भारतीय सिनेमा के आदिपुरुष यानी चार आने के फाल्‍के

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शेषजीटेलीविज़न पर मराठी फिल्म "हरिशचंद्राची फैक्टरी" देखने का मौक़ा मिला. एक बहुत ही अज़ीज़ दोस्त ने कहा कि मराठी भाषा न जानने की वजह से फिल्म को देखने में कोई दिक्क़त नहीं आयेगी. इस फिल्म के बारे में इतना पता था कि आस्कर पुरस्कारों के लिए गयी थी लेकिन पुरस्कार मिला नहीं. फिल्म देख कर समझ में आया कि आस्कर पुरस्कार देने वाले गलती कैसे करते हैं. यह फिल्म भारतीय सिनेमा के आदिपुरुष दादा साहेब फाल्के की पहली फिल्म हरिश्चंद्र तारामती के निर्माण के बारे में है.

दादासाहेब फाल्के ने इस देश में सिनेमा की बुनियाद डालने के लिए अपना सब कुछ दांव पर लगा दिया था. उनके उद्यम को विषय बनाकर बनायी गयी यह फिल्म बेहतरीन है और पहली बार फिल्म निर्देशन का काम कर रहे परेश मोकाशी की लीक से हट कर चलने की हिम्मत भी लाजवाब है. फिल्म एक वृत्तचित्र है लेकिन डाक्‍युमेंटरी की तरह बनायी गयी है. दादासाहेब फाल्के के दृढ़निश्चय को फिल्म की भाषा में पेश करने की कोशिश में फिल्मकार ने एक ऐसी फिल्म बनाने में सफलता हासिल कर ली है, जो गैर मराठी भाषी को भी मन्त्रमुग्ध करने की क्षमता रखती है. फाल्‍केदादासाहेब फाल्के की शुरुआती ज़िंदगी और खतरों से खेलने की क्षमता को बहुत ही अच्छी तरह से प्रस्तुत किया गया है.

मुंबई में प्रिंटिंग प्रेस की नौकरी छोड़कर जब फाल्के ने जादू दिखाने का काम शुरू किया तो जिस ऊहापोह से गुज़रे वह बहुत  ही अच्छी तरह से फिल्म के व्याकरण में क़ैद कर लिया गया है. जादू दिखाने के काम के दौरान उन्होंने चलती फिरती तस्वीरें देखीं. अभिभूत हो  गए. तब तक फिल्मों के बारे में कुछ नहीं जानते थे, लेकिन पढ़-लिख कर पता लगाया कि लन्दन में उस तरह की फ़िल्में बनती थीं. खर्च पानी का इंतज़ाम करके लन्दन गए और वहां देखा कि छोटी-छोटी फिल्म बनती थीं, कलाकार कुछ बोलते नहीं थे लेकिन मनोरंजन ख़ासा होता था. लन्दन में ही उन्होंने हज़रत ईसा मसीह के जीवन पर बनी एक फिल्म देखी जिसमें एक कहानी थी. बस उन्होंने फैसला कर लिया कि लौट कर महापुरुषों के जीवन पर आधारित फ़िल्में बनायेंगे. लन्दन से स्वदेश लौटने के पहले कैमरा खरीदने का आर्डर दे दिया और यहाँ आकर अयोध्या के राजा हरिश्चंद्र के जीवन पर फिल्म बनाने का मन बनाया. दादा साहेब फाल्के की भूमिका इस फिल्म में नंदू माधव ने निभाई है जबकि फाल्के की पत्नी सरस्वती की भूमिका मराठी थियेटर की सफल अभिनेत्री विभावरी देशपांडे ने की है. दोनों ही कलाकारों का अभिनय बेहतरीन है.

'हरिशचंद्राची फैक्टरी' फिल्म की कहानी 1911 में शुरू होती है जब फाल्के ने कुछ नया कर गुजरने का मन बनाया. 1913 में हरिश्चंद्र तारामती प्रदर्शित होने और उसके बाद के फाल्के के हौसले को फाल्‍केजिस तरह से फिल्माया गया है वह लाजवाब है. फिल्म में ह्यूमर है लेकिन फिल्म बहुत ही गंभीर है. ह्यूमर की शास्त्रीय परिभाषा में बताया गया था कि अपने आप पर हंसने की क्षमता ही ह्यूमर होता है. ज़ाहिर है अपने आप पर हंस पाना कमज़ोर इंसान का गुण नहीं होता, उसके लिए अन्दर की बहुत मजबूती चाहिए. पूरी फिल्म में ऐसी बहुत सारी सिचुएशंस हैं, जब मुख्य कलाकार नंदू माधव दादासाहेब की ज़िंदगी के बहुत मुश्किल लम्हों को ह्यूमर में बदल देते हैं. इससे फाल्के के चरित्र की ऐतिहासिक मजबूती और नंदू माधव की अभिनय क्षमता दोनों का डंका बज जाता है. जब अपने घर को छोड़कर फिल्म बनाने की अपनी योजना को कार्यरूप देने के लिए फाल्के अपने बच्चों और पत्नी के साथ चल पड़ते हैं तो उनकी मंजिल दादर है. उन्हें पता चला था कि दादर में फिल्म का काम करने के लिए सस्ते दामों पर ज्यादा जगह मिल आयेगी.

दादर उन दिनों शहर से बहुत दूर था. उनकी पड़ोसी एक महिला अपने पति से पूछती है कि सुना है कि दादर में तो जंगल हैं. जवाब में बहुत सारी सूचना एक वाक्य में भर दी गयी है. बुढऊ कहते हैं कि फाल्के जैसे जंगली के लिए वह सही जगह है. अभिनेताओं के लिए दिया गया विज्ञापन और उसके जवाब में आने वाले लोगों का जो हिस्सा है वह भी फाल्के की उस योग्यता की सनद है कि वे विपरीत हालात में किस तरह से लक्ष्य को नहीं भूलते. तारामती के रोल के लिए महिला कलाकार की उनकी तलाश के जो शाट हैं, वह बहुत ही अच्छी तरह से प्रस्तुत किये गए हैं. किसी महिला को सिनेमा में काम करने के लिए तैयार कर पाना उन दिनों असंभव था. लेकिन फाल्के ने आसानी से हार नहीं मानी. तवायफों के कोठों पर भी गए लेकिन सफलता हाथ नहीं लगी. आखिर में लड़कों को ही स्त्रियों के रोल में इस्तेमाल किया. जिस लड़के को तारामती को रोल दिया उसका मूंछ सहित तारामती का रोल करने का आग्रह और उसको उसके बाप की मौजूदगी में मूंछ साफ़ कराने के लिए राजी कर पाना बहुत ही कठिन काम था, लेकिन उसे फाल्के ने हासिल किया और नंदू माधव ने उस सीन में जान डाल दी. उसके पहले अपनी पत्नी को तारामती की भूमिका देने की जो कोशिश है वह विभावरी देशपांडे और नंदू माधव को वहां स्थापित कर देती है, जहां अभिनय की काबिलियत के लिहाज़ से हिन्दी फिल्मों का कोई भी मौजूदा स्टार नहीं पंहुच पाया है.

फाल्के की फिल्म लन्दन में दिखाई गयी और वहां के फिल्म उद्योग के नेताओं ने उन्हें आमंत्रित किया कि लन्दन में ही रहकर फिल्म बनाइये, लेकिन उन्होंने यह कहकर मना कर दिया कि अगर वे ज्यादा पैसे के लालच में लन्दन में फिल्म बनायेंगे तो भारत में फिल्म उद्योग की स्थापना ही नहीं हो पायेगी. बाद में जब नंदू माधव और विभावरी देशपांडे मुंबई की सड़कों पर चार आने में फाल्के नाम के खिलौने बिकते देखते हैं तो उनकी समझ में आ जाता है कि भारतीय सिनेमा के आदिपुरुष ने अपना काम कर दिखाया है. फिल्म में कोई भी नाच गाना नहीं है लेकिन आनंद मोदक का संगीत बहुत ही अच्छा है. पूरी फिल्म में लगता है कि आप 1910 के मुंबई में ही घूम रहे हैं. उसके लिए कला निर्देशक नितिन चंद्रकांत देसाई और संगीतकार आनंद मोदक की तारीफ़ की जानी चाहिए. सिनेमा के इतिहास पर एक ऐतिहासिक फिल्म बहुत ही अच्छी बन गयी है. इस तरह की फ़िल्में बनाने का सौदा बहुत ही रिस्की होता है. श्याम बेनेगल जैसा फिल्मकार भूमिका बनाकर इस सच्चाई को रेखांकित कर चुका है लेकिन फिर भी आशा की जानी चाहिए कि हिन्दी में भी इस तरह की फ़िल्में बनाने की दुबारा कोशिश की जायेगी.

लेखक शेष नारायण सिंह देश के जाने-माने पत्रकार और स्तंभकार हैं.


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