पत्रकारों को मुगालता हो गया है कि वह मीडिया हो गया है : अजय उपाध्याय

E-mail Print PDF

: न्यू मीडिया कर रहा सच्ची पत्रकारिता - राजीव सिंह : वाराणसी। वेब पत्रकारिता या न्यू मीडिया ही आगामी दिनों की पत्रकारिता है क्योंकि इस ओर आज के दौर में लोगों का रूझान तेजी से बढ़ रहा है। इस नयी पत्रकारिता में सच का बोलबाला समझ में आता है। जहां अभी तक न तो अपनी टीआरपी बढ़ाने की जरूरत समझी जा रही है और न ही प्रिंट मीडिया की तरह विज्ञापन के लिए किसी के पक्ष में वन साइडेड होकर लिखा जा रहा है।

इस आशय के विचार शनिवार को चंद्रकुमार मीडिया फाउंडेशन एवं हिंदी विभाग महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित ‘सच और पत्रकारिता’ विषयक संगोष्ठी में वक्ताओं ने व्यक्त किए। संगोष्ठी की शुरूआत में आयोजक जागरण इंस्टीट्यूट आफ मैनेजमेंट एंड मास कम्युनिकेशन, नोएडा की ओर से राजीव सिंह ने विषय की स्थापना करते हुए कहा कि आज के दौर में पत्रकारिता से जुड़े लोग सच से किनारा करते जा रहे हैं। इलेक्ट्रानिक मीडिया अगर अपनी टीआरपी बढ़ाने के लिए तथ्यों को तोड़मरोड़ कर पेश करता है तो हो-हल्ला होने पर पुनः अपनी खबरों का खंडन स्वयं कर देता है।

यही काम प्रिंट मीडिया के लोग अपना विज्ञापन बढ़ाने के लिए कर रहे हैं। यह कार्य प्रिंट और इलेक्ट्रानिक मीडिया के लिए कहीं से भी शुभ संकेत नहीं है। श्री सिंह ने दो-तीन दिन पहले दो अखबारों के दफ्तरों के ठीक सामने हुई एक घटना का हवाला दिया जिसमें आईजी ने दो वाहन सवारों को मात्र इसलिए लाठियों से पीट दिया कि उसके वाहन से आईजी के वाहन को मामूली धक्का लग गया। इस घटना को सैकड़ों मीडियाकर्मियों ने अपनी आखों से देखा लेकिन इस सच को किसी ने उजागर करने की हिम्मत नहीं दिखाई। यह भी पत्रकारिता का एक सच रहा।

राजीव सिंह ने हिंदुस्तान वाराणसी का अपरोक्ष रूप से जिक्र करते हुए कहा कि यह वही अखबार है जिसने कभी बनारस पुलिस के आला अफसर रह चुके सूर्यकुमार शुक्ल की पत्नी डाली शुक्ला के आत्महत्या प्रकरण को पूरी शिद्दत से उठाया था। सूर्यकुमार शुक्ल ने काफी दबाव बनाया और उस समय समूह संपादक पद पर अजय उपाध्याय हुआ करते थे जो आज की संगोष्ठी के मुख्य वक्ता हैं। उनपर भी शायद दबाव पड़ा होगा पर सूर्यकुमार शुक्ल की खबर पूरी शिद्दत से छह-छह कालम में छपती रही। इसका परिणाम यह रहा कि उस समय यही अखबार बनारस के अखबारों में नबर वन हो गया था। आज वही अखबार (हिंदुस्तान) है जो आईजी द्वारा निर्दोष और निरीह युवकों को पीट-पीट कर अधमरा करने की खबर को अपनी आंखों से देखकर भी नहीं छापता है। ऐसी घटनाएं साबित करती हैं कि पत्रकारिता और समाचारपत्र कितनी सत्यता अपने पाठकों को परोसते हैं।

उन्होंने उम्मीद जताई कि इस दौर में भी कुछ पत्र और पत्रकार हैं जो अपना सब कुछ गंवाकर भी सच की मुहिम को जिंदा रखने की कोशिश में लगे हैं। इस क्रम में उन्होंने वेबसाइट ‘पूर्वांचल दीप डाट काम’, ‘भड़ास4मीडिया’ और ‘जनसत्ता एक्सप्रेस डाट नेट’ का जिक्र किया। जिन्होंने इस सच को जनता के सामने लाने की हिम्मत दिखाई। काशी विद्यापीठ जनसंचार विभागाध्यक्ष अनिल उपाध्याय ने कहा कि पत्रकारिता पहले मिशन थी अब प्रोफेशन और कमिशन के सहारे चल रही है। काशी पत्रकार संघ के पूर्व अध्यक्ष संजय अस्थाना ने कहा कि कैसे कोई सच सामने आ सकता है जब प्रबंधतंत्र ही पत्रकार को नियुक्त कर रहा है। यह वही प्रबंधतंत्र है जिसे पत्रकारिता का ककहरा भी ज्ञात नहीं है।

काशी हिंदू विश्वविद्यालय के पूर्व विधि संकाय प्रमुख प्रो. एम. पी. सिंह ने कहा कि भारतीय संविधान में कार्यपालिका, न्याय पालिका और व्यवस्थापिका यही तीन खंभे बताए गए हैं। चौथे खंभे की बात खुद मीडिया ने ही पैदा की है। अब अगर तीन खंभे हिलडुल रहे हैं तो चौथे खंभे का हिलना डुलना भी स्वाभाविक है। इस लिहाज से हम वर्तमान मीडिया को भी पाक साफ नहीं कह सकते।

संगोष्ठी के मुख्य वक्ता अमर उजाला के सलाहकार संपादक अजय उपाध्याय ने कहा कि पत्रकारों को मुगालता हो गया है कि वह मीडिया हो गया है। पत्रकारिता एक रूप है उस रूप में कितना सच छिपा है इसे समझना होगा। और जहां तक समझने की बात है समाचार सिर्फ एक घटना को सिग्निफाई करती है। संकेत मिलने लग गए हैं कि मीडिया तंत्र पर एक बार फिर सच्ची पत्रकारिता हावी होगी। पत्रकारों की हैसियत बढ़ेगी और इसमें स्किल व इमोशंस का प्राबल्य प्रकट होगा। उन्होंने ‘डिकन्स्ट्रक्शन’ शब्द का जिक्र करते हुए कहा कि पर्दे के पीछे का सच ही असली खबरों या ‘डिकन्स्ट्रक्शन’ के रूप में सामने आएगा। अध्यक्षता करते हुए काशी विद्यापीठ मानविकी संकाय के संकायप्रमुख प्रो. अजीज हैदर ने उपस्थित लोगों के प्रति आभार जताते हुए अपने विचार इन पंक्तियों में पेश किए-

देके जब झूठी खबर वो कभी धर जाते हैं,
पड़ती है मार कभी इतनी कि मर जाते हैं,
झूठ अखबार का वो हैं जो बदल देता है रूख,
इससे मासूम पे भी जुल्म गुजर जाते हैं,
छापो तुम सच्ची खबर हो अगर अखबार नवीस
बात झूठी जो हुई लोग बिफर जाते हैं,
आज इस गोष्ठी में कह दो अजीजे खुशखू
सच्ची खबरों के करीं अहले नजर आते हैं।

संगोष्ठी में प्रो. दीपक मल्लिक, काशी हिंदू विश्वविद्यालय के जनसंपर्क अधिकारी डा. विश्वनाथ पांडेय, काशी पत्रकार संघ के महामंत्री कृष्णदेव नारायण राय, जिला कांग्रेस के कार्यकारी अध्यक्ष अनिल श्रीवास्तव और हाल ही में कांग्रेस से जुड़े धर्मेंद्र सिंह ने भी विचार व्यक्त किए। संगोष्ठी में राघवेंद्र चढ्ढा, रामप्रकाश ओझा, योगेश कुमार गुप्त पप्पू, डा. श्रद्धानंद, डा. तीर विजय सिंह आदि मौजूद थे। जबकि बांटे गए इन्विटेशन कार्ड पर छपे निवेदकों के नाम में से आनंद चंदोला, जगत नारायण शर्मा, डा. दयानंद, विकास पाठक आदि संगोष्ठी खत्म होने तक दिखाई नहीं पड़े।


AddThis