विकीलीक्स : सेंधमारों-हैकरों को हीरो न बनाएं

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डा. अभिज्ञात विकीलीक्स के कारनामों ने मीडिया को एक गहरी दुविधा में ढकेल दिया है। उसके खुलासों के आगे दुनिया की सारी खबरें फीकी और लगभग सारहीन नज़र आ रही हैं। सनसनी परोसने वालों की विकीलीक्स ने हवा निकाल दी है। सबसे पहले, सबसे आगे, सिर्फ़ हमारे पास जैसे नारों का रंग उतर गया है। एकाएक दुनियाभर का मीडिया संसार जूलियन असांजे द्वारा विकीलीक्स डाट ओआरजी वेबसाइट पर परोसी हुई जूठन पर आश्रित हो गया है। इसे सूचनाओं का विस्फोट माना जा रहा है।

कई पत्रकार असांजे को अपना अगुवा मानने से नहीं हिचक रहे हैं तो कुछ ने उसे नायक मान लिया है। कुछ और उसी की राह पर चलने के लिए बेचैन हैं। कुछ फर्जी विकीलीक्स के खुलासे भी इस बीच सामने आये हैं। इस तरह विकीलीक्स मार्का खुलासों का एक बूम आ गया है। इंटरनेट पर सूचनाओं का अबाध प्रवाह की दुनिया में यह पहली बड़ी दुर्घटना है। ऐसी दुर्घटना तो होनी ही थी। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का मतलब अनसेंसर्ड सूचना परोसना नहीं है। मीडिया का काम केवल खुलासा करना नहीं है। मीडिया यदि व्यक्ति की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की हिमायत करता है तो उसका आशय अबाध अभिव्यक्ति से नहीं है। लोकतंत्र में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का सम्बंध नैतिकता से भी है। हम किसी हैकर को मीडिया का नायक नहीं मान सकते। गुप्त सूचनाओं को खुलासा भर कर देना पत्रकारिता का धर्म कदापि नहीं है और ना ही यह कोई ऐसा गुण है जिस पर कोई वारी-वारी जाये। कूटनीति की बहुत सी मजबूरियां होती हैं और हर देश में बहुत सी बातें होती हैं जो न सिर्फ दूसरे देश से बल्कि स्वयं अपने भी देश के लोगों से गोपनीय रखनी होती हैं। आवश्यकता पड़ने पर कई गोपनीय बातों को उजागर करने के पूर्व उसके सार्वजनिक होने के प्रभावों पर भी विचार किया जाता है।

विसीलीक्स ने जो गुप्त सूचनाओं पर सेंधमारी की है वह अमरीकी को पूरी दुनिया की निगाह में गिराने के लिए काफी है। यही नहीं इससे उसके अपने मित्र राष्ट्रों से सम्बंध खराब होने का खतरा अंसाजेमंडरा रहा है। आर्थिक मंदी का शिकार इस देश की हालत इन खुलासों से और खराब हो सकती है। कोई ऐसा देश नहीं होगा जो अपने अपने स्तर और अपनी औकात के अनुसार किन्हीं कारगुजारियों को अंजाम देने की कोशिश न करता होगा। कमजोर से कमजोर देश भी शक्तिशाली बनने की कोशिश करता है और जिनसे वह संधि करता है अपने फायदे की पहले चिन्ता करता है। हर देश का अपना खुफिया तंत्र होता है और उसकी एजेंसियां देश की कूटनीतिक कार्रवाइयों को अंजाम देती रहती है। अमरीका के गोपनीय केबल संदेशों का खुलासा करके विकीलीक्स ने उसकी पोल खोल दी। और एक हैकर दुनिया का नायक बन गया। ऐसे लोगों का नायक जो अमरीकी की शक्ति के आगे नत हैं, उनसे आगे निकलना चाहते हैं, उसके सताये हुए हैं।

अब अमरीका इंटरनेट की अबाध स्वतंत्रता पर अंकुश लगाने की कोशिश कर रहा है तो यह स्वाभाविक है। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के हिमायती राष्ट्र का अंकुश के पक्ष में रवैया चिन्ता का विषय नहीं होना चाहिए, क्योंकि वह नैतिकता से स्खलित वैचारिक स्वतंत्रता के खिलाफ जो सही है। हमारे देश भारत को भी ऐसी चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है, क्योंकि हम भी मानते हैं कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का सम्बंध नैतिकता से है और उसकी प्रभावोत्पादता से भी। किन्हीं गोपनीय सूचनाओं को उजागर करना कोई बड़ी सूचना क्रांति नहीं है। हमारे यहां सूचना प्राप्त करने का कानून है और कई गोपनीय दस्तावेजों से सम्बंध में एक सुनिश्चित प्रक्रिया से जानकारी प्राप्त की जा सकती है, लेकिन उन जानकारियों में हर तरह की जानकारियों तक पहुंच नहीं बनती क्योंकि सरकार ने कुछ मामलों को जनहित और देशहित में उपलब्ध नहीं कराने का निर्णय लिया है।

असांजे की खुफियागिरी के तर्ज पर यदि आज की पत्रकारिता चली तो जासूसों की तो निकल पड़ेगी। मुझे यह जानकारी नहीं है कि कितने अखबार अपने यहां जासूसों की नियुक्ति किये हुए हैं। हाल में मीडिया द्वारा स्ट्रिंग आपरेशनों की जानकारी तो है किन्तु उसमें भी किसी ने किसी रूप में जनहित और नैतिकता के प्रश्न जुड़े होते हैं। अमरीका के खिलाफ खड़ी शक्तियों को लाभ पहुंचाने की गरज से गोपनीय दस्तावेजों के खुलासे के कारण जल्द ही उन लोगों की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता भी बाधित होगी जो किन्हीं नैतिक मूल्यों की लड़ाई इंटरनेट के जरिए लड़ रहे थे। यह भय है कि सस्ता, सुलभ और कारगर हथियार आम लोगों के हाथ से न निकल जाये। स्वाभाविक है कि जो देश इंटरनेट पर आ रही खबरों और विचारों के खुलेपन से अपने देश को बचाना चाहते थे वे लाभान्वित होंगे। ऐसे भी मुल्क हैं जहां अपने ही देश की विसंगतियों को, अपने ही देश में, अपने ही लोगों द्वारा अभिव्यक्ति करने पर जेल में डाल दिया जाता है, वहां इंटरनेट जैसे शक्तिशाली माध्यम सिरदर्द बना हुआ है। उन्हें इंटरनेट पर भावी पाबंदियों का लाभ मिलेगा।

दरअसल इंटरनेट मीडिया के विस्तार के साथ ही उस पर सीमित अंकुश का तंत्र विकसित किया जाना चाहिए था तथा सूचनाओं के प्रसार की नैतिकता का विकास भी होना चाहिए था। इंटरनेट के दुरुपयोग के खिलाफ कारगर कानून भी बनने चाहिए थे, जो नहीं हुआ और उसका नतीजा सामने है। विकीलीक्स को आज भले मीडिया तरजीह दे रहा हो किन्तु यह मीडिया के विनाश का कारण बन जायेगा। एक हैकर के कारनामों से भले ही किसी को लाभ हो मीडिया को चाहिए कि वह उसकी निन्दा करे और उसे नायक न बनने दे। कल को किसी देश के आम नागरिकों के बैंक खातों से लेकर तमाम गोपनीय जानकारियों को रातोंरात लीक कर कोई दुनिया को चौंका कर नायक बनने की कोशिश करेगा तो आप क्या करेंगे।

वर्तमान घटना को अमरीका के वर्ल्ड ट्रेड सेंटर पर हुए आतंकी हमले को रूप में देखा जाना चाहिए। यह किसी राष्ट्र की निजता पर आतंकी हमला है। और इससे जश्न मनाने वाले यह न भूलें कि उनकी निजता भी महफूज नहीं रह जायेगी। कोई भी उपलब्धि तभी उपलब्धि है जो उसे प्राप्त करने के साधन नैतिक हों। यदि गोपनीय सूचनाएं सेंधमारी या हैकिंग करके हासिल की गयी हैं किन्हीं मान्य तरीकों से नहीं, तो उन सूचनाओं से चाहे जितने बेहतर नतीजे निकाल लें वह किसी भी प्रकार से मनुष्य जाति के लिए हितकारी नहीं होंगे।

असांजे का जीवन कोई आदर्श जीवन नहीं रहा है। कंप्यूर हैक करने की अपनी एक कोशिश के दौरान वह पकड़ा गया था। फिर भी उसने अपना काम और कंप्यूटर के क्षेत्र में अनुसंधान जारी रखा। उसका दावा है कि अपने स्रोतों को सुरक्षित रखने के लिए उसने अलग-अलग देशों से काम किया। अपने संसाधनों और टीमों को भी हम अलग-अलग जगह ले गया ताकि कानूनी रुप से सुरक्षित रह सके। वह आज तक न कोई केस हारा है न ही अपने किसी स्रोत को खोया है।

उल्लेखनीय है कि विकीलीक्स की शुरुआत 2006 में हुई। असांजे ने कंप्यूटर कोडिंग के कुछ सिद्धहस्त लोगों को अपने साथ जोड़ा। उनका मक़सद था एक ऐसी वेबसाइट बनाना जो उन दस्तावेज़ों को जारी करे जो कंप्यूटर हैक कर पाए गए हैं। भले यह कहा जा रहा है कि यह असांजे के व्यक्तिगत प्रयासों को परिणाम हैं, लेकिन इसमें किन्हीं देशों की बड़ी शक्तियों का हाथ होने की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता।

विकीलीक्स खुलासों के आधार पर राजनीतिक और सामाजिक अध्ययन के लिए पर्याप्त सामग्री उपलब्ध हुई है इसमें कोई दो राय नहीं। उसके खुलासों से किसी देश की नीति और कूटनीति में कितना अन्तर है यह अध्ययन का विषय हो सकता है। नैतिकता की कितनी परतें होती हैं, उसके रेशे रेशे को इन खुलासों ने जगजाहिर कर दिया है। लेकिन कोई भी उपलब्धि किस कीमत पर मिली है बिना इसका मूल्यांकन किये बिना हम नहीं रह सकते। दूसरे किसी भी बात के खुलासे के उद्देश्यों को जब तक सामने न रखा जाये हम यह नहीं कह सकते कि भला हुआ या बुरा। उद्देश्य की स्पष्टता के अभाव में केवल खुलासे का थ्रिल पैदा करना या अपनी हैकर प्रतिभा का प्रदर्शन मेरे खयाल से कोई महान कार्य नहीं है।

लेखक अभिज्ञात इन दिनों सन्मार्ग, कोलकाता में वरिष्ठ उप-सम्पादक के रूप में कार्यरत हैं. इसके पहले वह दैनिक जागरण-जमशेदपुर, वेबदुनिया डाट काम-इंदौर, अमर उजाला-जालंधर / अमृतसर में सीनियर पदों पर काम कर चुके हैं.


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