फिल्मी कहानी पर कम से कम तीन लाख मिलेंगे !

E-mail Print PDF

हिंदुस्तान में किसी फिल्म की कहानी लिखने के लिए लेखक को कितना पैसा मिल सकता है? नामी लेखकों की बात छोड़ दें तो शायद ही कोई लेखक इसके लिए लाखों मिलने की बात सपने में भी सोच सकता होगा। लेकिन फिल्म राइटर्स एसोसिएशन, मुंबई की चली तो आने वाले दिनों में किसी भी लेखक को फिल्म की कहानी लिखने के लिए कम से कम तीन लाख रुपये मिलेंगे और अगर वही लेखक फिल्म की पटकथा और संवाद भी लिखना चाहे तो उसे छह लाख रुपये और मिलेंगे। जी हां, मुंबई में दो दिन तक चली दूसरी इंडियन स्क्रीनराइटर्स कांफ्रेंस में सर्वसम्मति से इस बारे में प्रस्ताव पारित किया गया। यही नहीं, मुंबई के नामी वकीलों की सहायता से फिल्म राइटर्स एसोसिएशन ने लेखकों का शोषण रोकने के लिए एक मॉडल कॉन्ट्रैक्ट भी तैयार किया है।

इसे फिल्म उद्योग की सबसे बड़ी संस्था वेस्टर्न इंडिया फेडरेशन ऑफ फिल्म एम्पलॉयीज़ की मंजूरी मिलने के बाद लेखकों को तमाम और फायदे भी मिलने वाले हैं। मसलन अगर किसी लेखक की लिखी फिल्म को दोबारा किसी अन्य भाषा में बनाया जाता है, तो लेखक को फिर पैसे मिलेंगे। यही नहीं, अगर कोई निर्माता किसी फिल्म के किरदारों को लेकर कोई दूसरे प्रोडक्ट मसलन खिलौने वगैरह बनाना चाहता है तो उसके लिए भी लेखक को रॉयल्टी मिलेगी।

युवा और प्रगतिशील फिल्म लेखकों की पहल पर पुणे में हुई पहली कांन्फ्रेंस की कामयाबी के बाद मुंबई में हुई इस कान्फ्रेंस में दो दिन तक फिल्म निर्माण में लेखक की भूमिका के अलग-अलग पहलुओं पर जमकर बहस हुई। कान्फ्रेंस मशहूर नाटक और पटकथा लेखक विजय तेंदुलकर को समर्पित की गई लिहाजा इसका पहला सेशन तेंदुलकर पर ही केंद्रित रखा गया। इस सेशन में कुछ ऐसी जानकारियां सामने आईं जो इंडस्ट्री के लोगों के लिए भी चौंकाने वाली हो सकती हैं। जैसे गोविंद निहलानी की मशहूर फिल्म अर्द्ध सत्य का जो क्लाइमेक्स हमने आपने देखा है वो दरअसल विजय तेंदुलकर ने लिखा ही नहीं था। ये क्लाइमेक्स गोविंद निहलानी को फिल्म बनाते वक्त सूझा और उन्होंने शूटिंग के वक्त अपनी पसंद का और लेखक की पसंद का दोनों क्लाइमेक्स शूट कर लिए। बाद में निहलानी और तेंदुलकर दोनों ने फिल्म दोनों क्लाइमेक्स के साथ देखी और तेंदुलकर मान गए कि निहलानी का सोचा क्लाइमेक्स फिल्म को ज़्यादा शूट करता है। ऐसा ही कुछ वाक्या मशहूर अभिनेता और निर्देशक अमोल पालेकर ने भी साझा किया।

पालेकर ने बताया कि उनकी बतौर निर्देशक पहली फिल्म आक्रीत के लिए जो पटकथा विजय तेंदुलकर ने उनकी बताई कहानी पर काफी दिनों की मेहनत के बाद लिखी थी, वो उन्होंने रिजेक्ट कर दी थी। और, आक्रीत एक ऐसी पटकथा पर बनी जो विजय तेंदुलकर ने बाद में उन्होंने दी। यही नहीं, निहलानी की तरह ही पालेकर को भी शूटिंग के दौरान एक नया क्लाइमेक्स सूझा और उन्होंने तेंदुलकर का लिखा क्लाइमेक्स बदल दिया। चेन्नई से खास तौर पर इस कार्यक्रम में शरीक होने आए अभिनेता और निर्देशक कमल हासन और लंदन से आईं नसरीन मुन्नी कबीर ने भारतीय फिल्मों की पटकथा की खासियत पर बहस में हिस्सा लिया। नसरीन ने जहां भारतीय फिल्मों को लेकर पश्चिम की सोच के बारे में विस्तार से चर्चा की, वहीं कमलहासन ने फिल्म राइटर्स कान्फ्रेंस से खास तौर से अनुरोध किया कि ऐसे आयोजन चेन्नई में भी होने चाहिए। मुन्नाभाई सीरीज़ में निर्देशक राजकुमार हीरानी को लेखन में सहायता करने वाले ओहियो से आए आभिजात जोशी ने गांधीगीरी को कागज़ पर उतारने के किस्से सुनाए। तो, जाने तू या जाने ना के निर्देशक अब्बास टायरवाला ने इस बात की ओर इशारा किया कि हिंदी सिनेमा को खलनायक अब नायक के भीतर ही तलाशने होंगे। पचास-साठ के दशक के ज़मींदार, सत्तर के दशक के स्मगलर्स, अस्सी के दशक के बदनाम नेता और नब्बे के दशक के आतंकवादियों से दर्शकों की बढ़ती ऊब की तरफ इशारा करते हुए टायरवाला ने भारतीय परंपरा और अतीत में फिर से झांकने की ज़रूरत समझाई और रामायण और महाभारत जैसे महाकाव्यों के दुविधा में पड़े चरित्रों से कहानियों के नए सिरे तलाशने का गुरुमंत्र समझाया।

कान्फ्रेंस में रविवार के पहले सत्र में उस समय अजीब स्थिति पैदा हो गई, जब अपना भाषण लंबा खींचने पर मशहूर लेखक कमलेश पांडे की हूटिंग शुरू हो गई। कमलेश अपनी हिट और सुपरहिट फिल्मों के बारे में लगातार बताते जा रहे थे, जबकि चर्चा इस सत्र में फिल्मों के सियासी जामे पर होनी थी। इस सेशन में सबसे ज़्यादा तालियां असमिया फिल्मों के मशहूर निर्देशक जानू बरुआ ने बटोरीं, जिनकी पहली हिंदी फिल्म मैंने गांधी को नहीं मारा को देश विदेश में खूब शोहरत मिली। उन्होंने कहा कि पश्चिम का ये कहना कि भारतीय फिल्मकार गरीबी बेचते हैं, गलत है। उन्होंने कहा कि गरीबी तुलनात्मक नजरिया है। और भारत का मज़दूर या किसान अगर अपनी सीमित कमाई में अपने परिवार के साथ खुश है तो किसी दूसरे को उसे गरीब कहने का कोई हक़ नहीं है। अपनी सियासी फिल्मों से देश विदेश में मशहूर हो चुके लेखक निर्देशक प्रकाश झा ने सामयिक विषयों पर फिल्म बनाने के लिए ज़रूरी बातों की तरफ लेखकों का ध्यान खींचा और विकास की सबसे तेज़ सदी में धर्म के बढ़ते दबदबे की तरफ भी ध्यान दिलाया। कान्फ्रेंस में सबसे लंबी चर्चा लेखकों खासकर फिल्म लेखकों के अधिकारों पर हुई।

मुंबई के नामी वकीलों अश्नी पारेख और रोहिणी वकील के सहयोग से छह महीनों की मेहनत और इंडस्ट्री के तमाम लेखकों, निर्देशकों और निर्माताओं से परामर्श के बाद फिल्म राइटर्स एसोसिएशन ने एक मॉडल कॉन्ट्रैक्ट तैयार किया है। इसे मंजूरी मिलने के बाद फिल्म इंडस्ट्री में काम करने वाले हर लेखक को कम से कम मेहनताना मिलने की गारंटी हो जाएगी। इसमें कहानी, पटकथा और संवाद तीनों के लिए तीन-तीन लाख रुपये की न्यूनतम रकम तय की गई है। एसोसिएशन का कोई भी सदस्य इससे कम पर किसी भी निर्माता के लिए काम नहीं करेगा। और जो निर्माता ये रकम देने से इंकार करेगा, उसके खिलाफ फेडरेशन बॉयकॉट का नोटिस भी जारी कर सकेगा। इस मॉडल कॉन्ट्रैक्ट में बदलते दौर में ज़रूरी हो चले तमाम पहलुओं को शामिल किया गया है।

कान्फ्रेंस में लेखकों-निर्देशकों और लेखकों-निर्माताओं के दो समूहों ने फिल्म निर्माण में लेखक की भूमिका के क्रिएटिव और फाइनेंशियल पहलुओं पर अलग से भी चर्चा की। धूम सीरीज़ के निर्देशक संजय गडवी ने जहां खुद को पूरी तरह से लेखक पर निर्भर निर्देशक बताया और विदेशी फिल्मों से प्रेरित होने को निर्देशक की निजी राय बताया, वहीं माई ब्रदर निखिल और सॉरी भाई बनाने वाले ओनीर ने कहा कि फिल्म के पहले प्रिंट तक फिल्म निर्माण में लेखक की बराबर की भागीदारी ज़रूरी है। मशहूर लेखक अंजुम राजाबली के संचालन में हुई कान्फ्रेंस के कुल सात सेशन्स के दौरान एक बात जो सामान्य रूप से हर लेखक या लेखक-निर्देशक ने मानी वो ये कि किसी भी कहानी को लिखने से पहले लेखक का उस पर यकीन होना ज़रूरी है। और, अगर किसी लेखक ने किसी किरदार को करीब से देखा, परखा, समझा या जिया नहीं है तो किसी कहानी को परदे के लिए लिख पाना नामुमकिन सा होता है।

कान्फ्रेंस में नए लेखकों को एक बार फिर ये जानकारी दी गई कि इंडस्ट्री के कायदों के मुताबिक कोई भी निर्माता किसी भी ऐसे शख्स को काम पर नहीं रख सकता है जो अपनी कला से संबंधित यूनियन का सदस्य नहीं है। फिल्म राइटर्स एसोसिएशन का सदस्य भारत में कहीं भी रहते हुए बना जा सकता है। इसके लिए लेखक This e-mail address is being protected from spambots. You need JavaScript enabled to view it या एसोसिशन के दफ्तर में फोन (022-26733027 या 022-26733108) कर सकते हैं।


लेखक पंकज शुक्ला पत्रकारिता में लंबी पारी खेलने के बाद अब फिल्म नगरी में हाथ आजमा रहे हैं। इनके निर्देशन में बनी 'भोले शंकर' रिलीज हो चुकी है। पंकज से This e-mail address is being protected from spambots. You need JavaScript enabled to view it  के जरिए संपर्क किया जा सकता है।
AddThis