यातना, संघर्ष और स्‍वप्‍न का नया सिनेमा

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नई कन्‍नड़ फिल्‍म ‘मानासाम्‍बा कुदुरेयानेरी’(राइजिंग ड्रीम्‍स) का एक दृश्यपणजी, गोवा : भारत के 41वें अंतरराष्‍ट्रीय फिल्‍म समारोह के पैनोरमा खंड में दिखाई गई सुप्रसि‍द्ध फिल्‍मकार गिरीश कासरवल्‍ली की नई कन्‍नड़ फिल्‍म ‘मानासाम्‍बा कुदुरेयानेरी’ (राइजिंग ड्रीम्‍स) अपने विषय और बर्ताव के कारण हमारा ध्‍यान खींचती है। भूमंडलीकरण के बाद भारतीय समाज में उपभोक्‍तावाद की नकली चमक-दमक के पीछे लगभग 80 करोड़ लोगों के जीवन की यातना, संघर्ष और स्‍वप्‍न को यह फिल्‍म सामने लाती है। अब तक 12 फिल्‍में बना चुके गिरीश कासरवल्‍ली को 4 बार सर्वश्रेष्‍ठ फीचर फिल्‍म एवं निर्देशन का राष्‍ट्रीय पुरस्‍कार मिल चुका है।

‘घटश्राद्ध’ से दुनिया भर में चर्चित इस फिल्‍मकार की शैली अब तक नहीं बदली है, हालांकि उनकी हर फिल्‍म कहानी के स्‍तर पर एक नया प्रस्‍थान रचती है। पिछले वर्ष वैदेही कहानी पर बनी उनकी फिल्‍म ‘गुलाबी टाकीज’ को भारी प्रशंसा और कई पुरस्‍कार मिले थे। इस बार भी केवल 38 दिन और 45 लाख रुपये के बजट में उन्‍होंने इस फिल्‍म को पूरा किया है, जो अमरेश नुआगादोनी की पुरस्‍कृत कहानी पर आधारित है। इसमें एक पिछड़े गांव में मृत्‍यु, गरीबी, रिश्‍तों और बाजार की रस्‍साकशी के माध्‍यम से भारतीय समाज पर भूमंडलीकरण के प्रभावों को बिल्‍कुल नये तरीके से दिखाया गया है। फिल्‍म का एक-एक दृश्‍य हमें बिल्‍कुल नये देशकाल में ले जाता है। ऐसा लगता है कि हर चरित्र अभिनय की बजाय अपना वास्‍तविक काम कर रहा है। फिल्‍म की कहानी कर्नाटक के बीजापुर जिले के एक गांव में रहने वाले इरीया नामक मजदूर की है, जो कब्र खोदने का काम करता है।

आश्‍चर्य है कि कर्नाटक के हिन्‍दुओं में मरने के बाद दफनाने की अनूठी परंपरा है। इरीया को अक्‍सर एक सपना आता है जिससे उसे पता चल जाता है कि गांव में दूसरे दिन कोई मरने वाला है और वह सुबह से ही कब्र खोदने में लग जाता है। एक रात उसके गुरू सिद्धा सपने में आते हैं और पता चलता है कि अगले दिन गांव का जमींदार मरने वाला है। दूसरी सुबह वह उनके लिए कब्र खोदने में लग जाता है। काम पूरा कर वह जमींदार के घर जाता है, जहां मैनेजर मातादैया उसे कुछ रूपये देकर डांटकर भगा देता है। इरीया सदमे में है कि उसका सपना झूठा कैसे हो गया। बाद में पता चलता है कि इरीया का सपना झूठा नहीं हुआ, उस दिन सचमुच जमींदार की मौत हो गई। दरअसल उसका बेटा शिवन्‍ना फैक्‍टरी बनाने गिरीश कासरवल्‍लीके लिए अपनी जमीनें बेचना चाहता था, जिस दिन जमीनें बेची जानी थीं उसी दिन उसके पिता की मृत्‍यु हो गई।

यदि यह खबर घर से बाहर निकलती तो जमीन की बिक्री को रोकना पड़ता। मैनेजर की सलाह पर शिवन्‍ना दो दिन बाद अपने पिता की मृत्‍यु की घोषणा करता है तब तक लाश की दुर्गन्‍ध से पूरी हवेली आक्रांत हो चुकी होती है। एक दृश्‍य में हम देखते हैं कि गाजे बाजे के साथ जमींदार की शवयात्रा निकली है और जैसे ही इरीया जुलूस में लोगों को यह बताने की कोशिश करता है कि जमींदार की मौत तो दो दिन पहले ही हो गई थी, उसे मार पीट कर भगा दिया जाता है। अंत में वह अपनी पत्‍नी रूद्री के साथ बंजर जमीन पर खेती करते दिखाया गया है। उसके सपने में फिर उसके गुरू आते हैं। वह कहता है कि अब वह कब्र खोदने का काम नहीं करेगा क्‍योंकि लोग इतने बदल गए हैं कि मृत्‍यु का भी कारोबार करने लगे हैं।

इस फिल्‍म को देखते हुए हमें प्रेमचन्‍द की कहानी ‘कफन’ के घीसू और माधव की याद आती है। इरीया और रूद्री समाज के आखिरी पायदान पर जी रहे दो लोग हैं, जिनके लिए सपने देखना, उनके जिंदा रहने की शर्त है। कैमरा बार-बार एक बंजर लैंडस्‍केप में इन दो लोगों के फटेहाल जीवन में सपनों को उगते हुए दिखाता है। फिल्‍म में कोई खलनायक नहीं है। भूमंडलीकरण के बाद का समय खुद एक खलनायक की तरह समूचे जीवन पर हावी है। संवाद बहुत कम हैं लेकिन अंदर तक चोट करते हैं। विशाल हवेली में तार-‍तार होता सामंतवाद जाते-जाते भी नये व्‍यापार में रूपांतरित होता है। जहां रूपये का लालच रिश्‍तों की अनिवार्य मर्यादा पर भारी पड़ता है। यह कैसे संभव है कि शिवन्‍ना के लिए पिता के अंतिम संस्‍कार से ज्‍यादा जरूरी फैक्‍टरी के लिए जमीन की खरीद-बिक्री हो जाए। फिल्‍म में उसकी सुशिक्षित अभिजात्‍य पत्‍नी की घबराहट और बेचैनी एक दुविधा की तरह बनी रहती है। उसकी 8 साल की छोटी बच्‍ची और उसके निष्‍पाप से लगने वाले सवाल निर्देशक का एक प्रतिकात्‍मक हस्‍तक्षेप है।

फिल्‍म का छायांकन हृदयस्‍पर्शी है। दिन भर कब्र खोदने के बाद जब थका-मांदा इरीया अपनी झोंपड़ी में लौटता है तो उसकी पत्‍नी रूद्री जिस तरह से सपनों का उत्‍सव मनाती है, वह गरीबी पर फिल्‍मकार की संवेदनशील टिप्‍पणी है। अंतिम दृश्‍य में जब रूद्री सपने में आए गुरू सिद्धा का तिरस्‍कार करती है, जिसके अंधविश्‍वास में फंसा इरिया सामान्‍य जीवन नहीं जी पाता और दोनों को खेती करते हुए देख गुरू पूछता है कि पौधों को कैसे सींचोगे, इरीया का जवाब सामान्‍य भारतीय आदमी की जिजीविषा और दृढ-निश्‍चय का घोषणा पत्र बन जाता है। वह कहता है कि एक-एक पौधे को बढ़ा करूंगा, भले ही उन्‍हें अपने पेशाब से ही क्‍यों सींचना पड़े।

अजित रायअजित राय अखबारों, चैनलों, थिएटर, सिनेमा, साहित्य, संस्कृति आदि से विविध रूपों में जुड़े हुए हैं. जनसत्‍ता के लिए वे फिल्म व थिएटर समीक्षक के रूप में लंबे समय तक लिखते रहे हैं. इंडिया टुडे और आउटलुक मैग्जीनों में लगातार लिखते रहते हैं. कई मशहूर शिक्षण संस्थानों में वे पत्रकारिता व थिएटर के छात्रों को पढ़ाने का काम भी समय-समय पर करते हैं. हरियाणा के यमुनानगर में डीएवी गर्ल्‍स कॉलेज के साथ मिल कर पिछले कुछ सालों से एक अंतरराष्‍ट्रीय फिल्‍म समारोह आयोजित कर रहे हैं. इन दिनों वे फिल्म समारोह में शिरकत करने गोवा गए हुए हैं. इनका ई मेल पता This e-mail address is being protected from spambots. You need JavaScript enabled to view it है.


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