पर नहीं बदली नत्था की जिंदगी

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: अब भी मुफलिसी की जिंदगी जीने की मजबूरी : पूरी दुनिया से उसे बधाई संदेश मिल रहे हैं। जिसे देखो वही एक बार नत्था के दर्शन कर लेना चाहता है लेकिन आमिर खान की सर्वाधिक लोकप्रिय फिल्म पीपली लाइव का नायक ओंकारदास मानिकपुरी उर्फ नत्था अब भी गरीबी में ही जिन्दगी गुजर-बसर करने को मजबूर है।

खुद नत्था को भी यह नहीं मालूम कि उसके साथ ऐसा क्यों हो रहा है? उसे उम्मीद थी कि पीपली लाइव के हिट हो जाने के बाद उसके पास फिल्मों का अंबार लग जाएगा लेकिन ऐसा नहीं हुआ। मुबंई के एक-दो निर्माताओं ने उससे फोन पर बातचीत जरूर की है लेकिन उसे यह नहीं बताया है कि उसकी भूमिका क्या होगी? छत्तीसगढ़ी फिल्म बनाने वाले निर्माताओं ने भी अब तक नत्था को अनुबंधित करना जरूरी नहीं समझा है, और तो और उस भिलाई में जहां नत्था रह रहा है, वहां मर्डर और काइट्स जैसी फिल्म बनाने वाले अनुराग बसु अपने स्वर्गीय पिता सुब्रत बोस को स्वप्नदृष्टा रंगकर्मी मानते हुए गत दो दिनों से एक बड़ा कार्यक्रम कर रहे हैं, लेकिन इस आयोजन में शामिल होने का न्यौता भी नत्था को नहीं दिया गया है। भले ही नत्था की पहली फिल्म देश और दुनिया में तहलका मचाने के बाद आस्कर के लिए नामित हो गई है, लेकिन उसकी जिन्दगी में कोई फर्क नहीं आया है।

पीपली लाइव के इस नायक की दशा अब भी वैसी ही बनी हुई है जैसे फिल्म में प्रदर्शित की गई है। नत्था का वृंदानगर स्थित घर इतना छोटा है कि यदि दो लोग भी उससे मिलने आ जाएं तो वह उन्हें आदर के साथ घर में बैठने को नहीं कह सकता है। अपने प्रशंसकों को ठीक से सम्मान नहीं दे पाने की वजह से नत्था अपनी मौसी की लड़की के पति यानी जीजा के घर रहने को चला आया है। यहां भी चैनलवाले उसका पीछा नहीं छोड़ रहे हैं।

जैसे ही यह खबर में चैनलों में प्रसारित हुई कि आमिर खान की फिल्म पीपली लाइव आस्कर के लिए नामित कर दी गई है, वैसे ही चैनल वालों का रूख जामुल के उस इलाके की ओर हो गया है जहां नत्था के जीजा रहते हैं। यहां भी नत्था चैनलवालों से लगातार बात कर रहा है। अपनी फिल्म के बारे में बता रहा है। आमिर खान और अनुषा रिजवी की तारीफ कर रहा है, लेकिन कोई चैनल वाला उससे यह नहीं पूछ रहा है कि भइया नत्था फिल्म के हिट हो जाने के बाद आपकी दशा में कोई सुधार आया है नहीं?

उल्लेखनीय है कि नत्था का बचपन बेहद मुफलिसी में बीता है। नत्था के पिता श्यामूदास मानिकपुरी एक मजदूर थे। इधर-उधर काम की तलाश में श्यामूदास को जहां-जहां भटकना पड़ता नत्था वहां-वहां उनके साथ जाता रहा है। कभी झोपड़ी की सीलन और बदबूदार जमीन का बिछौना मिलता रहा तो कभी उस पाइप में उसे रात गुजारनी पड़ी है जो पाइप ख्वाजा अहमद अब्बास की पटकथा में अक्सर दिख जाया करती थी। कई जगह भटकने के बाद जब नत्था के पिता यहां भिलाई नंदिनी के औद्योगिक क्षेत्र की सिम्पलेक्स कंपनी में काम करने आए तो अपने व्यवहार के चलते वे जल्द ही प्रसिद्ध मजदूर नेता शंकरगुहा नियोगी के करीबी हो गए।

सिम्पलेक्स वही कंपनी है, जिसके मालिकों पर शंकरगुहा नियोगी की हत्या का आरोप लग चुका है। वेतन विसंगति व अन्य मांगों को लेकर जब कंपनी में आंदोलन होने लगा तो प्रबंधन ने श्यामूदास को आंदोलनकारी समझकर नौकरी से निकाल दिया था। पिता के बेरोजगार हो जाने पर कई बार घर में फांके की नौबत भी आती रही है। पिता को सहारा देने के लिए जब नत्था ने रोजगार की तलाश की तो उसे काम भी मिला तो जान को जोखिम में डालने वाला। जी...हां.. यह बात पूरी तरह से सच है। अपने परिवार का पेट भरने के लिए नत्था को सिर्फ एक रस्सी के सहारे मुख्य चिकित्सालय सेक्टर 9 में राजमिस्त्री का काम भी करना पड़ा है। नत्था ऊंचे से ऊंचे भवन पर जान को जोखिम में डालकर काम करता रहा है।

नत्था जब पेट की आग को बुझाने के काबिल हो गया तब जाकर उसने हबीब तनवीर का ग्रुप ज्वाइन किया। यहां उसे कभी बहुत ज्यादा पैसे तो नहीं मिले लेकिन कला के प्रति समर्पण की संतुष्टि जरूर हासिल हुई। नत्था जब तनवीर के प्रसिद्ध नाटक चरणदास चोर का सांतवा चोर बना और जब उसकी ख्याति देश-विदेश में होने लगी तब टीवी पत्रकार अनुषा रिजवी ने उसे दो लाख रुपए देकर फिल्म पीपली लाइव के लिए अनुबंधित किया था। नत्था को किस्त-किस्त में दी गई यह राशि पारिवारिक जरूरतों को पूरा करने में ही खर्च हो गई है।

ऐसा भी नहीं है कि नत्था फिल्म के हिट हो जाने के बाद पूरी तरह से पैसों का ही दीवाना हो गया है। वह कहता है कि उसे सिर्फ उतने ही पैसे  चाहिए जितने में वह अपने परिवार का भरण-पोषण कर सके और बच्चों को लिखा-पढ़ा सकें। नत्था अपने बच्चों को खूब पढ़ाना-लिखाना चाहता है क्योंकि रोजी-रोटी का इन्तजाम करने के लिए उसके पिता शहर-दर-शहर खानाबदोश जिन्दगी जीते रहे हैं। एक शहर से दूसरे शहर पलायन करने के कारण नत्था 11 वर्ष की उम्र तक ही पहली कक्षा का छात्र रहा है। जैसे-तैसे पांचवी पास करने वाला नत्था अब अपने प्रशंसकों को आटोग्राफ तो दे रहा है, लेकिन नत्था से बधाई हो कहकर मिलने वाले लोग उसके भीतर छिपी हुई एक परेशानी को पढ़ नहीं पा रहे हैं।

नत्था की परेशानी यह नहीं है कि इलेक्ट्रानिक और प्रिंट मीडिया के लोग उसका पीछा कर रहे हैं। उसे सिर्फ यह तकलीफ सता रही रही है कि कहीं उसकी स्थिति भी चेन्दरू के समान न हो जाए। उल्लेखनीय है कि साठ के दशक में एक विदेशी फिल्मकार ने छत्तीसगढ़ बस्तर के अबूझमाड़ इलाके में रहने वाले चेन्दरू नामक एक बालक को अपनी फिल्म 'चेन्दरू द बाय एण्ड टाइगर' में काम करने का अवसर दिया था। फिल्म का नायक चेन्दरू बगैर किसी डर के शेरों के साथ घूमता था। जब जानवरों को लेकर टारजन जैसी काल्पनिक कथा गढ़ने वाले लोगों ने चेन्दरू का यह कारनामा देखा तो उन्हें भी आश्चर्य हुआ था। चेन्दरू को रुपहले पर्दे पर एक नक्षत्र की तरह चमकता देखने वाले सभी लोगों को यह उम्मीद थी कि अबूझमाड़िया लड़का देश और दुनिया में छा जाएगा और कुछ नहीं तो उसकी आर्थिक दशा सुधर जाएगी, लेकिन सालों-साल बीत जाने के बाद चेन्दरू को दोबारा फिल्म में काम करने का अवसर नहीं मिला।

अभी हाल ही में चेन्दरू का घर बाढ़ की चपेट में आ गया था। घर के बर्तन और जानवरों के बह जाने के बाद भी चेन्दरू को सरकारी सहायता नहीं मिल पाई है। यहां तक वन विभाग ने उसे आशियाना बनाने के लिए बांस-बल्ली भी मुहैय्या नहीं कराई है। सब जानते हैं कि शेखर कपूर की फिल्म बैंडिट क्वीन में काम करने वाले लोक कलाकार किस दशा में जी रहे हैं। बोल्ड सीन देकर पूरी दुनिया में स्त्री-विमर्श को नया आयाम देने वाली सीमा विश्वास की स्थिति भी बहुत ज्यादा अच्छी नहीं है।

27 सितम्बर को पीपली लाइव के नायक नत्था को मैं अपने अखबार के दफ्तर में लेता आया था। अखबार के लिए बातचीत करने के बाद मैं उसे आग्रह के साथ अपने निवास पर भी ले गया। यहां भी मैंने उससे घंटों बात की। पूरी बातचीत के बाद मैंने यह पाया कि एक सीधा-सरल लोक कलाकार बाजार के हथकंड़ों को नहीं जानता है और इसी वजह से अपनी मार्केटिंग भी नहीं कर पा रहा है। पूरी दुनिया में मौजूद खतरनाक बाजार में नत्था जैसे लोग फिट बैठ पाते हैं या नहीं यह तो भविष्य के गर्भ में है, लेकिन मैंने कल उसे उसी सोच में डूबा हुआ देखा, जिस सोच में वह फिल्म के अंतिम दृश्य में दिखाया गया है।राजकुमार सोनी

लेखक राजकुमार सोनी छत्‍तीसगढ़ के वरिष्‍ठ पत्रकार हैं तथा इस समय रायपुर में हरिभूमि अखबार से जुड़े हुए हैं.


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