धोबी घाट : किरण का असफल प्रयोग

E-mail Print PDF

धोबी घाटमिस्‍टर परफेक्‍टनिस्‍ट आमिर खान, जिन्होंने लगान, मंगल पाण्डेय, गजनी, थ्री इडियट्स जैसी शानदार, संदेशपूर्ण और मनोरंजक फिल्मों से दर्शकों के मन में एक ख़ास पहचान कायम की, उनकी इस नयी फिल्म "धोबी घाट" को देखने जाने के लिए मैं आपको एक वजह भी नहीं बता सकता. ऐसा प्रतीत होता है कि आमिर ने ये फिल्म अपनी पत्नी किरण राव की भावनाओं में बह कर की है.

आमिर खान एक जबरदस्त अभिनेता हैं, ऐसा सब जानते हैं पर यहाँ लगता ही नहीं कि उन्होंने अभिनय किया है. केवल "हाँ","ना","सारी" और कुछ छोटे-छोटे संवादों को बोलने के अलावा उन्होंने कुछ नहीं किया. किरण आमिर से अभिनय नहीं निकलवा पायीं और आमिर जिनकी हर अगली फिल्म पुरानी फिल्म से कहीं ज्यादा अच्छी होती है, ये फिल्म बहुत ज्यादा हल्की नजर आई. 1 घंटा 45 मिनट की इस फिल्म में न ही कोई ख़ास है, न ही गाना और ना ही कुछ ऐसा जो दर्शकों को लुभा पाए. आगरा शहर में ये किसी भी सिंगल स्क्रीन में नहीं लगी और मल्टीप्लेक्स में भी ज्यादा दर्शक नहीं बटोर सकी. फिल्म पूरे परदे पर नहीं दिखती है और ऐसा लगता है कि आमिर पहले ही इस फिल्म का हश्र जानते थे, इसलिए उन्होंने इसका प्रचार नहीं किया.

कहाँ गजनी में उन्होंने दिल्ली में जाकर बाल काटे थे, थ्री इडियट्स में वेश बदलकर बनारस और कोलकाता जैसे शहरों में घूमे थे, पर धोबी घाट में शांत पड़ गए. वो जानते थे कि फिल्म का कोई औचित्य या नैतिक शिक्षा नहीं है. इसको बहुत ही शांत ढंग से रिलीज किया गया. मुम्बइया पृष्टभूमि पर बनी फिल्म आखिरकार क्या दिखाना चाहती थी ये समझने में असफल रहे. मुम्बई पर और भी फिल्म बनी हैं जैसे- प्राण जाये पर शान न जाये, वंस अपान अ टाइम इन मुम्बई, वास्तव, सत्या  आदि जिनमें मुंबई के अलग-अलग मुद्दों को बड़े ही बेहतरीन ढंग से पेश किया है. पर धोबी घाट समझने में खासी दिक्कत हुई.

कहानी मुंबई से शुरू होती है. अरुण (आमिर खान) एक पेंटर हैं और अपनी पत्नी को तलाक देकर मुम्बई में रहते हैं, पर ये तलाक वाली बात हमें आधी फिल्म में पता चलती है. आमिर एक प्रदर्शनी लगते हैं जिसमें उनकी मुलाकात शाई (मोनिका डोगरा) से होती है, जो पेशे से इन्वेस्टमेंट बैंकर है और अमेरिका से मुंबई एक प्रोजेक्ट के सिलसिले में आई हैं. वह फोटोग्राफी की भी बहुत शौक़ीन हैं. मुलाकात के बाद वह आमिर खान के साथ उनके घर चली ज़ाती हैं और नशे में धुत्त दोनों के बीच शारीरिक सम्बन्ध बन जाता है. अगली सुबह अरुण शाई को सॉरी बोलता है और कहता है कि  वो कोई रिश्ता उससे नहीं रख सकता. शाई गुस्साकर चली ज़ाती है.

आमिर को खुल के नशा करते दिखाया गया है और शुरू में बस एक लाइन दिखाई है "CIGGARATE SMOKING IS INJURIOUS TO HEALTH" जो कि बहुत कम लोग पढ़ते हैं. मुन्ना एक धोबी है जो कि अभिनेता बनने के सपने से मुंबई आया था, लेकिन ख़ास बात ये है कि इसे कभी भी ऑडिशन तक देते नहीं दिखाया. वह रात में डंडा लेकर निकलता है और क्या करता है ये ढंग से समझ नहीं आया. बस फिल्म के आखिरी कुछ पल में उसे चूहा मारते दिखाया है. अरुण अपना घर बदल लेता है. शाई मुन्ना के जरिये अरुण का पता जानने की कोशिश करती है और एक पल ऐसा लगता है कि वह अरुण से प्रेम करती है, पर मुन्ना के प्रति उसका झुकाव देखकर इस बात को पक्के तौर पर नहीं कहा जा सकता. बिट्टू इसी बीच शाई से प्रेम करने लगा था. यह सब झोलम झोल देखकर लगा कि शायद ये प्रेम कहानी होगी, पर मैं गलत निकला. ऐसा तो कुछ नहीं था.

इसी बीच अरुण को अपने नए घर में कुछ सामान मिलता है, जिसमें घर में पहले रहने वाली औरत की बनायीं हुई वीडियो थे जो उसने अपने भाई के लिए बनायीं थी. अरुण उन्हें देखते हैं और उनसे जुड़ जाते हैं. आधी फिल्म की खपत इन वीडियो में ही हो गयी. अंतिम वीडियो में नसीमा बताती है कि उसके पति ने दूसरी शादी कर ली है और कहती है कि ये उसका आखिरी  वीडियो है. आमिर सोचते हैं कि नसीमा ने पंखे से लटककर जान दे दी थी और वह फूट-फूट कर रोतें हैं और अपना घर बदल लेतें हैं. इधर शाई भी अलग चली ज़ाती है और मुन्ना भी. मुन्ना शाई को अरुण का नया पता देता है पर शाई उस पर ध्यान नहीं देती.  कहानी ख़तम होती है.

प्रतीक बब्बर और मोनिका डोगरा दोनों ही बहुत सुन्दर लगे हैं और आमिर खान के क्या कहने, पर कहानी कुछ भी बताने से चूकती है. अब मुझ जैसा औसत दिमाग वाला इस कहानी को नहीं समझ पाया, पर हो सकता है कि यह कहानी किरण ने थोड़ा ऊँचे सोच वालों के लिए बनायीं हो. फिल्म का नाम धोबी घाट है, पर धोबी घाट बमुश्किल 3 या 4 बार दिखाया गया है, इससे ज्यादा धोबी घाट तो मुन्नाभाई फिल्म में देखने को मिला था. अरुण पेंटर हैं पर पूरी फिल्म में उन्होंने बस एक पेंटिंग बनायीं है. हाँ शाई ने तस्वीरें बहुत ली हैं. खैर आमिर जैसे जबरदस्त अभिनेता ने कहीं न कहीं प्रोफेशनल और पर्सनल जिंदगी को मिलाया जिसके चलते शायद ऐसा हुआ. जो आमिर खान को साल भर के बाद परदे पर देखने जाना चाहते हैं  वह इसे देखने जरुर जाएँ. दर्शक जो केवल आमिर के नाम से जाते थे उन्हें कहीं न कहीं हताश होकर लौटना पड़ा. ये प्रयोग निश्चित तौर से असफल रहा और मुझे आमिर की अगली फिल्म का इन्तजार रहेगा.

सागर गुजराती की यह समीक्षा उनके ब्‍लाग SG HOURS से साभार लेकर प्रकाशित की गई है.


AddThis