उफ! ये भड़ासिया दंभ

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नीचे दिए गए कथन में, जो भड़ास4मीडिया पर प्रकाशित हुआ है, दो संदर्भ दिए गए हैं. दोनों पढ़ने से साफ हो जा रहा है कि क्या कहा और किसके बारे में कहा जा रहा है. पहले संदर्भ में बात अख़बार जनसत्ता की कही जा रही है और कहनेवाले हैं दिग्गज पत्रकार प्रभाष जोशी. और उसी के तर्ज पर गढ़े गए दूसरे संदर्भ में बात मीडिया की एक चर्चित साइट के बारे में कही जा रही है और कहनेवाले हैं साइट के बहुचर्चित संपादक और CEO. पहले कथन पढ़िए-

जनसत्ता अखबार जब अपने चरम पर था, सरकुलेशन इतना ज्यादा दिल्ली में हुआ करता था कि मशीनें छापते-छापते हांफ जाया करती थीं तब प्रभाष जोशी जी ने अपने पाठकों से अखबार में संपादकीय लिखकर अपील की थी कि ”जनसत्ता को मिल-बांट कर पढ़ें, अपन की क्षमता अब और ज्यादा छापने की नहीं है”. अब वो दिन आ गया है जब मुझे आप सभी से अपील करना पड़ रहा है कि भड़ास4मीडिया को साथ मिलकर देखें-पढ़ें और कम से कम देर तक खोले रखें. आप जितनी देर तक इसे खोले रखते हैं, उतनी ज्यादा बैंडविथ कंज्यूम होती है. उतना ज्यादा शेयर्ड होस्टिंग का सिस्टम गड़बड़ाता है.

तो कथन को कुछ यू गढ़ा गया है कि खुद की साइट को जनसत्ता के बाजू में और खुद को प्रभाष जोशी के बगल में खड़ा कर दिया जाए. महाशय में अपनी साइट पर संकट बताते हुए लोगों से गुहार लगाई है की भई कम पढ़ो. भेड़िया आया भेड़िया आया के तर्ज पर कुछ महिनों के बाद अक्सर साइट के बारे मे महाशय ऐसी बात कहते रहे हैं. अब कोई इनसे पूछे की जनाब प्रभाष जोशी के कथन को मार लेने भर से भला कोई प्रभाष जोशी हो जाएगा क्या ? जनसरोकार की जो पत्रकारिता प्रभाष जी ने की उसका तो पासंग भर भी…..?

खैर प्रभाष जोशी से अपनी तुलना करने की इसी हनक में महाराज ने अपने वेंचर के बारे में कई अहम जानकारियां भी पाठकों को मुहैया कराई है. उन्हीं के शब्दों में कुछ जानकरियां और पढ़ ली जाएं…

...दिन भर काम करता और रात में एक पव्वा दारू का चढ़ाकर फिर शुरू हो जाता इंटरनेट आन करके. बहुत कम पुराने दोस्त काम आए. ज्यादातर ने एरोगेंट, आफेंसिव व एनार्किस्ट मानकर कन्नी काट लिया था....

तो खुद को प्रभाष जोशी के बगल में खड़ा भी किया और बता भी दिया की भई बगैर दारू का पव्वा हलक से नीचे उतारे अपन से कंप्यूटर का की बोर्ड नहीं चलता. कलम चलाना पता नहीं, आता है की नहीं. और वो कहते हैं न की आदमी की पहचान दोस्तों से भी होती है. तोहमत दोस्तों पर की साथ छोड़ दिया. और वजह भी साफ-साफ बता दी गई. आखिर धुआं तो तभी उठता है जब आग होती है. और कामयाबी तो अच्छे-अच्छे लोगों का मूड चढ़ा देती है, तो पव्वा पीने वालों की बात की क्या है.

खैर ये पूरी गाथा और रोना पाठकों को पैसों की कमी बताने के लिए किया गया था. महाशय ने बताया की कैसे अब होस्टिंग के लिए हजारों रुपए महीना देना पड़ेगा. रोना रोया की भई मेरे पास कुछ नहीं है. और उससे पहले ये भी बताया….

...थोड़े बहुत पैसे आने लगे तो मैं खुद को दुनिया का बेहद सफल आदमी मानने लगा. साल भर गुजरने के बाद आर्थिक स्थिति संतोषजनक होने लगी. आफिस मेनटेन किया. एकाध-दो साथी साथ रखे. दो-चार साथी पार्ट टाइम पर रखा. घर-आफिस के खर्च के बाद भी कुछ पैसा बचने लगा....

तो भाई साहब से कोई पूछे की जो बचाए थे पैसे वो कहां गए. किस धार्मिक कार्य में दान कर दिया. शराब की दुकान वाले को तो नहीं दे आए सारी रकम.

साइट के बारे में कुछ और जानकारियां दी गई हैं…

...220 जीबी बैंडविथ प्रत्येक महीने इस्तेमाल हो रहा है. 24 घंटे में साढ़े छह लाख हिट्स हो रहे हैं....

अब इन जानकारियों के बाद कोई मूर्ख से मूर्ख आदमी ही होगा जो मानेगा की ऐसी साइट को पैसों की कमी होगी. सरकार कहते हैं कि मीडिया के एक-दो हजार के विज्ञापन से काम नहीं चलता. अब कोई बताए भला की ऐसी साइट को क्या सिर्फ एक दो हज़ार के विज्ञापन ही मिलेंगें. और गुरू सही-सही बताओ की आखिर छापने के लिए जो लिया सो लिया ना छापने के लिए कितने हजम किए.

और आखिर में बात ये की जनाब आज तक जो अर्जित किया है, अपनी संपदा बनाई है सब पत्रकारों का भला करने का नारा उछाल कर ही किया है. मीडिया का हर आदमी जानता है की आखिर कैसे ख़बरें मैनेज हो रही हैं. कैसे पत्रकारों के हितों के लिए नारा बुलंद करनेवाला आदमी संस्थानों के संसाधनों के आगे मैनेज हो गया है. कैसे पीड़ित पत्रकार फोन और मेल कर करके थक जाते हैं और उन्हीं के दिए सबूतों की बदौलत हर बार एक नया विज्ञापन चमक जाता है.

ये आलेख मेल के जरिए भड़ास4मीडिया के पास पहुंचा है. लेखक ने अपना नाम नहीं दिया है. फिर भी इसे इसलिए प्रकाशित किया जा रहा है ताकि भड़ासी दंभ कम हो, भड़ासी लोकतंत्र फूले-फले.


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