''ई सरवा अपने के बहुत बड़ा साहित्‍यकार लगावत हव''

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: ये अभिव्‍यक्ति बता रही है फिल्‍म में अस्‍सी की आत्‍मा मरी नहीं है : कुछ ऐसे ही वाक्य का प्रयोग किया था उसने उन महानुभाव के लिए। वही जिन्होंने गालियों के प्रति एक ऐसा नजरिया पेश कर दिया कि अब गाली खाना सभी के लिए सम्मान का विषय हो गया। हालांकि उन्होंने कभी ये नहीं सोचा होगा कि कभी इस तरह से कोई उनका सम्मान करेगा। इससे पहले कि आप मुझे गरियाने के मूड में आ जाये मैं आपको बता ही देता हूं कि माजरा क्या है।

दरअसल पूरा वाक्या बनारस के अस्सी घाट का है, जहां डाक्टर चंद्र प्रकाश द्विवेदी अपनी फिल्म 'मोहल्ला अस्सी' की शूटिंग कर रहे हैं। फिल्म की कहानी प्रख्यात हो चले साहित्यकार काशीनाथ सिंह की अनुपम रचना काशी का अस्सी पर आधारित है। शूटिंग के दौरान ही एक दिन मैं भी वहां पहुंचा। काशीनाथ सिंह जी भी वहीं मौजूद थे। उनके आस-पास कुछ लोग टहल रहे थे। कुछ ऐसे भी थे जो उनका ध्यान अपनी ओर खींचना चाहते थे। दुर्भाग्य से काशीनाथ सिंह ने उनकी ओर ध्यान दिये बिना ही पास खड़ी वैनिटी वैन की ओर कदम बढ़ा दिये।

ये बात पास खड़े कुछ लोगों को नागवार गुजरी और उन्होंने बेहद सहज तरीके से इतना ही कहा कि 'ई सरवा अपने के बहुत बड़ा साहित्यकार लगावेला।' अपने बारे में ये सम्मान भरा वाक्य सुनने के लिए न तो काशीनाथ सिंह जी वहां नहीं थे। पर गालियों को लेकर काशीनाथ सिंह जी ने जो प्रयोग किये वो एक खांटी बनारसी ही कर सकता है। गालियों का एक दर्शन है और उसकी समझ एक बनारसी को होती है। किस समय कौन सी गाली दी जाती है, ये एक बनारसी को पता होता है। आमतौर पर गाली के लिए सभ्य समाज में कोई स्थान नहीं होता है, लेकिन बनारस के जीवन से अगर गाली को निकाल दिया जाये तो कुछ बचता ही नहीं हैं। उन्मुक्त और सहज विचार प्रवाह के लिए गालियों की नितांत आवश्यकता होती है।

काशी का अस्सी उपन्यास में काशीनाथ जी ने पूरी कोशिश की है कि ग्लोब्लाइज्ड होते सिनेरियो को पूरी तरह लोकलाइज्ड मैनर में पेश कर दिया जाये। अस्सी की अड़ी एक ऐसा ही स्थान है, जहां दुनिया जहान की हर बात लोकल मैनर में आती है और ग्लोब्लाइज्ड तरीके से उसका विश्लेषण किया जाता है। एक चाय की दुकान के इर्द-गिर्द पूरी दुनिया घूमती हुई नजर आयेगी आपको। संसार की कई बड़ी हस्तियों की आत्मायें भी अपने बारे में लोगों की राय जानने के लिए यहां आती हैं। ऐसा लोग कहते हैं।

इस मोहल्ले पर फिल्म बन सकती है इसका तो मुझे यकीन था, लेकिन फिल्म डाक्टर चंद्र प्रकाश द्विवेदी बनायेंगे ये उम्मीद नहीं थी। मोहल्ला अस्सी बनाने से पहले अस्सी इलाके को महसूस करना बहुत जरूरी है। जिसने अस्सी इलाके को महसूस नहीं किया उसके लिए फिल्म बना पाना न तो संभव है और न ही उचित है। इसके बावजूद मेरे मन में ये आशंका थी कि मुम्बईया रंग का आदमी क्या वाकई में कुछ ईमानदार कर पायेगा। इसी आशंका को लेकर बनारस के अस्सी घाट पर शूटिंग देखने पंहुचा था। वहां जब आदरणीय काशीनाथ सिंह के बारे में सुना कि 'ई सरवा अपने के बहुत बड़ा साहित्यकार लगावत हव' तब मेरी आशंका दूर हो गई। अब लगता है कि शीला की जवानी से खेल रही जनता को मुन्नी का स्वाद भी फीका लगेगा जब वो बनारस का रस चख लेगी।

लेखक अशीष तिवारी बनारस के युवा पत्रकार और ब्‍लागर हैं. यह लेख्‍ा उनके ब्‍लॉग अग्निवार्ता से साभार लिया गया है.


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