आएगी पारदर्शिता!

E-mail Print PDF

गिरीश: विकीलीक्स धमाके हों या राडिया, कॉमनवेल्थ, आदर्श जैसे खुलासे : इस समय वेबसाइट विकीलीक्स को लेकर सारी दुनिया में खासी चर्चा है. अनेक सत्‍ता तंत्र सकते में हैं. जो अमेरिका इंटरनेट में पहल के संदर्भ में कभी सिरमौर हुआ करता था, अब वही खुद इंटरनेट के निशाने पर है और हकबकाया हुआ सभी जगह सफाई देता घूम रहा है, इन सबके बीच गौरतलब ये है कि विश्व स्तर पर जो काम विकीलीक्स कर रहा है, लगभग उसी दरम्यान भारत में भी खुलासों का बाजार खासा गर्म है-चाहे कॉमनवेल्थ गेम्स का एक लाख 70 हजार करोड़ का घोटाला हो, उद्योगपतियों-दलालों-राजनीतिज्ञों-मीडियाकर्मियों के गठजोड़ की पोल खोलती नीरा राडिया टेप प्रकरण हो, स्पेक्ट्रम घोटाला हो, आदर्श सोसाइटी मामला हो या फिर कुछ और - ये सुर्खियां भी विकीलीक्स के खुलासों की धारा से कहीं-न-कहीं जुड़ती-सी प्रतीत होती हैं. उसी धारा की परछाई-सी लगती हैं. रही बात हंगामे की तो वो वहां भी है, यहां भी है - भले ही उनके रूप थोड़े अलग हैं. लेकिन मूल सवाल यही है कि इन खुलासों के संकेत क्या हैं? क्या ये पूंजीवाद और पूंजीवादी दरबारी लोकतंत्र के द्वंद्व-अंतर्द्वंद्व का खुलासा है? ये लोकतंत्र के लिए सुखद संकेत है या फिर दुखद? ऐसे अनेक सवाल उठ रहे हैं.

जहां तक विकीलीक्स की बात है तो उसके संचालक जूलियन असांजे की जान को खतरे की खबर सुर्खियों में है. खबर ये भी है कि वो इंग्लैंड में कहीं छिपे हुए हैं और उनकी तलाश जारी है. हाल में ढाई लाख गुप्त दस्तावेजों को चौराहे पर उजागर करने के बाद से वाशिंगटन बेइंतिहा नाराज है और अमेरिका की नाराजगी के साथ ही फ्रांस, जर्मनी भी जिस तरह से जुड़े हैं, उससे संकेत मिलता है कि अनेक पश्चिमी देश इस मसले पर एकजुट हो रहे हैं. स्वीडन में असांजे पर पहले ही एक मामला चल रहा है, लेकिन इन गुप्त दस्तावेजों को सार्वजनिक करने को लेकर ये देश किस कानून के तहत उन पर मुकदमा चलाना चाहते हैं, ये अभी स्पष्ट नहीं है. वो अलग बात है कि अमेरिकी विदेश मंत्री हिलेरी क्लिंटन इसे अमेरिका समेत पूरी दुनिया पर हमला बताते नहीं थक रही हैं, लेकिन ये हमला कैसे है, किन विधायी धाराओं का उल्लंघन है, यदि असांजे की गिरफ्तारी हो तो उसका ठोस-पुख्ता आधार क्या हो, इसे लेकर कयासों का भी बाजार गर्म है.

खबर ये भी है कि पिछले एक हफ्ते में जिस तरह से विकीलीक्स के दस्तावेजों को प्रसारित करने वाली ‘अमेजन’ जैसी संस्थाओं ने ‘दबाव’ में विकीलीक्स से हाथ झाड़ा है और तर्क दिया है कि उनकी दूसरी वेबसाइटों को उसके चलते खतरा पैदा हो गया था और फिर विकीलीक्स एक के बाद दूसरी जगहों से प्रसारण करता रहा है - वो किसी को चूहे-बिल्ली का खेल भले लगे, लेकिन अंतर्राष्ट्रीय दादागीरी का नायाब उदाहरण भी है. अब असांजे के स्विट्जरलैंड या इक्वाडोर जाने की बात भी उठ रही है. चर्चा ये भी है कि मुख्यत: अमेरिका विरोधी खबरों की वजह से और अभी असांजे के पास दस लाख गुप्त दस्तावेजों के और मौजूद होने के कारण उस पर दबाव बढ़ेगा तथा संभव है कि उसे चीन से मदद मिले. इस चर्चा को हवा इसलिए भी मिल रही है कि मूलत ऑस्ट्रेलिया निवासी असांजे ने 2006 से विकीलीक्स के खुलासों की शुरुआत इराक-अफगानिस्तान युद्ध को लेकर ही की थी. फिर जैसा कि दावा किया जा रहा है कि नए साल के प्रारंभ में ही वो अमेरिकी बैंकों की कुव्यवस्था की पोल खोलता हुआ बड़ा धमाका करने वाला है.

दिलचस्प तो ये है कि ऐसा भी संभव नहीं है कि विकीलीक्स के खुलासों को अब रोका जा सके, यदि इंटरनेट पर इन्हें प्रसारित होने से रोकने का प्रयास होगा तो दुनिया के बड़े अखबार जैसे अमेरिका के न्यूयार्क टाइम्स, इंग्लैंड के गार्जियन, फ्रांस के ली मांद, स्पेन के एल पेस और जर्मनी के डेर स्पीजेल एक-एक कर इन गुप्त दस्तावेजों को प्रकाशित करने वाले हैं. और फिर, इनके प्रसारण पर रोक की बात प्रचारित होने से इसके प्रति उत्सुकता का बढ़ना लाजिमी है, सो अलग. तो अमेरिका के लिए समझदारी इसी में है कि वो ऐसा कुछ न करे, जिससे सभी जगह से संदेश जाए कि लोकतंत्र और अभिव्‍यक्ति की आजादी का दुनिया में सबसे बड़ा ‘अलंबरदार’ ही उसकी हत्या पर उतारू है. वैसे फ्रांस और जर्मनी में निचले स्तर के कुछ अधिकारियों पर इस बाबत कार्रवाई की सूचना है, जिन्होंने दस्तावेजों के लीक होने में मदद की. लेकिन सबसे ज्यादा तो पेंटागन के 22 वर्षीय युवा अमेरिकी ब्रैडली मैनिंग पर लगे आरोप चर्चित हैं. मैनिंग अमेरिकी रक्षा मंत्रालय में खबरों का विश्लेषण करता रहा है, लेकिन अब कहा जा रहा है कि उसी ने चाबी के गुच्छे के आकार के पेन ड्राइव में ये लाखों गुप्त दस्तावेज एकत्र किए और विकिलीक्स को उपलब्ध कराए. अब सच क्या है - ये तो जांच-पड़ताल के बाद पता चलेगा.

लेकिन अब मुद्दा ये नहीं है कि किसने ये दस्तावेज उपलब्ध कराए, मुद्दा ये है कि जो दस्तावेज उजागर हो रहे हैं, वे सही हैं या नहीं. फिलहाल, अभी तक की जानकारी यही है कि इन दस्तावेजों को लेकर कोई खंडन-मंडन नहीं है. वैसे अब बात सिर्फ यही नहीं है कि फ्रांस के राष्ट्रपति को ‘नंगा सम्राट’ कहा जाए या रूसी नेता ब्लादिमीर पुतिन को ‘अल्फा डॉग’, इतालवी पीएम बर्लुस्कोनी को ‘बड़बोला और नकारा’ की उपाधि से नवाजा जाए या लीबिया के नेता मुअम्मर कद्दाफी पर ‘उक्रेनी नर्स’ का कब्जा माना जाए, ईरानी राष्ट्रपति अहमदीनेजाद को ‘हिटलर और सनकी’ कहा जाए या फिर अफगानिस्तान के राष्ट्रपति करजई को ‘बीमार दिमाग वाला’ - बात ये भी है कि पाकिस्तान के परमाणु संयंत्रों का खुलासा और उन परमाणु हथियारों के भारत के खिलाफ संभावित प्रयोग, बड़े घोटालों और भारत को सुरक्षा परिषद की स्थायी सदस्यता दिलाने की बाबत संसद में बराक ओबामा के ‘ऐतिहासिक संबोधन’ की कलई खुलना जैसे मुद्दे.

तो कहा जा सकता है कि इन खुलासों से स्थितियां पारदर्शी ही हुई हैं, जो व्यापक संदर्भों में लोकतंत्र के हित में ही है. यह सूचना के अधिकार और तकनीकी क्रांति का ऐसा संगम है, जो जनता को जागरूक ही करती है. जो चीजें पहले प्राय: दबी-छुपी रह जाती थीं, अब उनके खुलासे की प्रवृत्तियां जोर पकड़ रही हैं, कौन नहीं जानता कि कभी अमेरिकी राष्ट्रपति निक्सन भारतीय प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी के लिए अपशब्दों तक का प्रयोग अनौपचारिक बातचीत में करते थे, लेकिन अब जनता के बीच ये भी साफ हो रहा है कि प्यार-मोहब्बत-सहयोग की बात करने वालों के दिल में कितना जहर भरा हुआ है और उनकी असली मंशा और नीयत क्या है. वैसे दूसरे नजरिए से देखें तो ये पूंजीवाद, पूंजीवादी दरबारी लोकतंत्र और बाजार का द्वंद्व भी है.

अभी तक कई बार मीडिया राष्ट्रीयता, क्षेत्र और अनेक अन्य सीमाओं में बंधता प्रतीत होता था, लेकिन विकीलीक्स के खुलासों और दुनिया भर के मीडिया के उसके साथ जुड़ने से खबरों के वैश्विक कलेवर को सुदृढ़ता ही मिलेगी - ये तय है. विकिलीक्स ने अनेक पारंपरिक सीमाओं को तोड़ने में मदद ही की है, इसके पहले पाकिस्तान के जियो टीवी और डॉन ने भी आतंकी कसाब के मसले पर ये खुलासा करके कि वो पाकिस्तानी मूल का ही है, ऐसी ही पहल की थी, जबकि पाकिस्तानी सरकार शुरू में कसाब के पाकिस्तानी होने को ही नकार रही थी. इसके भी पूर्व इराकी बंदियों से बंदीगृह में अमेरिकी सैनिकों द्वारा अत्याचार की खबर सबसे पहले अमेरिकी मीडिया में ही छपी थी. बहरहाल, कुल मिलाकर यही कहा जा सकता है कि विकीलीक्स के चलते जहां दुनिया के स्तर पर जागरूकता बढ़ेगी, वहीं इसके असर में विभिन्‍न देशों में भ्रष्‍टाचार और अनियमितताओं के खुलासों की प्रवृत्ति को बढ़ावा ही मिलेगा - इससे पारदर्शिता बढ़ेगी, तो सत्‍ता तंत्र जनाभिमुख भी होगा. वैसे अभी पाकिस्तान, अफगानिस्तान और चीन को लेकर खुलासे भी संभावित हैं, जिनसे भूचाल आना लाजिमी है.

पिछले दिनों गार्जियन के संपादक एलन रॉसब्रिजर ने अपनी भारत यात्रा में खबरों की बदलती तकनीक और उनके स्वरूप को व्याख्यायित करते हुए चेन्नई में कहा था कि अब मुद्दे वैश्विक हो रहे हैं और दुनिया गांव. ऐसे में पारंपरिक पत्रकारिता का स्वरूप भी बदल रहा है. खबरों को व्यापक फलक पर जनाभिमुख होना होगा और जनता को मुद्दों पर खबरों में भागीदारी करनी होगी और ये मुद्दे भी जनसरोकारों से ही जुड़े होने हैं, जिनका दायरा क्षेत्र, राष्ट्रहित, महाद्वीपीय ही नहीं, बल्कि कहीं ज्यादा समूची दुनिया होगा. हम कह सकते हैं कि विकीलीक्स ने खबरों और सूचनाओं के जिस नए संसार की दिशा में पहल की है - वो वैचारिक स्तर पर उसी जनसापेक्ष मुहिम का एक छोटा, लेकिन मजबूत पक्ष है. कोशिश होनी चाहिए कि इनका दायरा ज्यादा व्यापक, पारदर्शी, जनपक्षीय और आम सरोकारों वाला हो.

लेखक गिरीश मिश्र वरिष्ठ पत्रकार हैं. इन दिनों वे लोकमत समाचार, नागपुर के संपादक हैं. गिरीश से संपर्क This e-mail address is being protected from spambots. You need JavaScript enabled to view it के जरिए किया जा सकता है.


AddThis