जुनून में थे। यह भारत-पाक सांस्कृतिक आदान प्रदान का अत्यंत महत्वपूर्ण  राजनीतिक व कूटनीतिक मसला था। ऐसे में हमें मलिका साहिबा का इतना बारीक इशारा कहां से समझ में आता?

हम हमलावर तरीके से शेरों की बौछार करने में लगे थे। ‘‘होने लगी है जिस्म में जुंबिश तो देखिये / इस परकटे परिंदे की कोशिश तो देखिये।’’ मलिका साहिबा की आंखों ने इशारा किया और ताहिरा ने नोट किया। फिर मैंने बड़े अंदाज से शायरों वाली अदा में कहा ‘‘उनकी अपील है उन्हें हम मदद करें / चाकू की पसलियों से गुजारिश तो देखिये।’’ इस शेर से मलिका साहिबा पूरी तरह से उखड़ गयीं। उन्होंने तल्ख स्वरों में कहा कि, ‘‘ग़ज़लों में चाकू-छुरी नहीं चलती। हमने जितना नोट कर लिया बहुत है। अब आप लोग जाइये।’’ इस बार संप्रेषण में लिहाज की कोई बारीकी नहीं थी, आदेश की स्पष्ट स्थूलता थी। हम लोग वहां से खिसक लिये। इसके बाद मलिका साहिबा या ताहिरा ने यदि इन ग़ज़लों को कंपोज किया भी हो तो कम से कम मैंने नहीं सुना।

कुछ दिनों बाद अनूप जलोटा भिलाई आये। वे भिलाई होटल की पहली मंजिल में कोने वाले कमरे में ठहरे थे। मैं अपनी प्रिय डायरी के साथ उनके पास भी पहुंच गया, पर उसे खोलने की नौबत नहीं आयी। अनूप जलोटा बहुत ही मिलनसार किस्म के इंसान हैं। उन्होंने मुझ जैसे अपने छोटे से प्रशंसक को भी चाय वगैरह पिलाई। बातें की और कहा कि दुष्यंत की ग़ज़लें उन्होंने पढ़ रखी हैं। गाना चाहते हैं, देखते हैं क्या होता है। अपना पता वगैरह दिया। मैंने उन्हें चिट्ठी लिखकर रिमाइंड किया। जवाब आया। लिखा कि दुश्यंत (दुष्यंत नहीं) कुमार की ग़ज़लों को रिकार्ड करने का प्रस्ताव उन्होंने रखा है। आशा है कि जल्दी ही कुछ होगा। पर कुछ हुआ नहीं।

फिर सुना कि अपने छत्तीसगढ़ के ही कलाकार शेखर -कल्याण ने दुष्यंत की ग़ज़लों को कंपोज किया है। ‘‘हिंदी की ग़ज़लें भी जगा सकती हैं जादू’’ शीर्षक से कोई लेख शायद धर्मयुग में छपा था। इसका कैसेट नहीं मिला। पता चला कि दुर्ग के ‘‘म्यूजिको’’ में इसकी रिकार्डिंग उपलब्ध है। वहां से कैसेट डब कराया पर मुझे आज तक नहीं मालूम कि मूल रिकार्डिंग किसी कंपनी ने जारी की अथवा नहीं। इंट्रो कमलेश्वर की आवाज में था पर कंपोजिशन में कोई खास बात नहीं थी। दुष्यंत की ग़ज़लों को गाने में कुछ वैसी ही संजीदगी की उम्मीद मैं कर रहा था जैसी संजीदगी मेहंदी हसन साहब ने ‘‘कहना उसे’’ में फरहत शहजाद की ग़ज़लों को गाने में दिखायी है। अब कल्याण का नाम बहुत दिनों से नहीं सुना और शेखर कबीर, तुलसी व विवेकानंद वगैरह पर मोनो एक्ट कर रहे हैं।

मशहूर ग़ज़ल गायक चंदन दास कोरबा आये थे। वे बेहद संजीदा गायक हैं पर मिलनसार इंसान कतई नहीं है। फिर भी मैंने अमिताभ के साथ उनका इंटरव्यू लिया जो ‘‘अमृत संदेश’’ में छपा था। चंदन दास बहुत बेरूखी से मिले। इस बेरूखी का बदला हमने किस तरह शाम को उनकी महफिल बिगाड़कर लिया, इसका जिक्र फिर कभी करूंगा। वे ज्यादातर अमीर कजलबाश, बशीर बद्र या निदा फाजली की ग़ज़लें ही गाते हैं। दुष्यंत कुमार के नाम पर उन्होंने एक लंबी चुप्प्पी साध ली। मैंने भी उन्हें कुरेदा नहीं। फिर जगजीत सिंह रायपुर आये तो उन्हें घेरने की योजना बनायी। लेकिन एक दिन पहले ही एक पत्रकार मित्र ने उनका इंटरव्यू छाप दिया जिसमें दुष्यंत के बारे में उन्होंने कहा कि कुछ ग़ज़लें पढ़ने में ही अच्छी लगती हैं और उनकी ग़ज़लें उसी श्रेणी में आती हैं। इसके बाद कुछ दिनों तक मैंने जगजीत सिंह साहब का अघोषित बायकॉट किया।

मीनू पुरूषोत्तम या शायद नीना मेहता ने भी दुष्यंत की एक ग़ज़ल गायी है पर उसका मतला पता नहीं क्यों गायब कर दिया। ‘‘मैं जिसे ओढ़ता-बिछाता  हूं/वो ग़ज़ल आपको सुनाता हूं’’ नहीं गाया। शुरुआत दूसरे शेर से की -‘‘एक जंगल है तेरी आंखों में / मैं जहां राह भूल जाता हूं।’’ राजकुमार संतोषी ने कुछ दिनों पहले ‘हल्ला बोल’ फिल्म में ‘‘हो गयी है पीर पर्वत-सी पिघलनी चाहिये’’ गवाया है, पर यह कंपोजिशन फिल्म की ही तरह खराब है। ‘इप्टा’ के अपने मित्र मनोज गुप्ता ने सूफी कलाम की तर्ज पर इस ग़ज़ल की बहुत बढ़िया कंपोजिशन तैयार की है, जिसे मैं कभी आपको सुनाउंगा। पर दुष्यंत की ग़ज़लों को अल्बम की शक्ल में देखने-सुनने की मेरी चाहत अब भी पूरी नहीं हुई है। यदि आपमें से किसी को जानकारी हो तो कृपया मुझे बतायें। फिलहाल नेट पर उपलब्ध उनकी कुछ ग़ज़लों को सुनें, जो मैं दीवानगी के उन दिनों में नहीं सुन पाया था। इनमें ‘‘शायद’’ फिल्म में ली गयी वह ग़ज़ल भी है, जिसे उषा मंगेशकर ने बेहद खूबसूरती से गाया है।

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आपका

दिनेश चौधरी

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